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राज्य की संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में महिलाओं का योगदान

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” हमारी भारतीय संस्कृति में माँ और जन्म भूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ माना गया है — यह श्लोक केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का आत्म स्वर है. माँ और माटी केवल जन्म ही नहीं देती अपितु व्यक्ति को जीवन की संवेदना, लय और सौंदर्यबोध का प्रथम संस्कार भी प्रदान करती हैं. यही संस्कार आगे चलकर कला और संस्कृति की आधारशिला बनते हैं.
(The Role of Women in Uttarakhand)

उत्तराखंड की इस माटी ने महिला शक्ति के रूप मे तीलू रौतेली, रानी कर्णावती, जिया रानी, जसुली अम्मा, गौरा देवी और बछेंद्री पाल जैसी अनेक महिलाओं को जन्म देकर यहाँ की संस्कृति को समृद्ध किया है.

उत्तराखंड राज्य की स्थापना से पहले, जब हम उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का हिस्सा थे, तब पहाड़ की महिलाओं के सामने दोहरी चुनौती थी — एक ओर कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ और दूसरी ओर सामाजिक उपेक्षा. इन चुनौतियों के बीच भी पर्वतीय महिलाओं ने अपनी प्रतिभा, श्रम और संवेदना से अपनी अलग पहचान बनाई, यद्यपि उन्हें वह मान्यता नहीं मिल पाई जिसकी वे सच्ची अधिकारी थीं.

सन 2000 का वर्ष मानव सभ्यता को एक नए युग की ओर ले जाने का संकेत था. उसी काल में देश के नेतृत्व में एक ऐसी दूरदृष्टि सक्रिय हुई, जिसने उत्तराखंड को उसकी विशिष्ट पहचान दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया. माननीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस पर्वतीय अंचल को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में नया जीवन प्रदान किया. यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि उन लोगों की आकांक्षाओं का सम्मान था, जिन्होंने वर्षों तक संघर्ष और आशा के साथ अपनी संस्कृति, भाषा और पहचान को जीवित रखा.
(The Role of Women in Uttarakhand)

नई शताब्दी में प्रवेश करते हुए उत्तराखंड ने नए युग की परिकल्पना के साथ कार्य आरंभ किया. आरंभिक वर्षों में अनेक कठिनाइयाँ थीं, किंतु हमने उन्हें पार करते हुए इन पच्चीस वर्षों में विकास की एक सार्थक यात्रा तय की है — एक ऐसी यात्रा, जिसमें लोकसंस्कृति, महिला शक्ति और सामूहिक चेतना की अमिट छाप स्पष्ट दिखाई देती है.

कला-संस्कृति के क्षेत्र में उत्तराखंड की महिलाओं का विशेष योगदान रहा ये महिलाएँ केवल कलाकार नहीं, बल्कि संस्कृति की सच्ची संरक्षक व संवाहक के रूप में सामने आई. अपने घर-आँगन की जिम्मेदारियों के साथ-साथ इस क्षेत्र को भी पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से सँभाला है. उनकी यात्रा जननी से जननेता तक की रही है — जहाँ उन्होंने सृजन, संरक्षण और नेतृत्व — तीनों भूमिकाएँ निभाई हैं. माटी से मंच तक और अब नई तकनीक की दुनिया में कदम मिलाते हुए, वे विकसित भारत 2047 के सपने को साकार करने की दिशा मे अग्रसर हैं.
(The Role of Women in Uttarakhand)

संस्कृति अपने आप में एक विशाल विषय है — यदि हम नृत्य, संगीत की बात करें तो उत्तराखंड की धरती पर स्वर्गीय कबूतरी देवी, पद्मश्री बसंती बिष्ट, पद्मश्री माधुरी बर्थवाल, नईमा उप्रेती और बीना तिवारी जैसी लोकसंगीत की साधिकाएँ जन्मी हैं, जिन्होंने अपनी कला विधा के माध्यम से यहाँ की लोक संस्कृति को विशिष्ट पहचान दिलाई है.   फलस्वरूप बसंती बिष्ट और माधुरी बर्थवाल जी को, पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है, वहीं हस्तशिल्प के क्षेत्र में मीरा जोशी, बिमला शाह जैसी महिला कलाकारों ने ऐपण कला को वैश्विक पहचान दिलाई है. महिलाओं के इसी सृजनशील प्रयास का परिणाम है कि ऐपण कला को G.I. टैग प्राप्त हुआ इसी तरह थारू, भोटिया और जौनसारी जनजातियों की महिलाओं ने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को विशिष्ट पहचान दी.

उत्तराखंड की पहचान होली गायकी और रामलीला मंचन, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से और समृद्ध हुई है. अब तो कई स्थानों पर महिला रामलीला की पहल भी हुई है, जहाँ स्त्रियाँ अभिनय, संगीत और संचालन—तीनों भूमिकाएँ निभा रही हैं.

इन 25 वर्षों में उत्तराखंड की महिलाएँ केवल संस्कृति की संरक्षक ही नहीं, बल्कि सृजनकर्ता और नेता के रूप में भी उभरी हैं. उन्होंने लोक संस्कृति को आधुनिक मंचों से जोड़कर उत्तराखंड की पहचान को देश-विदेश तक पहुँचाया है. यह उपलब्धियां महिला सृजनशक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है.

आज जब प्रदेश अपनी रजत जयंती मना रहा है, वह अपनी यौवन अवस्था में है — ऊर्जावान और आत्मविश्वास से भरा. वर्ष 2047 में जब यह राज्य अपनी परिपक्व अवस्था में पहुँचेगा, तब अनुभव और ऊर्जा का संतुलन इसे नई ऊँचाई देगा. इस अंतराल में आवश्यकता है कि हम उपलब्धियों का उत्सव मनाते हुए उन अछूते बिंदुओं पर भी ध्यान दें, जिनसे हम विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त कर सकें — एक ऐसा भारत जो तकनीक में अग्रणी हो, पर अपनी संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा रहे.
(The Role of Women in Uttarakhand)

इस रजत जयंती के पावन पर्व पर हम यह संकल्प लें कि देवभूमि की संस्कृति की यह कलाधारा, हमारी महिला शक्ति के साथ मिलकर स्वर्ण जयंती की ओर और भी सशक्त रूप में अग्रसर हो — जहाँ परंपरा हमारी जड़ होगी और नवाचार उसकी उड़ान.

-डॉ. दीपा जोशी

कथक के लखनऊ घराने की प्रतिनिधि सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. दीपा जोशी दिल्ली दूरदर्शन की ए- ग्रेड कथक नृत्यांगना हैं. बहरहाल भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत ‘सेंट्रल ब्यूरो ऑफ कम्युनिकेशन (नैनीताल)  में कार्यरत डॉ. दीपा जोशी वे भारत की दूसरी महिला कथक कलाकार हैं जिन्हें कथक नृत्य के क्षेत्र में  डी.लिट्. की प्रतिष्ठित उपाधि प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है.

इसे भी पढ़ें : ‘पत्थर और पानी’ एक यात्री की बचपन की ओर यात्रा

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