लड़कपन में लेखक
(पिछली कड़ी – पिछली सदी के पहाड़ का दर्द जी उठता है त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा में)
जब मैं छात्रावास में ही था, अगस्त 1938 के पहले हफ़्ते में मुझे एक हरकारे द्वारा छः पन्ने का पत्र प्राप्त हुआ जिसमें बाबू द्वारा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सचिव का पद छोड़कर अपने गुरु की इच्छानुसार संन्यासी जीवन अपनाने की सूचना दी गई थी. ऐसा करने के उन्होंने कुछ कारण गिनाए थे और इसका सारा ज़िम्मा मौसी पर लगाया था. चिट्ठी में उन्होंने मुझे दिन में दो दफ़ा भगवान की पूजा करने की सलाह दी थी ताकि मुझे सद्बुद्धि प्राप्त हो. उन्होंने मुझे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने पर ज़ोर दिया था और यह भी लिखा था कि मैं लखनऊ जाकर ओवरसीयर का कोर्स करूं. उन्होंने मुझे सूचित किया था कि उन्होंने मेरी छोटी सौतेली बहन (बड़ी मां से), जो मुझसे डेढ़ साल छोटी थी, के विवाह और मेरे सौतेले छोटे भाई (बड़ी मां से ही), जो मुझसे आठ साल छोटा था, की पढ़ाई के लिए आर्थिक बन्दोबस्त कर दिए हैं. इस पैसे का प्रबन्धन उनके चार मित्रों की देखरेख में किया जाना था. जाहिर है मेरे गालों पर आंसुओं की धाराएं बह रही होंगी. अपनी स्थिति को जानकर मैं हैरत कर रहा था कि किसी भी तरह के नैतिक सहारे के बगैर मैं इतनी बड़ी दुनिया का सामना अकेला कैसे कर सकूंगा. चिठ्ठी को बार-बार पढते हुए मैं बुरी तरह रो रहा होऊंगा, मुझे अपनी मानसिक और शारीरिक हालत के बारे में इतना याद है कि मुझे अहसास हो रहा था जैसे किसी ने मेरे दिल में एक बर्छी चुभो दी हो. बाद में मेरे वार्डन और छात्रावास के साथियों ने मेरा ढाढ़स बंधाया होगा. मैं कुल तेरह साल का था. कक्षा आठ में पढ़ रहा था और इस लड़कपन में मेरे जीवन में ऐसा धुंधुआया समय आ चुका था. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
मुझे बाद में पता लगा कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की मीटिंग में बाबू की शानदार सेवाओं को याद करते हुए उनके इस्तीफ़े को स्वीकार करते हुए यह भी तय पाया गया कि यदि वे अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहें तो उन्हें पुनः उसी पद पर नियुक्त करने में बोर्ड को कोई आपत्ति नहीं होगी. यह भी कहा गया कि मेरे हाईस्कूल पास करते ही पहली खाली जगह पर मुझे नौकरी मुहैया कराई जाएगी. एक तरह से काफ़ी छोटी उम्र में मैं अपनी नियति और अपने भविष्य का स्वामी बन गया था. सर्दी की अगली छुट्टियां मैंने हल्द्वानी में ठाकुर बच्ची सिंह के घर पर बिताईं. वे भी बाबू के गुरु-भाई थे और नैनीताल/हल्द्वानी के विशेष जंगलात दफ़्तर में स्टोर-क्लर्क का काम किया करते थे. द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले जीवनयापन खासा सस्ता था. मेरी कक्षा और छात्रावास का एक साथी उसी जंगलात कॉलोनी में रहा करता था. हम दोनों ने छुट्टियों में साइकिल चलाना सीखा. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
फ़रवरी 1939 में हमारा स्कूल खुला. छात्रावास के अन्य साथियों से साथ सिनेमा देखने जाने की मेरी हरकतें चालू रहीं.
मई 1939 की एक दुर्भाग्यपूर्ण रात मैं अपने छात्रावास के एक साथी के साथ, जो उम्र में मुझसे बड़ा था पर स्कूल में जूनियर, “हीरो नं. 1” फ़िल्म देखने भाग निकले. छात्रावास के चौकीदार के माध्यम से हमारे वार्डन पं. पी. सी. उप्रेती को, जो कट्टर अनुशासन के हामी थे, इस बारे में पता चल गया. हमारा कमरा बाहर से बन्द था. लौटने पर ही हमें इस बारे में पता चला. अगली सुबह हमारे हैडमास्टर को इस बारे में बता दिया गया और बहुत अशालीन आचरण के आरोप लगाकर हमें छात्रावास से निष्कासित कर दिया गया. सो काफ़ी कम आयु में ही मैंने कुख्याति अर्जित कर ली थी.
