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मां, हम हँस क्यों नहीं सकते?

“मां, मेरे लिए सुधा मूर्ति की बुक आर्डर कर दो” बेटी भीतर आते ही बोली.

“कभी अपने स्कूल की किताबें भी पढ़ लिया करो ” मैंने लापरवाही से जवाब दिया .

“प्लीज मां, कर दो ना. मैंने आपकी कार्ट में ऐड भी कर दी है.”उसने फोन मुझे देते हुए कहा. अमेजॉन कार्ट में बुक ऐड थी. स्क्रीन पर किताब का कवर देखकर मुझे कुछ याद आया. “अरे, यह किताब तो आगे तुम्हारे कोर्स में है. इंग्लिश में सप्लीमेंट्री रीडिंग के लिए इस किताब को शामिल किया गया है.”

“नहीं मां, आप मेरे लिए अभी ऑर्डर करो.”

“पर क्यों? जो कोर्स में है उसे तुम स्कूल में पढ़ोगे ही…” मेरी बात काटते हुए वह बोली, “कोर्स में होने का कोई फायदा नहीं.”

“फायदा नहीं मतलब?” मैंने आश्चर्य से पूछा. 

“क्योंकि स्कूल में पढ़ते हुए हम हँस नहीं सकते.” मुझे कुछ ना समझते हुए देख वह आगे बोली “इसलिए क्योंकि हमारी स्कूल बुक्स में जब भी कोई मजेदार चैप्टर होता है तो मैम पहले ही सब बच्चों को हँसने से मना कर देती हैं. कभी-कभी तो बहुत मजेदार बात में भी हँसी रोकनी पड़ती है. अगर हँस गए तो फिर डांट पड़ेगी. अब आप ही बताओ ऐसे में क्या मजा आएगा?”

यह बात तो मेरे जहन में कभी आई ही नहीं कि एक ही किताब को स्कूल और घर में पढ़ने के अलग-अलग मतलब होते हैं. किसी रोचक कहानी में हँसी आने पर बच्चों को डांट पड़ने का डर हो सकता है. “माँ, आप भी तो टीचर हो, आप बताओ कि पढ़ते-पढ़ते हँसी आने पर हम हँस क्यों नहीं सकते?” 

मैं अवाक् थी. उसे बातों में उलझाने की कोशिश में मैंने पूछा, “क्या तुम ऐसा कोई पाठ बता सकती हो जिसमें हँसने पर तुम्हें डांट पड़ी हो?” 

“हां, हमारी हिंदी बुक में “पापा जब बच्चे थे” और “दोस्त की पोशाक” पाठ हैं. उन्हें पढ़ते हुए मैं अचानक हँस पड़ी तो मैम ने बहुत डांटा. मैम को इनडिसिप्लिन बिल्कुल पसंद नहीं. पर मेरी हंसी रुक ही नहीं पाई. हँसी आने पर हम हँस क्यों नहीं सकते मां?”

क्या जवाब दूं? इसलिए कि यह अनुशासन के खिलाफ है या फिर इसलिए कि बीच में हँसने से बच्चों का सीखना रुक जाता है. क्या जवाब दूं? खुद ही तो मैंने उसे शिक्षकों का कहा मानने और उनका सम्मान करने की बातें सिखाई हैं. अब कैसे कह दूं कि खूब हँसो. कहने दो मैम को जो भी कहें .चौथी कक्षा के किसी बच्चे के लिए हँसते-हँसते पढ़ना बुरा कैसे हो सकता है?

 यह सब सोच ही रही थी कि उसने फिर पुकारा,

 “आर्डर कर दो ना मां.” 

“ठीक है एक दो चीजें और भी मंगानी हैं. सब एक साथ ऐड करके आर्डर करूंगी.”

 बेटी खुश हो कर चली गई पर उसका प्रश्न मेरे मस्तिष्क में घूमता रहा. “हम हँस क्यों नहीं सकते मां? क्यों नहीं हँस सकते हम?” पिछले दस सालों से मैं सरकारी स्कूल में पढ़ाती हूं. मेरे सभी सहकर्मियों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. कई बार सोचा कि अपनी बेटी को अपने ही स्कूल में ले आऊँ, पर निर्णय नहीं ले पाई. स्कूल की अव्यवस्था बार-बार याद आ जाती है. आज फिर गांव के उस स्कूल की कई घटनाएं मेरी आंखों के आगे नाचने लगी हैं.

