फोटो: जयमित्र सिंह बिष्ट
एक इन्दरू मोल्या था. उसके माँ बाप नहीं थे. वह गायों के साथ रहता था. एक दिन वह गाय चरा रहा था तभी उसकी इच्छा काफल खाने की हई. वह काफल के पड़ पर चढ़ गया और काफल खाने खाने लगा, तभी एक डक्योंणि (डकनी, चुड़ैल औरत) आई. वह आदमी खाती थी. इन्दरू छोरा को पेड़ पर चढ़ा देखकर उसके मुँह में पानी आ गया. उसने कहा,”अरे इन्दरू, छोरा जरा काफल मुझे भी देना.” इन्दरू ने कहा, “ऐ बौडी ! मैं कैसे काफल तोडूं? काफल तो बहुत ऊपर लगे हैं.” झौक्योंणी ने कहा, “अरे इसमें क्या बात है. एक पाँव सूखे फांगे में रख और एक हरे फांगे में रख.” इन्दरू मोल्या ने वही किया और वह सूखे फांगे के टूटने से नीचे गिरा कि उसने उसे उठाकर झोली में डाल लिया तथा झोली में बाँधकर वह उसे पीठ पर लादकर चल पड़ी.
(Indru Molya Folk Stories of Uttarakhand)
रास्ते में उसे लघु शंका लगी. उसने झोला नीचे रखा और वहाँ आई . घसियारी औरतों से कहा, “ऐरे! लड़कियो! जरा इस झोले को देखना मैं अभी आती हूँ. “जैसे ही वह गई कि इन्दरू छोरे ने हल्ला मचाया, “मुझे बचाओ! घसियारी औरतों ने थैला खोलकर उसे बाहर निकाला और इन्दरू छोरा के बदले उसमें पत्थर रख दिए. बुढ़िया ड्क्योंणी वापस आई और थैला लादकर घर चल दी. अब उसकी पीठ पर पत्थर चुभने लगे. उसने कहा, “अहे ओ! इन्दरू छोरा, मुझे अपनी कुहनी, घुटने चुभा रहा है. ठैर ठैर तू… घर जाकर तो आज तेरा स्वादिष्ट कोमल मांस खाऊँगी.” वह घर पहुँची तो उसमें पत्थर निकले, उसने कहा, “अरे…ये तो गलत हो गया…”
अब दूसरे दिन वह फिर उसी तरफ गई. इन्दरू छोरा फिर वही काफल पेड़ पर चढ़कर खा रहा था. फिर बुढ़िया ने उसे काफल खिलाने की बात कही. इन्दरू छोरा ने फिर वहीं जवाब दिया कि काफल कैसे तोड़ें? बुढ़िया ने फिर वही तरतीब बतलाई. मोल्या को अकल न आई . फिर वही किया. फांगा फिर टूटा. वह नीचे गिरा. बुढ़िया फिर उसे झोले में बन्द कर कर ले गई. रास्ते में फिर उसे लघु शंका लगी. तभी पंदरी औरतें (पानी भरने वाला औरतें) दिखाई दी. उसने उन औरतों से कहा, “अरे लड़कियो, जरा इस थैले को द मैं अभी आती हूँ.“ वो गईं कि इन्दरू छोरे ने आवाज लगाई. औरतों ने फिर उसे निकालकर उस झोले में पानी भर दिया. तभी बुढिया आई. झोला लादकर वह चल पड़ी. पानी उसकी पीठ में आने लगा तो वह बोली “अरे! मूतता है तो मूत… आज तो घर जाकर बढ़िया भभकने वाली आग में रखकर तेरा भटुआ खाऊँगी.”
घर जाकर फिर उसने झोला देखा तो उसने फिर कहा, “अरे ये तो गलत हो गया.”
फिर वह उधर ही तीसरे दिन निकली. इन्दरू मोल्या फिर काफल खा रहा था बुढ़िया ने फिर अपनी पुरानी तरतीब से उसे नीचे गिराया और झोले में उसे लादकर चल दी. रास्ते में फिर बुढ़िया को वही बीमारी लगी. वहाँ गाय चरानेवाली लड़कियाँ दिखीं. उसने लड़कियों से कहा, “ओ रे लड़कियो! मैं जरा जा रही हूँ. इस थैले को देखना.
(Indru Molya Folk Stories of Uttarakhand)
उसके जाते ही इन्दरू छोरे ने हल्ला मचाया, तो लड़कियों ने उसे थैली से निकाला और थैले में अंग्यार भर दिए. रास्ते में बुढ़िया की पीठ पर अंग्यारों ने काट खाया. इस पर बुढ़िया बोली, “ठैर तू ठैर. तू मुझे चिंगोटी काट रहा है? अब जरा घर आने दे, आज तो तेरा भुर्ता खूब मसाले डालकर खाऊँगी.”
घर जाते बुढ़िया ने अपना परिवार इकट्ठा किया और कहा, “आज जाड़ा है, आग भी खूब भभक रही है. तुम लोगों को गर्मा-गर्म शिकार खिलाऊँगी.” सब होंठ चाटने और हो-हो करने लगे. पर जैसे ही थैला खोला अंग्यारों ने अपना काम शुरू कर उसे और उसके बच्चों को ऐसा काटा कि सबके चेहरे मुँह-नाक-कान आँख ओष्या (फूलना) गए. तबसे बुढ़िया कभी जंगल नहीं गई. वरना इन्दरू मोल्या और बेवकूफ बनता फिर गाँव की लडकियाँ उसे छुड़ाती या क्या पता बुढ़िया का शिकार ही हो जाता. उसके बाद इन्दरू मोल्या काफल खाता रहा और तोड़-तोड़कर जंगल जाती लड़कियों को खिलाता भी रहा.
(Indru Molya Folk Stories of Uttarakhand)
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किसी जमाने में पॉलीथीन बाबा के नाम से विख्यात हो चुके प्रभात उप्रेती उत्तराखंड के तमाम महाविद्यालयों में अध्यापन कर चुकने के बाद अब सेवानिवृत्त होकर हल्द्वानी में रहते हैं. अनेक पुस्तकें लिख चुके उप्रेती जी की यात्राओं और पर्यावरण में गहरी दिलचस्पी रही है.
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