हमारे सहपाठियों ने हमें फ़िल्म के नाम की तर्ज़ पर हीरो पुकारना शुरू कर दिया. एक बार फिर मैं नैनीताल में बच्ची सिंह चाचा के घर रहने लगा. गर्मियों में नैनीताल में ऑल इन्डिया ट्रेड्स कप हॉकी टूर्नामेन्ट का आयोजन किया जाता था. उत्तर भारत की सबसे प्रख्यात टीमें इसमें हिस्सा लिया करतीं. मुझे पहली बार उसे देखने में आनन्द आने लगा. बच्ची सिंह चाचा का दफ़्तर हल्द्वानी शिफ़्ट हो गया था सो मैंने बिड़ला विद्यामन्दिर के निकट ठाकुर जी. एस. बिष्ट के साथ रहना शुरू कर दिया, जो बाबू के एक और गुरु भाई थे. चूंकि वे उम्र में कहीं छोटे थे मैं उन्हें भाईसाहब और उनकी पत्नी को भाभी जी कहा करता था. उनके साथ में दिसम्बर 1939 तक रहा. फ़रवरी 1940 में सर्दियों की छुट्टियां खत्म होने के बाद में वापस उनके साथ रहने चला गया और अक्टूबर 1940 तक उनके ही साथ रहा. चूंकि वह मेरे हाईस्कूल का साल था, मैंने नवम्बर, दिसम्बर और मार्च 1941 में अपने पिता के एक मित्र ठाकुर बी.एस. भोज के घर रहने को तरजीह दी जो इम्पीरियल बैंक में एक मिनिस्टीरियल एक्ज़ीक्यूटिव थे. हमेशा की तरह सर्दियों की छुट्टियां हल्द्वानी में बच्ची सिंह चाचा के यहां बीतीं.
हाईस्कूल के हमारे इम्तहान 2 अप्रैल 1941 को खत्म हुए. अपने सोलहवें साल में मैंने अपने पैतृक गांव हड़बाड़ जाने का मन बना लिया था. मैं नैनीताल से गरुड़ के लिए रवाना हुआ जहां तक मोटर जाती थी. मैं 4 अप्रैल को शाम के कोई छः बजे वहां पहुंचा. बागेश्वर से आगे पिण्डारी ग्लेशियर को जाने वाला रास्ता पैदल पार किया जाना था. रात मैं गरुड़ में ठहरा. अगली सुबह मैं बागेश्वर से होता हुआ हड़बाड़ के लिए पैदल रवाना हुआ और दोपहर तीन बजे वहां पहुंच गया.
मैंने पहली बार 23 किलोमीटर का रास्ता पैदल पार किया था. मुझे हड़बाड़ के भूगोल की वह झलक नज़र आई जो मेरी याददाश्त में धुंधली सी बची थी जब मैं पांच साल की उम्र में वहां गया था. मुझे ग्रामीण परिवेश की खुली हवा पसन्द आने लगी थी क्योंकि मुझे अपने स्कूल की पढ़ाई के बारे में नहीं सोचना था – किताबें, गणित के सवाल वगैरह.
मैंने अपने चाचा गजे सिंह के साथ गांव की बारह किलोमीटर की परिधि में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के साथ मिलने का कार्यक्रम बना लिया. जाने वाली जगहों की सूची बनाते हुए मेरी तीन बुआओं का ज़िक्र आया जिनमें से एक काण्डा में रहती थी और जिनके साथ मेरी मां ने करीब छः महीने बिताकर अपनी अन्तिम सांसें ली थीं. उसके बाद हम चाचा के ससुराल गए, वहां से बाबू के चचेरे भाई के गांव फल्यांठी जो बागेश्वर से तीन किलोमीटर दूर था. आखिर में हम बागेश्वर के नज़दीक मेरी चचेरी बहन के गांव खोली पहुंचे. ये सभी मुलाकातें सौहार्दपूर्ण रहीं – कुछ से मैं पहले मिला था कुछ से कभी नहीं. मेरे चाचा एक शौकीन शिकारी थे और मैं जब-तब उनके साथ जाया करता.
जून के पहले हफ़्ते के आसपास मैं वापस नैनीताल पहुंचा. हमारे हाईस्कूल का परिणाम आ चुका था. 33 छात्रों की कक्षा में औसत से ज़रा ही ऊपर रहने वाले मैंने अच्छे नम्बरों से सेकेन्ड क्लास पाई थी. अब मेरी प्राथमिकता अपने भविष्य को लेकर थी, किस कॉलेज में जाना है, कहां रहना है वगैरह. चूंकि मुझे रास्ता दिखाने वाला कोई न था, सारे फ़ैसले मुझे खुद ही लेने थे.
जैसा कि मैंने पहले बताया बाबू ने मुझे लखनऊ जाकर ओवरसीयर का कोर्स करने की सलाह दी थी. अगर मैं उनकी इच्छा का अनुसरण करता भी तो मुझे लखनऊ ले जाने वाला कोई न था. इसके अलावा पता नहीं किन वजहों से मैं डॉक्टर बनना चाहता था जबकि हमारे परिवार में कोई भी डॉक्टर नहीं हुआ था. इसके अलावा चार साल की पढ़ाई का खर्च उठाने के कोई साधन भी न थे. मैं जासूस भी बनना चाहता था, इसकी वजह यह थी कि स्कूल के दिनों में मैंने मिस्टर ब्लेक के कई हिन्दी उपन्यास पढ़ रखे थे जिनमें मुख्य नायक मिस्टर ब्लेक अपराधियों को पकड़ा करता था. मैं अंग्रेज़ी का पत्रकार भी बनना चाहता था. यह भी एक अनाथ बच्चे के किसी हवाई किले में रहने जैसा स्वप्न था.