पन्द्रह अगस्त का दिन था. कई दिनों से छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी की थी. स्कूल में मंच या हॉल न होने के कारण बाहर खुले में ही कार्यक्रम हो रहा था. तभी मिठाई की पेटी आई. स्कूल का चपरासी नशे में धुत था. मिठाई की पेटी खोलते हुए उसके मुंह से निकलती लार मिठाई के ऊपर गिर गई. उसके बाद वह दोनों हाथों में लड्डू लेकर लार गिराता हुआ लड्डू खाने लगा. खाते-खाते उसने लड़खड़ाती आवाज में नारा लगाया “पंद्रह….. अगस्त… अमर रहे…” और मिठाई के ऊपर ही गिर पड़ा . सारे लड्डू बिखर गए और पेड़ पर बैठे बन्दर उन पर झपट पड़े. प्रधानाचार्य छुट्टी पर थे . बच्चे बिना मिठाई लिए ही घर लौटे.

स्कूल में पढ़ाते हुए कई समस्याएं दिखती थी पर संभावनाओं की चाबी शिक्षकों के पास ही नजर आती थी. पर यह धारणा हर बार सही हो ऐसा ज़रूरी भी तो नहीं.

अप्रैल का महीना था .नया शैक्षिक सत्र प्रारंभ हो चुका था. स्कूल को इंटरमीडिएट बने 6 साल बीत चुके थे पर अब तक सिर्फ दो ही प्रवक्ता स्कूल में आए थे. मुझे टाइम टेबल बनाने का काम दिया गया . मैंने अर्थशास्त्र की प्रवक्ता को कक्षा सात में विज्ञान विषय का पीरियड दे दिया. मुझे पता था कि उन्होंने पहले विज्ञान से पढ़ाई की है. पर उन्होंने टाइम टेबल देखते ही विज्ञान पढ़ाने से साफ इनकार कर दिया. यह अलग बात थी कि विज्ञान व हिंदी की शिक्षिकाएं कक्षा छः से बारह तक की सभी कक्षाएं पढ़ाती थी. खैर, टाइम टेबल बदल दिया गया और उन्हें विज्ञान की कक्षा से मुक्त कर दिया गया.

अगले वर्ष फिर अप्रैल आया . मुझे दोबारा टाइम टेबल बनाने का काम मिला. इस बार अर्थशास्त्र प्रवक्ता खुद मेरे पास आई और कक्षा छः में विज्ञान विषय की कक्षा देने का आग्रह किया. मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए एक वर्ष के भीतर उनके इस हृदय परिवर्तन का कारण जानना चाहा. इस पर वह बोली, “इस बार मेरा बेटा कक्षा छः में आ गया है. मैं सोच रही थी कि अगर कक्षा छः को पढ़ाती तो सब्जेक्ट से टच बना रहता और घर में बेटे को पढ़ाने में आसानी होती.” इतना कहकर वह मुस्कुरा दी. पर मैं नहीं मुस्कुरा पाई .

मेरी यही सहकर्मी जब पहले दिन स्कूल जॉइन करने आई थी तो स्कूल की एक छात्रा को देखकर मुंह बिचकाते हुए बोली ,”हूँह , तो अब हमें इसी शक्ल के बच्चों को पढ़ाना होगा.” उनकी इस पहली बात से मेरे मस्तिष्क में जो नकारात्मक छवि बनी उसने कई वर्षों के साथ के बाद भी हमारे बीच मैत्री की संभावना को बढ़ने नहीं दिया. किसी रिश्ते के पनपने की संभावना तभी बन पाती है जब उस रिश्ते से बंधे लोग खुद को उस विशाल परिवार का हिस्सा मानें जो इस धरती और आकाश के बीच बिना किसी भेदभाव के फैला हुआ है. पर इस हवाई सोच के चलते दुनिया में मजबूत किलों का निर्माण होता है. ऐसे किले जिनमें तानाशाह तब भी सुरक्षित रह जाते हैं जब सारा नगर जलकर ख़ाक हो चुका हो.

उस दिन रूबी मैम तेजी से स्टाफ रूम में आई. आते ही सांस्कृतिक समारोह की सामग्री वाले बक्से को खोलने लगी. इस हड़बड़ी का कारण पूछने पर बोली, “ब्लॉक शिक्षा अधिकारी लड़कियों का नृत्य देखना चाहते हैं.” 

“पर क्यों?”

