कुमाउनी शब्द सम्पदा की विपुलता, विविधता और सामर्थ्य के प्रसंग में लब्ध प्रतिष्ठित भाषा शास्त्रियों का मत है कि कभी-कभी तो हिंदी या अन्य भाषाएं इसका मुकाबला नहीं कर पाती. ऐसे में यह सन्दर्भ पुस्तक “ठेठ कुमाउनी” के शब्दों का दस्तावेजीकरण तो है ही साथ ही वर्तमान कुमाउनी की प्रचलित शब्द राशि का संग्रह भी है ताकि आज और कल की युवा पीढ़ी इससे परिचित हो सके.
(Kumaoni Shabd Book Pooran Joshi)
लोक वाणी या लोकाभिव्यक्ति जिसे हम मौखिक भाषा कहते हैं वह किसी न किसी बोली के रूप में अभिव्यक्त होती है. मातृभाषा को हम माँ की गोद में खेलते हुए बिना किसी पाठशाला के खुद-ब-खुद सीख लेते हैं. इसे दुधबोलि की संज्ञा दी जाती है जिसमें हम अपनी भावनाओं को प्रभावी रूप से प्रकट कर सकते हैं और इसके द्वारा जटिल विषयों को गहराई से समझ सकते हैं. मौखिक भाषा लोक साहित्य की आत्मा मानी जाती रही है. लोक साहित्य में लोक जीवन की अभिनव झांकी व विविध लोक व्यवहार निहित है. यह ‘शाब्दिक-जीवन-प्रतिबिम्ब’ है.
कुमाउनी भाषा के सामान्यतः दो मुख्य अंग हैं – पहला स्थानीय या देशज शब्दों से भरा स्वरुप जिसे लोक भाषा, मूल कुमाउनी या ठेठ कुमाउनी भाषा कहा जाता है व दूसरा कुमाउनी भाषा का वह वर्तमान स्वरूप जिसमें मूल कुमाउनी का हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिश्रण व घालमेल रहता है.
स्थानीय बोलियों के शब्दों को देशज कहा जाता है. लोक भाषा में इनकी बहुलता होती है. प्रायः इन्हें ही ‘मूल कुमाउनी या ठेठ कुमाउनी’ शब्द कहा जाता है. वहीं प्रचलित कुमाउनी में ऐसे अनेक शब्द हैं जो न तो खड़ी बोली या हिंदी से मिलते हैं और न ही किसी अन्य प्राचीन भाषाओं में. इस कारण भाषाविदों का मानना है कि ऐसे कुमाउनी शब्द जिनका किसी भी भाषा से कोई से कोई साम्य नहीं है और जो इस तरह भाषा की एक अलग पहचान या स्वतंत्र अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं को हम मूल कुमाउनी या ठेठ कुमाउनी कह सकते हैं.
(Kumaoni Shabd Book Pooran Joshi)
पारम्परिक शब्दावली “कुमाउनी शब्द “सन्दर्भ पुस्तक के लेखक पूरन चंद्र जोशी पेशे से जंतु विज्ञान के समर्पित प्राध्यापक रहे हैं. अपने विषय की व्यावहारिक समस्याओं पर शोध के साथ ही प्रतिष्ठित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपे उनके लेख अपने पेशेगत विषय सार्थक योगदान के लिए जाने जाते रहे.वहीं उनके व्यक्तित्व की यह महत्वपूर्ण विशेषता रही कि उन्होंने लोकप्रिय विज्ञान पर लगातार लिखा जिसका उद्देश्य यह रहा कि एक सामान्य जन व विद्यार्थी भी आम बोलचाल की भाषा में गहरी बातों को सरल तरीके से समझ सकें. अपनी जन्मभूमि अल्मोड़ा जनपद के ग्राम बोरखोला, बिंता-रानीखेत के ग्रामीण परिवेश व वहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य के साथ लोकथात को वह प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात् लखनऊ में बस जाने के बाद भी दिल में ऐसा बसाये कि उन्होने न केवल कुमाउनी में अनेक लेख लिखे जो लगातार छपते रहे व अपने सांस्कृतिक परिवेश व लोक रंग की सहज सरल तस्वीर से जिज्ञासु पाठकों को आकर्षित करते रहे. इन सबसे आगे उनका महत्वपूर्ण योगदान कुमाउनी भाषा और यहाँ की संस्कृति पर केंद्रित हुआ जिससे कुमाउनी भाषा का परिचयात्मक संग्रह एवम कुमाउनी शब्द जैसे सन्दर्भ सामने आये. विज्ञान के शोधार्थी होने के नाते उनके सन्दर्भ ग्रंथों में भले ही वह स्थानीय बोली व भाषा पर केंद्रित हों शोधकार्य की प्राविधि व प्रस्तुतीकरण का पूर्ण निर्वाह दिखाई देता है. यह उनके लेखन को प्रमाणिक व गुणवत्ता युक्त बनाता है.
