कुमाऊं में जाति व भूमि के संबंध का विश्लेषण करने वाले अनुसन्धान के जनक रहे राम दत्त सनवाल (1929-1970) जिन्होंने सामाजिक स्तरीकरण पर काम किया. हिमालयी समाज के अध्ययन को नई दिशा देने वाले सनवाल का अनुसन्धान क्षेत्र कुमाऊं का ग्रामीण समाज, जाति संरचना, सामाजिक गतिशीलता,शक्ति सम्बन्ध तथा ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में सत्ता का वितरण रहा.
“ग्रामीण कुमाऊं में सामाजिक स्तरीकरण” 1966 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के लिए “Social changes in casts in Kumaun” शीर्षक से लिखा सामाजिक मानव शास्त्र पर उनका शोध प्रबंध है. पुस्तक रूप में यह ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से 1976 में प्रकाशित हुई .उनके लेख,”Agricultural Extension in a Kumaunes Village (journal of development studies, 1965) में कृषि सुधार कार्यक्रम, सरकारी योजनाओं के विस्तार व ग्रामीण समाज की प्रतिक्रिया को मुख्यतः ध्यान में रखा गया. उनके समग्र लेखन में कुमाऊं की जातिगत संरचना, भूमि स्वामित्ब, कृषि के तौर-तरीके, सामाजिक शक्ति, गांव की राजनीति व नेतृत्व, जाति व आर्थिक संरचना का संबंध मुख्यतः ध्यान में रखा गया है. वह उस समय की समाज शास्त्रीय परम्परा से जुड़े थे जिसमें ग्राम आधारित फील्ड वर्क किया जाता रहा. इस परंपरा से जुड़े विद्वानों में ऍम एन श्रीनिवास व एंड्रे बैटल मुख्य थे .
कुमाऊं के ग्रामीण समाज में विकसित जाति व्यवस्था की विशिष्ट संरचना को Social Stratification of Kumaun (1976) में क्षेत्रीय अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया गया जो स्पष्ट करता है कि हिमालय में यह किस प्रकार यह गंगा के मैदानों में पनपी वर्ण-जाति व्यवस्था से भिन्न स्वरूप लेती है. उनकी शोध मूलतः सामाजिक मानव विज्ञान का अनुशीलन है जो अपने आरंभिक पृष्ठों में इतिहास का निर्वचन करती है जिसकी प्रणाली व दृष्टिकोण मार्क्सवादी है. लेखक ने पेशेवर रुख अपना कर अपने काम को ब्राह्मण संस्कृति दूषण से मुक्त रखा है.उन्होंने कुमाऊं के गावों में प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अध्ययन किया. जाति को केवल धार्मिक व्यवस्था नहीं बल्कि आर्थिक संसाधन, भूमि स्वामित्व व स्थानीय सत्ता के साथ जोड़ कर देखा.
सनवाल ने 1959-60 में कुमाऊं के तीन इलाकों में सर्वेक्षण किया जिसका विषय जाति आधारित पेशे, भूमि स्वामित्व, राजनीतिक शक्ति व सामाजिक प्रतिष्ठा था.इतिहास पर चर्चा करते हुए सनवाल ने लिखा कि इस पहाड़ी इलाके में आने वाले, सबसे पहले बसने वाले लोग मध्य भारत से आने वाले कोल और गौंड थे जो बाद में डोम, राम या शिल्पकार कहलाए. इन्हें कुछ सदियों बाद खस या खसिया द्वारा अपने अधीन सेवारत कर लिया गया. इस विवेचना में उन्होंने क्रूक (1896), आवले(1905), जोशी (1929), एटकिंसन (1886) व टर्नर (1935) का उल्लेख किया. खस कौन थे, क्या वह आर्यों की कोई शाखा थे या कोकेशिया से आए स्वतंत्र घूमटू कबीले, इसे उन्होंने स्पष्ट नहीं किया पर यह स्थापित किया कि खस लोगों ने डोम समाज को अपने अधीन कर गुलाम जरूर बनाया था. खस वर्ण-जाति व्यवस्था से अनजान थे. बाद में पहाड़ में आ बसे आर्यों और ब्राह्मणों ने उन्हें हेय माना. खस और डोम के द्वैध वाला समाज क्लासिकल मार्क्स वादी अर्थों में “दास प्रथा” कहा जा सकता है.जब यह समाज सामंत व्यवस्था में बदल रहा था तो एक धर्म के रूप में उसने बौद्ध धर्म को चुना लेकिन आर्यों के आक्रमण व शंकराचार्य के आने के बाद वर्ण -जाति व्यवस्था आरम्भ हुई.
आदि शंकराचार्य अपनी धार्मिक यात्रा में हिमालय आए. उन्होंने बद्रीनाथ मंदिर का पुनरुर्द्धार किया. ज्योतिर्मठ के चार मठों में एक जोशीमठ में स्थापित किया. शंकराचार्य ने हिमालय में जाति व्यवस्था बनाई नहीं पर उन्होंने वैदिक ब्राह्मण धार्मिक संरचना को संगठित किया. तब कुल आधारित संगठन अर्थात कृषक योद्धा समुदाय या खस, स्थानीय जनजाति समूह व छोटे राजवंश थे.कठोर ब्राह्मण वादी जाति व्यवस्था न थी. शँकराचार्य ने वैदिक धर्म का पुनर्गठन किया. उन्होंने अद्वैत वेदांत को स्थापित किया. ब्राह्मणों की धार्मिक भूमिका सबल हुई. बद्रीनाथ जैसे तीर्थ पुनर्जीवित हुए. तीर्थ व्यवस्था संगठित हुई. ब्राह्मण पुजारियों का आगमन हुआ व धार्मिक संस्थाओं का निर्माण हुआ. ज्योतिर्मठ की स्थापना से हिमालय में ब्राह्मणिक विद्या व संस्कृति का आर्विभाव हुआ. जाति व्यवस्था का स्तरीकरण 1000-1500 ई. के मध्य हुआ जब राज्य संगठित हुए. कत्यूरी, चंद व पंवार वंश के राज्यों को प्रशासन के लिए ब्राह्मणों की आवश्यकता थी. उन्हें भूमि दान दी गई व धार्मिक अधिकार मिले. स्थानीय समुदाय धीरे धीरे गोत्र अपनाने लगे. पूजन पद्धतियां आरम्भ हुईं व उच्च जाति की संस्कृति को अपनाया जाने लगा. इसे “संस्कृतिकरण” कहा गया. हिमालय मे जाति व्यवस्था किसी एक व्यक्ति ने नहीं बनाई. यह राजनीतिक सत्ता, भूमि व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं के संयुक्त प्रभाव से धीरे धीरे विकसित हुई.यह किसी एक घटना नहीं बल्कि दीर्घकालीन सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन का परिणाम थी .सनवाल के अनुसार जाति संरचना राजनीतिक सत्ता, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक गतिशीलता से काल -क्रम निर्मित होती रही.
ब्रिटिश गजेटियर की परंपरा में सनवाल की शोध ऐसा समाजशास्त्रीय अध्ययन बना जिसमें कुमाऊं की जाति संरचना को आर्थिक व राजनीतिक शक्ति से जोड़ा गया था. मूलतः उनका काम सामाजिक मानव शास्त्र व ग्रामीण समाज शास्त्र की पद्धति पर आधारित था. वह गाँवों में रहे व परिवारों के साथ घुले मिले. परिवारों की वंशावली तैयार की. बड़े बूढ़े स यानों से बातचीत कर उनके अपने परिवेश में किए व्यवहार का अवलोकन किया. तब सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए ब्राह्मण, ठाकुर व शिल्पकार जातियों का त्रि-स्तरीय आधार लिया जिनसे पारम्परिक प्रतिष्ठा तय होती थी. इनके साथ भू स्वामित्व देखा, स्थानीय शक्ति व पंचायत, प्रशासन और नेतृत्व की दशाऐं परखीं. स्पष्ट कहा कि कुमाऊं में सामाजिक हैसियत मात्र जाति से नहीं बल्कि जाति, भूमि व शक्ति से स्तरीकरण करती है. उन्होंने पाया कि कुमाऊं में जाति व्यवस्था में क्रमिक परिवर्तन हो रहे थे जिसका कारण शिक्षा, सरकारी नौकरी व बाजार का विस्तार था. सबसे अधिक महत्वपूर्ण शक्ति स्त्रोत भूमि रही. जिनके पास भूमि अधिक थी वह गांव में आर्थिक रूप से सबल, सामाजिक रूप से प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से शक्ति शाली माने गये . जब पारम्परिक पेशों का पतन हुआ तो इनसे जुड़े लोग नये अवसरों की तलाश में गांव से बाहर निकले. सत्ता में ध्रुवीकरण बड़े भूस्वामियों व ऊँची जातियों के वर्चस्व से हुआ. इसलिए उन्होंने कुमाऊं के समाज को “परिवर्तनशील पदानुक्रम” कहा अर्थात ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो धीरे-धीरे बदल रही थी.
आर. डी. सनवाल ने कुमाऊं की सामाजिक संरचना का अध्ययन सर्वेक्षण के आधार पर किया. उन्होंने गावों को इस आधार पर चुना कि वह भौगोलिक रूप से अलग-अलग हों जैसे पहाड़ी ढलान, नदी-घाटी, ऊंचाई के हिसाब से उपरांऊ-तलाऊं व सेरा इत्यादि. चुने जाने वाले गाँव आर्थिक दृष्टि से विविधता लिए हों जैसे ऐसे गांव जहाँ किसान धनी हों. छोटे किसान हों. कारीगर बहुल हों. सामाजिक दृष्टि से मिश्रित हों. जहाँ उच्च जाति, मध्यम कृषक वर्ग, सेवा जातियाँ रह रही हों. सामाजिक, सांस्कृतिक जानकारी व आर्थिक समंक एकत्रित करने हेतु उन्होंने स्तरीकृत गावों का सर्वेक्षण किया जिससे घर-घर जा कर जाति, परिवार, भू-स्वामित्व, पेशे आदि की सूचनाएं एकत्रित की. उन्होंने परिवार के बुजुर्गों, सयानों व समुदाय के प्रमुखों से चली आ रही रीत, परंपरा, सामाजिक नियम और पारम्परिक अधिकारों पर चर्चा की. इसके साथ ही मिल-भेंट के अवसरों, खाली समय की गप-शप, पर्व-त्यौहार, मेले-उत्सव व अन्य कर्मकांडों के साथ सामुदायिक कार्यों जैसे हल चलाना, रूपाई-कटाई, मकान बनाने के लिए सामान की ढुलाई, छत डालने व शादी ब्याह में आपसी भागीदारी का विस्तृत हाल जाना. कृषि उत्पादकता, भूमि वितरण, श्रम का प्रवाह और आर्थिक स्थिति के समंक ले कर उनका विश्लेषण किया.
सनवाल ने कुमाऊं के समाज को जाति आधारित कहा जिसमें आर्थिक व भौगोलिक कारणों से परिवर्तन आया इसलिए इसे “संशोधित जाति व्यवस्था” से प्रकट किया जा सकता है जिसमें जाति, वर्ग व इकोतंत्र सामाजिक संरचना बनाते हैं. सनवाल ने स्पष्ट किया कि कुमाऊं का जाति क्षेत्र देश की जाति प्रणाली का ही स्वरूप है जहाँ जाति व्यवस्था विद्यमान है पर मैदानी भारत सी कठोर और बंद नहीं है. वह लिखते हैं, “The caste systam in the himalyan region exists in a modified form where the rigidity of the hierarchy is considerably less than in the plains of India”. मैदानों की भांति अत्यधिक छुआ-छूत व दृढ़ सामाजिक दूरी नहीं है. कुमाऊं में आर्थिक स्थिति सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है. यदि किसी कृषक परिवार के पास अधिक भूमि है तो उसका सामाजिक प्रभाव बढ़ सकता है. कुछ शिल्पकार समुदाय आर्थिक रूप से सबल होने पर अपनी सामाजिक स्थिति सुधार लेते हैं अर्थात वर्ग कारक भी जाति को प्रभावित करते हैं. “Economic position and control over land resources often influence social prestige in the villages of kumaun”.
आर्थिक शक्ति पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि जिनके पास अधिक भूमि है वह ही गांव की राजनीति व सामाजिक प्रतिष्ठा नियंत्रित करते हैं. यह विचार आर्थिक आधार के महत्त्व को सूचित करता है जो मार्क्सवादी परम्परा का अनुशीलन है. उन्होंने पाया कि जाति व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं है इसके पीछे आर्थिक संसाधनों का असमान वितरण भी है पर उनके अध्ययन में “वर्ग-संघर्ष” पर जोर नहीं है. उन्होंने समाज को अधिक संतुलन व पदानुक्रम के रूप में देखा. उनकी पद्धति ‘ब्रिटिश सामाजिक मानव शास्त्र’ पर अवलंबित है जिसमें जाति को सामाजिक संरचना के रूप में देखा गया. गाँव आधारित फील्ड वर्क करते हुए उनकी विचारधारा “सामाजिक मानव शास्त्र-ग्रामीण समाज विज्ञान ” का आधार लेती थी. उन्होंने आर्थिक असमानता पर सीमित ध्यान दिया इसलिए उन्हें “सार्वभौमिक समाज शास्त्री” कहा गया.
सनवाल के अनुसार कुमाऊं में सामाजिक गतिशीलता अन्य इलाकों की तुलना में अधिक है. “Compared to the plains, the Himalyan caste system shows greater flexibility and mobility”.इसका कारण यह है कि गांव प्रायः कम आबादी वाले होते हैं. संसाधन सीमित होते हैं इसलिए गांव के कामकाज में आपसी सहयोग बना रहता है. इससे सामाजिक सम्बन्ध लचीले बने रहते हैं.पहाड़ के छोटे गाँवों में जीवन कठिन होने के कारण सामाजिक सहयोग आवश्यक है. “The small size of the village community and the ecological constraints compel cooperation among diffrent caste system. भौगोलिक परिस्थितियां विभिन्न जातियों के बीच सहयोग को अनिवार्य बनाती है.
