Featured

लोक कथा : मनमंजरी और सियार

किसी जंगल में एक बकरा और बकरी साथ रहा करते थे. बकरी का नाम था मनमंजरी. दोनों बहुत दुखी थे, उनके दुःख का कारण था उसी जंगल में रहने वाला एक सियार. जब भी मनमंजरी बच्चों को जनम देती तो सियार उन बच्चों को उठा कर ले जाता और मार कर खा लेता. इस वजह से मनमंजरी बहुत दु:खी रहती थी और उसके दुःख से बकरा भी. (Folk Tale of Uttarakhand)

एक बार फिर मनमंजरी ने दो बच्चे जने. उसे भय हुआ कि इस बार भी सियार मेरे इन दोनों बच्चों को उमार कर खा जाएगा. उसने बकरे से कहा — तुम ऐसे कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे. अबकी बार कोई ऐसी युक्ति करो कि स्याव मेरे नन्हें बच्चों को न खा सके. बकरे ने बहुत दिमाग़ लगाया तो उसे एक तरकीब सूझी.

उसने बकरी से कहा इस बार जब सियार आता दिखाई देगा तो मैं सामने की चट्टान पर चला जाऊंगा. जब सियार पास पहुँचने वाला होगा तो मैं पूछुंगा— मनमंजरी ये बच्चे रो क्यों रहे हैं? इन्हें चुप तो कराओ. सुनकर तुम बच्चों को जोर से चिकोटी काट देना और वो जोर से रोने लगेंगे. जब बच्चे रोने लगेंगे तो तुम कहना — कैसे चुप कराऊँ? सियार का ताजा कलेजा खाने की जिद पकड़ कर रो रहे हैं.

जब सियार आता दिखाई दिया तो बकरा सामने धार पर चढ़ गया. उसने कहा “मनमंजरी ये बच्चे रो क्यों रहे हैं? इन्हें चुप तो कराओ.” मनमंजरी ने बच्चों को जोर से चिकोट दिया तो बच्चे जोर-जोर से रोने लगे. तब मनमंजरी ने जवाब दिया “कैसे चुप कराऊँ? “बासी शिकार खाते नहीं ताजा पाते नहीं. सियार का ताजा कलेजा खाने को कहकर रो रहे हैं.” बकरे ने तुरंत कहा “ सियार आता ही होगा मैं उसका कलेजा लेकर आता हूं, तुम बस इन्हें चुप कराओ.” सुनकर सियार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी वह किसी तरह जान की भली मनाता बागा.

भागते सियार को रास्ते में एक लंगूर मिला. लंगूर ने सियार से इस तरह बदहवास भागने की वजह पूछी तो उसने सारा किस्सा सुना दिया. लंगूर ने हँसते-हँसते पेट पकड़ लिया ओर कहा “भला बकरी का बच्चा भी सियार का कलेजा खा सकता है?”

लंगूर ने सियार को बहुत समझाया और उसकी हिम्मत बाँधी. लंगूर ने सियार से कहा चलो मैं तुम्हारे साथ चलता हूं. लंगूर ने सियार की पूँछ से अपनी पूँछ बाँध दी और बकरा-बकरी के पास चल दिए.

जब वहां पहुंचे तो बकरा लंगूर को डांटते हुए बोला — ओ रे! लंगूर तू बड़ा दुष्ट निकला रे. तू तो कह रहा था सात सियार लेकर आता हूं करके और एक ही सियार साथ में लाया. बकरे की बात सुनकर सियार ने लंगूर का षड्यंत्र समझा और भागने लगा. दोनों की पूँछ बंधी होने से वे उछलते-कूदते लुढ़क कर भ्योव में चले गए और मर गए. बकरा-बकरी अपने बच्चों के साथ हंसी-खुशी जीवन बिताने लगे. (Folk Tale of Uttarakhand)

लोक कथा : माँ की ममता

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

दुनिया की सबसे प्रभावशाली चीज : कुमाऊनी लोककथा

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago