कब तक बैठी रहोगी इस तरह अनमनी, चलो घूम आएँ
Posted By: Kafal Treeon:
चलो घूम आएँ - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना उठो, कब तक बैठी रहोगीइस तरह अनमनीचलो घूम आएँ.तुम अपनी बरसाती डाल लोमैं छाता खोल लेता हूँबादल –वह तो भीतर बरस रहे हैंझीसियाँ पड़नी शुरु हो गई हैंजब झमाझम... Read more
अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा
Posted By: Kafal Treeon:
अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर खड़ा होना मैंने सीख लिया है. घबराओ मत मैं क्ष... Read more
Popular Posts
- बर्फ ही नहीं हरियाली भी गायब हो रही है हिमालयी इलाकों से
- उत्तराखंड क्रिकेट टीम से रचा इतिहास
- उत्तराखंड बजट : स्वयं स्फूर्ति से परिपक्वता की ओर
- बर्बर इतिहास का नाम क्यों ढो रहा है ‘खूनीबढ़’
- कौन थे पाशुपत संप्रदाय के पुरोधा ‘लकुलीश’?
- कैसे अस्तित्व में आया नारायण आश्रम और कौन थे नारायण स्वामी?
- घमंडी पिता और उसकी सीख
- उत्तराखंड के पेड़-पौधे: लोकज्ञान और औषधीय सत्य
- सामाजिक उत्पीड़न को सम्पूर्णता में व्यक्त करते हैं ‘जागर गीत’
- क्या चंद शासकों से पहले अल्मोड़ा में नंदादेवी का कोई मंदिर था?
- ‘काल्द’ यानी भैरव पहली बार कैसे प्रकट हुए?
- कैसा था नंदा देवी में गायब हुआ परमाणु डिवाइस?
- उपकोशा और उसके वर
- मेहनती भालू और चालाक सियार की लोककथा
- बाल, माल व पटालों का शहर : अल्मोड़ा
- आज ‘नशा नहीं-रोजगार दो आन्दोलन’ की 42वीं वर्षगांठ है
- 200 साल पुराने यात्रा-वृतांत में कुमाऊँ के ‘खस’
- तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन
- बंदर बहादुर के चोर तेंदुए को जंगल से भगाने वाली लोककथा
- 200 साल पहले कैसा था उत्तराखंड
- जब तक सरकार मानती रहेगी कि ‘पलायन’ विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे
- एक रोटी, तीन मुसाफ़िर : लोभ से सीख तक की लोक कथा
- तिब्बती समाज की बहुपतित्व परंपरा: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन
- इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक स्मृति के मौन संरक्षक
- नाम ही नहीं ‘मिडिल नेम’ में भी बहुत कुछ रखा है !
