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उत्तराखंड के रीति-रिवाज़ों पर भी पलायन की मार

पलायन के साथ-साथ रीति रिवाजों का पलायन भी जोर पकड़ रहा है. पहले अपनी क्षमता के अनुसार खेती करके, उसमें उपजे अनाज से जीवन यापन और साथ में कोई भी शुभ-अशुभ कार्य में अपनी खेती में उपजे अनाज से ही पूर्ति हो जाया करती थीं. चूड़ाकर्म, ब्रतबंध, शादी- ब्याह जैसे शुभ कार्यों में दाल-भात बनाने की परम्परा आज कुछ क्षेत्रों में जीवित तो है लेकिन स्वरूप बिल्कुल बदला-बदला सा नजर आता है और वह भी धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर नज़र आती हैं. (Customs of Uttarakhand)

पहले जिस परिवार में शुभ कार्य होता था उस घर की बुजुर्ग अम्मा (दादी) या मां द्वारा शुभ कार्य के निश्चित लग्न से काफ़ी समय पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं. जैसे धान को घर आंगन में सुखाना, एक बड़े से ढूकर (भकार) में बड़ी मात्रा में धान संजों कर रखना, उसमें गैमक्शीन का पाउडर डालकर उस ढूकर (भकार) के मुहाने को कपड़े से बांधकर, फिर उसे पूरी तरह से लाल मिट्टी और गोबर से पुताई कर देना, जिससे उस ढूकर (भकार) का सुरक्षा कवच तैयार हो जाता था और धानपुतई (धान को नुकसान पहुंचाने वाला पंखदार सफेद कीड़ा) का डर दूर हो जाता था जिससे ढूकर (भकार) में रखे धान सुरक्षित रहते थे. जैसे ही शुभघड़ी नजदीक आती, उधर शुरुआत हो जाती : उखव लीपने की (ओखली पोतना) मुसव की नई गांज (मूसली का निचला लोहे वाला भाग) लगवाने की, नए सूप खरीदने की, फिर उन्हें लाल मिट्टी और गोबर से लीपना, सुखाना इत्यादि जो घर में शुभ कार्य के संकेत होते थे. 

जैसे ही शुभ लग्न की घड़ी नजदीक आने लगती घर द्वार में खुशी का माहौल होना स्वाभाविक ही है. दादी, मां, काकी, ताई का आपस में राय – मशवरा शुरू हो जाता था. बेशक सालभर अनबन हो लेकिन जैसे ही कोई शुभ कार्य होता सब एक साथ दिखते थे.

फिर एक दिन गांव के लोगों को सूचित किया जाता था. 5 गते बैशाख दिन इतवार को मेरे पोते या मेरे बेटे की शादी तय हुई है, बुहार (बुधवार) के दिन शाम 3 बजे हमारे घर में शुभ कार्य का श्री गणेश है आपने धान कूटने आना है. सामने वाली औरत भी एकदम बिना कोई बहाना बनाए आगमन के लिए तैयार हो जाया करती थीं और साथ में शुभकामनाएं (शगुन आखर) देती थीं. उस शुभ घड़ी के दिन घर में सुबह-सुबह पंडितजी द्वारा मां भगवती का पाठ, फिर शाम होते ही दादी, मां का पीठिया की थाली तैयार हो जाती थी. जैसे-जैसे बुलाई गई महिलाओं का आगमन आंगन में होता दादी, मां या कोई अन्य महिला बारी-बारी से उन सबको तिलक और अक्षत (चावल) लगना शुरू कर देती थीं. साथ में उन्हें कुछ दक्षिणा भी दी जाती थी. दो महिलाओं द्वारा मंगलगान (मांगव) की शुरुआत हो जाती थी.

दैणा हौया खोली का गणेशा हे…
दैणा हौया मोरी का नारेणा हे…
दैणा हौया भूमि का भूमिया हे…
दैणा हौया पंचनामा देवा हे…

फिर कुछ महिलाएं सूप से धान निकालकर ओखली को भरती तो कुछ महिलाएं बारी-बारी से (दो तीन एक साथ) ओखली (उखव) में धान कूटने की शुरुआत करती थीं. दूर-दूर तक ओखली में धान कूटने की धमक सुनाई पड़ती थी. धान कूटने वाली महिलाओं में एक दूसरे को थकाने, हराने की भी होड़ लगी रहती थी. कोई हाथ से धान समेट रहा तो कोई कूटे हुए धानों को सूप से साफ (उछीट) कर रहा है. बीच-बीच में हंसी ठिठोली हो रही है, उधर मंगल गान गाकर मंगलेरूओं द्वारा समस्त देवी देवताओं को आव्हान भेजा जा रहा है साथ में अपने ईष्ट पितरों को शगुन आखर से बुलाया जा रहा है, कि हमारे ईष्ट परमेश्वरो आओ और हमारे इस शुभ कार्य को निर्विघ्नता पूर्वक पूर्ण करो. साथ में मंगल्यारों द्वारा मंगीलगीत के माध्यम से मित्रगणों को निमंत्रण भेजा जाता है. मित्रगण जैसे दूल्हे के नाना-नानी, मामा-मामी और अन्य मित्र.

कहीं कहीं यह मंगल गीत इस प्रकार सुनने को मिलता है. जो ज्यादा प्रचलित है.

