Featured

कहीं दिल्ली न बन जाये उत्तराखंड

दिल्ली की जानलेवा ज़हरीली हवाओं ने वातावरण को इस क़दर प्रदूषित कर दिया कि सरकार को स्वास्थ्य आपातकाल लगानी पड़ी. परिस्थिती की भयावता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया और लोगों को घरों में रहने की सलाह दी गई. सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई है. हालात की गंभीरता को देखते हुए केंद्र को आपात बैठक बुलानी पड़ी. लेकिन प्रदूषण का स्तर खतरनाक बना हुआ है. ज्ञात हो कि पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली विश्व की सबसे प्रदूषित शहर बनी हुई है. इसके लिए जहां लचर राजनीतिक फैसले ज़िम्मेदार हैं वहीं एनसीआर में धुंए फैलाते हज़ारों कल कारखाने भी इसमें समान रूप से ज़िम्मेदार हैं. (Environmental Crisis in Uttarakhand)

प्रदूषण का बढ़ता स्तर केवल दिल्ली या एनसीआर तक ही सीमित नहीं है बल्कि धीरे धीरे यह पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को भी खतरनाक रूप से अपनी चपेट में ले रहा है. उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिवाली के बाद से राज्य के कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर बहुत खराब हो चुका है. हवा में पीएम 10 और पीएम 2.5 की मात्रा में 25 से 30 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. इसके साथ ही हवा में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा भी बढ़ गई है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है. बात केवल वायु प्रदूषण तक ही सीमित नहीं है बल्कि ध्वनि प्रदूषण ने भी इस देवभूमि की आबोहवा को बिगाड़ दिया है. मोटर गाड़ियों की लगातार बढ़ती संख्या और उससे निकलने वाले धुएं ने राज्य को प्रदूषित कर दिया है. (Environmental Crisis in Uttarakhand)

विशेषज्ञों की माने तो उत्तराखंड में प्रदूषण बढ़ने का एक प्रमुख कारण तेज़ी से स्थापित होते कल-कारखाने और उनसे निकलने वाले ज़हरीले धुंए तथा प्रदूषित जल है. यह वह कारक है जो हवा और पानी दोनों को समान रूप से प्रदूषित कर रहा है. राज्य के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां उद्योगों से निकलने वाले धुएं और प्रदूषित जल तय मानकों से कहीं अधिक खतरनाक रूप धारण कर चुके हैं, जिससे आसपास बसी इंसानी आबादी के साथ साथ पशु-पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं. लेकिन सरकार और स्थानीय प्रशासन दोनों ही इस गंभीर मुद्दे पर खामोश है. उत्तराखंड का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले लालकुंआ स्थित सेंचुरी पल्प एंड पेपर मिल इसका एक निकृष्ट उदाहरण है. स्थानीय लोगों का कहना है कि मिल द्वारा भूमिगत जल का बेतहाशा दोहन करने के अलावा ध्वनि, वायु तथा जल प्रदूषण असहनीय स्तर तक फैल रहा है. इसके प्रदूषण से आसपास के क्षेत्रों के लोग अनेक तरह की बीमारियों की चपेट में आ गये है और असमय मौत के मुंह में समा जा रहे हैं. वहीं पर्यावरण संतुलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कई कीट-पतंगों की प्रजातियां भी इसकी भेंट चढ़ चुकी हैं या लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं. Environmental Crisis in Uttarakhand)

 कागज उद्योग के क्षेत्र में एशिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल इस पेपर मिल से निकलने वाले प्रदूषण के खिलाफ स्थानीय लोगों द्वारा बनायी गयी पर्यावरण संरक्षण संघर्ष समिति ने अनेकों बार आन्दोलन भी चलाया है. लेकिन स्थानीय प्रशासन की टालमटोल नीति के कारण इस आंदोलन का कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका है. हालांकि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने केंद्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा आइआइटी रुड़की की ज्वाइंट इंस्पेक्शन रिपोर्ट के आधार पर मिल को प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताते हुए इसपर एनजीटी एक्ट-2010 की धारा 24 के अंतर्गत पर्यावरणीय मुआवजे के रूप में 30 लाख रुपये पर्यावरण रिलीफ फंड में जमा कराने का आदेश भी दिया था. इसके साथ साथ प्राधिकरण ने जम्मू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व आइआइटी रुड़की को उपचारात्मक सुझाव देने के लिए अध्ययन करने को भी कहा.

