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अनास्था : एक कहानी ऐसी भी

भावनाएं हैं पर सामर्थ्य नहीं. भादों का मौसम आसमान आधा बादलों से घिरा है बादलों के बीच से फूटती चटक धूप कुछ ज्यादा ही तेज हैँ. उमस भरी दोपहरी में थका सतपाल पसीने से तरबतर हो, लड़खड़ाते हुए किसी तरह गाँव की चढ़ाई पर चढ़ रहा है अचानक उसे दिखा दो नेपाली मजदूर नीचे गधेरे की तरफ बांस एक लंबा सा डंडा जिस पर एक गठरी बंधी हुई है, ले जा रहे हैं. इस अदभुद दृश्य को देख सतपाल को उन पर हंसी आती है और उन्हें आवाज लगता है –

अरे कामचोरों जरा सी गठरी, दो-दो बहादुर और 12 फीट का बांस. ऐसा क्या ले जा रहे हो?

साब यह गठरी नहीं डेड बॉडी है, सड़ गई थी… बदबू छोड़ रही है.” पसीने से तर-ब-तर मजदूर रंग बहादुर ने उत्तर दिया.

डेड बॉडी? हमारे ही गाँव की है?

हाँ साब एक बुड्ढा था।

कौन है ये अभागा?

अभागा नहीं साब ‘भग्यान’ था. चार लड़के हैं इसके. सब परदेश सेटल हो रखें हैं खूब खा कमा रहे हैं. पोइसा वाला है, साब पर मां-बाप के लिए उनके पास कोई टाइम ही नहीं है.

सतपाल को कुछ संदेह तो हुआ और घबराहट में बोला “यार ज्यादा बात को मत घुमा, कौन बुड्ढा था ये?

नाम तो नहीं मालूम लेकिन हम लोग इसे ‘बोडा’ बोलते थे. हां, इसका बड़ा बेटा मास्टर है और देहरादून के छर्रावाला में मकान लगा रखा है प्रेमपाल है बल, उसका नाम. ऐसा हमें प्रधान जी ने बताया.

अरे कैसी किस्मत फूटी. प्रेमपाल तो मैं ही हूं. गांव वालों कैसे मुर्दा मारा तुम्हारा? कम से कम फोन नहीं तो मैसेज तो करते!

अरे साब गांव में ऐसा बचा ही कौन है. हम दोनों के अलावा. सारा गांव हमने संभाल रखा है हम तो प्रधान को ही जानते हैं बस उसी ने फोन किया था. उसने तुम को फोन नहीं किया?

फोन तो आया था. उसने तो कहा कि आपका बाप सीरियस है, ऐसा नहीं बोला कि मर गए.

हां जी साहब प्रधान बहुत समझदार आदमी है. उ जानता था कि मैं सीधा बोलूंगा तो कहीं आपका हार्ट फैल न जाए. बाप के चक्कर में औलाद भी ना मर जाए

कहां है प्रधान?

देहरादून.

कब गया?

उसको गए पंच-छः बरस हो गए हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए.

गाँव आता है?

कैसे नहीं आता साब. गाँव में भौत विकास कार्य का चल रहे हैं. ज्यादातर तो ब्लॉक तक आता है, कभी-२ गांव भी आ जाता है. साब लोगों के साथ नाप-जोख करने. काम भी खूब है. पॉइसा भी भौत कमाता है, स्साब जी.

बाकी लोग कहाँ गए?

सब परदेश भाग गए स्साब…

ऐसा कैसे हो सकता है? दो-चार तो होंगे?

कैसे नहीं साब उ चार-छै लाचार बूढ़े और दो-चार शराबी-कबाबी भी है. दूसरा मजदूर रंगबहादुर का छोता भाई मनबहादुर बोला.

मनबहादुर उनको क्या गिनता है ऊ भी मरे हुए के ही तो समान हैं. रंगबहादुर उपेक्षा से बोला.

तो फिर कौन चुनता है प्रधान को? सतपाल को आश्चर्य हुआ.

प्रधान के खास लोगों का नाम वोटर लिस्ट में है. परधान टैक्सी भेजता है उ लोग भोट के टैम आ जाते हैं गाँव, परदेश से.