सुआ रे सुआ बणखंडी सुवा जा सुआ नगरी में न्यूत दि आ

सुआ (तोता पक्षी) को शिव पार्वती का स्वरूप मानकर यह समृद्ध मंगल गीत लोक परम्परा का हिस्सा है. जो महिलाओं द्वारा समूह में गाया जाता है. कुमाऊँ के अलावा भी अन्य संस्कृति में यह पारंपरिक गीत के तौर पर इस मंगल गीत को अपनी-अपनी भाषा के माध्यम से गाया जाता है.

इस प्रकार शादी-ब्याह में धान कूटने के दिन से ही शुभ कार्य के श्री गणेश की परम्परा शुरू हो जाती थीं. धान से निकले चावल को नाली से मापा जाता है. जितने लोग वहां होंगे उसी हिसाब से रस्यारे चावल मंगाते. बारात जाने के दिन सुबह सभी लोगों को दाल भात खिलाया जाता था. गांव के नजदीक बड़े खेत में दो चूल्हे तैयार किए जाते थे. दो रस्यारे (अधिकतर वे लोग ब्राह्मण होते थे) दाल भात बनाते थे. बड़े-बड़े तांबे के दो तौल होते थे. एक तौल में दाल और एक में भात बनता था. दाल भात बनाने वाले रस्यारों के भी अपने नियम होते हैं. बदन पर सिर्फ बंडी और अंगोछा के अलावा भात बनाते समय वे अन्य वस्त्र धारण नहीं करते थे और न ही पांव में चप्पल, जूते पहनते थे. भात के आधा पक जाने पर रस्यारे चूल्हे से कुछ दूरी पर एक निश्चित गोला (लक्ष्मण रेखा) बना देते थे. उस गोले के अन्दर किसी को भी आने की अनुमति नहीं होती थी. जो गलती से आ जाए तो आग से जली लकड़ी फैंक मारते थे या डरा देते थे. क्योंकि भात को कच्चा राशन कहते थे, अगर उसे कोई अन्य व्यक्ति छू ले तो उस भात को अशुद्ध करार दिया जाता था. पारम्परिक दाल-भात बनाने का तरीका

भात को कच्चा राशन और रोटी-सब्जी को पक्का राशन नाम दिया होता था. कच्चा राशन बनाने वाले अधिकतर ब्राह्मण ही होते थे और पक्का राशन ब्राह्मण और राजपूत कोई भी बना सकता था. उसमें कोई भेद नहीं होता था. दाल भात बनने के बाद भात खाने वालों को धात (आवाज) लगाई जाती थी “आओ आपत, मित्र, भात बनि गो भात खहुण खाओ.”  दूसरी ओर यानी रात के समय जब दुल्हन के वहां बारात पहुंचने के बाद खाना(दाल भात) बनता था तो ये रस्यारे आवाज लगाते “आओ आपत, मित्र, बाराती, घराती भात खहुण खाओ भात बनि गो”. जिसके घर में शुभ कार्य होता उस घर का सयाना व्यक्ति पिठिया की थाली लाता, दोनों रस्यारो को पिठियाँ लगाता या उन्हें खुद लगाने को देता, साथ में कुछ मुद्रा मुठ्ठी में बन्द कर दक्षिणा के रूप में देता. कई जगह इस मुद्रा को तौल कटाई भी कहते हैं (भात को बड़े चम्मच से पहली बार बांटने के लिए काटना). फिर रस्यारे गरम-गरम भात को एक बड़ी परात में रखते और गोलाकार आकार में बैठे लोगों को अपने हाथों से भात वितरित करते थे. एक रस्यारा दाल को बड़ी बाल्टी से बांटते थे. सबसे पहले आपत, मित्र और साथ में बड़े बुजुर्ग लोग खाना खाते थे, फिर अगली बार सब लोग एक साथ गोलाकार आकार में बैठकर दाल भात खाते थे.

थाली की जगह कनार (साल) के पत्ते व तिमले (अंजीर के पेड़ के पत्ते) के तीन चार पत्तों को बारीक घास के तिनके (सिणुक) से छेदकर पत्तल बनाकर उसमें दाल भात को परोसा जाता था. आराम से जमीन पर बैठकर दाल भात को हाथ से खाने का असीम आनंद आ जाता था. सिर्फ दूल्हे के दाल भात खाने के लिए कांसे की थाली आती थी जिसे ससुराल पक्ष से दूल्हे की सालियां लेकर आती थीं सालियों का पूरा का पूरा समूह वहां आ जाता था और खेत के एक कोने में बैठकर वे मंगलगीत गाते थे कभी-कभी बनडे गाकर दूल्हे और उसके साथीयों को चिढ़ाते थे.

जैसे गोल टमाटर लाल वैसे बरना (वरनारायण) जी के गाल
जैसे जंगल में हो हाथी वैसे बरना जी के साथी”
जैसे इंडिया का गेट वैसा बरना जी का पेट

मूल रूप से सल्ट, अल्मोड़ा के रहने वाले आनन्द ध्यानी वर्तमान में दिल्ली में रहते हैं. आनन्द ध्यानी से उनकी ईमेल आईडी anandbdhyani.author@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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Sudhir Kumar

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