सारी बातों को ध्यान में रखकर मैंने आखिरकार अल्मोड़ा के सरकारी इन्टर कॉलेज में विज्ञान और जीवविज्ञान के साथ इन्टरमीडियेट में दाखिला लेने का फ़ैसला किया. यह इस वजह से हुआ कि प्राइमरी स्कूल के समय से लगातार मेरे साथ रहे एम. एल. गंगोला, जिसके परिवार के साथ मेरे काफ़ी अच्छे सम्बन्ध थे, ने भी ऐसा ही करने का फ़ैसला किया था. इसके अलावा एम. एल. गंगोला के एक नज़दीकी सम्बन्धी श्री चौधरी का अल्मोड़े में अपना घर था जहां हमने रहने का निर्णय लिया. इत्तफ़ाकन सारे कुमाऊँ डिवीज़न में अल्मोड़ा में ही इकलौता इन्टर कॉलेज था.
अन्ततः एक दोपहर को हम अल्मोड़ा में थे. अगले दिन हमने सरकारी इन्टर कॉलेज में दाखिले के लिए अर्ज़ी लगा दी. भाग्यवश हम दोनों को एक सप्ताह के भीतर दाखिला मिल गया. वहां हमारे रहते हुए गजेसिंह चाचा एक खच्चर भर आटा, चावल और कुछ किलो दाल हर महीने भिजवाया करते थे. श्री चौधरी भले लेकिन सीमित संसाधनों वाले सज्जन थे.
उसके बाद हम दोनों के अलावा दामोदर पाण्डे और वी. डी. काण्डपाल, जो कक्षा तीन से हाईस्कूल तक हमारे साथी रहे थे, एक दिन हमें मिले और हमने एक अलग मकान किराये पर लेकर अपनी रसोई संचालित करने का फ़ैसला किया. हमें तीन कमरों का एक छोटा सा मकान झिझाड़ मोहल्ले में तीन रुपए मासिक किराये पर मिल गया. हमने मिलजुल कर बरतन खरीदे और हमारी रसोई दो दिनों के भीतर चल पड़ी. काण्डपाल हम में सबसे बड़ा था और गांव से आया था. उसने हमारे लिए इस शर्त पर खाना बनाना मंजूर किया कि वह बरतन नहीं धोएगा. इस काम को करने के लिए हमने खुशी खुशी हामी भर दी.
दोपहरों को हम मिलकर घूमने जाया करते थे. इतवारों को हम अल्मोड़ा के नज़दीक पिकनिक पर जाते. काण्डपाल को छोड़कर हम यदा-कदा रात को सिनेमा देखने जाते थे. हमारा स्तर थोड़ा बढ़ गया था और हम साढ़े चार आने यानी अठ्ठाईस पैसे का टिकट लेकर सबसे निचले दर्ज़े से एक ऊपर का टिकट ले सकते थे. हम मिल कर दैनिक अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स भी लिया करते थे जो एक आने (छः पैसे) का मिलता था.
मुझे हर महीने पच्चीस रुपये मिलने लगे थे और इस लिहाज़ से मैं एक सम्पन्न छात्र था. इस तरह काण्डपाल को छोड़कर हम तीनों इन्टरवल के दौरान चाय और हल्का नाश्ता किया करते थे. काण्डपाल आर्ट्स का छात्र था और फ़कत तेरह रुपये पाने वाले चपरासी का पुत्र होने के कारण यह खर्च वहन कर पाने में असमर्थ था. हमें जब भी अवसर मिलता हम उसकी मुफ़्त सेवा किया करते.
मेरी मित्रमण्डली में ककड़ी, गन्ना और सन्तरे चुराने का शौक था और उसे बुरा भी नहीं माना जाता था. वैसे भी हम लोग पड़ोसियों के बगीचों में आधीरात के बाद ही हमला बोला करते थे.
हमारी सर्दी की छुट्टियां जनवरी में होती थीं. जनवरी 1942 में मैं और काण्डपाल अपने अपने गांवों क्रमशः हड़बाड़ और काण्डा के लिए पैदल निकले. हमने काण्डपाल के पकाए नाश्ते से अपनी यात्रा शुरू की और क्रमशः 33 और 36 किलोमीटर का फ़ासला तय करके शाम सात बजे के आसपास अपने ठिकानों पर पहुंचे. मुझे लगता है कि अगर हमने बचपन में छात्रावास में समय नहीं बिताया होता तो ऐसा कर पाने के बारे में सोच सकना भी असम्भव था. छुट्टियों के बाद हम फिर मिले और जुलाई 1942 तक जीवन ठीकठाक चलता रहा जब हमने दूसरे वर्ष में प्रवेश लिया.
इसी समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में आज़ादी का आन्दोलन अपने चरम पर पहुंच चुका था, अन्ततः 9 अगस्त का दिन आया जब देश के इस छोर से उस छोर तक अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा गूंज उठा.
ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही होने के कारण मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया जो बस अड्डे की तरफ़ जा रही थी और जिसका मकसद अल्मोड़ा के जिलाधिकारी के दफ़्तर के ऊपर तिरंगा फ़हराना था. उक्त स्टेशन के उत्तर की तरफ़ जिलाधिकारी मिस्टर एटकिंसन को पुलिस दल के साथ हमारी तरफ़ आते देखा गया. वह भीड़ को तितरबितर होने का आदेश दे रहा था. लेकिन लोग आगे बढ़ते चले गए. जब हमारे बीच कुल पचास मीटर का फ़ासला रह गया, जिलाधिकारी ने हवाई फ़ायरिंग शुरू करा दी. लोग इधर उधर भागने लगे और अफ़रातफ़री मच गई.
जिलाधिकारी के दफ़्तर पर तिरंगा फ़हराने पर आमादा भीड़ का धधकता असन्तोष लोगों की बातचीत से स्पष्ट था. जिलाधिकारी का दफ़्तर बस अड्डे से करीब 75 मीटर की ऊंचाई पर था. प्रदर्शन का विरोध कर रहे प्रशासन ने दफ़्तर की सुरक्षा के भरपूर इन्तज़ाम किए हुए थे. करीब एक घन्टे बाद यूं ही या उत्सुकतावश लोगों ने सड़क पर चलना शुरू कर दिया. मैं भी ऐसा ही कर रहा था और जिलाधिकारी के दफ़्तर को जाने वाले रास्ते पर खड़ा था जब एक खास पल मैंने कुछ झगड़ा सा होता देखा और पाया कि खिलाड़ियों की सी कदकाठी वाले नाथ सा्ह नामक एक आदमी ने एस डी एम ठाकुर मेहरबान सिंह को सशरीर उठा कर नीचे बिच्छू झाड़ियों की दिशा में दे फेंका. सो इस घटना के चन्द प्रत्यक्षदर्शियों में मैं भी था, जो उस दिन शहर भर के लोगों में चर्चा का विषय बनी रही. बाद में कुछ आन्दोलनकारियों को जिनमें हमारे स्कूल के तीन लड़के और नाथ साह शामिल थे, जेल भेज दिया गया. अल्मोड़ा जिले के दूरदराज़ हिस्सों से भी ऐसे ही प्रदर्शनों की सूचनाएं आती रहीं.
अगस्त 1942 का महीना आमतौर पर अफ़रातफ़री वाला था जिससे हमारी पढ़ाई भी बाधित हुई. एक ही छत के नीचे रह रहे हम तीन दोस्तों ने अल्मोड़ा के एक रेस्टोरेन्ट में साढ़े सात रुपए महीने के हिसाब से खाना शुरू कर दिया. भोजन काफ़ी अच्छा होता था. काण्डपाल अब भी अपना भोजन पहले की तरह पकाया करता था. अक्टूबर 1943 तक सब कुछ सामान्य रहा.
सितम्बर 1942 में एक दिन अल्मोड़ा की बाज़ार में घूमते हुए एक विश्वसनीय सूत्र से मुझे पता चला कि सन्यासी बन चुकने के चार साल बाद बाबू फिर से हल्द्वानी में देखे गए हैं. यह मेरे लिए उत्साहित करने वाली बात भी पर इसके आगे जो पता चला उसे सुनकर मेरा दिल रो पड़ा. बाबू ने एक शादी और कर ली थी. मैंने अपने ऊपर काबू रखा और सूचना देने वाले के सामने अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं होने दिया. घर पहुंचकर मैंने बाबू को एक चिठ्ठी लिख कर अपनी दुर्भावनाओं का इज़हार किया. यह पहला पत्र था जो मैंने अपने बाबू को लिखा था. रात को बिस्तर में तमाम गलत बातें याद आती रहीं, रामी मौसी के हाथों पाई सज़ाएं याद आती रहीं और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में सोचकर डर लगता रहा.
हफ़्ते भर के अन्दर मुझे बाबू का साधारण सा जवाब मिला जिसमें उन्होंने मुझसे अक्टूबर के समय दशहरे में हल्द्वानी आने को लिखा था. मैंने ऐसा किया भी. उनके लिए अपनी पुरानी बुरी भावनाओं के बावजूद मैंने उन्हें पर्याप्त आदर और सम्मान दिया.
उनके सन्यासी जीवन के बारे में होने वाली हमारी अनौपचारिक बातचीत में कि उन्होंने पिछले चार साल किस तरह बिताए थे, के अलावा बाबू ने मुझे अपनी ताज़ा शादी के बारे में भी मुझे बताया. मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा कि बावजूद अपने पिछले जीवन में की गई भीषण गलतियों को नज़र अन्दाज़ करके, बावजूद हड़बाड़ में बड़ी मां की उपस्थिति के ऐसी कौन सी वजहें थीं जिनके कारण वे वापस दुनियावी समाज में लौट कर आए. बाबू ने अपना पक्ष रखते हुए कहा : “अगर सबकुछ ठीक होने वाला होता तो मैं तुम्हारी मां के साथ नहीं आ सकता था. उन्होंने कहा कि उनके स्वाभाव एक दूसरे से कतई मेल नहीं खाते थे और उनके बीच संवादहीनता की स्थिति थी.
बाद में मैंने उनसे पूछा कि उन्हें दोबारा शादी करने की क्यों सूझी तो उनका जवाब काफ़ी लम्बा था. इस ज़िक्र मैं रामी मौसी और उनकी गतिविधियों के बारे में बताते समय करूंगा.
