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हरिद्वार के 5 आदिकालीन और रहस्यमयी शिव मंदिर

धर्मनगरी हरिद्वार को सिर्फ गंगा मैया के घाटों के लिए ही नहीं, बल्कि यहाँ के प्राचीन और चमत्कारी शिव मंदिरों के लिए भी जाना जाता है. कनखल के राजा दक्ष और माता सती की पौराणिक कहानियों से घिरे ये मंदिर अपने आप में कई अनूठे रहस्य समेटे हुए हैं. आइए जानते हैं हरिद्वार के उन 5 प्रमुख और ऐतिहासिक शिव मंदिरों के बारे में, जिनकी महिमा आज भी श्रद्धालुओं को हैरान कर देती है.

नीलेश्वर महादेव मंदिर

नील पर्वत पर स्थित नीलेश्वर महादेव को इस पूरे क्षेत्र का स्वामी और रक्षक माना जाता है. यह मंदिर कनखल के प्रसिद्ध दक्षेश्वर मंदिर के समय का ही है. यहाँ ढाई फीट ऊँचा एक स्वयंभू शिवलिंग है, जिसके भीतर हज़ार छोटे-छोटे शिवलिंग समाहित हैं. शिव पुराण में इस उत्तराभिमुख शिवलिंग का विशेष वर्णन मिलता है.

इस मंदिर परिसर में कई फलदार पेड़ हैं, लेकिन यहाँ का एक कड़ा नियम है—पेड़ों से फल तोड़ना सख्त मना है. जब फल खुद पककर नीचे गिरते हैं, तभी उन्हें भोलेनाथ को अर्पित करके भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है.

माना जाता है कि जब माता सती ने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में प्राण त्याग दिए, तब क्रोधित होकर महादेव इसी पर्वत पर आए थे. प्रचंड क्रोध और तांडव के कारण उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया, जिससे इस पर्वत का नाम ‘नील पर्वत’ और महादेव का नाम ‘नीलेश्वर’ पड़ा. यहीं पास से माँ गंगा ‘नील धारा’ के रूप में इनके चरणों को छूते हुए आगे बढ़ती हैं.

बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान की सुरेश्वरी देवी रेंज के घने जंगलों से घिरा बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर माता पार्वती की तपस्या का गवाह है. मंदिर के प्राचीन पेड़ के पास एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है. ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग के दक्षिणी भाग में मणि से सुशोभित मस्तक वाला ‘अश्वतर’ नाम का एक महानाग वास करता है.

यहाँ हर दिन गौरी कुंड के पवित्र जल से शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाता है और नाग प्रतिष्ठित कर शिव का भव्य श्रृंगार होता है. माना जाता है कि केवल गौरीकुंड में स्नान करने और बेलपत्र चढ़ाने मात्र से ही भोलेनाथ प्रसन्न होकर हर मनोकामना पूरी कर देते हैं.

दरिद्र भंजन महादेव

कनखल के राजघाट पर स्थित दरिद्र भंजन महादेव मंदिर का रहस्य बेहद अनोखा और वैज्ञानिक रूप से भी हैरान करने वाला है. इस मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग का आकार धीरे-धीरे घटकर धरातल (जमीन) के अंदर जा रहा है. पिछले 22 वर्षों में यह शिवलिंग करीब 7 इंच तक धरती में समा चुका है. मान्यता है कि जैसे-जैसे यह शिवलिंग नीचे जा रहा है, वैसे-वैसे क्षेत्र से दरिद्रता (गरीबी) का नाश हो रहा है और संपन्नता आ रही है. कहा जाता है कि जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया था, तो यह वही स्थान है जहाँ दरिद्रता देवी और जेष्ठा देवी का भाग निकला था.

भक्तों का विश्वास है कि यहाँ लगातार 40 दिनों तक दीप जलाने और जलाभिषेक करने से मनचाहा फल मिलता है. प्राचीन काल में यहाँ नागों का वास था और आज भी कई बार मंदिर में साक्षात नाग देवता के दर्शन हो जाते हैं.

तिलभाण्डेश्वर महादेव मंदिर

हरिद्वार के सती घाट पर गंगा किनारे स्थित यह मंदिर महादेव के एक अद्भुत चमत्कार के लिए प्रसिद्ध है. प्राचीन काल में इसे ‘तिलवर्धनेश्वर’ कहा जाता था. गर्भगृह में स्थापित इस स्वयंभू शिवलिंग की गोलाई करीब 5 फीट और ऊँचाई 2 फीट है. इस शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हर महीने के कृष्ण पक्ष में एक तिल के बराबर घटता है और शुक्ल पक्ष में एक तिल के बराबर बढ़ता है. पूर्णिमा के दिन यह अपने पूर्ण स्वरूप में दिखाई देता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिव जी ने इसी स्थान पर तिल के समान बेहद सूक्ष्म रूप धारण किया था, इसीलिए इन्हें तिलभाण्डेश्वर कहा जाता है.

पशुपतिनाथ मंदिर

हरिद्वार का यह मंदिर वास्तुकला और इतिहास का एक बेहतरीन बेजोड़ नमूना है, जो पूरी तरह से नेपाल के काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर जैसा दिखता है. इस मंदिर का निर्माण सन 1819 में नेपाल के तत्कालीन राजा राजेंद्र विक्रम सिंह ने अपने गुरु (श्रवण नाथ मठ के स्वामी श्री श्रवण नाथ गिरी) की प्रेरणा से करवाया था.

इस भव्य मंदिर के निर्माण में मेवाड़ के राजा रतन सिंह ने भी सहयोग दिया था. उन्होंने मंदिर के लिए 5 हाथी, 5 घोड़े, 5 दुशाला और सोने के 10 कड़े दान किए थे. मंदिर में स्थापित शिवलिंग को बनाने के लिए उसी विशेष कसौटी पत्थर का इस्तेमाल किया गया है, जिससे नेपाल के पशुपतिनाथ का शिवलिंग बना है. पूरे विश्व में नेपाल के बाद यह एकमात्र ऐसा दूसरा मंदिर है जो उसका हूबहू प्रतिरूप है.

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