पहाड़ की अर्थव्यवस्था में जाति बनाम वर्ग की समस्या समाज शास्त्र की महत्वपूर्ण बहस रही. सनवाल ने जाति व वर्ग को दो अलग धारणाओं के रूप में समझाया. भारतीय समाज में सामाजिक स्थिति मुख्यतः जन्म से निर्धारित होती है जो जन्म आधारित, पेशा आधारित, सामाजिक दूरी व विवाह प्रतिबंध के रूपक से जुड़ी है. दूसरी तरफ वर्ग में मार्क्स के अनुसार इसे उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण, आय वर्ग व आर्थिक शक्ति से जनित कहा गया.
सनवाल ने कुमाऊं के गाँवों के सर्वेक्षण में पाया कि जाति व वर्ग एक जैसे नहीं थे. उदाहरण स्वरूप कई ब्राह्मण व ठाकुर गरीब थे तो कुछ निम्न जाति के लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहे थे. इससे प्रश्न उठा कि क्या समाज को समझने का आधार जाति है या आर्थिक वर्ग? सनवाल ने तीन तत्वों के संयोजन “जाति,भूमि स्वामित्व व स्थानीय सत्ता” को ध्यान में रखा और प्रदर्शित किया कि जाति और वर्ग जुड़े हैं लेकिन पूरी तरह से समान नहीं हैं. उच्च जाति के पास अगर अधिक भूमि है तो उसके पास अधिक शक्ति है. यदि उच्च जाति के पास कम भूमि है तो प्रतिष्ठा तो है पर आर्थिक कमजोरी है. निम्न जाति के पास यदि अधिक आय है तो आर्थिक उन्नति तो है पर सामाजिक बाधाऐं उभरेंगी. यही जाति बनाम वर्ग का तनाव है.
जाति बनाम वर्ग की समस्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय ग्रामीण समाज केवल पारम्परिक नहीं है. आर्थिक परिवर्तन से सामाजिक संरचना बदलती है. जाति व वर्ग दोनों मिल कर सामाजिक असमानता बनाते हैं. कुमाऊं में सामाजिक स्तरीकरण को समझने की समस्या यह थी कि समाज को केवल जाति से समझें या आर्थिक वर्ग से? सनवाल ने दिखाया कि वास्तविकता में दोनों एक साथ काम करते हैं.
सनवाल ने कुमाऊं की परंपरागत सामाजिक संरचना तीन स्तरों पर रख व्याख्या की जिसमें उच्च क्रम में ब्राह्मण, मध्य में खस व निम्न में शिल्पकार थे. उन्होंने लिखा कि कुमाऊं में ब्राह्मण मुख्यतः वाह्य प्रवास कर मैदानी उत्तर भारत से आए जिनके आगमन की अवधि कत्यूरी व चंद राजाओं के समय मानी जाती है. उन्हें शासकों ने भूमि, अनुदान, धार्मिक अधिकार व प्रशासनिक पद दिए. ये पुरोहित, ज्योतिषी, शिक्षित वर्ग व भू स्वामी रहे जिससे इन्हें उच्च प्रतिष्ठा मिली. कुमाऊं में ब्राह्मण परिवारों की छोटी वंशीय इकाई को ‘खोली’ या थोक कहा जाता रहा. इससे अभिप्राय एक ही पूर्वज से निकला परिवार, एक ही गांव या क्षेत्र में बसना व सामान कुलदेवता या परंपरा का पालन करना था . कई बार एक ही उपनाम के भीतर कई खोलियां होती थीं. कत्यूरी वंश व चंद वंश के राजाओं से दान भूमि मिलने पर ब्राह्मणों ने अलग अलग गाँवों में बस अपनी शाखाएं बना लीं. समय के साथ वही गांव या क्षेत्र उस शाखा की पहचान बन गये. कई ब्राह्मण परिवार विशेष मंदिरों से जुड़े जो किसी मंदिर के पुजारी, ज्योतिष-पत्री, कर्मकांड-संस्कार कराने वाले परिवार रहे जिनकी भूमि का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्ततरण चलता रहा. इस प्रक्रिया से भी अलग-अलग कुल या शाखाएं बन गईं. वंशावलियों का निर्माण हुआ जिसमें मूल पूर्वज, बसाव का स्थान, गोत्र व शाखा सम्मिलित हुई. इससे परिवारों की पहचान स्थायी हो गई. एटकिंसन ने लिखा था कि कुमाऊं के कई ब्राह्मण परिवार अलग-अलग गाँवों में बस कर अपनी पहचान बना चुके थे. डबराल ने स्पष्ट किया कि भूमि दान, मंदिर व्यवस्था व राज्य संरक्षण से ब्राह्मण समाज की विविध शाखाएं विकसित हुई. कुमाऊं में ब्राह्मणों की अधिक होने का कारण चंद राजाओं की प्रश्रय नीति, भूमिदान, मंदिर केंद्रित समाज एवम उत्तर भारत से पहाड़ों की ओर होने वाला प्रवास था.
सनवाल के अनुसार कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा. खसों को उन्होंने स्थानीय या प्राचीन हिमालयी आबादी का वंशज बताया. फिर इस समूह का एक भाग राजपूती पहचान ग्रहण कर गया. यह प्रक्रिया मध्य काल में हुई जब राजपूती परंपराएं फैलने लगीं थीं. यह मुख्यत: कृषक समुदाय था जिनके पास गांव की राजनीतिक शक्ति थी. जिनकी स्थानीय सैन्य परम्परा थी. कई गाँवों में वास्तविक आर्थिक शक्ति इसी समूह के पास थी. सनवाल ने तीसरे समूह को डोम या शिल्पकार कहा जिसमें लोहार, बढ़ई दर्जी, ढोली व अन्य कारीगर शामिल थे जो पारम्परिक सेवा व शिल्प का कार्य करते थे. जाति व्यवस्था में इनका स्थान निम्न था. इनके पास खेती की जमीन कम थी. सनवाल ने दिखाया कि आर्थिक रूप से ये समुदाय निर्भर स्थिति में था.
सनवाल का महत्वपूर्ण तर्क था कि कुमाऊं में सामाजिक स्थिति केवल जाति से नहीं बल्कि भू स्वामित्व व आर्थिक शक्ति से निर्धारित होती रही. पहाड़ में सामुदायिक श्रम से खेती व अन्य काम होते थे. खेती के काम में हलिया व सयार आपसी मदद करते. रोपाई व फसल कटाई सामूहिक उत्सव का रूप ले लेते. हुड़के की थाप पर कई जगह ‘हुड़की- बौल’ का प्रचलन बना. लोकगीत व संगीत खेती व फसल चक्र से गहरे जुड़ा. मेलों व त्योहारों में सबकी सहभागिता रही विशेष रूप से जात में, रामलीला में,जागर व जागो में. सनवाल ने इसे “नरम राज्य पदानुक्रम” कहा.
पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां जाति व्यवस्था को प्रभावित करती थीं. छोटे गाँवों में पानी भरने, ईंधन के लिए लकड़ी जुटाने, जानवरों के लिए घास लाने के लिए जंगल जाने के काम मिलजुल कर किए जाते अर्थात श्रम का सामूहिक उपयोग होता रहा. गाँव में किसी का घर बनने, शादी ब्याह के काम काज इत्यादि आपसी सहयोग से होते जिसमें हर जाति या वर्ण की भूमिका सुनिश्चित होती जिससे सामाजिक अलगाव नहीं बना .कुमाऊं में लम्बे समय से प्रवास की परम्परा रहने से नये विचार आए, चाल-चलन बदला जिससे सामाजिक संपर्क बढ़े और बड़ी जाति की कठोरता कम हुई. “Migration has introduced new ideas and weakened the rigidity of traditional social relations”.
आर. डी. सनवाल का अध्ययन “सोसियल स्ट्रेटिफिकेशन इन कुमाऊं” कुमाऊं के सामाजिक ढांचे का समाज शास्त्रीय अध्ययन है. उन्होंने अल्मोड़ा के ग्रामों की केस स्टडी की तथा कुमाऊं के ग्रामीण समाज का जाति व्यवस्था, भूमि स्वामित्व, पेशेगत विभाजन व सामाजिक गतिशीलता के आधार पर विवेचन किया. पहाड़ के समाज में सामाजिक स्तरीकरण तीन स्तरों पर देखा गया जिसमें मुख्यतः ब्राह्मण, ठाकुर और शिल्पकार वर्ग थे .भूमि स्वामित्व महत्वपूर्ण कारक था, जिनके पास अधिक जमीन थी उसकी सामाजिक चौल या प्रतिष्ठा भी अधिक थी. फिर शिक्षा व सरकारी सेवा में गये लोगों का जीवन स्तर बदला जिसने स्तरीकरण पर प्रभाव डाला.
आर. डी. सनवाल ने समाज में दिख रहे स्तर व विभेद को अपने अध्ययन का मुख्य विषय बनाया जिससे संरचनात्मक समाज शास्त्र को नया स्वरूप मिला व सामाजिक स्तरीकरण पर मानक सन्दर्भ व लेखों की श्रृंखला सामने आई. सनवाल का काम इसीलिए महत्वपूर्ण बना क्योंकि यह हिमालय का पहला व्यवस्थित समाज शास्त्रीय विश्लेषण था. स्थलीय सर्वेक्षण के आधार पर उन्होंने सामाजिक संरचना को समझाया.
सनवाल ने कुमाऊं के ग्रामीण समाज विशेषत :अल्मोड़ा के गांव, हवलबाग व उसके निकटवर्ती इलाके, अल्मोड़ा की निकटवर्ती घाटियों के प्रतिनिधि अलग -अलग बसासत व संरचना वाले गांव चुने जिससे दिखने वाले विभेद की तुलना की जा सके. गाँवों को इस आधार पर चुना गया कि जहाँ जातीय संरचना अलग अलग हो, भूमि के स्वामित्व में अंतर हो तथा आर्थिक गतिविधियां भिन्न हों. उन्होंने तीन मुख्य समाज शास्त्रीय पद्धतियाँ अपनाईँ जिनमें पहली ग्राम का अनुसूचियों की सहायता से सर्वेक्षण था. इसमें उन्होंने परिवार -जाति संरचना,भूमि स्वामित्व, पेशे व शिक्षा को सम्मिलित किया.उन्होंने कुछ समय तक गाँवों में रह कर ग्रामीण जीवन व वहां हो रही क्रियाओं गतिविधियों को निकट से देखा जिससे उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि जातीय संबंध किस तरह कार्य करते हैं, सामाजिक दूरियां कैसी हैँ तथा पर्व त्यौहार, विवाह व त्योहारों में धार्मिक परंपराएं किस प्रकार सामाजिक स्थिति तय करती है. उन्होंने गजेटियर व ब्रिटिश राजस्व बंदोबस्त के अभिलेख का उपयोग कर सामाजिक परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझी.
सनवाल ने तीन स्तरों पर सामाजिक स्तरीकरण का विश्लेषण किया, ब्राह्मण, राजपूत व शिल्पकार (लोहार, बढ़ई, दर्जी इत्यादि). दूसरी तरफ भूमि आधारित भूमि आधारित स्तरीकरण पर बड़े भूमिस्वामी,छोटे खेतिहर किसान, भूमिहीन मजदूर तथा आधुनिक स्तरीकरण में शिक्षा प्राप्त ग्रामीण, सरकारी नौकरी व सेना में भर्ती लोग शामिल किए.
सनवाल ने बताया कि पहाड़ के समाज में दो प्रकार का स्तरीकरण प्रणाली साथ- साथ चलती है. पहली जाति आधारित या पारम्परिक व दूसरी आर्थिक व शिक्षा आधारित जो आधुनिक है. इस मिश्रण ने कुमाऊं की सामाजिक संरचना को विशेष बनाया. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिमालय का पहला गहन स्थलीय सर्वेक्षण पर आधारित अध्ययन है. इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पहाड़ का समाज केवल जाति आधारित नहीं बल्कि आर्थिक व शैक्षिक कारकों से प्रभावित रहा .
हिमालयन गजेटियर व राजस्व अभिलेखों की समीक्षा से सनवाल ने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश भूमि बंदोबस्त व प्रशासन की नीतियों ने कुमाऊं गढ़वाल के समाज में सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप बदल दिया. ब्रिटिश शासन से पहले कुमाऊं में भूमि व्यवस्था परंपरागत व सामुदायिक रही थी पर ब्रिटिश शासन ने भूमि का सर्वेक्षण करवाया. प्रत्येक खेत का कानूनी मालिक तय किया. स्थायी राजस्व तय किया. पहली बार भूमि व्यक्तिगत संपत्ति बनी. जिन परिवारों के पास पहले से अधिक भूमि जोत थी वह स्थायी भूमि स्वामी बन गये तो छोटे खेतिहर व काश्तकार कमजोर पड़ गये. इससे समाज में आर्थिक वर्ग विभाजन हुआ.
जाति आधारित व्यवस्था में आर्थिक तत्व का प्रवेश हुआ. पहले सामाजिक प्रतिष्ठा मुख्यत: कुल, जाति, धार्मिक स्थिति से नियत होती थी पर बंदोबस्त के बाद भूमि स्वामित्व निर्णायक मोड़ बन गया. कुछ ब्राह्मण व राजपूत परिवार बड़े भू स्वामी बन गये तो शिल्पकारों के पास भूमि कम रही इससे जाति व आर्थिक शक्ति का मिश्रित स्तरीकरण बना. ब्रिटिश काल में एक नया अभिजात वर्ग ग्रामीण इलाके में उभरा, जिसमें शिक्षित व राजस्व व प्रशासन से जुड़े लोग,बड़े भू स्वामी थे अर्थात अब पैमाना भूमि, शिक्षा व नौकरी बन गया.