हे भगवान… कैसे मारा इन सब का. क्या होगा इस पाहाड़ का? ” दुखी सतपाल थकान से चूर होकर पत्थर पर पसर जाता है.

भाई बहादुर अब आदत नहीं रही पहाड़ में चलने की. बुड्ढे को तुम ही फूक आओ.

जब तुम आ ई गए हो तो. पुत्र धर्म निभाओ और बुड्ढे का ‘बरमंड’ फोड़ने तो चलो अब तो ‘थोरा’ सा ही चलना है।

अरे इसे बरमंड फोड़ना नहीं, कपाल क्रिया कहते हैं. मैं असमर्थ हूं. मेरे बस का जरा भी चलना नहीं.अब आदत भी नहीं रही. कुछ सोचता है.

कपाल क्रिया के लिए तीन भाई और भी तो है रामपाल ऋषिकेश, पृथ्वीपाल काशीपुर और धर्मपाल दिल्ली में भी तो है वे क्यों नहीं आए? क्या प्रधान का फोन उन तक नहीं पहुंचा होगा?

हम क्या जाने दस साल हमें भी इस गांव में हो गए हमने उनकी सूरत क्या फोटो तक नहीं देखी. सुना जरूर था कि बुड्ढे के चार बच्चे हैं. सबसे बड़ा प्रेमपाल मास्टर…

हे भगवान कैसी किस्मत फूटी मेरी सारी समस्याएं मुझे देखनी पड़ेगी? मेरी समस्या कोई नहीं देख रहा. पोते के यूनिट टेस्ट चल रहे हैं. स्कूल कौन छोड़ेगा उसे? बुढ़िया बीमार है अस्पताल कौन ले जाएगा.और भी कई काम हैं मेरे जिम्मे?

आपके लड़के और बहु तो होंगे?

अरे लड़का ही तो काम का नहीं है पढ़ लिख करके नेताओं के पीछे घूम रहा है. भू-कानून की लड़ाई लड़ रहा है. उसे यह मालूम तक नहीं कि हमारे गांव का नाम क्या है और हमारी जमीन कितनी है? छोटे बच्चे हैं. बेचारी बहू प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती है.

इतने कष्ट में हो तो गांव क्यों नहीं आ जाते घर में क्या नहीं है गाय पालो ‘खित्ति’ करो अनाज होगा खूब घी दूध होगा खूब रौनक रहेगी बाहर जाकर क्या स्पेशल कर रहे हो. दिन ही तो काट रहे हो!

यार फालतू की बात नहीं करनी. मेरे पास इन प्रश्नों का जवाब नहीं.” फिर कुछ सोचता है जेब से रुपये निकालता है –

ले हजार रुपए पकड़ तू ही कपाल क्रिया कर लेना यार…

साब कोई गरीब गुरुबा हो तो हम फ्री में फूंक देते हैं, तुम तो पैसे बाज हो. हजार में तो बुड्ढे एक टांग तक नहीं फुकेगी.

यार दाजू ऐसा मत बोल मेरी जिम्मेदारी बहुत है चल तू ही बता कितना दूं.

होते तो पांच हजार फूकने के. सर फोड़ने के हुए द्वि हजार कुल मिलाके सात हजार रुपए. रंग बहादुर ने बिना डिस्काउंट के हिसाब बताया –

बाप रे! बहुत लूट रहे हो यार? इतना पैसा तो मैं ले के भी नहीं आया. कुछ किरपा करो. सतपाल ने बार्गेनिंग की.

चलो हमारे भी बाप के समान था. कपाल क्रिया हमारी तरफ से. द्वि हजार माफ. पांच हजार दे देना.

यार चार हजार में सौदा पक्का कर.

इमरजेंसी केस है अब एक पैसा कम नहीं होगा. अपने-आप फूंक लेना. यहां तक की बेगारी भी नहीं लूँगा.

फिलहाल दो हजार एडवांस पकड़ ले यार तीन हजार भाई लोग आ जाएंगे तो बाकी भी दे दूंगा.

यह बात सुन, मन बहादुर भड़क उठा – उधार कतई नहीं. तुम्हारा कोई भरोसा नहीं है जी! तुमने पहले माँ-बाप का कर्ज ही नहीं चुकाया. साहब हम तो परदेसी हैं.