बाबू के सन्यास लेने के बाद रामी मौसी के लिए उन्होंने कोई भी आर्थिक व्यवस्था नहीं की थी जैसा वे हमारे लिए कर गए थे. उनके पास दो दुधारू गाएं और घर के बरतन फ़र्नीचर आदि के अलावा कुछ नहीं बचा था. मुझे पता लगा कि उन्होंने इस सारी चीज़ों को कौड़ियों के भाव बेच दिया था. अपनी गुरबत और पारिवारिक जीवन के त्रास के लिए वे बाबा सदाफल को ज़िम्मेदार ठहराती थीं. जैसी कि शहर में चर्चा थी वे 1940 के साल बाबा सदाफल के मठ में चली गई थीं.
अब मैं ऊपर लिखी बात का ज़िक्र करूंगा. मठ में पहुंचने के बाद रामी मौसी ने पाया कि वहां बाबा सदाफल के खिलाफ़ काफ़ी रोष और असन्तोष व्याप्त था. इनमें सबसे बड़ा पर्दाफ़ाश बाबा की एक चेली के साथ हुआ सैक्स-काण्ड था जिसके साथ उनके सम्बन्ध रहे थे. अब बाबा ने चेली की पुत्री के कौमार्य पर हाथ डालने की कोशिश की थी. इसके अलावा भी कुछ गम्भीर आरोप थे. इस तरह दोनों महिलाओं ने मिलकर मठ के अन्य प्रभावित लोगों के साथ मिलकर मोर्चाबन्दी कर ली.
अन्ततः दोनों ने बलिया की अदालत में बाबा के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ करा दिया. इस मुकदमे में रामी मौसी पहली अपीलकर्ता थीं. समय के साथ साथ बाबा पर अपराध साबित हुआ और उसे दो साल के लिए जेल में डाल दिया गया. बाबा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अर्ज़ी दी और उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया गया. अजीब बात यह थी, बाबू ने मुझे बताया कि वह फ़र्ज़ी बाबा किसी तरह उच्च न्यायालय के जज को अपना चेला बना पाने में सफल हो गया. इस चेले जज ने तकनीकी कारण बताते हुए पूरे मामले को कुछ समय बाद इस कारण से रद्द कर दिया कि पहली अपीलकर्ता यानी रामी मौसी ने नैनीताल की निवासी होने कारण मुकदमा नैनीताल की अदालत में दायर करना चाहिए था न कि बलिया में. बाबा को छोड़ दिया गया. अदालत से छूट जाने के बावजूद बाबा का असली चेहरा लोगों के सामने आ गया.
अगस्त 1938 में नैनीताल छोड़ने के बाद बाबू करीब सवा साल तक बाबा सदाफल के साथ छपरा, बलिया में रहे. उसके बाद उन्हें गढ़वाल के सुदूर कोने में एक आश्रम खोलने और अगले आदेश मिलने तक आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्य करने को कहा गया. बाबू ने बताया कि उन्हें पत्र के माध्यम से एक विश्वसनीय सूत्र ने बाबा के आश्रम में हो रहे बखेड़े की और बाबा के खिलाफ़ मुकदमे की सूचना प्राप्त हुई. जाहिर है उनके दिल को ठेस पहुंची और 1940 के अन्तिम दिनों में वे बलिया के लिए रवाना हुए ताकि स्थिति का जायज़ा ले सकें. वहां जाकर उन्हें मालूम पड़ा कि सारी बातें सच्ची थीं. बाबू ने सम्भवतः अपने आप को गालियां दी होंगी कि वे कैसे मूर्ख थे कि सन्त के चोगे में छिपे शैतान के बहलावे में आ गए. इस सब ने उनके परिवार को तहस नहस करने के साथ उनके बच्चों को बेसहारा छोड़ दिया था.
मैं अच्छी तरह समझ सकता था कि वे एक ऊहापोह की स्थिति में थे कि वापस उस स्थान पर कैसे जाएं जिसे वे अपने मन से छोड़ आए थे. उन्होंने अन्ततः तय किया कि बाबा सदाफल के गुरु से मिलें जिनका आश्रम मध्य प्रदेश में कहीं अवस्थित था. वहां उनका सौहार्दपूर्ण स्वागत हुआ. जब गुरू प्रवचन दे रहे थे तो बाबू ने देखा कि एक चिकित्सक ने गुरू को कोई इंजेक्शन लगाया. फेंक दी गई इंजेक्शन की शीशी को बाबू ने उत्सुकतावश देखा तो पाया कि वह सिफ़लिस नामक यौनरोग की दवा थी. बाबू ने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सचिव रहते हुए मेडिकल बोर्ड के साथ होने वाली बैठकों के दौरान यह जानकारी इकठ्ठा की थी. उन्हें भीषण अचरज हुआ कि किस तरह तथाकथित बाबा और गुरू निर्दोष और भोले भाले लोगों को लालच देकर अपने शिकंजे में फंसाया करते हैं और उनकी कथनी और करनी में कितना अन्तर होता है.
