हैडलाइन्स

ऐसा रहा पहला टनकपुर बर्ड फेस्टिवल

टनकपुर और आसपास का क्षेत्र नंधौर जंगल, शारदा नदी और प्रवासी पक्षियों की प्रचुरता के कारण प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ है. इस अनूठे सौंदर्य का आनंद लेने के लिए दिल्ली, नैनीताल, रुद्रपुर, हल्द्वानी, बनबसा, खटीमा, टनकपुर और चंपावत आदि जगहों से आए हुए प्रकृति प्रेमियों 2 दिवसीय टनकपुर बर्ड वाचिंग फेस्ट के लिए एकजुट हुए.
(Tanakpur Bird Festival)

बीते 4 फरवरी के दिन भर घने कोहरे से ढके टनकपुर में दिन ढलने से पहले धूप ने दर्शन दे ही दिए और ठीक तभी कुछ लोग ककराली गेट में वनविभाग द्वारा बनाई एक हट के अहाते में जमा हो रहे थे. मौका टनकपुर के प्रथम पक्षी महोत्सव का था. उन लोगों के परस्पर संक्षिप्त परिचय के बाद पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट द्वारा पक्षियों की दुनिया का इंसानी दुनिया के साथ पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार व्यक्त किये गए.

उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में घुघुती (हिमालयी डव) एक विशिष्ट स्थान रखता है. वो सभी का अन्तरंग साथी है जिसके द्वारा कभी विरह के गीत में परदेसी पति के लिए संदेश भेजा जाता है कभी उसको याद कर बच्चों को लोरिया सुनाई जाती हैं तो कभी उनका रूप धर पुरखों के आने का मन्तव्य सोचा जाता है. घुघुती ही नहीं बल्कि न्योली, गौरेया, कौवा, चील, मैना, कफ्फू आदि कई पक्षियों को समाज अपनी जिंदगी में जगह देता है.
(Tanakpur Bird Festival)

पक्षी विशेषज्ञ भट्टजी ने विभिन्न पक्षियों की आवाज निकालने में कुशलता हासिल की है. इसका उन्होंने शानदार प्रदर्शन भी किया. तय हुआ कि जंगल की गहराई में जा कर स्थानीय पक्षियों को खोजा जाए और समूह टनकपुर के जंगल में पक्षियों देखने निकल पड़ा.

यह वह समय था जब धूप ढल रही थी और कटे वृक्षों के तनों के ढेर के बीच से समूह जंगलात के भीतर प्रवेश कर रहा था. समूह में फोटोग्राफर भी थे और पक्षी प्रेमी भी. शुरुआत में ही उड़ती हुई कोतवाल, फ्लाई कैचर, पैराकिट्स आदि पक्षियों के झुंडों के दर्शन हो गए.

तभी खबर आई कि नजदीक की नदी में हाथी आया हुआ है. यह उत्साह बढ़ाने वाली खबर थी. कुछ उत्साही फोटोग्राफर जंगल के भीतर की तरफ ले जाती कच्ची सड़क से जंगल में गहराई में बढ़ने लगे और कुछ दिखाई पड़ती चिड़ियों को देखने समझने में पीछे रह गए.

टनकपुर चूँकि पहाड़ की जड़ पर स्थित एक भाभर का क्षेत्र है इसलिए यहाँ नदियाँ स्वच्छ जल की हैं और वेग कम है. जंगल में चार पांच किलोमीटर के बाद ही एक छोटी सी नदी बहती है जो इतनी साफ है कि उसकी गहराई में पड़े पत्थर स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं. शांत नदी की धारा में छोटी छोटी मछलियों द्वारा पानी से हवा में कूद लगाई जा रही थी जिससे सुस्त नदी में जान पड़ती महसूस होती थी अन्यथा नदी इतनी शांत थी कि उसके तालाब होने का भ्रम होता है. हाथी नहीं मिला. पर हाथी न मिलने का अफसोस इस खूबसूरत नदी की जलधारा ने पूर्ण कर दिया. लौटते हुए सारा दल पुनः उसी स्थान पर एकत्र हुआ जहाँ से शुरुआत की थी. टनकपुर बर्ड फेस्टिवल की शुरुआत हो चुकी थी.

दूसरे दिन सुबह सुबह बनबसा के जल संस्थान के डाकबंगले में पक्षियों के ऊपर एक डिजिटल शो रखा गया था जिसमें पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट द्वारा पक्षियों को पहचानने के लिए टिप्स भी थी और पक्षियों की विस्तृत जानकारी भी.

कोहरे से ढके डाकबंगले में फूलों पेड़ों की भव्य सजावट है. अंग्रेजों द्वारा निर्मित इस डाकबंगले के भोजनकक्ष में शारदा बैराज के इतिहास के बारे में दस्तावेजी जानकारी और पुरातन फोटोग्राफ्स लगे हैं. इस ऐतिहासिक जगह के पास ही एक विस्तृत खुली जगह है जिसमें घास के मैदान और झाड़ियों के बीच एक नहर रूपी छोटी जलधारा बहती है. ऊँचे पेड़ भी हैं और मध्यम झाडियों भी और मैदान भी. यह जगह पक्षियों के प्रवास के लिए उपयुक्त जगह है.

रेयर स्लेटी कठफोड़वे और विदेशी सारस भी दिखाई पड़े तो स्थानीय बुलबुल और टिटहरी भी. कुल जमा 40 प्रकार के पक्षी उसी क्षेत्र में दिखाई दे गए. भिन्न-भिन्न पक्षियों की मधुर आवाज और अनछुई प्रकृति के बीच घिरा हुआ महसूस करना किसी भी व्यक्ति को संजीवनी प्रदान करता है. टनकपुर बर्ड फेस्टिवल यह मौका प्रदान करने में सक्षम इवेंट है.

टनकपुर पुस्तक मेला आयोजन समिति के सदस्यों द्वारा अत्यंत उत्साह के साथ इस पक्षी महोत्सव का आगाज किया गया और प्रतिभागियों को पक्षियों की दुनिया जानने-समझने का मौका मिला. इस आयोजन के माध्यम से कोशिश की गई कि पूर्णागिरी धाम आने वाले श्रद्धालुओं को यहां समय बिताने के अन्य विकल्प उपलब्ध कराए जाएं और उत्तराखंड के वन पर्यटन मानचित्र में यह क्षेत्र उचित स्थान पा सके.
(Tanakpur Bird Festival)

अजय कन्याल

फोटोग्राफर व शिक्षक अजय कन्याल फिलहाल हल्द्वानी में रहते हैं. अजय कन्याल की तस्वीरें उनके सोशियल मीडिया अकाउंट में देखी जा सकती है.

काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा

दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है. (Smriti Yatra Poem by Sindhuja) शायद हर पीढ़ी,…

3 hours ago

पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल

पिछली कड़ी : कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से…

1 week ago

घी संक्रान्ति का लोक विज्ञान

उत्तराखंड अपनी निराली संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोक जीवन के कई…

1 week ago

दुनिया ने अपनाया और अपनों ने भुलाया : जन्मदिन विशेष

‘‘...हिमालय के दूर-दराज गाँव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री…

2 weeks ago

गलगोटिया वाला कॉपी नहीं, असली नवाचार है अल्मोड़ा के रवि टम्टा का ड्रोन

अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल "हापिडा स्काईनेक्स"…

2 weeks ago

लोक गायिकाओं का समृद्ध इतिहास रहा है पहाड़ो में

उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक…

2 weeks ago