हे प्रभु कैसा जमाना आ गया संसार में कोई धर्म नहीं रहा, ना शर्म. झुंझलाहट में बोलता है – मुझे भी फूक दो यार अब मैं भी मरता हूं.

यहां मत मरना साब परदेश जाकर मरना वही है तुम्हारे अपने! अच्छी भलमनसाहत रही अपनी जिम्मेदारी से फारिग होकर हमें फंसा दो वाह..

चल दादा में मान गया. तीन यह पकड़ बाकी दो मैं घर जाकर के दे दूंगा.

मेठ लोग बॉडी लेकर के चले गए. सतपाल पत्थर पर पसर जाता है. थका हुआ तो था ही पता भी नहीं चला कब गहरी नींद पड़ गई. संध्याकाल का समय. मेठ लोग लौट के आते हैं और सतपाल को आवाज देते हैं. नींद गहरी पड़ी थी. शहर के कोलाहल से घर-गाँव की नीरवता व असीम शांति की वजह से नींद गहरी आ गई थी. जब वह उठाने पर उठा नहीं तो उन्होंने उसे हिलाना शुरू कर और वह घबराकर के जोर से उछलता है और अर्द चेतनावश चीखने लगता है – कौन है रे? फिर घबराहट में – हे बबा जी मैं कहां हूं?

उसी पत्थर पर, जहां बैठ कर तुम कभी बखरे चराया करते थे, मनबहादुर ने उपहास किया. डरो मत क्यों डर रहे हो मैं हूं रंगबहादुर.

कौन रंगबहादुर?  

‘जु’ तुम्हारे बाप को फूकने गया था

कौन बाप? अचानक संयत होता है – हां, हाँ समझ गया.

तुम आ गये पिताजी को फूक आए. कपाल क्रिया भी कर दी थी. कई प्रश्न मुंह से निकलने लगे. अरे पूरा फूंक के आए या अधूरे में छोड़कर नहीं आए?

साब जी पैसा पूरा लेते हैं लेकिन काम भी पूरा करते हैं. रंग बहादुर बोला

आपके बाप के भाग से वहां हमको भगतू बामण भी मिल गया था. है तो पूरा लंपट. नंबर एक का दरौलीया भंगलिया. लेकिन उसने क्रिया कर्म विधि-विधान से कर दिया.

चलो बहुत अच्छा हुआ. दाज्यु मैं तुम्हारा ऋण कभी भी नहीं चुका सकता.

हो भौत चालक हो. काम निकला तुमने हमारे द्वी हजार मार दिए? मन बहादुर गुस्सा हो बोला.

ऊपर से भगतू बामण को भी तो पव्वे के पैसे दिए थे, वे भी गए? रंग बहादुर निराश हो बोला.

अरे… मैं ऐसा नहीं बोल रहा हूं. भैया तुम्हारा एहसान मान रहा हूं. पैसा दूंगा अरे क्यों नहीं दूंगा.

भगतू बोल रहा था की बुड्ढा पंचक में मरा हुआ है. पूरी पांच जान और जाएगी. उपाय करोगे तभी अनिष्ट कटेंगे.

छोड़ उसकी बात वह तो लंपट है. कलंक है, बामणों नाम् पर शराबी-कबाबी कहीं का! पतड़ा देखना तो उसे आता नहीं.

सब इलाका भर में वह अकेला बामण है साब जी. अच्छी बात भले ही उसकी फलित न हो लेकिन कड़वी जबान खट्ट असर करती है.

काली जुबान है साब उसकी. मन बहादुर बोला

किसी के कहने से कोई नहीं मरता हर आदमी अपनी मौत मरता है चलो घर चलो.

किसके?

अपने और किसके…

चलो, जो भी कमी पेशी जो भी होगी. रात ही तो काटनी है आपकी मर्जी.

घर पहुंचता है. फुसफुसा कर बोला – बहादुर कुछ व्यवस्था है?

कैसी व्यवस्था?

व्यवस्था नहीं समझता. पहाड़ में व्यवस्था किसे बोलते हैं?

दारू की?

धीरे बोल यार…

जी साब, आज तो हम सुबह से इसी बुड्ढे के चक्कर में रह गए. हम भी तो ऐसे ही सोएंगे.

