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आजादी से पहले ही उठ चुकी थी अलग पर्वतीय राज्य की मांग

1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन ब्रिटिश क्रॉउन में निहित होने के बाद, अंग्रेजों ने केंद्रीकृत व्यवस्था को प्रशासनिक एवं जन विद्रोह को विभाजित करने की नियत से ही प्रांतों का गठन प्रारंभ किया, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, विदर्भ ऐसे ही प्रांत थे. लेकिन भारत के अधिकांश हिस्से का नियंत्रण तब भी प्रिंसली स्टेट के जरिए जारी था. बंगाल और उड़ीसा क्षेत्र में सांस्कृतिक और भाषाई आधार पर विरोध देखा गया, तो 1896 में बंगाल के बड़े हिस्से से बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रांत में आदिवासी क्षेत्रों को अलग-अलग राज्यों में बांट दिया गया ताकि उनके संगठित होने की संभावनाएं कम हो जाएं.
(Uttarakhand Andolan History Rare Facts)

पर्वतीय राज्यों के संबंध में अंग्रेज सीधे राज करने की नीति से बचना चाहते थे। जिसके तहत उन्होंने कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश तथा टिहरी गढ़वाल में प्रिंसली स्टेट के जरिए शासन जारी रखा. यह ऐतिहासिक संयोग था कि वर्ष 1815 के साल ही कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में अंग्रेजों को इन पर्वतीय क्षेत्रों में राज्य करने का अवसर प्राप्त हुआ, लेकिन ब्रिटिश गढ़वाल व कुमाऊं को छोड़कर अंग्रेजों ने शेष पर्वतीय भाग को रियासत के जरिए ही अपने नियंत्रण में रखा, ब्रिटिश गढ़वाल जिसे प्रारंभ में कुमाऊं कहा गया ,संयुक्त प्रांत के प्रशासनिक नियंत्रण में आया.

संयुक्त प्रांत जिसे 1936 के बाद उत्तर प्रदेश कहां गया, में प्रारंभ से ही इस पर्वतीय प्रदेश ने खुद को असहज महसूस किया, हालांकि कुमाऊं का प्रशासनिक नियंत्रण रैमजे के समय 1855 से 1885 तक, एक अलग राज्य के रूप में ही रहा, कालांतर में संयुक्त प्रांत का हस्तक्षेप यहां बढ़ता गया.

बढ़ते हस्तक्षेप के कारण सबसे पहले 1897 में अल्मोड़ा के श्री हरिदत्त पांडे ज्वाला दत्त जोशी, बद्री दत्त जोशी व श्री गोपाल दत्त आदि ने रानी विक्टोरिया को पत्र लिखकर भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर अलग पर्वतीय राज्य की मांग कर डाली.

इस प्रकार 1897 अलग पर्वतीय राज्य की मांग का शुरुआती साल है. 1920 के कुली बेगार और बाद के दिनों में वन आंदोलनों में जिस प्रकार एक अलग क्षेत्र के रूप में उत्तराखंड ने अपनी पहचान बनाई थी. जिसे 1930 में महात्मा गांधी ने अपने कुमाऊं प्रवास में अलग ही रेखांकित किया था. फिर 1938 में जब जवाहरलाल नेहरू अपने गढ़वाल के भ्रमण में आए तो उन्होंने भी सैद्धांतिक रूप से उत्तराखंड को एक अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र होने के आधार पर इस क्षेत्र के स्वयं निर्णय लेने के अधिकार को मान्यता दी. जिसके आधार पर 1940 में बद्री दत्त पांडे द्वारा विशेष पर्वतीय क्षेत्र की मांग कांग्रेस के हल्द्वानी सम्मेलन में रखी.

