Featured

हल्द्वानी के कर्नल ठुस्सू और उनकी दी हुई सीख

कर्नल ठुस्सू

कर्नल ठुस्सू – इनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता. सिवाय इनके हास्यास्पद नाम, पदनाम, पैनी नज़र और हिंदी बोलने के ढंग के, जो किसी भी गैर-हिन्दी भाषी व्यक्ति का हो सकता है. ज्ञानी जन कब किस रूप में आपके जीवन को राह दिखा दें, कहा नहीं जा सकता. (Colonel Thussu Memoir Nikhil Pande)

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान

हमारे ताऊजी से इनकी मुलाकात एक एन. सी. सी. कैंप के दौरान हुई थी. मुलाकात संक्षिप्त थी, मगर प्रभाव गहरा था. हमारे ताऊजी का दिमाग जो कि एक अजायबघर है जिसमे तीन सर वाले कुत्ते, दोमुंहे सांप, जलपरियां, शेर के धड़ वाले दरियाई घोड़े और न जाने क्या क्या मिलता है, के जिस कोने में इस कैंप से सम्बंधित जानकारियों का जिक्र है, वहाँ दो बातों का पता चलता है. पहला तो ये की ये कैंप तीन दिन चला था. और दूसरा की इन तीन दिनों में ताऊजी समेत समस्त कैडेट्स एक पहाड़ी जैसी जगह को समतल करने के अभियान पर लगाए गए थे. अब तीन दिनों में कितनी ज़मीन समतल हुई होगी, ये कहना तो मुश्किल है. मगर कामू की तर्ज पर ये मानना ही पड़ेगा कि, वी मस्ट इमेजिन सिसीफस टू बी हैप्पी. नहीं तो इस जैसे न जाने कितने ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अभियानों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जायेगा. (Colonel Thussu Memoir Nikhil Pande)

बरहराल बात ताऊजी और कर्नल ठुस्सू की हो रही थी, तो इन्हीं तीन दिनों में से कोई एक दिन इन दोनों की टकराहट का गवाह भी बना. मौका था दोपहर के खाने का. हमारे ताऊजी की खाने की थाली में जो चावल था उसमें शायद कीड़े थे. इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ भी नहीं, ये चिरकालीन भारतीय परंपरा है जिसके अनुसार हॉस्टल और कैंपों में रहने वाले बच्चों को ऐसा ही खाना दिया जाता रहा है. अगर वाल्मीकि इसका ज़िक्र नहीं करते, वो इसलिए क्यूंकि राम और लक्ष्मण राजा के लौंडे थे. और उनकी गुरूमाता, यानी वशिष्ठ की औरत, उनके लिए अलग से खाना बनाती थी. जरा आश्रम में रहने वाले और लौंडों से पूछिए …

पर हमारे ताऊजी कौन किसी राजा के लौंडे से कम थे. “हट, कौन खायेगा ऐसा भात” – कहा और चल दिये फेंकने. मगर आज नचिकेता को भगवान् मिलने थे. कर्नल ठुस्सू की पैनी नज़र से बच न सके. फिर उस दिव्य आत्मा ने कहा, “ए बॉय, क्या करता है? खाना फेंकता है. जानता नहीं खाना भगवान् होता है. प्लेट में उतना ही लेने का जितना खाने का. फेंकने का नहीं.”

बकौल ताऊजी, वो दिन था और आज का दिन वो प्लेट में उतना ही खाना लेते हैं जितना खा सकते हैं, और कभी खाना बर्बाद नहीं करते. हाँ जब कभी-कभी, अपनी पत्नी, यानी हमारी ताईजी (चूँकि बवासीर की मरीज़ हैं इसलिए बहुत फीका खाना बनाती हैं) के खाने से उकताये हुए उन्हें चटपटा खाना नसीब होता है, तो उनके मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ता है, “आज आया खाने का मजा!”

निखिल पाण्डे

निखिल पाण्डे हल्द्वानी में रहने वाले युवा लेखक हैं. अधिकतर लेखन अंग्रेज़ी में करने वाले निखिल ने दिल्ली से अपनी पढ़ाई की और फिलहाल पूर्णकालिक लेखन करते हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

View Comments

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

3 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

3 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

3 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago