कॉलम

कोयले की अठन्नी, धागे पर हड्डी उर्फ़ जरा माचिस देना उस्ताद!

भूतचरित

-शंभू राणा

न जाने क्या बात है कि आज-कल लोग भूतों की बात नहीं करते, उनकी कहानियां नहीं सुनाते. जो कि एक ज़माने में बड़ी ही आम बात हुआ करती थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज आदमी इतना कमीना हो गया है कि भूतों को उससे मेल-मुलाकात न करने में ही भलाई जान पड़ी हो कि ना यार अब ये अपने वश का नहीं. वर्ना हर पीपल का पेड़, सुनसान जगह, खँडहर और वीरान इमारत में कम से कम एक भूत तो रहता ही था. कहीं-कहीं तो एक से ज्यादा भी. हर आदमी के पास भूतों की कई कहानियां हुआ करती थीं. सुनने-सुनाने का दौर जब चलता तो ख़त्म ही होने को नहीं आता था. अब कोई भूत का किस्सा नहीं सुनाता.

कई बार यूँ सुनने को कि एक बार फलां आदमी का सामना भूत से हो गया. अब भूत तो भूत हुआ पर वह आदमी भी कुछ कम नहीं था. जब भूत ने उसका रास्ता रोका तो उसने भी दो-दो हाथ करने की ठान ली. दोनों में गुत्थम-गुत्था होने लगी. कभी भूत आदमी पर भारी तो कभी आदमी भूत पर हावी. किसी ने मैदान नहीं छोड़ा. डटे रहे. होते-करते रात बीत गयी. ज्यों ही पौ फटने को हुई भूत की ताकत कुदरती तौर पर कम होने लगी. भूत रात ही में भूत होता है. दिन के उजाले में पस्त पड़ जाता है.तो अंत में भूत ने कहा कि भाई तू जीता मैं हारा. मुझे बख्श दे. मैं तेरा गुलाम हुआ. जब कहेगा हाजिर हो जाऊंगा और जो हुक्म होगा बजा लाऊंगा.

ऐसा ही एक किस्सा अल्मोड़ा शहर के मुख्य मुर्दाघाट विश्वनाथ में कभी घटा था. बात काफी पुरानी है. तब न मोटर न गाड़ी. सभी मुर्दे अपनी अंतिम यात्रा पैदल ही तय करते थे. अल्मोड़ा से विश्वनाथ तक का रास्ता ज्यादातर वीरान और सुनसान. उन दिनों विश्वनाथ में एक बड़ा ही ताकतवर और मशहूर भूत रहा करता था. रात ढलते ही वह अपनी जटाओं की फायबर केबल शहर के मोहल्ले धारानौला और उससे भी कुछ ऊपर बावन सीढ़ी तक बिछा देता. भूला-भटका कोई राहगीर उस रास्ते आ बैठता तो जटायें उसे जकड़ लेतीं और उसका काम तमाम.

एक रात की बात है. कीर्ति अनरिया नाम का एक आदमी अकेला ही उस रास्ते पर चल पड़ा. उस दिन न जाने कैसे उसे इतनी देर हो गयी घर लौटने में. उसका गाँव अनरियाकोट विश्वनाथ और सुयाल नदी के उस पार काफी चढ़ाई पर था (और अब भी है). तो साहब! कीर्ति ज्यों ही धारानौला पहुंचा, जटाओं ने उसे लपटने की कोशिश की. हर दिन की तरह हर रात भी एक सी नहीं होती. उस रात भूत का भूत का राशिफल कुछ उत्तम नहीं था. उसके वहमो-गुमान में भी नहीं था कि उसका पाला आज गुरु से पड़ने वाला है. तो जी कीर्ति ने जटाओं में उलझने के बजाय उन्हें कसकर पकड़ा और ऊन की-सी लच्छी बनानी शुरू कर दी. जटायें लपेटते-लपेटते वह भूत के हेडक्वार्टर विश्वनाथ पहुँच गया. भूत और कीर्ति के बीच हुज्जत हुई जो कि मारपीट में बदल गयी. रात भर घमासान का रन पड़ा. फिर वही हुआ जो पहले कहा. पौ फटते ही भूत ने कीर्ति के पाँव पकड़ लिए और सदा के लिए गुलामी लिख दी. बाद में कीर्ति अनरिया ने भूत से खेती-किसानी के कई काम करवाए. और यूँ उसकी कीर्ति अमर हो गयी.