संयुक्त प्रांत और बाद में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उत्तराखंड के निवासियों का राजनीतिक का बहुत बड़ा हो गया जिस कारण अलग प्रशासनिक इकाई की मांग पीछे छूटते गई, इस छोटे पर्वतीय क्षेत्र के गोविंद बल्लभ पंत, बैरिस्टर मुकंदी राम और बद्री दत्त पांडे ने संयुक्त प्रांत में अपनी अलग पहचान बना ली. संयुक्त प्रांत में साइमन कमीशन के विरोध का पूरा आंदोलन इन तीनों उत्तराखंडी नौजवानों के सिर पर आ टिका था. उत्तराखंड के प्रतिनिधियों का राजनीतिक कद बढ़ने के साथ राज्य की मांग पिछड़ती गई.
(Uttarakhand Andolan History Rare Facts)

आजाद भारत में भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में प्रशासनिक अव्यवस्था महसूस की जाने लगी जिसे रेखांकित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव कामरेड पीसी जोशी ने 1952 में उत्तराखंड के अलग केंद्र शासित राज्य के रूप में गठन किए जाने की मांग की, लेकिन तब तक कामरेड पी. सी. जोशी अपना राजनीतिक प्रभाव खो चुके थे लेकिन 1956 में जब राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट आई तो विद्वान के. एम. पाणिकर ने भौगोलिक सांस्कृतिक और भाषाई आधार पर जो कि राज्य गठन के मुख्य आधार माने गए थे, के आधार पर उत्तराखंड अलग पर्वतीय राज्य बनाए जाने की प्रबल संस्तुति की थी.

उत्तराखंड के राजनीतिक प्रतिनिधियों का मजबूत कद अलग उत्तराखंड राज्य बनाने के आड़े आया, जब गोविंद बल्लभ पंत द्वारा एक अलग राज्य के रूप में उत्तराखंड के संसाधनों का पर्याप्त ना होना कहकर अलग राज्य गठन किए जाने का प्रबल विरोध किया, इस प्रकार राज्य गठन का एक संवैधानिक अवसर उत्तराखंड के हाथ से निकल गया. लेकिन विकास में भौगोलिक आधार पर पिछड़ने के कारण 1970 में प्रधीनमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा क्षेत्र के विकास के लिए अलग व्यवस्था किए जाने की बात की जिसके आधार पर ही उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड के लिए अलग पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन किया गया. इस अलग मंत्रालय ने वर्षों तक उत्तराखंड राज्य की विशेष परिस्थितियों को लगातार रेखांकित किया, लेकिन जमीनी असंतोष और अलग राज्य की मांग अंदर अंदर अपना स्वरूप ले रही थी.
(Uttarakhand Andolan History Rare Facts)

1971 में महाराजा मानवेन्द्र शाह, इन्द्रमणी बडोनी, नरेन्द्र सिंह, लक्षमण सिंह आदि ने अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन किया जिस पर उनकी गिरफ्तारी हुई. 24 अगस्त 1972 को ऋषि वल्लभ सुंद्रियाल, श्री पूरन सिंह आदि उत्तराखंड के आंदोलनकारियों ने बोट हाउस क्लब पर प्रदर्शन किया. यहां 21 आन्दोलनकारियो की गिरफ्तारी हुई, इसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश में पहले हेमंती नंदन बहुगुणा और उसके बाद नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री हुए जिस कारण अलग पर्वतीय राज्य का नैतिक बल कमजोर हुआ.

उत्तराखंड क्रांति दल का गठन 1979 और आगे के राज्य गठन के संघर्ष को हम जानते हैं. देश में उत्तराखंड ही वह अलग राज्य है जिसने अपने निर्माण के लिए सदियों तक संघर्ष किया और अंतिम चरण में 42 शहादत है, देकर इस राज्य को प्राप्त किया. आज हम राज्य स्थापना दिवस के 25 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं, उपलब्धियां और दुश्वारियां दोनों ही हमारे हिस्से हैं. लेकिन इस ऐतिहासिक गर्व के क्षण में हमें अपने राज्य गठन के लंबे संघर्ष को, राज्य के उपेक्षित भूगोल और नागरिकों को जिनके कारण राज्य की अवधारणा ने जन्म लिया, उसे फिर से अपने मस्तिष्क में रखकर समग्र उत्तराखंड के सर्वांगीण विकास का विशेषज्ञ मत प्राप्त कर डाटा बेस आधारित एक रोडमेप तैयार करना ही होगा.
(Uttarakhand Andolan History Rare Facts)

प्रमोद साह

हल्द्वानी में रहने वाले प्रमोद साह वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं. एक सजग और प्रखर वक्ता और लेखक के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफलता पाई है. वे काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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