“फ़ोन आया है कि कल जो मंत्री जी का दौरा होना है उसमें प्रस्तुत होने वाले कार्यक्रम स्तरीय होने चाहिए, इसी को सुनिश्चित करना है.” ऐसा कहकर वह बक्से से लड़कियों के लिए साड़ियां निकालने लगी. 

“आज इतनी ठंड में भी साड़ी पहनकर डांस करेंगी क्या.”

“हां, वह कह रहे हैं कि फुल ड्रेस रिहर्सल देखेंगे.” रूबी मैम ने ज़ल्दी में उत्तर दिया.

“वे कौन से नृत्य संगीत के पारखी हैं?” मैं मन ही मन बडबडाते हुए बोली.

दूसरे पीरियड में ही लड़कियां साड़ी ब्लाउज पहने प्रतीक्षा करने लगीं. जनवरी की ठंड थी. साढ़े तीन बज गया पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी नहीं आए. छुट्टी का समय हो गया था. तभी उनकी गाड़ी स्कूल के गेट पर दिखाई दी. उन्हें एक कमरे में ले जाकर छात्राओं का नृत्य दिखाया गया. नृत्य शुरू होते ही वे प्रधानाचार्य से बातों में मशगूल हो गए. उनकी बातों का स्वर इतना तेज़ था की गाना गाने वाली छात्राओं की आवाज़ भी धीमी पड़ गयी. असमंजस से भरे चेहरे लेकर छात्राएं नाचती रही …जय शारदे मां… जय शारदे मां… गीत और बातें लगातार जारी रही. छुट्टी के बाद एक घंटा बीत चुका था. उनके जाने के बाद लड़कियों ने जल्दी-जल्दी साड़ियां बदली. उनमें से अधिकांश ठंड से कांप रही थी. 

अगले दिन कस्बे के मैदान में मंत्री जी का हेलीकॉप्टर उतरा. उतरते हेलीकॉप्टर की धूल हम सबकी आंखों और बालों में बैठ गई. समयाभाव के कारण हमारे स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो पाया. भाषण, तालियों और घोषणाओं के बाद लाल बॉर्डर वाली सफेद रंग की झीनी साड़ियों में ठिठुरती छात्राएं घर लौटने लगी. उड़ते हेलीकॉप्टर की धूल एक और बार मेरी आंखों से होकर दिल और दिमाग पर छाने लगी. मंत्री जी लौट चुके थे. एक छात्रा के साथ हारमोनियम और ढोलक थामे मैं बंद स्कूल की सीढ़ियां चढ़ रही थी.

इस सब के बीच कैसे अपनी बेटी को इसी सरकारी स्कूल में ले आऊं. क्या यह एक आत्मघाती निर्णय नहीं होगा. कल जब वह बड़ी होगी तो मेरे इस निर्णय पर मुझे कोसेगी . उसे लगेगा कि मां ने महंगी फीस के पैसे बचाने के लिए मुझे सरकारी स्कूल में दाखिला दिला दिया. अगर वह मुझसे सवाल करेगी तो क्या जवाब दूंगी? उसके पिता बागेश्वर के एक अति दुर्गम स्कूल में पोस्टेड हैं और अब तक वह एक सिंगल पैरंट चाइल्ड की तरह अकेले मेरे साथ ही पली है. उसकी परवरिश और शिक्षा के लिए मैं अकेली जिम्मेदार हूं. अच्छा या बुरा जो भी हो, उसके लिए जवाबदेह मैं अकेली ही रहूंगी. पर… उसके स्कूल में तो उसे हँसने नहीं देते. कोविड लॉकडाउन के दौरान चली ऑनलाइन कक्षाओं में उसके शिक्षकों की गलत अंग्रेजी सुनकर तो मैंने अपना सिर पीट लिया. पर अंग्रेजी माध्यम स्कूल है इसलिए वहाँ शुद्ध हिंदी में पढ़ाने के बजाय अशुद्ध अंग्रेजी में पढ़ाना स्वीकार्य है. बेटी नर्सरी में पढ़ती थी जब एक खास कर्र्सिव स्टाइल में अंग्रेजी वर्णमाला का ‘डी’ अक्षर न बना पाने के कारण उसका सारा होमवर्क काट दिया गया था. मैंने उसे बताया कि वह जो ‘डी’ बना रही है वह भी सही है क्योंकि नर्सरी में इतना घुमावदार अक्षर बनाना जरूरी नहीं है. पर वह इंग्लिश मीडियम में पढ़ती थी और उसे अपने स्कूल के अनुसार ही चलना था.