अनरियाकोट और आस-पास के गाँव वालों को आज भी कभी रात-बेरात विश्वनाथ घाट से गुजरना होता है तो वो अपना जबानी परिचय-पत्र दिखाते हैं कि रे भूतों, हम कीर्ति अनरिया के वंशज हैं. हमें कुछ मत कहना. याद रहे कि हमारे-तुम्हारे बुजुर्गों के बीच जेनेवा कन्वेंशन टाइप का कुछ हुआ था. तुम उस संधि से बंधे हो.

भूत चाहे जहाँ हो, जैसा हो काला-भूरा, देशी-फिरंगी, जिस भी किमाश का हो उसके साथ किसी को भाषा की दिक्कत आई हो, सुनने में नहीं आया. वे सही मायने में बहुभाषाविद हुआ करते थे. आप उनकी तुलना टूरिस्ट गाइडों से कर सकते हैं जो हर देश-प्रान्त की भाषा काम चलाऊ ही सही जानते हैं. एक अंगूठा छाप ग्रामीण की मुलाकात अगर किसी फिरंगी भूत से हो जाये तो वह गंवई भाषा में ही बात करता है. कोई इंसान चार भाषाएँ जान-समझ लेता है तो इतराता फिरता है. भूत लोग जो संसार की हर भाषा-बोली जानते हैं, उनकी तारीफ में दो शब्द बोलते हमारी नानी मरती है. क्यों न भूत हमसे दूरी बनाकर रखें भला.

इसी तरह लगभग सारे ही भूतों को बीड़ी पीने की लत होती थी पर इनके पास माचिस नहीं होती थी. वे राह चलते इंसान से पूछते थे- ए भाई, माचिस है क्या?

भूतों के अलावा चुड़ैलें भी हुआ करती थीं. उनमें से कई तो बहुत ही आशिक मिज़ाज और अय्याश किस्म की भी होती थीं. उनके शिकार नौजवान लोग हुआ करते थे. मसलन एक खाता-पीता, हट्टा-कट्टा नौजवान अचानक सूखकर छुआरा हो जाता. लोग पूछते कि भाई सब खैरियत तो है. ये क्या हाल बना लिया तुमने अपनी सेहत का? घर वाले उसे बैद-हकीमों के पास ले जाते. जांच-पड़ताल से पता चलता सब कुछ तो ठीक है. सारी इन्द्रियां सुचारू ढंग से चल रही हैं. पर लौंडा है कि दिन पर दिन सूखता ही चला जाता है. बताता कुछ नहीं अपने आप में गुम रहता है. फिर एक दिन पानी नाक तक आ चढ़ता है, वह किसी राजदार के सामने अपनी गिरती सेहत का राज उगल देता है. पता चलता है कि पिछले कई महीनों से उसके कमरे में एक बला की खूबसूरत औरत आती है, रात भर ऐश करती है तडके ही गायब. ओ हो, बेटा तो ये बात है. अरे पहले बताते यार, हम किस मर्ज की दवा हैं. तुम पर किसी चुड़ैल का दिल आ गया है.

फिर वह राजदार उपाय बताता कि आज रात उसके पल्लू से एक लंबा धागा बाँध देना बिना खबर लगे. सुबह को आकर बताता हूँ क्या करना है. अगली सुबह देखने में आता कि धागे का एक सिरा दरवाजे या खिड़की की झिर्री से बहार को चला गया है. उसका पीछा करने वाले किसी खंडहर, पीपल के पेड़ या किसी वीरान-सी जगह जा पहुँचते. धागा खींचने पर पाया जाता उसका दूसरा सिरा एक हड्डी से बंधा है. जिसका बाकायदा कफ़न-दफ़न कर दिया जाता और सूखता हुआ लौंडा कुछ ही दिनों में फिर से हरा-भरा हो जाता. अफ़सोस कि अब इस तरह की चुड़ैलें भी नहीं पाई जातीं.

