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सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण: संवैधानिक आधार व चुनौतियाँ

अवसर की समानता अर्थात किसी भी प्रकार की सरकारी सेवा में चुने जाने का भारत के प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो यह हमारे संविधान द्वारा दिया गया मूल अधिकार है. जिसकी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 16 में की गई है.

अनुच्छेद 16 (1) प्रत्येक नागरिक को अवसर की समानता का अधिकार प्रदान करता है इसमें विभिन्न प्रकार के अवसरों में नौकरी का अवसर भी शामिल है.

अनुच्छेद 16 (2) के अनुसार अवसर की समानता को धर्म ,जाति लिंग तथा जन्म स्थान के आधार पर वंचित अथवा विभेदकारी नहीं किया जा सकता है.

अनुच्छेद 16 (3) के तहत यदि केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार आवश्यक समझे तो समाज के किसी वर्ग विशेष अथवा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति जो कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हों, के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण) कर सकती है.

अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए अन्य पिछड़ा वर्ग ( ओ.बी.सी ) के लिए भी सरकार विशेष प्रावधान कर सकती है.

इस प्रकार संविधान का अनुच्छेद 16 जो कि हमें अवसर की समानता प्रदान करता है, वही अनुच्छेद 16 उपबंध 3 व उपबंध 4 में आरक्षण के प्रावधान शामिल किए गए हैं. इनमें किसी भी प्रावधान में आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन ही है ना कि आर्थिक रूप से पिछड़ापन. क्योंकि मूल अधिकार संविधान के भाग 3 के अंतर्गत आते हैं जिन्हें की केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1967 तथा मिनर्वा मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इस अध्याय में संशोधन के संसद के अधिकार को प्रतिबंधित किया है. न्यायलय द्वारा मिनर्वा मिल्स मामले में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि यदि संसद इसमें किसी प्रकार का संशोधन करती है तो उक्त संशोधन को भी न्यायिक पुनरीक्षण से गुजरना होगा.

अब जबकि संसद के सत्र का आखिरी दिन बचा है और सरकार के पास उच्च सदन में अनिवार्य 162 सदस्यों के बहुमत के विपरीत मात्र 86 सदस्यों का ही समर्थन हासिल है ऐसे में 10% आर्थिक आधार पर आरक्षण के विधेयक को क्या संसद मंजूरी दे पाएगी यह एक बड़ा प्रश्न है. साथ ही यह भी, अब जबकि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लागू किए जाने में 60 दिन से कम समय बचा है क्या संविधान के अध्याय 3 को संशोधित करने वाला कोई कानून धरातल पर उतर पाएगा.

पहले भी आर्थिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक करार दिया गया है : वर्ष 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू कर ओबीसी वर्ग के लिए 27% अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था किए जाने से समाज में जिस प्रकार का उद्बेग उत्पन्न हुआ था. उसे शांत करने के लिए नरसिम्हाराव सरकार द्वारा स्वर्ण जातियों को 10% अतिरिक्त आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था वर्ष 1991 में जारी शासनादेश से की गई थी. वर्ष 1992 में ही सर्वोच्च न्यायालय के 9 जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के एक फैसले में असंवैधानिक घोषित करते हुए आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर दी थी. इस लड़ाई में ही यह व्यवस्था दी गई थी कि आरक्षण का लाभ नियुक्ति में तो दिया जा सकता है लेकिन प्रमोशन में नहीं. और यह कि अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण दिए जाने हेतु सरकार को क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू किए जाने की व्यवस्था करनी चाहिए. इस आरक्षण वर्ग में आर्थिक आधार पर पात्रता खोजी जानी चाहिए.

इस प्रकार उपरोक्त संवैधानिक आधार तथा चुनौतियों को देखते हुए सरकार द्वारा घोषित सवर्ण जातियों के लिए 10% आरक्षण की घोषणा क्या वास्तव में अमली जामा पहन पाएगी. यह एक बहुत संशय भरा प्रश्न है. इस संशय का सबसे महत्वपूर्ण आधार समय को लेकर ही है. क्योंकि सरकार के पास अब इतना समय नहीं है कि वह आचार संहिता लागू होने से पहले इस निर्णय के समक्ष मौजूद समस्त संवैधानिक बाधाओं को पार कर सके.

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Sudhir Kumar

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