12 मार्च 1930 की सुबह साबरमती आश्रम के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र थे. महात्मा गांधी ने अपने हाथ में लाठी ली और 78 सत्याग्रहियों के साथ दांडी की ओर पैदल चलना शुरू किया. अगले 24 दिनों में यह दल लगभग 390 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 6 अप्रैल को अरब सागर के तट पर स्थित दांडी पहुँचा. वहीं गांधीजी ने समुद्र के किनारे से नमक उठाकर ब्रिटिश नमक कानून का उल्लंघन किया. उस समय उपस्थित लोगों ने इसे एक प्रतीकात्मक घटना माना. कुछ ही सप्ताह में यही घटना भारत के सबसे बड़े जनआंदोलनों में बदल गई.
दांडी मार्च किसी आवेग में लिया गया निर्णय नहीं था. गांधीजी ने 2 मार्च 1930 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने ग्यारह मांगें रखीं. नमक कर समाप्त करना उन मांगों में शामिल था. गांधीजी ने पत्र में स्पष्ट लिखा कि यदि सरकार इन मांगों पर विचार नहीं करेगी तो वे सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करेंगे. ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया. दस दिन बाद दांडी मार्च आरम्भ हो गया.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक Gandhi: The Years That Changed the World (1914–1948) में दांडी मार्च की तैयारियों का विस्तार से वर्णन करते हैं. उनके अनुसार यात्रा का मार्ग पहले से तय किया गया था. प्रत्येक पड़ाव का चयन किया गया. स्थानीय कांग्रेस समितियों को सूचना भेजी गई. जिन गाँवों से यात्रा गुजरनी थी, वहाँ सभाओं और रात्रि विश्राम की तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी थी. दांडी मार्च एक सुव्यवस्थित अभियान था जिसकी योजना कई सप्ताह पहले बन चुकी थी.
गांधीजी ने इस यात्रा के लिए केवल 78 सत्याग्रहियों का चयन किया. यह संख्या संयोग नहीं थी. प्रतिभागियों का चयन उनके चरित्र, अनुशासन, शारीरिक क्षमता और सत्याग्रह के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर किया गया. इनमें किसान, बुनकर, शिक्षक, आश्रमवासी और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे. अधिकांश प्रतिभागी साबरमती आश्रम के अनुशासित जीवन से परिचित थे. उन्हें लंबी पदयात्रा, सादा भोजन और कठिन परिस्थितियों में रहने का अनुभव था.
गांधीजी ने यात्रा शुरू होने से पहले सभी सत्याग्रहियों को स्पष्ट निर्देश दिए. किसी भी परिस्थिति में हिंसा नहीं करनी है. पुलिस उकसाए तो प्रतिक्रिया नहीं देनी है. गिरफ्तारी का विरोध नहीं करना है. सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाना है. सत्य बोलना है. समय का पालन करना है. व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखनी है. सादा भोजन करना है. शराब और नशे से दूर रहना है. गांधीजी इन नियमों को आंदोलन की नैतिक शक्ति का आधार मानते थे. इन निर्देशों का उल्लेख The Collected Works of Mahatma Gandhi और महादेव देसाई की डायरी में मिलता है.
महादेव देसाई दांडी यात्रा के दौरान गांधीजी के निजी सचिव थे. उन्होंने अपनी डायरी में यात्रा की दैनिक गतिविधियों का विस्तृत विवरण लिखा है. यात्रा की शुरुआत प्रतिदिन प्रार्थना से होती थी. उसके बाद निर्धारित दूरी तक पैदल चला जाता था. रास्ते में आने वाले गाँवों में गांधीजी लोगों को संबोधित करते थे. वे नमक कानून के साथ खादी, ग्राम स्वावलंबन, अस्पृश्यता उन्मूलन और स्वदेशी पर भी बोलते थे. दोपहर में विश्राम होता था. शाम को फिर प्रार्थना सभा आयोजित की जाती थी. अगले दिन की यात्रा का समय पहले से निर्धारित रहता था.