कई जगहों पर बच्चा भूत भी पाए जाते थे. जो कि अमूमन किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते थे. जिस घर में इनका अड्डा होता वहां रहने वालों को रात-भर चैन से सोने नहीं देते. रात भर की ही-ही, खी-खी, धमाचौकड़ी, सामान की उठा-पटक, सोये आदमी के बदन से चादर खींचना, पैर के तलवों में गुदगुदी करना, खिड़की-दरवाजे के पल्ले पकड़ कर झूलना और कान में तिनके से खुजली कर भाग जाना जैसे काम करते. अब बच्चे तो बच्चे होते हैं न जी. बचपन का दूसरा नाम ही शैतानी है. आपने कभी सुना है कि फलाना भूत उम्र में काफी सयाना हो चला है मगर हरकतें उसकी अब भी बच्चों सी हैं.

अल्मोड़ा की लाल बाजार में ‘शिब्बन पान भण्डार’ नाम से बड़ी ही मशहूर दूकान हुआ करती थी. सुबह जल्दी ही खुलने और रात बारह बजे बाद बंद होने के लिए भी यह दुकान जानी जाती थी. रात को नौ से बारह बजे वाला सिनेमा का शो देखकर आने वालों के लिए पान-सिगरेट की आखिरी और सौ फीसदी भरोसेमंद दुकान हुआ करती थी. पता नहीं खुली भी होगी या नहीं वाला कोई धड़का नहीं था. यकीनन खुली ही होगी. तब अल्मोड़ा जैसे शहर में इतनी देर तक किसी दुकान का खुले रहना कोई आम बात नहीं थी. इस दुकान के बारे में लोगों ने एक किस्सा गढ़ रखा था कि जब तक भूत लोग आकर पान नहीं खा लेते तब तक दुकान बंद नहीं होती. दुकान उन्हीं के इन्तजार में इतनी रात तक खुलती है. वे लोग बारह बजे के बाद ही कभी आते हैं. पान का दाम कोयले से चुकाते हैं जो गल्ले में डालते ही अठन्नी-रुपये में बदल जाता है.

मेरे पिता भी भूत से मुलाकात का एक किस्सा सुनाया करते थे. गढ़वाल कैडर का वह भूत उन्हें देहरादून में मिला था. वह एक मजहबी मुस्लिम बुजुर्ग के रूप में मिला. बकौल पिताजी के – गुरु, एक बार की बात है. लखनऊ से हमारा डिप्टी डायरेक्टर आया था. हमको उसके पास जाना था कि डाकबंगले कि किसी चीज की जरूरत तो नहीं. हम साइकिल लेकर निकले. रास्ता भटक गये. अँधेरा होने लगा. हम अंदाजे से एक गली में घुस गए. सोचा कोई मिले तो रास्ता पूछें. चलते-चलते क्या देखते हैं कि गली ख़तम हो गई. तभी हमारी नजर सामने एक टूटे-फूटे से घर पे पड़ी. आले पे ढिबरी जल रही है. पुरानी-सी चारपाई पर हमारी ओर पीठ किए एक बूढ़ा आदमी बैठा माला जप रहा है. बदन पर सफ़ेद कुरता-पायजामा, सर पे टोपी, चेहरे में सफ़ेद दाढ़ी और अजीब सी चमक, हमने आवाज दी –बड़े मियां जरा सुनिएगा. आवाज सुनते ही उसने धीरे से गर्दन हमारी ओर घुमाई और बोला – मैसेन-मैसेन … हम झट से समझ गए और सर पर पाँव रखकर वहां से भागे.

अब इसे भूत की महिमा नहीं तो और क्या कहेंगे कि देखने वाला भूत को पीठ की ओर से देख रहा है फिर भी हाथ में माला, चेहरे पर दाढ़ी और नूर साफ़ देख पा रहा है. मेरे पिता गर उर्दूदां होते तो बड़े मियां के मुंह से निकलता बू-ए-आदम. अगर गढ़वाली भाषा जानते तो शायद वे फरमाते मनख्याण … भूत और भगवान में काफी हद तक समानता है. अतः विधान है कि दोनों की ही कथा का बिना व्यवधान, श्रद्धापूर्वक श्रवण किया जाए.

शंभू राणा विलक्षण प्रतिभा के व्यंगकार हैं. नितांत यायावर जीवन जीने वाले शंभू राणा की लेखनी परसाई की परंपरा को आगे बढाती है. शंभू राणा के आलीशान लेखों की किताब ‘माफ़ करना हे पिता’  प्रकाशित हो चुकी  है. शम्भू अल्मोड़ा में रहते हैं और उनकी रचनाएं समय समय पर मुख्यतः कबाड़खाना ब्लॉग और नैनीताल समाचार में छपती रहती हैं.>

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