अरे आस-पास कोई नहीं है जिससे…

पहले था, एक जिम्दार साहब! खूब बेचता था. अब तो आदमी ही नहीं है यहां. वह भी देहरादून चला गया.

यार खाने का तो बुढ़िया ने पूरी अचार रखा हुआ है, सोने की व्यवस्था क्या होगी?

ऊपर है ना. वोडा का बिस्तर लगा हुआ है उसी में लमलेट हो जाओ.

बीमार आदमी का बिस्तर है. मारना है तुमने मुझे? अरे बीमार आदमी के बिस्तर पर कीटाणु होते हैं.

साफ साफ-सुथरा बिस्तर है बुढ़्या की बॉडी मरते ही सार हमने ओवरे में रख दी थी. तुम लोगों का इंतजार किया आज आओगे. कल आओगे? जब सड़ियांण(बदबू) आने लगी तब जाके फूंकने की मजबूरी हो गई. साब

थक-हार कर सतपाल बिस्तर पर लेट जाता है. सुनसान जगह. नींद भी तो नहीं आ रही थी. दिमाग में अनेक चित्र घूम रहे थे. जैसे- जैसे रात और गहरी होती गई. घना अंधेरा छाने लगा तो कल्पित साये और डरावने विचार मन-मस्तिष्क में मंडराने लगे. शरीर में चीटियां सी रेंग रही थी और कानों में भौंरे से भरमा रहे थे.

पंचक,पंचक… पांच की मौत? कहीं होना हो इन अभागों ने पिता को ढंग से नहीं फूका हो. कहीं बाप की आत्मा खाट के ऊपर तो नहीं घूम रही होगी?

नीरवता, भ्रम और बेचैनी से रात कट ही रही थी. अचानक बाहर से कुछ अजीब तरह की आवाज आने लगी सतपाल डर गया. उसने ओड़ी हुई चादर में खुद को चारों तरफ से लपेट कर मानसिक रूप से सुरक्षित कर लिया. डर के मारे मुंह को भी ढक दिया लेकिन गर्मी के कारण वह पसीने से तर-ब-तर होने लगा और दम घुटने लगा क्या करे. फिर उसने बड़ा साहस करके चादर नाक तक हटाई लंबी सांस खींचने को ही था. अचानक दोबारा किसी चीज की रोने की आवाज फिर आने लगी. यह आवाज पहले जैसी नहीं थी. बदली हुई थी. फिर तो सतपाल से नहीं रहा गया. घबराहट में नाम भी ठीक से याद नहीं आया. जोर- जोर से आवाज दी – राम बहादुर.राम बहादुर?

थोड़ी देर में रंगबहादुर ऊपर पहुंचता है. नंग-धड़ंग उसके शरीर पर सिवाय एक लंगोट के कुछ नहीं था हाथ में मिट्टी तेल की चिमनी पकड़ी हुई थी. चिमनी की हिलती-डुलती धुएं और गंध मिश्रित रोशनी में उसका शरीर डोल रहा था और चेहरा रंग बदल रहा था. सतपाल का डर-बेचैनी और बढ़ जाती है.

पहाड़ों का लोक विश्वास है कि रात को किसी का नाम जोर से नहीं पुकारते. जी, ऐसी मान्यता है. बुरी आत्मायें पीछे पड़ जाती हैं इसीलिए रंगबहादुर फुसफुसाकर पूछता है – क्या हुआ साब.

सतपाल घबराते और चौंकते हुए – अरे राम बहादुर तू?

रंग बहादुर बोलो स्साब. राम बहादुर मेरे बाप का नाम था. वह फुसफुसाकर बोला. बेचारा बोझा फालता था. एक दिन पाँव फिसला. इसी गांव में ऊंचे पाखे(चट्टान) से नीचे गिरा और मर गया. तब ‘मुई’ कोई ग्यारा साल का था. कभी- कभी रात को वह भी ऐड़ाता है स्साब.

लालटेन की दप-दप करती रोशनी के स्पेशल एफ़ेक्ट से हिलती-डुलती रंगबहादुर की काया और फुसफुसाने के तरीके से घबराया सतपाल बहादुरी का स्वांग करते हुए बोला – फालतू की बात मत कर. मैं नहीं मानता इन बातों को.