अपनी प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा ग्रामीण अंचल की स्थानीय सरकारी संस्थाओं से प्राप्त करते हुए लोकथात को गहराई से समझने देखने की उनकी अभिरूचि निरंतर बढ़ती रही. अपने अभिभावकों के साथ विद्यालय के गुरुजनों ने उनका समुचित मार्गदर्शन किया. उच्चतर अध्ययन के लिए डी. एस. बी. कॉलेज नैनीताल से उन्होने प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की तथा शोध कार्य पूर्ण किया. फिर उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के नामचीन राजकीय महाविद्यालयों में प्राध्यापक रहे. अपने सरल व मृदु व्यवहार के साथ विषय पर गहरी अंतरदृष्टि के रहते वह हमेशा ही अपने सहयोगियों व विद्यार्थियों के प्रिय रहे.
न्यूरोइंडोक्रिनिलॉजी, फिश फिजियोलॉजी, हिमेटोलॉजी व इकोलौजी उनके शोध अध्ययन के मुख्य क्षेत्र रहे जिन पर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय रिसर्च शोध पत्रिकाओं में उनके बीस से अधिक आलेख प्रकाशित हो चर्चा में रहे. जर्मनी के जकॉब्स विश्व विद्यालय, यू के लेंकेस्टर व बाथ विश्वविद्यालय, डयूक विश्वविद्यालय, अमेरिका, ज्यूरिच स्विटजरलैंड, रूस एवम यू एन ई पी जैसे संस्थानों से जुड़े रह उन्होंने पारिस्थितिकी, जैव विविधता से संबंधित अनेक समस्याओं पर काम किया. चालीस वर्षों के अध्यापन के लम्बे दौर में उनके भीतर का पहाड़ी अपनी कुमाउनी भाषा के शब्द रूपों का चिंतन मनन करता रहा.
उन्हें महसूस हुआ कि कुमाउनी में साहित्यिक रचनाओं में तो वृद्धि हो रही है परन्तु इनमें जो भाषाई अनेकरूपता दिखाई दे रही है वह इस लोक भाषा के भविष्य के लिए निराशाजनक है. प्रोफेसर जोशी यह मानते हैं कि बोलियों में अस्थिरता अर्थात अनेकरूपता तो होती रहती है परन्तु लेखन में एकरूपता होना आवश्यक है. इसके साथ ही भाषा के बोलने व लिखने में अंतर न हो इसके लिए वर्तनी और विशेषक चिह्नों का सही प्रयोग जरूरी है .इस पक्ष को ध्यान में रखते हुए अपनी पुस्तक के आरंभिक चार अध्यायों में उन्होंने लिपि संकेत या अनुप्रयोग चिह्न, लेखन व टाइपिंग के दिशा निर्देश, कम्यूटर से अधोरेखा की टाइपिंग के तरीके तथा हल व हलन्त चिह्न की टाइपिंग को स्पष्ट रूप से समझाया भी है.