सनवाल के अनुसार पहले गाँवो में जाति आधारित पेशे थे. ब्रिटिश काल में सेवा आधारित पेशे बढ़े. आवागमन बढ़ा तो बाजार से लेनदेन भी ज्यादा होने लगा. इससे कई परंपरागत पेशों में संकट आया. खेती पशु पालन छोड़ जहाँ ऊँची जात वाले लाम व अन्य नौकरी पर गये तो कई शिल्पकार नगद मजदूरी की लालसा में शहर जा मजूरी करने लगे. पलायन की गति बढ़ती ही रही जिससे पारम्परिक सामाजिक संतुलन टूट गया. स्कूल की सुविधा मिली, सेना की भर्ती में चुस्त कद काठी का लाभ मिला जिससे सामाजिक गतिशीलता आई. धीरे- धीरे निम्न वर्ग के लोग भी अधिक आर्थिक अवसर पाने में सफल रहे जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी.
प्रवास आधारित आर्थिक स्वरूप से ग्रामीण सामाजिक संरचना में बदलाव आया. हिमालयी समाज में तीन स्तर साफ दिखाई देने लगे थे अर्थात भूमिस्वामी और शिक्षित वर्ग, छोटे किसान व भूमिहीन वर्ग, जो समाज पहले जाति आधारित था वहां अब जाति, आर्थिक शक्ति व शिक्षा मिल कर नई संरचना बना गये. ब्रिटिश बंदोबस्त व प्रशासन की नीतियों ने पहाड़ के समाज को कई तरह से बदला जैसे भूमि को निजी संपत्ति बना दिया. नया ग्रामीण अभिजात वर्ग पैदा किया और सामाजिक स्तरीकरण में आर्थिक और शैक्षिक कारक जोड़ दिए.
1815 में नेपाल से हुए युद्ध के बाद गोरखा शासन का अंत हुआ. अब अंग्रेजों ने भूमि व्यवस्था बनाए रखने के लिए बंदोबस्त किया था. भूमि नापी गई. गांव की सीमाऐं तय हुईं. लगान- भूमि कर तय हुआ. इससे पहले गांव की भू व्यवस्था परंपरागत व सामुदायिक थी. बंदोबस्त से भूमि का कानूनी स्वामित्व दर्ज हुआ. राजस्व की दर तय हुई. गांव का प्रशासन अधिक औपचारिक हुआ. ब्रिटिश प्रशासन ने भूमि को कई श्रेणियों में बांटा जैसे किसान द्वारा स्वयं जोती जाने वाली भूमि जिसे ‘खुद कास्त भूमि’ भी कहा गया. राज्य के नियंत्रण में वन भूमि व सामुदायिक या पार्टी भूमि. ऐसे वर्गीकरण ने भूमि के पारम्परिक उपयोग को बदल दिया. फिर 19 वीं सदी के मध्य जंगल को राज संपत्ति घोषित किया. स्थानीय समुदाय के अधिकार कम हुए. इससे ईंधन, पशु चराई व कई उपयोगों में इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी प्राप्त करने में रोकटोक लगी. खेती से प्राप्त उपज जीवन निर्वाह लायक थी उस पर लगान की वसूली से किसान पर आर्थिक भार पड़ा. इसी दौर में सामान सारने के लिए कुली भर्ती शुरू हुई तो फौज के लिए ह्रष्ट -पुष्ट युवकों की आपूर्ति के लिए पहाड़ उपयुक्त पाया गया. गांव से बाहर निकल काम के इन मौकों से प्रवास आरम्भ हो गया.बंदोबस्त के बाद जो बदलाव देखे गये उनमें जिनके पास जमीन पर कब्जा अधिक था उनकी स्थिति सुदृढ़ हुई. गांव के नेतृत्व में परिवर्तन आया. भूमि व शक्ति का सम्बन्ध स्पष्ट हुआ. इन बदलावों का समाज शास्त्रीय विवेचन सनवाल ने अपनी रचनाओं में किया.
सनवाल ने पहाड़ के समाज को स्थिर माना. गावों की स्थिति का अवलोकन कर उन्होंने पाया कि सामाजिक ढांचा कई मामलों में यथावत बना रहा. ब्राह्मण, ठाकुर व शिल्पकार के बीच भोजन, विवाह, कर्मकांड जैसे सामाजिक सम्बन्धों के नियम काफी स्थिर रहे. खेती की व्यवस्था भी वही बनी रही. आरंभिक क्रम में परंपरागत खेती, छोटी जोत व सीमित बाजार से जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था बनी रही.अधिकांश परिवार पीढ़ियों तक वही पेशा करते रहे.लम्बे समय से परिवहन के साधनों के अभाव में रहे.ऐसी सीमित सामाजिक गतिशीलता की दशा को उन्होंने स्थैतिक समाज कहा.
सनवाल के स्थैतिक व्यवस्था के तर्क पर शिव प्रसाद डबराल ने कुमाऊं गढ़वाल में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों को पूरी तरह से ध्यान में न रखना बताया. डबराल ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में प्रवास एक बहुत बड़ा कारक था जिसने आर्थिक व सामाजिक हैसियत को बदल डाला. बीसवीं सदी में सड़कें बनने से स्थानीय बाजार विकसित होने लगे,मैदानी भागों से नकद फसल आयीं जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदलाव के दौर से गुजरी. फिर स्वतंत्रता के बाद शिक्षा के प्रसार, लोकतान्त्रिक राजनीति व पंचायती प्रणाली से सामाजिक शक्ति का संतुलन बदला. इसी कारण हिमालयी समाज धीरे धीरे पर लगातार बदलने वाला समाज बना जो स्थिर न था, इसे पारम्परिक सामाजिक संरचना, आर्थिक परिवर्तन, शिक्षा और प्रवास ने बदला. डबराल ने “गढ़वाल के इतिहास’ ‘एवम “उत्तराखंड का राजनीतिक एवम सांस्कृतिक इतिहास” में स्तरीकरण समझाया. उनके अनुसार गढ़वाल का समाज मुख्यतः खस समाज था जिसमें ब्राह्मण और राजपूत मुख्य थे. शिल्पकार समुदाय सेवा कार्यों व कारीगरी से जुड़ा था. कुमाऊं और गढ़वाल दोनों में यह विशेषता होने से उन्हें “हिमालयी कृषक समाज” की श्रेणी में रखा जाता रहा. गढ़वाल में जहाँ लम्बे समय तक राज्य की केंद्रीय सत्ता रही जबकि कुमाऊं में कत्यूरी और चंद राजाओं के अलग-अलग चरण रहे जिससे स्थानीय शक्ति संरचना में कुछ भिन्नता आई. गढ़वाल में सामाजिक संरचना जहाँ अधिक परंपरागत रही जबकि कुमाऊं में खस से राजपूत बनने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट दिखाई देती है.