अब वह चौथी कक्षा में है. अंग्रेजी में प्रार्थना पत्र लिखना सीख रही है. कल उसकी कॉपी देखी. प्रार्थना पत्र में पंद्रह दिन की छुट्टी इसलिए मांगी गई थी क्योंकि बच्चा अपने माता-पिता के साथ अमेरिका घूमने जा रहा था. मैं सोचने लगी कि हमारे इस कस्बे में कितने बच्चों को ऐसा प्रार्थना पत्र सिखाने की जरूरत है जिसे वे अमेरिका घूमने जाने की छुट्टी मांगने के लिए लिखें. कस्बे में लगने वाले जन्माष्टमी मेले को देखने के लिए शायद ही इनमें से कोई बच्चा छुट्टी का प्रार्थना पत्र लिख पाएगा. क्या यह बच्चे देवीधुरा का बग्वाल देखने जाने के लिए छुट्टी प्रार्थना पत्र नहीं लिख सकते? क्या बारिश के कारण अपने गांव की सड़क में हुए भूस्खलन की वजह से स्कूल आ पाने में असमर्थता हेतु प्रार्थनापत्र नहीं लिख सकते? क्यों ये बच्चे ऐसे प्रार्थनापत्र लिखना नहीं सीखते जिसमें छुट्टी इसलिए मांगी गयी हो क्योंकि बरसात में नदी का पानी बढ़ गया है और हर साल की तरह इस साल भी उस पर बना इकलौता पुल बह चुका है?

उस दिन प्रार्थना सभा के बाद लड़कियों को चप्पल पहनकर आने के लिए सजा दी जा रही थी. सजा पाने वाली अधिकांश लड़कियां कोसी नदी के दूसरी ओर के गांवों की थी. इन सभी को नदी पार करके स्कूल आना होता था. जिस स्कूल में मैं पढ़ाती हूं वह उस इलाके का अकेला इंटर कॉलेज है. नदी पार करने में जूतों से बेहतर चप्पल होती है. क्लास में बिछी दरी पर बैठने में भी चप्पल बाहर खोलने पहनने में सुविधा होती है. पर छात्राओं को जूता न पहनने के लिए सजा दी जा रही थी. हमारे स्कूल का अनुशासन हमारे बच्चों के भूगोल और अर्थशास्त्र से जोड़कर कभी नहीं बन पाता. कितने सीमित हैं हमारे प्रयास और कितनी संकुचित हमारी पहुँच . सिर्फ भावनाओं से संस्थाएं नहीं चलती. सिर्फ अपनी कक्षा तक सीमित रह कर व्यवस्था नहीं बदलती. अपना असहायताबोध मुझे हर दिन कचोटता है. मैं खुद ही अपनी असफलता और अंतर्द्वंद की एकमात्र साक्षी हूँ और मैं अपनी अदालत में पेश होकर अपने बचाव में कुछ नहीं बोलना चाहती.

वह लड़की सुनीता याद आती है. वह तथाकथित बिगड़ी लड़की जिसके इंतजार में लड़के स्कूल के गेट पर खड़े रहते थे. कक्षा 10 की उस सांवली लड़की के नैन नक्श तीखे थे. निसंदेह व सुंदर थी . अगर लड़के छेड़खानी के लिए उसके इंतज़ार में खड़े रहते भी हों तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं. पर यह सब मैंने सिर्फ सुना था, देखा नहीं था. कक्षा में वह चुपचाप रहती थी. पढ़ने में भी औसत से नीचे थी. पर बिगड़ी कहलाने भर को मेरे अनुसार इतना काफी नहीं था. मुझे उम्मीद थी कि अगर वह दसवीं में फेल हो जाए तो उसका बिगड़ा होना प्रमाणित हो जाएगा. पर ऐसा नहीं हुआ और कक्षा की अधिकांश छात्राओं की तरह वह भी सेकंड डिवीजन में पास हो गई. ग्यारहवीं कक्षा में एक दिन मैंने उसे लंगड़ाकर चलते देखा. किनारे ले जाकर इसका कारण पूछा. पहले तो वह खामोश रही. पर मेरे प्यार से दोबारा पूछने उसने अपना सफेद पैजामा ऊपर उठाकर अपना पैर दिखाया. उसकी पिंडली में पट्टी बनी थी. घाव गहरा लगता था. 