मैं कब मानने को कहता हूँ?

पर ये आवाज किसकी थी?

अरे साब जी उल्लू बास रहा था. सो जाओ.

तो फिर वो राम बहादुर कब ऐड़ाता है?

अरे साब उ कुछ नहीं करता. कह के रंग बहादुर गला फाड़ के हंसता है – डरो मत साब, उ सिर्फ औंसी कि रात को एड़ाता (चीखता) है या मन में आया तो कभी- कभी किसी करड़े बार को भी एड़ाता है.

तूने अपने बाप के खातिर कुछ ‘खटकरम’ नहीं करे कभी?

हां जागर लगाया था साहब और हंत्या भी आया था उसका, छोटे भाई मन बहादुर पर.

क्या बोला?

बोला. मैं भूत बनकर बहुत खुश हूं अब मुझको पचास किलो का शरीर और सौ किलो का वजन नहीं फालना (ढोना) पड़ता. क्या मिला मुझे आदमी योनि में शिवाय बेगारी के. उकाल में चढ़ाई चढ़ते हुए छाती फटती थी मेरी. अब तो शरीर ही नहीं है.तो हवा से भी हल्का और तेज हूं. कभी इस पे चिपकता हूं कभी उस पर.

बहादुर तू भी यहीं सो जा यार? सतपाल बुरी तरह डर रहा था.

जब तुम नहीं मानते ही नहीं. फिर मेरे को सोने को क्यों बोलते हो.

अरे तेरे पर भरोशा करता हूं.

सा…ब आज के टैम, भूत पिचाश पर विश्वास कर लो आदमी का कोई भरोसा नहीं! मरा हुआ भूत किसी का क्या बिगाड़ लेगा. आदमी तो हजार-दो हजार के वास्ते आदमी का गला काट सकता है.

सतपाल मन ही मन में बड़बड़ाता है कि हो ना हो इसकी नियत फिर गई हो? कि सचमुच मेरी गर्दन ना काट दे. इसका क्या भरोसा गला काट करके अपने देश भाग जाएगा. अब वह पर्स से पैसा निकलता है और कहता है – ले बहादुर अपने बचे पैसे अब तो खुश!

बहादुर ने कहा – ठीक है. बाबूजी. और नीचे फर्श पर पसर जाता है

सुबह का समय सतपाल आँगन में टहल रहे हैं. सूर्य के प्रकाश से घर आँगन और चारों तरफ के दृश्य स्पष्ट हो चुके हैं. धूप से नहाए टूटे-फूटे घर का कोना-कोना स्पष्ट हो चुका है. मकान की हालत देख उसे रोना आ रहा था. तिबारी के पठाल तक उखड़ गए थे. जगह- जगह घास उगी थी. चौक टूट-फूट गया था. चौक की पठालें भी उखड़-उधड़ गई थी. दीवारों की पपड़ी झड़ चुकी थी. सतपाल का दुख गुस्से में प्रकट हो गया. ऊपर से कल के पाँच हजार उसे चुभ रहे थे. मालिकाना अंदाज में उसने बहादुर को झिड़का.

“अरे बहादुर क्या हाल कर रखे रे घर के? मजे मार रहे हो! जब रहते हो तो भाई साफ सफाई तो रखते”

“साब जो भी बचा हुआ है. इसलिए कि हम रह रहे हैं. तब बचा हुआ है. साथ ही तुम्हारे हताश-निराश और बीमार बाप को भी हम ही सम्हाल रहे थे.

बाबा की पेंशन कौन खा रहा रे?

यही सुनना बाकी रह गया था. गाँव के लोग ठीक बोलते थे बहादुर ज्यादा भला मत बन हो. यहाँ मत रहो. कल असगार (अपयश) तुम्हारे सर आएगा. मन बहादुर ने खेद व्यक्त किया.

पूछने का हक़ है मेरा. परधान जी से बोल के पेन्सन भी मेरी ही लगईं हुई थी.

हे राम, बृद्धावस्था पेंशन मिलती भी कितनी है? वो भी खर्च नहीं करता था.

सच बोल रहा है? ला पासबुक!

बहादुर पासबुक लाता है. सतपाल चश्मा लगा सीढ़ी में बैठ पासबुक टटोलने लगता है. चेहरे के भाव और रंग बदलते जा रहे थे. अचानक मन ही मन खुशी से झूम उठा. अनायास उसके मुंह से निकाल गया – अरे इसमें तो पैसे बचे हुए हैं. फिर मन ही मन बोला – चलो कुछ तो वसूल हुए.

साब खर्चा कहाँ होना था. हम अपने लिए पकाते. दो रोटी ब्वाडा को खिला देते. सोचते. किसी भूत-खबेश को खिलाने से अच्छा अपने बाप समान आदिम को खिलाएंगे तो पुण्य लगेगा हम को क्या मालूम था…

सतपाल का ध्यान आधा पासबुक और आधा बहादुर की बातों पर था.

अचानक गुस्सा होकर चीखा –

एक तो तमीज़ से बात कर भूत-खबेश होगा तेरा बाप. नोमिनी में तेरा नाम कैसे?

यो क्या होता है साब?

जिस आदमी की चार- चार औलादें हों और पासबुक का पैसे तेरे नाम कर गया. हाय हमारी किस्मत में कैसा बाप लिखा था ये?

बोडा बोल तो रहा था. मैं समझा नहीं उसके मन में क्या है?

समझा नहीं, नियत खराब हो गई होगी तेरी. अंगूठा लगाऊँगा और खा जाऊंगा?

साब मीनत मजदूरी का खाता है. थूकता है हम हराम के ‘पोइसे’ पर. मेरे साथ अभी पोस्ट ऑफिस चलो.

सतपाल आगे कुछ बोलता कि इसी बीच पिट्ठू लगाकर हौलदार पृथिपाल और थैला पकड़े रामपाल चौक पर पहुँच जाते हैं.

सतपाल अचानक हड़बड़ी में होंठों पर अंगुली रख बहादुर की तरफ इशारा करता है – तेरे-मेरे बीच की बात है. किसी को भी पता न चले. तुझे भी खुश कर दूंगा.

फिर दुआ सलाम होती है. समाज के दस्तूर भर गले मिले, साथ ही एक-आद आँशुओं की बूंद बमुश्किल निकली. सतपाल की आंखें पहले से ही सूखी पड़ी थी.

हे रे धरमपाल क्यों नहीं आया? सतपाल ने उत्तेजित होकर कहा. 

वो कह रहा था. मैं दुआदश तक ही आ पाऊँगा. तारिख बता देना. सबसे छोटे भाई रामपाल ने उत्तर दिया.

और तुम्हें प्रधान का फोन नहीं आया? सतपाल ने चिढ़ कर पूछा.

आया था उसने कहा. बड़े भाईसाब को भी फोन कर दिया था. पृथिपाल बेपरवाह होकर बोला.

तुम ने मुझे फ़ोन करना था. राय सलाह तो करते. अरे मैं अकेला फंस गया था. कल मुझ पर क्या बीती… हे प्रभो ऐसी किसी दुश्मन पर भी न बीते. दुखी सतपाल बोला.

आप बड़े हैं, पहले तो आपका फोन आना चाहिए था. हम इंतजार में थे. पृथिपाल ने शिकायती लहजे में कहा.

पृथिपाल की बात सुन सतपाल चिढ़ सा गया

सब मेरि खोपड़ी में. तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं हैं. हे भगवान मैं बड़ा क्यों हुआ होंगा?

तभी भक्तू बामण की इंट्री हो गई. पहुंचते ही उसकी काली जुबान चालू हो गई हे प्रभु! जमाना देखो जमाना. कभी देवताओं के नाम् पर भयात इकट्ठा होती थी. अब तो मुर्दों के नाम पर भी पूरे इकट्ठा नहीं हो पा रहे हैं.

भक्तू बामण की बात सुन पृथिपाल को गुस्सा आ गया – देखो पंडजी आप का जो काम है वो करो फालतू बात नहीं.

काम के वास्ते ही यहाँ आया हूँ. शाम तक यहीं तो रहोगे तभि बिस्तार से बताऊँगा.