(Kumaoni Shabd Book Pooran Joshi)
कुमाउनी शब्द सम्पदा का वर्गीकरण करते हुए प्रोफेसर जोशी स्पष्ट करते हैं कि इसमें संस्कृत, प्राकृत आदि की शब्दावली है तो संस्कृत से विकसित हुए शब्द भी जिन्हें तद्भव शब्द कहा जाता है. यहाँ की प्राचीन स्थानीय जातियों यथा यक्ष, गंदर्भ, किन्नर, नाग, हूण, कोल, किरात कुणंद, तंगड़, शक, खस, वैदिक आर्य इत्यादि की बोली के शब्दों को निजी या देशज शब्द कहा जाता है. इनका किसी अन्य भाषा से कोई साम्य नहीं पाया जाता है. इन शब्दों की जड़ें प्राचीन काल से जुड़ी प्रतीत होती हैं. फिर आते हैं हिंदी व भारत के विभिन्न प्रांतों से आये शब्द जो अनेक भाषा-भाषी लोगों से मेलजोल से कुमाउनी में शामिल हुए. इसके साथ ही मुगल, अंग्रेज व गोरखा जैसे विदेशी शासकों के आगमन से अंग्रेजी, अरबी, फारसी, पुर्तगाली व नेपाली भाषा के शब्द कुमाउनी में शामिल हुए.
कुमाउनी भाषा आर्य व अनार्य भाषाओं का मिश्रण मानी गई. चंद राजाओं के शासन काल में प्राचीन या मूल कुमाउनी ही राजभाषा रही. ग्यारहवीं सदी के ताम्र पत्रों में इस लोकभाषा के प्रमाण मिले हैं. उन्नीसवीं सदी में गुमानी की रचनाएं (वर्ष 1810 से) व अन्य साहित्यिक रचनाओं में मूल कुमाउनी शब्दों का ही प्रभुत्व रहा. धीरे-धीरे हिंदी व अन्य भाषाओं के घुलने मिलने से मूल कुमाउनी के शब्द बोलचाल से बाहर होते गए. अब तो कुमाउनी भाषा “अर्बन कुमाउनी” बनते जा रही है जिसमें हिंदी व अन्य भाषाओं के शब्दों का घालमेल है. कहते हैं कि “पुराण पतेल झड़ण्, नईं पतेल लागण्, डाव ‘मूल’ में रुनेर भय” अर्थात पुरानी पत्तियां झड़ जाती हैं, नई पत्तियां उग आती हैं, शाख व तना तो वही रहता है. यह कहा जाता है कि ऐसी मिलावट से भाषा में निखार आ सकता है पर अन्य भाषा के शब्दों के साथ लोक भाषा का ध्वन्यावत्मक ठेठपन बने रहना ज्यादा जरूरी है.
पुराने समय में साहित्य या लेखन का कार्य नहीं हुआ करता था जिससे साहित्यिक शब्दों या परिनिष्ठित शब्दों का प्रवेश मूल कुमाउनी शब्दावली में नहीं हो पाया . आम तौर पर रोजमर्रा बोली जाने वाली शब्दावली ही श्रुति परम्परा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तां तरित होती रही. जैसे जैसे विकास हुआ तो अंतरसंरचना के बनने व संचार सुविधाओं के बढ़ने से भाषाई संपर्क विस्तृत हुए. अन्य भाषाओं के शब्द कुमाउनी में शामिल हुए. साथ ही यह असमंजस बना ही रहा कि क्या बढ़ते भाषायी सम्पर्क से कुमाउनी भाषा की विभिन्न बोलियां एकरूपता की ओर बढ़ेंगी?