कुछ ही दिन बाद बाबू मार्च 1941 में गढ़वाल अपने आश्रम लौट आए. अपनी पिछली गतिविधियों और अनिश्चित भविष्य के कारण वे काफ़ी असमंजस की स्थिति में रहे होगे. मैंने यह जानने की कोशिश की कि बाबू दोबारा उसी दयनीय ज़िन्दगी में डूबने को क्यों विवश हुए. मैं निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचा.
बाबू की आयु 46 साल की थी और इसके पहले वे पांच साल तक अपने गुरु की और अपनी इच्छा से सन्यासी जीवन बिता रहे थे. इसी दौरान पास के एक गांव की युवा स्त्री जो उनसे उम्र में आधी थी, किसी न किसी बहाने उनसे मिलने आ जाती थी और शायद उनके बीच धीरे धीरे नज़दीकियां बढ़ीं और वे पुनः उसी जाल में फंस गए.
उसके बाद में वापस अपने साथियों के साथ अल्मोड़ा आ गया. पन्द्रह दिन बाद मुझे बाबू की चिठ्ठी मिली कि वे दर्शिनी मौसी के साथ हड़बाड़ जाकर गजे सिंह चाचा के साथ रह रहे हैं. इसी दौरान उनका एक पुत्र हुआ – रामपाल. मैंने इस बात को भारी दिल के साथ यह दिलासा देते हुए स्वीकार कर लिया कि जिस चीज़ का इलाज़ न हो सके उसका सामना करना ही होता है.
1940 में मेरे दादा यानी बाबू के बाबू का देहान्त हो गया था. तब मैं नवीं में पढ़ता था. जब तक वे जीवित थे गांव की ज़मीन का तीन चौथाई उनके पास था जबकि एक चौथाई पर बड़ी का हक था. दादा की मृत्यु के बाद उनकी ज़मीन चाचा गजे सिंह के पास चली गई. दोनों भाई बमुश्किल एक महीना साथ रह सके. मौसी के आने के कारण चाची के भीतर ऐसी भावना आ गई थी कि घर का काम तो उन्हें करना पड़ता है जबकि मौसी उनकी मेहनत पर सुख भोगती है. बाबू पैसा भी नहीं कमाते थे. चाची इस बात को लेकर काफ़ी हल्ला मचाया करती थी. मेरे ख्याल से मौसी ने भी कड़ा प्रतिवाद किया होगा. सामूहिक परिवार की शान्ति का यूं भंग होना बाबू से बरदाश्त नहीं हुआ. बाबू ग्राम प्रधान के पास गए और अपने हिस्से की ज़मीन दिलाने की मांग की. गांव की पंचायत ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुना दिया.
उन्होंने एक कमरे के अलग घर में रहना शुरू कर दिया जिसके भीतर एक रसोई का इन्तज़ाम किया गया था. नीचे की मंजिल मवेशियों के लिए थी. जनवरी 1943 की छुट्टियों में मैंने देखा कि उनकी सम्पन्नता के दिनों के हिसाब से वे बेहद गरीबी में रह रहे थे. मैंने इस बारे में बहुत विचार किया और खुद को बताया कि अपने कर्मों का फल आदमी को खुद ही भुगतना होता है. छुट्टियों के बाद मैं अल्मोड़ा लौटा और अप्रैल 1943 तक अपनी परीक्षाओं तक वहीं रहा. वापस लौटने पर मैंने पाया कि वे गांव के एक कोने पर स्थित खत्ते में (यह ज़मीन दादा ने किसी और व्यक्ति से खरीदी थी) एक दो कमरों का नया घर और बगल में मवेशियों के लिए झोपड़ी बना रहे थे. निर्माण कार्य ज़मीन की सतह तक पहुंच चुका था.
जैसी उम्मीद थी, बाबू भीषण गरीबी में थे, सो यह कार्य ऋण लेकर किया जा रहा था. मैंने बाकी मज़दूरों और मिस्त्रियों के साथ एक मज़दूर की तरह पत्थर और छत की पटालें ढोने का काम किया. थोड़ी ऊंचाई पर बना यह नया घर दक्षिण पूर्वोन्मुख था जिससे सीढ़ीदार खेतों और नीचे बह रही लोहारू धारा का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था. हमारा घर गांव के बाकी मकानों से अलग था जो एक दूसरे बहुत नज़दीक बने हुए थे.
मकान तकरीबन समाप्त हो चुका था और जून 1943 के शुरू में हम उसमें आ गए. बाबू और मैंने सब्ज़ियों के खेत तैयार किये और मानसून के मौसम लिए सब्ज़ियों के बीज बोए.
जैसे जैसे मैं बड़ा हो रहा था धीरे धीरे किशोरावस्था से ही बाबू और मेरे बीच दोस्ताना सम्बन्ध बनने शुरू हुए क्योंकि दूसरों से मेरा व्यवहार प्रीतिकर होता था, ठीक यही बात बाबू ले लिए कही जा सकती है जो मुझे बेहिचक अपने बीते समय के बारे में बताया करते थे, जिनमें मेरे बचपन के दुखों की दास्तानें छिपी हुई होती थीं.