शाम तक कैसे? आप अपना कार्यक्रम बताओ. इस बीच मेरे भौत अर्जंट काम हैं, बीजि हूं. हमारे बड़े साब रिटेर जा रहे हैं दवात का सारा इंतजाम मैंने ही करना है. चार-पाँच दिन में फारिग हो सकूँगा. पृथिपाल ने अपनी विवशता जहिर की

न तुम्हें फुरसत, न मुझे अभी पूरे दिन फुरसत नहीं है. अकेला हूं आज तो एक जगह मुंडन और फिर एक सगाई में व्यस्त हूं. पुराने जजमान हो इसलिए कर्तब्य समझा तो पहले यहाँ आ गया. आज रुको शाम को आता हूं.

कैसे पंडित हो? और पंडित नहीं है कोई यहाँ? धरमपाल ने पूछा.

पृथिपाल ने चिढ़ कर कहा – हाथ में पैसा हो दस पंडित आ जायेंगे.

मैं कुलगुरु हूं समझे. मेरे ही हाथ से मुक्ति हो पाएगी. बाकी ले आओ, जहां से ला सकते हो. सब कुछ पैसा नहीं होता. ले आओ शहर का कोई पंडत! पर मुक्ति नहीं मिलेगी.

मनबहादुर भगतू के कान के पास धीमी आवाज में – अरे ये मुक्ति नहीं. ये पिंड छुड़ाने कि युक्ति ढूंढ रहे. तू टैम क्यूं खराब कर रहा है. अपणा गेम बना और खिसक.

क्या खुसर-फुसुर कर रहे हो. तुम जैसे चकड़ैतों की वजह से कोई पहाड़ नहीं आना चाहता है. पृथि तैश में बोला.

भक्तू गुरु की भृकुटि तन गई मुख से थूक वर्षा करते कांपते हुए बोले –

पहाड़ में आना न आना आपकी मर्जी है. विरासत पर थूक के जाने वालों हम जैसे भी हैं अभाव में भी मात्र भूमि की सेवा कर रहे हैं. फिर क्रोधवश चीखता है.

इस धरती और मेरा हंकार (श्राप) लगेगा तुमको!

हे पृथि, गुरजी को नाराज कर तूने अच्छा नहीं किया. माफी मांग, दक्षिणा देके विदा कर. मैं दाह संस्कार में अच्छा खासा खर्च कर सका हूँ. क्यों बहादुर? सतपाल गुरुजी के तेवर देख घबरा कर बोला. वह कोई अनिष्ठ नहीं चाहता था.

पृथिपाल इस लोक में बहादुर जरूर था लेकिन परलोक का भय और भक्तू का तीर उसे घायल कर गया. अनमने मन से जेब से पंडित को संतुष्ट करने का प्रयास किया. भक्तू रूख देख बृह्मास्त्र दागना पड़ा. बैग से ठम से एक बोतल रम थैले में खोंस कर पंडजी को हाथ जोड़ कर बिदा ली. भक्तूने भी ने तृप्त हो आशीर्वाद की वर्षा कर विदा किया. फिर रंग बहादुर को आँख मारते हुए कहा – देखा तूने कैसे ये भाई एक दूसरे को टोपी पहना रहे थे इन्हें आज पता चला होगा ये मूर्ख गाँव छोड़ कर परदेश जरूर चले गए हैं लेकिन गाँव में चतुर बुद्धिबल्लभ अभी भी जिंदा हैं.

भक्तू संसार में पइसा है तभी तो पाप है. न माँ है न बाप है, न भरोसे का भाई है न दोस्त. तू गुरु नहीं साक्षात गुरौ(सांप) है. मेरे गुरु दस्तूर ही ऐसा है, जब तक फन नहीं उठाएगा. पाइसा और सम्मान भी नहीं पा पाएगा.     

दुगड्डा, पौड़ी गढ़वाल में रहने वाले जागेश्वर जोशी मूलतः बाडेछीना अल्मोड़ा के हैं. वर्त्तमान में माध्यमिक शिक्षा में अध्यापन कार्य कर रहे हैं. शौकिया व्यंगचित्रकार हैं जनसत्ता, विश्वामानव,अमर उजाला व अन्य समसामयिक में उनके व्यंग्य चित्र प्रकाशित होते रहते हैं. उनकी कथा और नाटक आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुके  हैं.

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