कुमाऊं और गढ़वाल की सामाजिक संरचना आरंभिक काल में समता मूलक मानी गई और कठोर जातिगत स्तरीकारण धीरे धीरे विकसित हुआ. प्राचीन काल में नौ सौ इसवी तक हिमालय का समाज मुख्यत: जनजातीय-कुल आधारित संगठनों अर्थात छोटे कुलों, खामों या थोकों में संगठित था.सामाजिक प्रतिष्ठा जन्म से कम और भूमि, पशुपालन, युद्ध कौशल या धार्मिक भूमिका से अधिक जुड़ी थी. आजीविका का मिश्रित स्वरूप था अर्थात कृषि, पशुपालन व वनों पर निर्भरता थी आर्थिक संसाधन कम थे इसलिए आर्थिक असमानता की भी सीमा रेखा थी.
वैदिक ब्राह्मणीय व्यवस्था का प्रभाव सीमित था. स्थानीय देवता प्रकृति पूजा, कुल देवता मुख्य थे. इस समय समाज में जाति व्यवस्था तो थी पर कठोर ऊंच-नीच वाली न थी. कई जातियाँ व्यवसाय आधारित समूह थीं. दसवीं से बारहवीं सदी के बाद ऐसी कई ऐतिहासिक प्रक्रियाऐं हुईं जिससे हिमालय में जाति स्तरीकरण सुद्रढ़ हुआ. उत्तर भारत मेँ राजनीतिक उथल-पुथल हुई जिसमें राजपूत राज्यों का विस्तार हुआ. तुर्क आक्रमण के कारण कई बड़े ब्राह्मण व क्षत्रिय परिवार देश के विभिन्न भागों से आ पहाड़ों में बसने लगे. कत्यूरियों के राज के बाद नये राजवंश स्थापित हुए. इनमें कुमाऊं में चंद वंश व गढ़वाल में पवार वंश मुख्य था. इन राजाओं ने अपने साथ ब्राह्मण पुरोहित, कारीगर व सेवादार जातियाँ भी बसाईं. राज्य को संगठित करने के लिए ब्राह्मण वादी सामाजिक ढांचे को अपनाया जिससे ब्राह्मण, क्षत्रिय, शिल्पकार व अन्य सेवा जातियों का स्पष्ट क्रम बना. धार्मिक वैधता के लिए पुजारी वर्ग की शक्ति बढ़ी. भूमि का पुनर्वितरण हुआ. ब्राह्मणों को दान भूमि अग्रहार, सैनिक व अधिकारियों को जागीर व स्थानीय कृषकों को अधीन कृषक बनाया गया. इससे आर्थिक असमानता सामाजिक असमानता में बदल गई. स्थानीय जनजातियां व समुदाय धीरे धीरे उच्च जातियों की संस्कृति अपनाने लगे कुल देवता के साथ वैदिक पूजा, गोत्र प्रणाली का विकास व विवाह नियम कठोर हुए. इसे “संस्कृतिकरण” कहा गया. स्थानीय समुदायों को धीरे-धीरे निम्न जातियों में वर्गीकृत किया गया.
कुमाऊं में गोत्र परंपरा का विकास धीरे-धीरे हुआ. यह व्यवस्था सीधे वैदिक परंपरा से नहीं आई बल्कि स्थानीय समाज के साथ मिल कर बनी. वैदिक परंपरा में गोत्र का अर्थ था किसी ऋषि के वंश से जुड़ी परंपरा जिनको ऋषि गोत्र कहा जाता था. इसका मूल उद्देश्य वंश पहचान बनाए रखना और विवाह में रक्त सम्बन्ध से बचना था. आरंभिक हिमालयी समाज में कुल, क्षेत्र व पेशा आधारित पहचान थी. मध्य काल में मैदानों से कई ब्राह्मण परिवार पहाड़ आ बसे जिनके पास गोत्र परंपरा थी. उन्होंने यज्ञ, संस्कार व विवाह व्यवस्था के माध्यम से गोत्र प्रणाली का विकास किया. कत्यूरी, चंद व पंवार वंश में प्रशासन व धार्मिक क्रिया कलापों के लिए ब्राह्मणों को विशेष महत्त्व मिला जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी व उनकी परंपराएं फैलने लगीं. तब स्थानीय समुदाय ने भी गोत्र अपनाया. अपनी वंशावली को ऋषियों से जोड़ना आरम्भ किया व ब्राह्मणों द्वारा नियत नियम अपनाए. इससे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा गया. मध्यकाल में खस समुदाय ने भी गोत्र प्रणाली अपनायी व अपनी वंशावली को सूर्य व चंद्र वंश से जोड़ना आरम्भ किया. श्री निवास के अनुसार कई समुदायों ने सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए ब्राह्मणिक परंपराएं अपना लीं. कुछ खस समुदायों ने पुरोहित कार्य, ज्योतिष व धार्मिक अनुष्ठान अपनाए. धीरे धीरे उन्हें ब्राह्मण वर्ग में सम्मिलित कर लिया गया. यह सामाजिक गतिशीलता का उदाहरण था जिसे संस्कृतिकरण कहा गया. इसमें स्थानीय समुदाय उच्च जातियों की संस्कृति अपना कर अपना कर अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार का प्रयास करने लगे. शिव प्रसाद डबराल ने स्पष्ट किया कि कई स्थानीय समुदायों ने तदन्तर गोत्र अपनाया जिससे सामाजिक स्तरीकरण आरम्भ हुआ.
एटकिंसन के अनुसार हिमालय में जाति संरचना ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई और स्थिर नहीं रही.
सन 1200 से 1700ई. के मध्य हिमालयी सामाजिक संरचना का नया रूप व्यवस्थित हुआ जिसमें उच्च जातियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय राजपूत. मध्य कृषक जातियों में स्थानीय कृषक समुदाय व शिल्पकारों में बढ़ई, लोहार, ताम्रकार, ऑजी, नाई, ढोली के साथ अन्य सेवादार व अस्पृश्य माने जाने वाले वर्ग शामिल हुए. इसप्रकार हिमालय में 900 ई तक कुल आधारित अपेक्षाकृत समता मूलक समाज रहा.900 से 1200ई में बाहरी समूहों का आगमन हुआ.. नये राज्य बने. स्तरीकरण का काल 1200 से 1700 ई में हुआ जब ब्राह्मणवादी सामाजिक ढांचा बना. जाति पदानुक्रम हुआ व भूमि व्यवस्था बनी. कठोर ऊंच-नीच वाली जाति व्यवस्था का विकास मुख्यतः तभी हुआ. इसे “कठोर सामाजिक स्तरीकरण” कहा गया.