मैं उन्हें अपने छात्रावास के दिनों के बारे में बताया करता जो मेरे लिए किसी पालने की तरह था. मैं उन्हें बचपन से ही अपनी आज़ादी के बारे में बताया करता था जिसमें “ये मत करो, वो मत करो” के लिए कोई जगह न थी. मैं उन्हें उन परिवारों के बारे में बताता था जिनके साथ मैं रहा था कि किस तरह वे मुझ पर लाड़ जताते थे और अपने बच्चों की तरह मेरा खयाल करते थे.
थोड़े शब्दों में कहूं तो बावजूद तमाम अभावों के वह मेरे जीवन का अविस्मरणीय समय था. बाद में रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में एक सामान्य एयरमैन की हैसियत से जब मैं नौकरी कर रहा था बाबू की चिठ्ठियों में लिखा रहता था : “तुम मेरे जीवन की इकलौती चमकीली रेखा हो. अगर तुम न होते तो मैं पागल हो गया होता. तुम अपनी मां के मूल्यों का प्रतिरूप हो.” मुझे इस बात से बहुत तसल्ली मिलती है कि कि उनके जीवन के सबसे गहन समय में मैं उन्हें नैतिक सहारा दे सका.
हमारे परिवार की निर्धनता के कारण बाबू को विवश होना पड़ा कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मुझे रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में भर्ती करें. 18 साल की आयु उत्तर प्रदेश के इन्टरमीडिएट बोर्ड की विज्ञान परीक्षा अंग्रेज़ी में कम्पार्टमेन्ट आने के बाद वे मुझे अल्मोड़ा के भर्ती केन्द्र में लेकर गए.
रॉयल इन्डियन एयरफ़ोर्स में ग्राउन्ड टैक्नीशियन के तौर पर नौकरी करने लखनऊ जाने से पहली शाम मैं और बाबू मेरे चचेरे मामा ऑनरेरी लैफ़्टिनेन्ट एस. सी. बूड़ाथोकी से मिलने गए. समय सबसे बड़ा मरहम होता है, सो पिछली कड़वी बातें भुलाकर उन्होंने हमारा स्वागत किया. रात का खाना खाते समय मैंने उनसे अपनी मां की फ़ोटो दिखाने को कहा जो 1920 के दशक में एक दुर्लभ चीज़ होती थी. उन्होंने कहा कि उनके पास कोई फ़ोटो नहीं है अलबत्ता पातालदेवी के राणा परिवार से, जहां मां की पिछली ससुराल थी, इस बारे में निवेदन करने का वादा किया.
मैं जानना चाहता था कि मां कैसी दिखती थी. बाद में मुझे पता लगा कि राणा परिवार के पास भी कोई फ़ोटो नहीं थी या शायद उन्होंने परिवार की इज़्ज़त की खातिर उन्हें नष्ट कर दिया हो. इस तरह मुझे इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ा. यह इच्छा आज भी जस की तस बनी हुई है.
बाबू एक गरीब किसान के परिवार में पैदा हुए थे. बाबू के पिताजी यानी मेरे दादा नैनीताल के उत्तरी छोर पर स्थित राजा बलरामपुर की हवेली में माली का काम करते थे. इस लिहाज़ से बाबू किस्मत वाले थे कि उन्हें पढ़ने का मौका मिल गया हालांकि पढ़ाई उन्होंने अपेक्षाकृत देर से शुरू की. बाबू ने वहां से हाईस्कूल पास किया था. मैं उनके जीवन के बारे में मोटी मोटी बातें बता चुका हूं. अब मैं कुछ बारीक बातें बताना चाहूंगा.
पहले मैं उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलुओं के बारे में बताऊंगा. जैसा मैंने बताया पं. गोविन्द बल्लभ पन्त की इच्छा के विपरीत उन्हें डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का सचिव चुना गया. दोनों हॊ बोर्ड के महत्वपूर्ण अधिकारी थे लेकिन छः महीनों तक दोनों में बात नहीं हुई थी. वे फ़ाइलों के माध्यम से एक दूसरे से वार्तालाप बनाए रहते थे. जैसा बाबू ने बताया एक दोपहर माल रोड में टहलते हुए दोनों एक दूसरे के सामने थे. पं. पंत ने कुमाऊंनी में बात शुरू करते हुए बाबू को नाम से पुकारा – दौलत सिंह! और उन्हें बताया कि उन्होंने बोर्ड को गर्त से उठाकर काफ़ी बेहतर बना दिया है और यह कि वे इस बात से बहुत खुश हैं. पं. पंत ने इस बात का ज़िक्र 1928 की बोर्ड रिपोर्ट में भी किया कि ठाकुर दौलत सिंह ने बोर्ड के सारे विभागों की कार्यप्रणाली का अकेले दम पर बहुत सक्षमता के साथ निरीक्षण किया है.
1946 के दौरान जब बाबू सार्वजनिक जीवन में अपने को पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, वे एक बार फिर पं. पंत से मिले. तब पंत जी यूनाइटेड प्रोविन्स के मुख्यमन्त्री बन चुके थे. उन्होंने तब 50 साल के हो चुके बाबू के लिए आयु सीमा को दरकिनार करते हुए उन्हें सार्वजनिक आपूर्ति विभाग में एरिया राशनिंग ऑफ़िसर के पद पर नियुक्त कर दिया. बाबू उस नौकरी में नहीं गए क्योंकि उसी साल उन्होंने जंगलात में ठेकेदारी का काम शुरू कर दिया.