यात्रा का पूरा प्रबंध स्थानीय लोगों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संभाला. मार्ग में आने वाले गाँवों में भोजन और रात्रि विश्राम की व्यवस्था पहले से कर दी जाती थी. सत्याग्रहियों को सादा शाकाहारी भोजन दिया जाता था. रोटी, दाल, सब्जी, छाछ, खजूर और स्थानीय फल उनके भोजन का हिस्सा थे. रात्रि विश्राम धर्मशालाओं, विद्यालयों, आश्रमों और ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध कराए गए स्थानों पर होता था. इस व्यवस्था के लिए स्थानीय कांग्रेस समितियाँ कई दिन पहले से तैयारी शुरू कर देती थीं.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस पूरे अभियान की संगठनात्मक शक्ति थी. प्रत्येक जिले में स्थानीय समितियाँ बनाई गईं. यात्रा का कार्यक्रम पहले से भेजा गया. सभाओं के लिए स्थान तय किए गए. स्वयंसेवकों को भीड़ नियंत्रित करने की जिम्मेदारी दी गई. चिकित्सा सहायता, पेयजल, विश्राम स्थल और संचार व्यवस्था का कार्य भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संभाला. गांधीजी आगे चल रहे थे. उनके पीछे एक विस्तृत संगठन लगातार काम कर रहा था.
दांडी मार्च की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी मीडिया रणनीति थी. गांधीजी ने भारतीय और विदेशी पत्रकारों को यात्रा की जानकारी पहले ही दे दी थी. ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के कई संवाददाता यात्रा के विभिन्न चरणों में उपस्थित रहे. अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने बाद में धरसाना नमक सत्याग्रह की जो रिपोर्ट लिखी, वह The New York Times सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई. इतिहासकार मानते हैं कि इन रिपोर्टों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति विश्व जनमत को प्रभावित किया. लुई फिशर अपनी पुस्तक The Life of Mahatma Gandhi में लिखते हैं कि दांडी मार्च ने गांधीजी को विश्व राजनीति के प्रमुख नेताओं की श्रेणी में पहुँचा दिया.
अनुशासन इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति था. प्रत्येक सत्याग्रही अपने व्यवहार के लिए स्वयं उत्तरदायी था. स्थानीय स्वयंसेवक भीड़ को नियंत्रित करते थे. जनसभाओं में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग दल नियुक्त किए जाते थे. गांधीजी स्वयं समय का कठोरता से पालन करते थे. वे प्रतिदिन पैदल चलते, लोगों से मिलते और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ते. आश्रम में विकसित अनुशासन पूरी यात्रा में दिखाई देता है. इतिहासकार जूडिथ एम. ब्राउन अपनी पुस्तक Gandhi: Prisoner of Hope में लिखती हैं कि गांधीजी के आंदोलनों की सबसे बड़ी शक्ति उनके अनुयायियों का आत्मअनुशासन था.
6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ने के बाद आंदोलन पूरे देश में फैल गया. हजारों लोगों ने समुद्र तटों पर नमक बनाया. अनेक स्थानों पर नमक कानून का सार्वजनिक उल्लंघन किया गया. बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ हुईं. मई 1930 में धरसाना नमक कारखाने के सामने सत्याग्रह हुआ. वेब मिलर ने इस घटना की प्रत्यक्ष रिपोर्टिंग की. उन्होंने लिखा कि स्वयंसेवक बिना प्रतिरोध किए लाठियाँ खाते रहे और उनकी जगह लेने के लिए अगली पंक्ति तुरंत आगे बढ़ जाती थी. उनकी रिपोर्ट यूरोप और अमेरिका के अनेक समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई. अमेरिकी इतिहासकार आर्थर हरमन लिखते हैं कि इस रिपोर्ट ने ब्रिटिश शासन की अंतरराष्ट्रीय छवि को गंभीर नुकसान पहुँचाया.
दांडी मार्च का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के दौरान गांधीजी की अहिंसा को अपनी प्रेरणा बताया. नेल्सन मंडेला ने भी दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी की रणनीति का उल्लेख किया. बीसवीं शताब्दी के अनेक अहिंसक आंदोलनों में दांडी मार्च को एक सफल संगठनात्मक मॉडल के रूप में देखा गया. आज भी यह आंदोलन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि स्पष्ट उद्देश्य, विस्तृत तैयारी, अनुशासित नेतृत्व और जनसहभागिता के आधार पर बिना हथियार उठाए भी एक शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है.
-डॉ. लता जोशी
मूलतः गंगोलीहाट की रहने वाली डॉ. लता जोशी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. फ़िलहाल हल्द्वानी शहर में रह ही, डॉ. लता जोशी, काफल ट्री की नियमित सहयोगी रही हैं.
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