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चंद्र दत्त पंत मास्साब की स्मृति में

मैं उनसे पहली बार आज से ठीक 58 वर्ष पूर्व मार्च 1962 में मिला था. मैंने वहां लीलावती पंत इंटर कालेज से इंटर की परीक्षा दी थी. अपनी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ में मैंने उस समय को शिद्दत से याद किया है. लिखा है: Chandra Dutt Pant

“हम वहां परीक्षा शुरू होने से दो-एक दिन पहले पहुंच गए. ददा, मैं और पानसिंह. डाट पर बस से नीचे उतर कर सामने देखा तो हपकपाल (हैरान) रह गया. इतना पानी, यहां से वहां तक! सामने डबाडब भरा हुआ ताल था, भीमताल. अहा रे ताल! तो, ऐसा होता है ताल? जैंतुवा ऐसा ही तो बताता था हमारी लोहाखाम की ताल के बारे में, ”

पानी-पानि, चारों तरफ गैरो (गहरा) पानि. और, जैसे ददा ने कहा था- डाट के सामने ताल के बीच में टापू था. वहां हरे-भरे पेड़ भी उगे हुए थे. टीन की छत वाला विश्राम गृह जैसा भी दिखाई दे रहा था. ददा ने मुझे उस ओर देखते हुए देखा तो कहा, “वहां तक लोग नाव से जाते हैं. वह देखो.” एक नाव टापू की ओर जा रही थी. “अच्छा, चलो, चलते हैं,” ददा ने कहा तो हम लोग अपनी कापी-किताबों के झोले और सामान लेकर ददा के पीछे-पीछे चल पड़े.

मैं चलते-चलते रास्ते भर सोचता रहा कि जिनके यहां जा रहे हैं उन्हें ददा कैसे जानते होंगे? फिर याद आया कि ददा ने नॉर्मल की पढ़ाई तो यहीं से की थी. तभी से जानते होंगे चंद्रदत्त मास्साब को. ददा को वे अच्छा मानते होंगे, इसीलिए अपने यहां बुलाया होगा.

हम डाट से नौकुचिया ताल की ओर जाने वाली सड़क पर चलते रहे फिर ऊपर उनके घर की ओर. गेट पर पहुंचे जिस पर लिखा था – बद्री निवास. गेट के दोनों ओर दो ऊंचे सुरई के पेड़ थे. हम गेट से ऊपर की ओर ऊंचाई में सीढ़ियां चढ़ने लगे. सीढ़ियों के दांई ओर नाली में साफ पानी बह रहा था जो बीच-बीच में उछल कर छल-छल करता था. कुछ दूर जाता, फिर गिरता, छल-छल. ददा ने कहा, “अभी ऊपर देखना.” ऊपर घर के समतल पर पहुंचे तो सामने देखा… एक बड़ा-सा फव्वारा था. चारों ओर गोल मेंड़़ बनी थी. बीच में एक पनिहारिन कमर में घड़ा रख कर जैसे पानी भर कर जाने के लिए तैयार खड़ी थी. फव्वारा ऊंचाई तक फुहार छोड़ रहा था. उसके चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों और हरे-भरे पौधों की क्यारियां थीं. आसपास चौड़ी पत्तियों वाले पाम के बड़े-बड़े पौधे थे. चारों ओर हराभरा, खिला-खिला माहौल था.

ददा ने घर पर जाकर हमारे आने की खबर की. तभी हंसता हुआ दीवान आ गया. वही दीवान जो खालगड़ा में खिमदा के साथ था और हंसने पर जिसका पूरा मुंह लाल हो जाता था. उसने हमें बांई ओर आउट हाउस के दो कमरे दिखाए. वहां सामान रखवाया. पता लगा, उसे ददा ने ही वहां लगवाया था. वह वहां खुश था. Chandra Dutt Pant

बाद में ददा ने हमें चंद्रदत्त पंत जी से मिलाया. उन्होंने हमें दो बच्चों रीना और बत्तू से मिलाया. फिर बोले, “तुम लोगों के पढ़ने के लिए यहां कितनी अच्छी-अच्छी जगहें हैं, आओ दिखाता हूं.”

उन्होंने घर के आगे एक ओर ‘कमल कुंड’ दिखाया. बोले, “देखो इसमें कमल खिले हैं.” फिर फव्वारे के पीछे नेस्टरशियम के फूलों की क्यारियों के पीछे की जगह दिखा कर कहा, “यहां एक बाग बनाना है, बाग के ही बराबर. झाड़ियों के बीच दिखाई देगा. बैठक के बाहर और भीतर की मूर्तियां दिखाईं. बैठक में एक किनारे सितार रखा था. बाहर आंगन में एक ओर बैठे हुए बुद्ध की काफी बड़ी मूर्ति थी. उसके सामने थोड़ा नीचे की क्यारी की ओर इशारा करके पूछा, “इलायची का पौधा देखा है कभी? बड़ी इलायची? ये देखो मैंने यहां लगाए हैं इलायची के पौधे.” हमने पहली बार बड़ी इलायची के पौधे देखे.

फिर बोले, “चलो, ऊपर बाग में चलते हैं.” हम जिस रास्ते चल रहे थे, उसके साथ-साथ नाली में साफ पानी भी बहता जा रहा था. ऊपर फिर एक बड़ा कुंड दिखा- राधा कृष्ण कुंड. उसमें मछलियां तैर रही थीं. पंत जी ने कहा, “यहां शांति से बैठ कर पढ़ सकते हो. ये पेड़ देखो- पहचानते हो इन्हें?”

मैंने कहा, ‘नहीं’. उन्हें मैं पहली बार देख रहा था. तब उन्होंने बताया, “ये लीची के पेड़ हैं. खूब फलते हैं. तुम इनके बीच बैठ कर भी शांति से पढ़ सकते हो.”

वहां पानी के कुछ और भी कुंड थे. उनमें मछलियां थीं. मुझे आश्चर्य हुआ कि इतना पानी आखिर आता कहां से है? सकुचाते हुए पूछा, ”यह पानी कहां से आता है?“

पंत जी ने इशारा करके कहा, “वहां, बहुत ऊपर से. मुझे वहां पानी का एक स्रोत मिल गया था. मैंने पक्का टैंक बना दिया. उसका पानी ऊपर के इस टैंक में आता है. वहां से खुली नाली में बहता, छलछलाता कुंडों में चला जाता है. घर की सीध में आने पर, पाइप से पहली मंजिल पर हमारी रसोई में पहुंच जाता है. वहां बर्तन वगैरह धोने के काम आता है. बाकी पानी नीचे उतर कर बड़े फव्वारे और दूसरे कुंडों में घूम कर छलछलाता नीचे गेट की ओर चला जाता है. तुमने आते समय देखा होगा.”

“और मछलियां?” मैंने पूछा तो वे हंस कर बोले, “हमने पाली हुई हैं. ये भी हमारी तरह यहां रहती हैं. इन्हें हम चारा-दाना वगैरह भी देते हैं. लेकिन, जानते हो इन्हें सबसे अधिक पसंद क्या है? भीमताल की ताल की सिवार (शैवाल). कालेज से लौटते समय मैं इनके लिए रोज सिवार ले आता हूं. और हां, मैं ताल में से मछलियों के छोटे-छोटे अंडे-बच्चे भी लाता हूं. वे यहां हमारे कुंडों में बढ़ते हैं. मछली बन जाते हैं. वे मछलियां इन कुंडों में खेलती रहती हैं, वो देखो!” Chandra Dutt Pant

मैं वह सब कुछ देख कर बहुत चकित रह गया था. एक आदमी छोटे-से स्रोत से पानी लाकर अपने घर और बाग में इतनी हरियाली ला सकता है! अपने लिए हरे-भरे पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों और मछलियों की दुनिया रच कर उनके बीच रह सकता है! वे तमाम मूर्तियां उन्होंने स्वयं बनाई थीं. पेड़-पौधे स्वयं लगाए थे. वे देर रात तक सितार बजाते थे. सुबह की बयार में उनके राग गूंजते थे.”

श्रद्धेय पंत जी की स्मृति को पुष्पाजलि के साथ विनम्र नमन.

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वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

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