राष्ट्रीय स्तर के एक नेता की निगाहों में इतनी ऊंची जगह रखने वाले बाबू को ऐसे ही खारिज नहीं किया जा सकता.
अब बाबू की कमज़ोरियों के बारे में कुछ. बाबू के साफ़ साफ़ दो चेहरे थे, एक अनुशासनप्रिय अधिकारी का और दूसरा एक पारिवारिक व्यक्ति का. वे दोनों इस कदर अलग अलग थे कि मुझे निश्चित नहीं मालूम कि मैं उनका बेटा होने के नाते इस बात को कितना सही सही व्यक्त कर सकूंगा.
स्त्रियों के साथ बाबू के सम्बन्धों में रूमानियत हुआ करती थी जो कि पहले बताई गई घटनाओं और परिस्थितियों के कारण बाबू के बुरी तरह टूट जाने का कारण हुआ करता था. उनकी सबसे बड़ी कमी यह नहीं थी कि वे ’दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है’ वाली कहावत से कोई सबक नहीं लेते थे और बार-बार वही गलती करते जाते थे.
देवी उपासना से अध्यात्म की दिशा में बढ़ने के अपने उत्साह के अतिरेक और पारिवारिक मामलों में सन्तुलन न बना सकने के कारण ही बाबू को सन्यास लेना पड़ा और परिवार के सदस्य छिन्न भिन्न हो गए.
अन्त में यह भी कि वे कमज़ोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे जिन्हें नकली या असली बाबाओं का चमत्कारिक व्यक्तित्व प्रभावित कर देता था. इस में कोई शक नहीं कि बाबा लोग पिछले सन्यासियों का साहित्य पढ़कर ज्ञान हासिल करते हैं. वे अपनी वाकपटुता के कारण प्रभावशाली वक्ता भी बन जाते हैं. इसके अलावा दुग्ध उत्पादों, मौसमी फलों, सब्ज़ियों और मावों के नियमित सेवन से वे अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाए रखते हैं. बाबू की यही कमज़ोरी आकर्षक स्त्रियों के सामने भी आ जाया करती थी.
मैं शुरू में ही कह देना चाहता हूं कि इस विषय पर अपनी बात रखने से पहले मुझे क्षमा किया जाएगा, क्योंकि दो तथाकथित ईश्वरीय व्यक्तियों का शिकार बना मैं थोड़ा बहुत पक्षपातपूर्ण भी हो सकता हूं.
अपने पुराने अध्ययन के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ईश्वरीय व्यक्तियों की बाढ़, खास तौर पर हिन्दू धर्म में, 1920 के दशक से आना शुरू हुई. इसका एक कारण यातायात और संचार के साधनों की उपलब्धता हो सकता है. इनमें से कुछ ईश्वरीय व्यक्तियों ने अपने नाम के आगे भगवान शब्द भी जोड़ा. मेरे खयाल से उनके चेले इन गुरुओं के प्रभाव की बढ़ोत्तरी में बड़ी भूमिका निभाते हैं. चेलों की संख्या बढ़ती जाती है. और अपने चुम्बकीय व्यक्तित्व से वे बहुत सारे भले लोगों को आकर्षित करने में सफल हो जाते हैं.
मैं अपने बच्चॊं से कहना चाहता हूं कि किसी भी दिशा में छलांग लगाने से पहले उस तरफ़ देख लेना चाहिए. किसी भी गुरु के पैरों पर अपना सर्वस्व रख देने से पहले उन्होंने थोड़ा परिपक्व तरीके से सोचना चाहिये. सबसे पहले काफ़ी समय तक गुरु को हर कोण से परख लेना चाहिये और इस बात को अच्छी तरह नापतौल लेना चाहिये कि क्या वे संन्यासी का जीवन बिता सकेंगे.
गलतियां मनुष्य ही करते हैं. यह बात सब पर लागू होती है – गुरु पर भी और उसे मानने वाले चेले पर भी. मैं ऐसे अनेक मामले देख चुका हूं जहां इन गुरुओं का असली रूप दुनिया के सामने उजागर हुआ है.
मैं किसी ऐसे व्यक्ति को हतोत्साहित नहीं करना चाहता जो एक समर्थ गुरु के सान्निध्य में शान्ति पाता हो.
इस आख्यान को मैं एक सुखद बात के साथ समाप्त कर रहा हूं. मेरी मंगेतर के नाम पर बाबू ने 1944 के आसपास डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अपने एक मातहत की सलाह पर सहमति की मोहर लगा दी थी. उनके कहने पर 1944 के नवम्बर में मैं उससे मिला. हालांकि वह प्राइमरी स्कूल तक पढ़ी थी, मैंने उसे एक सादगीभरी और सन्तुलित लड़की पाया. हमारा विवाह 15 जून 1945 को हुआ जब मैं अर्न्ड लीव पर बीरभट्टी, नैनीताल में था. बीस साल का होने में मुझे अभी ढाई महीने बाकी थे.
(जारी)
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Bahut badiya dàju...intjar mai