“ये चोट कैसे लग गई?” 

“जी… वो हमारे पापा बहुत शराब पीते हैं. हमारे घर में रोज लड़ाई होती है. पापा रोज मम्मी को मारते हैं. कल पापा टूटी बोतल मम्मी के पेट में घोंपने वाले थे. मैंने रोका तो उन्होंने वह बोतल मेरे पैर में मार दी. कांच अंदर तक चुभ गया. बहुत खून भी आया…” वह सुबकने लगी. उस बिगड़ी लड़की को रोता देख मेरी आंखें भर आई. हम अपने विद्यार्थियों को कितना कम जानते हैं, उन्हें कितना कम समझते हैं हम.

कल शाम मेरी पुरानी साथी शिक्षिका निर्मला का फोन आया. पिछले वर्ष वह स्थानांतरित होकर देहरादून चली गई थी. उसकी बेटी मेरी बेटी से तीन साल बड़ी थी. वह हमेशा से अपनी बेटी को किसी ऊंचे इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाने की इच्छा रखती थी. एक ऐसा स्कूल जहां उसे उच्च स्तर की पढ़ाई मिल सके. 

“और सुनाओ, अब तो तुम्हारी बेटी अच्छे स्कूल में पढ़ रही है ना? कैसी चल रही है उसकी पढ़ाई? पहले तुम्हें उसकी पढाई को लेकर बहुत चिंता रहती थी. अब तो तुम निश्चिंत हो गई होगी?”

एक हल्की खामोशी के बाद निर्मला बोली, “ऐसा कुछ नहीं हुआ. यहां के एक नामी गिरामी स्कूल में उसका दाखिला कराया है. फीस भी बहुत ज्यादा है. पर मुझे यह स्कूल कुछ खास नहीं लगा…” 

“क्यों, क्या पढ़ाई नहीं होती?” मैंने आश्चर्य से पूछा .

 “पढ़ाई तो हर जगह होती है. पर कुछ छूट रहा है. कुछ रह जाता है. इस इंटरनेशनल स्कूल में बच्चों को बहुत व्यस्त रखते हैं. कई तरह की एक्टिविटीज होती हैं. बहुत सारा पैसा भी लगता है. पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि वे बहुत कुछ सार्थक नहीं सीख रहे हैं. ऐसा लगता है कि हमने बच्चों की आजादी छीन कर उन्हें किसी प्लास्टिक में बाँधकर शोकेस में सजा दिया है. शोकेस में चमकता लैमिनेटेड बच्चा भव्य तो दिखाई देता है पर असल में प्लास्टिक के भीतर उसका दम घुट रहा है. वह खांस रहा है और बाहर निकल कर खुली हवा में सांस लेना चाहता है. यही हाल मेरी बेटी का भी है.” 

निर्मला चुप हो गई. मैंने फोन काट दिया. अब एक दूसरे का हाल जानने का कोई मतलब नहीं रह गया था. जो हाल हमारा है वही सब का है. हम सब बंधना चाहते हैं. हम सब छूटना चाहते हैं. आजादी और अनुशासन, सीखने और छोड़ देने के बीच किसी पुल की तलाश में हम कई नदियों में दिशाहीन डूबते-उतराते हैं. मुझे नहीं पता कि किस ओर आकाश ज्यादा नीला है या किस तट पर घास ज्यादा हरी है. पर मैं हर तट पर बच्चों को खिलखिलाता देखना चाहती हूँ. मैं हर आकाश में बच्चों को रंग भरते देखना चाहती हूँ. मेरी इन अप्राप्त चाहतों के बीच मेरी बेटी का यह सवाल हर वक्त मेरा पीछा करता है “मां, हम हँस क्यों नहीं सकते?

स्वाति मेलकानी

स्वाति मेलकानी

29 अप्रैल 1984 को नैनीताल के पटवाडांगर में जन्मीं स्वाति मेलकानी उत्तराखंड के एक छोटे से कस्बे लोहाघाट के स्वामी विवेकानंद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में पढ़ाती हैं. भौतिकविज्ञान एवं शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर चुकी स्वाति का पहला कविता संग्रह ‘जब मैं जिंदा होती हूँ’ भारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन प्रतियोगिता में अनुशंसित अवं प्रकाशित हो चुका है. उनकी कविताएं देश की तमाम छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती रही हैं और हिन्दी कविता के पाठकों के लिए वे एक परिचित नाम हैं. 

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