मूल कुमाउनी अपनी सूक्ष्म अनुभूतियों या विशिष्ट संवेदनाओं से जुड़े खास शब्दों से सटीक भाषा की अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता रखती है. लोक जीवन से संबंधित वस्तुएँ हों या पदार्थ या उनकी विविध अवस्थाएं, साथ ही भौगोलिक व सामाजिक स्थितियाँ, लोक थात से संबंधित आयाम, जैव विविधता से ले कर स्थानीय जनों के मनोभाव, गतिविधियां व सूक्ष्म संवेदनाएं जिनके लिए भिन्न भिन्न सटीक शब्द कुमाउनी में प्रयुक्त किये जाते रहे हैं. मूल कुमाउनी में तो अलग-अलग ध्वनियों, गंध व भाव-भंगिमाओं के लिए ऐसे खास शब्द हैं जो हिंदी या अन्य भाषाओं में सटीक अभिव्यक्ति से कहीं अधिक प्रभावी हैं. इसे ध्यान में रखते हुए भाषाविदों का मत है कि मूल कुमाउनी शब्द सम्पदा अपनी सूक्ष्म अनुभूतियों व संवेदनाओं से भरे विशिष्ट शब्दों से हिंदी भाषा के तत्सम्बंधित अभाव की पूर्ति करने में सक्षम है.
(Kumaoni Shabd Book Pooran Joshi)
समस्या यह है कि कुमाउनी की पुरानी शब्द राशि का एक बड़ा हिस्सा पहले के समय में लेखन परंपरा के सीमित होने से लुप्तप्राय रहा. फिर जैसे जैसे आर्थिक सामाजिक विकास हुआ पहले प्रयोग की जा रही वस्तुओं के स्थान पर नई वस्तुओं का प्रचलन बढ़ा और धीरे धीरे पुरानी शब्दावली भी गायब हो गई. साथ ही अनेकों पारम्परिक परिधान, आभूषण, संयन्त्र, व्यंजन, खेलकूद की स्मृतियाँ ही शेष हैं. मान्यताओं, रीति-रिवाजों, वस्तुओं आदि का समय के बीतते लोप होता रहा तो उनसे सम्बन्धित भाषा/शब्द भी खोती गई.
गाँव-घरों के बुजुर्गों की बोल-चाल में मूल कुमाउनी के बोल वचन अब भी सुनाई दे जाते हैं पर शहरीकरण के दौर में नये नये शब्दों का ऐसा घालमेल सुनाई देता है जिसके चलते मूल कुमाउनी अपनी पहचान समेट रही है. प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी इसी अवमूल्यन से चिंतित हो मूल कुमाउनी शब्दों को अधिकाधिक चलन में बनाये रखने का समाधान देते हैं. ऐसा करते हुए ही अपनी लोक भाषा की अलग पहचान व उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहेगा व तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत की वाहक यह ‘दुधबोलि’ संरक्षित रह सकेगी.
अपनी भाषा, परंपरा व मूल संस्कृति की उपेक्षा व इसे भुला देने के असमंजस से ही चालीस से अधिक वर्षों तक उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में प्राणि विज्ञान का यह प्राध्यापक इस खतरे को महसूस करता रहा कि मूल कुमाउनी शब्दों के लुप्त होने से स्थानीय संस्कृति एवम परंपराओं, यहाँ तक कि इसके मुहावरों और कहावतों में भरा जीवन ज्ञान एवम दिशा-बोध के लुप्त होने का अपराध बोध बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में जो कुमाउनी शब्द प्रचलन से बाहर हो गए हैं, विलुप्ति की कगार में हैं उनकी खोज-बीन कर उनको संकलित करना ही होगा क्योंकि वह खोये जा रहे शब्द न केवल आंचलिक इतिहास व संस्कृति को प्रतिबिम्बत करते हैं बल्कि लोक थात के मूल स्वभाव, मूल विशेषताओं व स्वतंत्र अस्तित्व के भी वाहक हैं.