वहीं मिल प्रबंधकों की ओर से प्राधिकरण को बताया कि आवश्यक स्थानों पर हैंडपंप लगा दिए गए हैं, प्रदूषित नाला को साफ कर दिया गया है, ग्रामीणों के लिए वेलफेयर प्रोग्राम और जानकारी देने के लिए विभिन्न स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, उपचारित रासायनिक जल इस्तेमाल भी हो रहा है. इस संबंध में मिल के प्रशासनिक अधिकारी जगमोहन उप्रेती से जब लेखक ने बात की तो उन्होंने कहा कि मिल किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं कर रही है, मिल के अन्दर प्रयोग किये गए पानी का बागवानी में उपयोग किया जा रहा है साथ ही प्रदूषण की ऑनलाइन मॉनिटरिंग भी हो रही है. वहीं उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, हल्द्वानी कार्यालय के क्षेत्रीय अधिकारी आरके चतुर्वेदी ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि सेंचुरी पेपर मिल की ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाती है. मिल से किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं हो रहा है. वहां लगे सभी इक्यूबमैन्ट सही संचालित हो रहे है.

 दूसरी ओर स्थानीय  लोगों की शिकायत है कि प्रदूषण बोर्ड,  स्थानीय प्रशासन और नेताओं की मिलीभगत से इस मिल के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती है. उनका यह भी आरोप है कि मिल की तरफ से प्राधिकरण को दिए गए हलफनामे असत्य हैं. मिल में आज भी पूर्ववत् भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है, जिससे न केवल पानी के स्रोत खत्म हो रहे हैं, बल्कि मिल द्वारा कैमिकल युक्त पानी को प्राकृतिक नालों में छोड़ने से स्थानीय लोगों के हैडपम्पों का पानी पीने योग्य भी नहीं रह गया है. जिसके चलते यहां के स्थानीय लोगों की जलजनित गंभीर बीमारियों से अकाल मौतें हो रही हैं. (Environmental Crisis in Uttarakhand)

मिल के प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र में अधिकांश लोग छोटी उम्र में ही पीलिया,  एलर्जी,  अस्थमा,  क्षयरोग के अलावा गले, फेफडे़ व पेट के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं. दूसरी ओर क्षेत्र में कीट-पतंगे,  गिलहरी,  नेवले,  कछुए,  घोंघे,  जुगनू,  मेंढक जैसे जीव लगभग समाप्त हो चुके हैं. स्थानीय समाजिक कार्यकर्ता हरीश बिसौती का कहना है कि मिल की स्थापना के 35 वर्ष हो गये हैं, परंतु सीएसआर से केवल 6 इंडिया मार्का के हैडपम्प यहां लगे हुए हैं. यहां तक कि मिल प्रबंधन कारखाना एक्ट का पालन करते हुए 80:20 के अनुपात में स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध नहीं करा रहा है. सेंचुरी पेपर मिल सरकार द्वारा निर्धारित कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) प्रोग्राम के तहत प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र मे कार्य करने के बजाय मिल से 35-40 से लेकर सैकड़ों किलोमीटर दूर किये कार्य दिखा रही है.

बहरहाल इस पेपर मिल पर लगने वाले आरोप और उनका जवाब कितना सही है, यह जांच का विषय हो सकता है. लेकिन इतना तो तय है कि उत्तराखंड की फ़िज़ा भी धीरे धीरे दिल्ली की तरह प्रदूषण का शिकार होती जा रही है. राज्य में छोटे बड़े कई उद्योग स्थापित हो चुके हैं जिनसे निकलने वाले जानलेवा धुंए और प्रदूषित जल लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं. यदि समय रहते इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो इस पहाड़ी राज्य का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है. अब भी वक़्त है इस गलती को सुधारने का. लेकिन इसके लिए सरकार और प्रशासन के साथ साथ आमजनों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है.

-बसंत पांडेय
हल्द्वानी, उत्तराखंड

(चरखा फीचर्स, नई दिल्ली के द्वारा प्रेषित)

यह भी पढ़ें: विकास के नाम पर पर्यावरण की हत्या

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

View Comments

  • समय रहते नहीं चेते तो अपूरणीय क्षति निश्चित है । राजनेताओं से कोई उम्मीद बेमानी है ।

  • Humlog charo traf se pollution bdane vali cheezo se bnde hue hai sbse plhe hme khud un cheezo ka use jhan tk ho ske km ya band krna pde ga tb na to cheeze bke gi na bne gi

Recent Posts

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 days ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 days ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 days ago

कुमाऊँ की खड़ी होली

इन दिनों उत्तराखंड के कुमाऊँ में होली की धूम है. जगह-जगह खड़ी होली और बैठकी…

1 week ago

आधी सदी से आंदोलनरत उत्तराखंड का सबसे बड़ा गांव

बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर…

2 weeks ago

फूल, तितली और बचपन

बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि…

2 weeks ago