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आज से तकरीबन पच्चीस बरस पहले का होगा ये वाक़िया. गर्मियों के दिन थे और अपने बड़े भाई साहब के दोस्त के ननिहाल जाना हुआ. तब होता था ऐसा कुछ. दोस्त के मामा के ननिहाल या मामा के दोस्त के ननिहाल आप कहीं भी आ-जा सकते थे. कई बार तो ननिहाल के दोस्त के मामा के वहाँ भी जाने का मौका मिल जाता था. दो बड़े शहरों को मिलाने वाली सड़क के पास का गाँव था इसलिए वाहियातपना दुतरफा घुसे जा रहा था. (Column by Amit Shrivastav)
दोपहर से पहले-पहले का वक्त था जब हम घर में दाख़िल हुए. बैठक में बैठे मामा और गलियारे में खड़ी मामी से मिलते-मिलाते आँगन में पहुंचे जहाँ नानी थीं. संस्कारों के दबाव और परम्परागत सिखलाई के अनुसार हम नानी के चरण स्पर्श उर्फ पाँव लागी को लपके. पर ये क्या? हम अधरस्ते ही लपक लिए गए. अचानक ही बैठक से उठकर गलियारा लांघते हुए मामा जाने कब अवतरित हुए और मेरी बाईं बाँह पकड़ कर आलमोस्ट हवा में झुला दिया. कसम जॉन्टी रोड्स की अगर हड्डियों पर, कसम खाने भर को ही सही, मास न चढ़ा होता तो आज हम बाएं हाथ से किये जाने वाले सारे काम बाएं पैर से करने पर मजबूर होते.
हम हतप्रद थे. आश्चर्य मिश्रित अनिश्चितता से लाल हो रहे चेहरे (मामा से गुस्सा होने का प्रचलन इतिहास में भी निषिद्ध बताया गया है) पर दृष्टिपात किये बिना मामा ने हमें पास ही पड़े तख्त पर सेफली लैंड करा दिया. हमें लगा ‘आउट दे’ (तब यही पुकारने का चलन था, बाद में जाने किस पढ़े-लिखे ने ‘हाउ इज़ दैट’ करा दिया) की आवाज़ भी अब आ ही जानी चाहिए कि एक मीठी लेकिन दृढ़ आवाज़ ने चौंका दिया. (चौका नहीं चौंका, आराम-आराम से पढ़िए) ‘छूअ जिन… छुअ जिन… छुअ जिन मोरे लाल. आवाज़ नानी की थी. हमें लगा नानी किसी मंत्र का जाप कर रही हैं क्योंकि अभी-अभी स्नान करके आई थीं और आँगन में डारे पर अपनी धोती सूखने डाल रही थीं जब हम उनके गोड़ पड़ने को लपके थे.
स्थिति स्पष्ट होने से पहले ही पिच पर नीरज दा का आगमन हुआ. हमारे बड़े भाई साहब के दोस्त के छोटे भाई साहब. (मैंने कहा न तब…) उन्होंने भी उन्हीं संस्कारों के दबाव और वैसी ही सिखलाई के अनुसार नानी के पाँव की ओर अपना हाथ बढ़ाया. मामा को इस बार जॉन्टी रोड्स नहीं बनना था, शायद इसलिए, कि वहीं खड़े थे, या शायद इसलिए कि नीरज दा को बाँह पकड़ कर झूला झुलाने में उन्हें अपने दोनों हाथों का काम पैरों से लेने की नौबत आ सकती थी, उन्होंने बस वो इशारा किया और उस पोज़ीशन में खड़े रहे जो बैट्समैन के तैयार होने तक डेविड शेफर्ड किया करते थे. मुझे कमर से बस ज़रा सा न्यून कोण बनाए, दाहिना हाथ अपनी बगल में उठाए आगे को झुके मामा के मौन इशारे से ज़्यादा आश्चर्य नानी के बोलने से हुआ. मेरे आश्चर्य को धार देते हुए नानी ने फिर उसी मंत्र का जाप किया था ‘मोरे लाल छूअ जिन… छुअ जिन… छुअ जिन’.
वैसे इस मंत्र का मतलब ये तो नहीं था पर जब मामा ने ‘अबै नहाई के आय हईंन पूजा करिहं तब ओकरे बाद…’ कहकर और बाद में कुछ और सन्दर्भ-प्रसंग-उदाहरणों से वस्तुस्थिति को स्पष्ट किया तब जाकर नानी का कहा समझ में आया. नानी सफाई पसंद थीं. इस वाली सफाई में रगड़ाई-धुलाई-घिसाई से लेकर टच-मी-नॉट, कीप डिस्टेंस, हैंडल विद केयर, यूज़ डिप्पर एट नाइट सब शामिल था. नानी को जितनी पसंद थी सफाई, सफाई को भी नानी उतनी ही पसंद थीं. मैंने उनके पाँव देखे. उन्हें ज़मीन पर रखती होंगी, लगता ही नहीं था. पानी से धोए जाने की बारम्बारता की वजह से उँगलियाँ गुलाबी होते-होते सफेद पड़ चुकी थीं. हाथों का भी कुहहियों तक कमोबेश यही हाल था. नानी को छूने के निश्चित घण्टों में जब मैंने उनके पाँव छुए तो लगा सेमल के फाहे छू रहा हूँ.