कुमाउनी की दस से अधिक स्थानीय बोलियां हैं. कुमाऊं की विविधतापूर्ण भौगोलिक स्थिति व भौगोलिक बाधाओं जैसे कि ऊँचे पहाड़ों, गाड़-गधेरों, घने जंगलों के साथ आवागमन की असुविधाओं के कारण अलग-अलग स्थानों के रहवासियों का विपटन भाषाओं के अंतरमिलन में बाधक रहा जिससे इस लोक वाणी में आंचलिक विविधता व भिन्नताएं उपजती रहीं. प्रोफेसर जोशी ने अपनी पुस्तक ‘कुमाउनी शब्द’ में पूर्वी कुमाउनी की मुख्य बोली “खसपर्जिया” की शब्दावली को मुख्य आधार बनाया है. स्थानीय प्रभाव के कारण कुमाउनी भाषा में वर्तनी की अनेकरूपता है जबकि बोलियां अनेक, भाषा एक तथा पहचान भी एक है. उन्हें यह महसूस हुआ कि कुमाउनी के अनेक शब्द तो विकारी भी होते जहाँ उनके रूप में लिंग, काल, वचन, कारक और पुरुष के अनुसार परिवर्तन हो जाता है तो कहीं कहीं शब्दों की वर्तनी व उच्चारण तो समान है पर अर्थ में भिन्नता हो जाती है.
प्रोफेसर जोशी स्पष्ट करते हैं कि वचन, लिंग व समय के अनुसार एक ही शब्द के कई रूप व अर्थ हो जाते हैं. कहीं कहीं शब्दों की वर्तनी व उच्चारण तो समान होता है पर उनका आशय भिन्न होता है.ऐसे शब्दों के उदाहरण उचित सन्दर्भ में अर्थ सहित समझाए गए हैं. ऐसे ही कहीं वर्तनी तो समान होती है पर बोलने के ढंग व शब्द का अर्थ भिन्न हो जाता है. ऐसे शब्दों की पहचान करने व उनके अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विशेषक चिह्न जैसे अधोरेखा या हल चिह्न का प्रयोग समझाया गया है जिससे शब्दों की पहचान व उनके अर्थ-भावार्थ को समझा जा सके.
हमारी लोकभाषा की मूल शब्द राशि, स्वभाव व विशेषताएं पर्वत पुत्रों का लोक मानस का “स्मृतिकोष” है जिसके संरक्षण व विकास के लिए कुमाउनी शब्दावली का दस्तावेजीकरण लोक संस्कृति के अनुरक्षण व अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को बनाये बचाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम प्रयास की अपेक्षा करता है. प्राणिविज्ञानी प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी ने पहाड़ के प्रति अपने दायित्व को प्रकट अधिमान देते हुए इस सन्दर्भ पुस्तक में उन शब्दों को संजोने का श्रम साध्य प्रयास किया जो ठेठ कुमाउनी के हैं और इनके स्त्रोत श्रुत या आम बोलचाल की है जो ग्रामीण अंचलों में बोली जाती है.इसके साथ ही लोक साहित्य व विभिन्न ग्रंथों, शब्दकोशों, पत्र-पत्रिकाओं आदि से शब्दों का संग्रह कर उनका अर्थ, आशय व प्रयोग सूचीबद्ध किया गया है.
(Kumaoni Shabd Book Pooran Joshi)
इसी क्रम में प्रोफेसर जोशी अब “कुमाउनी भाषा की वर्गीकृत शब्दावली” की पुस्तक को अंतिम रूप दे रहे हैं जिसमें लोक जीवन में दैनिक आवश्यक्ताओं की वस्तु व सेवाओं के साथ रहन सहन विषयक शब्दों, लोकथात, गंध-स्वाद से संबंधित व प्राकृतिक व जीव जन्तु के साथ मानव द्वारा उच्चारित ध्वनियों के शब्द तो सम्मिलित हैं ही कुमाउनी जैव विविधता व नाजुक पारिस्थितिकी विषयक सन्दर्भ भी विस्तार से वर्णित होंगे.
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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