एटकिंसन ने हिमालयन गजेटियर (भाग 2, 1882) में स्पष्ट किया कि हिमालय में कई जातियाँ मुख्यतः पेशागत समूह थीं और उनका क्रम समय के साथ विकसित हुआ. प्रोफेसर पी सी जोशी ने “सोसियल आर्गेनाईजेशन इन कुमाऊं” में निष्कर्ष दिया कि पहाड़ में सामाजिक संरचना भूमि और पेशे से जुड़ी थी बाद में यह ब्राह्मण वादी जाति संरचना में ढली. ऍम एन श्रीनिवास ने “सोसियल चेंज इन मॉडर्न इंडिया” में संस्कृतिकरण का सिद्धांत दिया जो हिमालयी समाज को भी समझने में भी लागू किया गया. शिव प्रसाद डबराल ने उत्तराखंड का इतिहास (1968) में स्पष्ट किया कि कई स्थानीय समुदायों को बाद में निम्न जातियों में रखा गया. यह प्रक्रिया राजनीतिक सत्ता और धार्मिक व्यवस्था से जुड़ी थी.
कुमाऊं और गढ़वाल में जाति संरचना थोड़ी भिन्नता लिए थी. कुमाऊं में ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी. चंद राज्य में ब्राह्मणों को अधिक भूमि मिली. गढ़वाल में राजपूत प्रभुत्ब रहा. कई स्थानीय कुलों को क्षत्रिय
की पहचान मिली.आरंभिक हिमालयी समाज पूरी तरह जातिहीन नहीं था. सन 1000-1200 के बाद नये राजवंशों के गठन, ब्राह्मण वादी वर्चस्व व भूमि व्यवस्था ने सामाजिक स्तरीकरण को मजबूत किया. कई स्थानीय समुदायों की सामाजिक स्थिति समय के साथ बदली.हिमालय की जाति व्यवस्था किसी एक घटना का परिणाम नहीं बल्कि दीर्घकालीन सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन का परिणाम
सनवाल के विश्लेषण की विशेषता यह रही कि उन्होंने कई गाँवों का प्रत्यक्ष सामाजिक सर्वेक्षण किया. जाति व्यवस्था के साथ परिवेश को ध्यान में रखा. गाँवों के अध्ययन से उनने कुछ निष्कर्ष निकाले कि :
सनवाल ने गाँवों में पहली बार सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को प्राथमिक समंक के विश्लेषण से स्पष्ट करने का आधार दिया कि हिमालयी समाज में जाति, आर्थिक स्थिति और पर्यावरण एक साथ काम करते हैं. सनवाल के अध्ययन की सीमा यह थी कि उनका अध्ययन कुछ गाँवों तक सीमित था. औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था के प्रभाव पर कम चर्चा थी. सनवाल ने इसे अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं माना उनका मुख्य विषय कुमाऊं की सामाजिक स्तरीकरण व्यवस्था था न कि धार्मिक इतिहास का पुनरावलोकन.कुमाउनी समाज के विवेचन की समय रेखा में 1880 के दशक में एटकिंसन ने वर्णनात्मक अध्ययन किया. 1960 के दशक में सनवाल समाज शास्त्रीय सर्वेक्षण के आधार पर नतीजों तक आए. उनके अध्ययन के आधार पर1970 के दशक में पूरन चंद्र जोशी ने हिमालयी क्षेत्रों के अध्ययन में राजनीतिक अर्थव्यवस्था व विकास के अर्थशास्त्र का दृष्टिकोण अपनाया. विकास की नीति व संसाधन संरचना पर केंद्रित रहे. उनका मुख्य प्रश्न था कि हिमालय में संसाधन मौजूद होने के बाद भी निर्धनता व आर्थिक पिछड़ापन बना रहता है. अन्य कई अर्थशास्त्रियों ने हिमालयी समाज के आर्थिक विश्लेषण में उनके निष्कर्ष आधार रूप में लिए. सनवाल ने सामाजिक ढांचे पर जोर दिया तो जोशी ने आर्थिक ढांचे को महत्त्व दिया.सनवाल ने भूमि व आर्थिक शक्ति के कारक लिए जिनकी सहायता से वह यह स्पष्ट करना चाहते थे कि गाँवों में भू स्वामित्व सामाजिक शक्ति का मुख्य स्त्रोत है. जिसके पास अधिक भूमि है.उन्होंने ब्राह्मण,खस और डोम के इतिहास का वर्णन किया पर उनका मुख्य उद्देश्य कुमाऊं के गाँवों में सामाजिक स्तरीकरण की वर्तमान दशा को समझना था. उन्होंने जोर दिया कि खस से राजपूत बनने की प्रक्रिया एक सामाजिक -ऐतिहासिक परिवर्तन थी. यह कोई घटना नहीं बल्कि कई सदियों में हुई सामाजिक उन्नयन की प्रक्रिया थी. खस हिमालय के प्राचीन निवासी माने गये अर्थात वह जनजातीय स्थानीय समुदाय थे. वह कृषक और योद्धा थे जो कुमाऊं, गढ़वाल और नेपाल के पहाड़ी भागों में फैले थे. प्राचीन संस्कृत व पौराणिक ग्रंथों में उनका उल्लेख मिलता है.
दसवीं से सोलहवीं सदी के बीच हिमालय में बड़े सामाजिक परिवर्तन हुए. मैदानों से ब्राह्मणों व राजपूतों का आगमन हुआ. कत्यूरी व चंद वंश का राज्य विस्तार हुआ. राज्य प्रशासन व सैन्य व्यवस्था क विकास हुआ. इन परिवर्तनों ने सामाजिक व्यवस्था को बदलना शुरू किया. स्थानीय खस सरदारों ने सैन्य सेवा, प्रशासनिक पद व भूमि अधिकार प्राप्त किए. जब वह राज्य सत्ता से जुड़े तो उनकी सामाजिक हैसियत बढ़ी. समय के साथ कई खस समूहों ने राजपूती वंशावली अपनाई. कुल देवता परम्परा विकसित की. गोत्र व वंश कथा अपनाई. यह राजपूती परंपरा को अपनाना था जिसे राजपूतीकरण कहा गया. ब्राह्मण पुरोहितों ने वंशावली लिखी, कुल परम्परा स्थापित की. जिन खस परिवारों के पास अधिक भूमि थी वही गांव के मुखिया बने तथा स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली बने. समय के साथ वही परिवार राजपूत कहलाए. खस से राजपूत बनने की प्रक्रिया सामाजिक गतिशीलता का उदाहरण है जिसने यह प्रदर्शित किया कि हिमालयी समाज स्थिर नहीं रहा. सामाजिक पहचान राजनीतिक शक्ति व भूमि से बदल सकती थी. जाति व्यवस्था भी इतिहास में बनती और बदलती रही. कुमाऊं में राजपूत बनने की प्रक्रिया मुख्यतः खस समुदाय की राजनीतिक शक्ति, भूमि स्वामित्व व ब्राम्हणीय मान्यता के संयोजन से विकसित हुई.
कुछ विद्वानों ने तर्क दिया कि हिमालय में प्राचीन बौद्ध धर्म का प्रभाव था. जब ब्राह्मण वादी व्यवस्था सुदृढ हुई तो कुछ समुदाय सामाजिक रूप से नीचे धकेल दिए गये. इस सन्दर्भ में यह विचार भी किया गया कि कुमाऊं के शिल्पकार पहले बौद्ध परंपरा से जुड़े. गजेटियर व स्थानीय अन्य स्त्रोत हिमालय में बौद्ध प्रभाव व सामाजिक परिवर्तन का उल्लेख करते हैं.