जेठ की लंबी दुपहरिया बीत चुकी थी. हमारी वापसी का समय हो चला था. नानी से मिलने हम दुबारा आँगन में पहुंचे. नानी अंदर वाली कोठरी में चली गई थीं. हम उधर को होने को हुए कि हमने नानी की वही सफेद धोती को आँगन में डारे पर झूलते देखा. इतने घण्टे बाद भी उससे पानी टपक रहा था. इतनी कड़ी धूप में इतने घण्टे टँगी होने के बाद भी. हमारे आश्चर्य को ताड़ लिया मामी ने- ‘ई पँचवीं बार हौ, अम्मा धोई के डारे हइन’ फिर जो तफ़सील दी उसके अनुसार दरअसल आँगन के पार एक मंदिर था. वहाँ के पुजारी जी का आज कोई मेहमान आया था. जाने क्यों थोड़ी-थोड़ी देर में वो खंखार कर थूक रहा था. तो वो उड़कर कहीं धोती को गंदा न कर दे, नानी हर बार आक थू की आवाज़ सुनते ही धोती को बाल्टी में डुबा दे रही थीं.
हमारा मुँह खुला-का-खुला रह गया (खुलने और बंद होने के अलावा कोई ऑप्शन भी नहीं होता) घटनास्थल का भूगोल ही ऐसा था. आँगन के बीचों बीच में था डारा, आँगन की पिछली दीवार बाइस गज न भी हो करीब आठ-दस फ़ीट दूर तो होगी ही. दीवार के बाद एक बड़े मैदान जैसा अहाता था उसके पार था मंदिर. मंदिर के दूरस्थ कोने में था चापाकल जिससे आगे बनी नाली पर ये उत्सर्जन हो रहा था. ‘आक थू’ की आवाज़ को भी यहाँ तक पहुंचने में मशक्कत करनी पड़ रही होगी. मगर नानी उर्फ छुआ जिन! उनकी कल्पनाशीलता को प्रणाम करते हुए हम दो कदम आगे बढ़कर मार्क वॉग की तरह ‘थुक्का’ उड़ाते हुए किसी आदमी की कल्पना करते पर दूरी इतनी थी कि रवि शास्त्री की तरह ढक्क से स्टम्प्ड हो जाते.
कुछ ही सालों में नानी को स्पर्श के निश्चित घण्टे मिनटों में तब्दील होकर लगभग समाप्त हो चुके थे. नानी टच मी नॉट उर्फ छुअ जिन की ब्रांड अम्बेसडर, पोस्टर गर्ल लगभग आधिकारिक घोषणापत्र, विद सिग्नेचर, हो चुकी थीं. बाद के सालों में मामा हमारे ही शहर के किसी होमियोपैथ डॉक्टर की क्लीनिक पर स्किन डिसीज़ की दवा लेते पाए जाते थे. दरअसल डिसीज़ स्किन पर तो बाद में उभरी थी उसके पहले उसने नानी के मन-मंदिर (?) को घेरे में लिया था. नानी ने सेल्फ कारण्टाइनन, सोशल डिस्टेंसिंग और बीमारी की स्टेज टू-थ्री-फोर खुद ही चुना था.
हाँ, कोरोना की वजह से ही याद आई ये घटना. क्या है कोरोना? वायरस है, बीमारी है, महामारी है, बाज़ार के पोषण के लिए आई है, भूमंडलीकरण की देन है या जैविक युद्ध का कोई षणयंत्र, जो भी है ख़त्म हो जल्दी. ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ सुरक्षा के लिए ज़रूरी है तो कर लेंगे मगर ये सोशल डिस्टेंसिंग मन (मंदिर एज़ वेल एज़ मस्ज़िद) में न बैठा लेना. वैसे ही (एंटी) सोशल मीडिया अपने डबल डोज़ इंजेक्शन लिए तैयार बैठा है.
पूरी दुनिया नमस्ते कर रही है. अच्छी बात है लेकिन सोशल मीडिया पर लोग नमस्ते पर ही नहीं रुके हैं. बैक गियर में गोमूत्र, गोबर से होते हुए चौके में एक-वस्त्रा होकर खाना बनाने खाने की पद्धति और तो और मासिक शुद्धता तक लौट पड़े हैं. जाओ भइया जाओ, जितना पीछे जाना है जाओ. हम तो इस ख़तरे के हटते ही नमस्ते भी करेंगे, हाय हेल्लो हैंड शेक, शोल्डर पैट, सलाम-आदाब भी! अरे छाती में भींच के मिलेंगे यार!!
पर अभईं त छुअ जिन मोरे लाल
ओहरैं से गुड बाई-नमस्ते-सलाम-सत श्री अकाल!
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अमित श्रीवास्तव. उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) और गहन है यह अन्धकारा (उपन्यास).
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