हिमालय में बौद्ध धर्म का प्रसार मौर्य व उत्तर मौर्य काल में हुआ.सम्राट अशोक के समय से उत्तर भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार के प्रमाण मिलते हैं. कुमाऊं गढ़वाल में व्यापार मार्गोँ से बौद्ध भिक्षुओं का आवागमन रहा जिनका तिब्बत व मध्य हिमालय से संबंध था. कुछ स्थानीय समुदाय बौद्ध परंपराओं से प्रभावित हुए पर यहाँ बड़े बौद्ध मठों के प्रभाव कम मिलते हैं. कत्यूरी राजवंश सातवीं से ग्यारहवीं सदी के मध्य रहा. तब शैव व वैष्णव परंपराएं सुद्रढ़ हुईं. ब्राह्मणों को भूमि दी गई, अनुदान मिले व मंदिर संस्कृति का उदय हुआ. धीरे धीरे ब्राह्मण वादी धार्मिक व्यवस्था मजबूत होने लगी.अब जाति व्यवस्था कठोर हो रही थी व ‘भूमि आधारित पदानुक्रम’ बन रहा था. गजेटियर में उल्लेख मिलता है कि कुमाऊं के कुछ शिल्पकार पहले बौद्ध परंपरा से संबंधित रहे पर बाद में उन्हें निम्न जाति में रखा गया. पर यह पूरी तरह से सिद्ध ऐतिहासिक तर्क नहीं है
सनवाल का मानना था कि कुमाऊं की सामाजिक संरचना लगातार बदलती रही और जाति व्यवस्था समय के साथ विकसित हुई. वह मैदानी उत्तर भारत की कठोर वर्ण व्यवस्था से कुछ भिन्न व लचीली थी. यहाँ समाज की मूल संरचना खस समुदाय पर आधारित थी, एक ऐसा स्थानीय कृषक समुदाय जिसका बड़ा भाग बाद में राजपूत पहचान में बदल गया. कुमाऊं के समाज को ‘छोटा किसान समुदाय ‘ कहा गया जो पारम्परिक अर्थ में सामंती समाज नहीं था.सामंती समाज में अधिक भूमि प्रायः जमींदार या सामंत के पास होती है तो राजनीतिक शक्ति भी इन्हीं के पास केंद्रित रही. अधिकांश किसान काश्तकार, बटाई दार, साझी या बंधुवा रहे. ऐसी व्यवस्था उत्तर भारत के कई मैदानी क्षेत्रों में पाई जाती रही पर कुमाऊं में खेती छोटे पैमाने में काश्तकार द्वारा की जाती रही. भूमि की जोत भी कम होती थी. खेती प्रायः परिवार आधारित होती रही. कुमाऊं की सामाजिक बनावट का आधार खस कृषक समुदाय था जिनके अधिकांश परिवार खेती से ही गुजर बसर करते थे. अपनी जमीन का स्वामित्व होने के बाद भी किसानों की माली हालत में बहुत अधिक अंतर नहीं देखा जाता था. इसे ही “किसान समाज” कहा गया.
आजीविका एवम अन्य काम धंधों में सामुदायिक सहयोग होता था जिसमें श्रम का आपसी बंटवारा होता. सामूहिक काम-काज के अलावा मजदूरी पर किए काम सीमित होते जिससे सहयोगात्मक सामाजिक संबंधों की पुष्टि होती थी. फिर भी आर्थिक विषमता विद्यमान थी क्योंकि कुछ परिवारों के पास अधिक भूमि थी व कुछ के पास बहुत कम. शिल्पकार समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर था पर दरिद्र नहीं, न हीं यह अंतर सामंती शोषण जितना गहरा था.
सनवाल इस नतीजे पर पहुंचे कि गांव की शक्ति तीन कारकों से बनती है जाति-भूमि व स्थानीय नेतृत्व. अधिकांश छोटे किसान हुए. बड़ी जमींदारी के कम होने के पीछे भौगोलिक कारक भी हुए जैसे दुर्गम इलाके, सीढ़ीदार खेत, आने जाने की मुश्किलें, मौसम की प्रतिकूलता व इन सबके साथ सीमित स्तर पर हुआ उत्पादन. इसलिए इसे सामंती समाज न कह कर ‘कृषक समाज’ कहा गया.
सनवाल का अध्ययन केवल कुछ गाँवों पर आधारित था जबकि कुमाऊं का समाज विविधता लिए है. अलग अलग इलाकों में सामाजिक संरचना भिन्न है. इसलिए सीमित गाँवों से पूरे समाज का सामान्यीकरण करना समस्या को पूरी तरह नहीं सुलझाता. उनका अध्ययन मुख्यतः समाज शास्त्रीय फील्ड वर्क पर आधारित है जिसमें उन्होंने सामाजिक संरचना का स्वरूप बताया पर उसके ऐतिहासिक स्वरूप की विस्तृत व्याख्या नहीं की. उनका विवेचन खस से राजपूत बनने की प्रक्रिया, ब्राह्मण प्रवास के इतिहास व प्राचीन सामाजिक संरचना पर चर्चा सीमित है.
कुमाऊं की सामाजिक संरचना पर ब्रिटिश भूमि बंदोबस्त का बहुत अधिक प्रभाव रहा जिससे भूमि स्वामित्व का पुनर्वितरण हुआ. समाज के वर्गों की शक्ति संरचना में परिवर्तन देखे गये पर सनवाल ने इस औपनिवेशिक नीति का विस्तृत विवेचन नहीं किया. उन्होंने जाति पर अधिक केंद्रित किया. भूमि व शक्ति का उल्लेख किया पर आर्थिक वर्ग संरचना को विस्तार नहीं दिया जिससे उनका अध्ययन राजनीतिक अर्थव्यवस्था की दिशा में नहीं जाता. क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के अन्य कारकों जैसे प्रवास, सैन्य भर्ती, बाजार संपर्क जैसी आर्थिक प्रक्रियाओं को उन्होंने सीमित रूप से ही परखा. उनकी व्याख्या सामान्य ग्राम मॉडल को ध्यान में रखती है पर हिमालयी समाज की विशेषता जैसे छोटे गांव, सीमित भूमि व सामुदायिक श्रम सहभागिता का अधिक विस्तार नहीं किया इसलिए उनकी व्याख्या आंचलिक परिप्रेक्ष्य को गहराई से न देख सामान्य गांव के लक्षण ही प्रकट करती है. सीमित गाँवों के अध्ययन, ऐतिहासिक विश्लेषण की कमी, औपनिवेशिक भू-व्यवस्था की उपेक्षा व आर्थिक वर्ग संरचना के सीमित विश्लेषण की कमी सनवाल के अध्ययन में दिखाई देती है.
(जारी)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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