एक रोटी, तीन मुसाफ़िर : लोभ से सीख तक की लोक कथा

पुराने समय की बात है. हिमालय की तराइयों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाने वाले एक लंबे पैदल मार्ग पर तीन मुसाफ़िर सफ़र कर रहे थे. तीनों अलग-अलग जगहों से आए थे, लेकिन मंज़िल कुछ समय के लिए एक ही थी. पहला मुसाफ़िर पढ़ा-लिखा था, बातें बड़ी समझदारी की करता. दूसरा मेहनती था, कम बोलता लेकिन काम में तेज़. तीसरा थोड़ा चालाक था, हर काम में अपना फ़ायदा पहले देखता.

दिन ढलने लगा. पहाड़ों में शाम जल्दी उतर आती है. रास्ता कठिन था, आस-पास कोई ढाबा या गाँव नहीं दिख रहा था. तीनों थक चुके थे और भूख भी ज़ोरों पर थी. थोड़ी देर बाद वे एक पेड़ के नीचे रुके. तभी तीसरे मुसाफ़िर ने झोले से एक रोटी निकाली और बोला, “मेरे पास बस यही एक रोटी है. अब बताओ, इसे कैसे बाँटा जाए?”

पहले मुसाफ़िर ने कहा, “हम तीनों बराबर हैं. रोटी को तीन बराबर हिस्सों में बाँट लेते हैं.”

दूसरे ने सिर हिलाया, “हाँ, यही ठीक रहेगा.”

लेकिन तीसरा मुसाफ़िर मुस्कराया. उसकी आँखों में चालाकी चमक रही थी. वह बोला, “नहीं-नहीं, बराबरी से बाँटना ठीक नहीं. बेहतर होगा कि हम इसे बुद्धि से बाँटें.”

दोनों ने हैरानी से उसकी ओर देखा. तीसरा बोला, “चलो ऐसा करते हैं—हम तीनों बारी-बारी से रोटी को देखेंगे और जो सबसे अच्छा कारण बताएगा, उसे सबसे बड़ा हिस्सा मिलेगा.”

पहले मुसाफ़िर ने कहा, “मैंने रास्ते भर तुम्हें सही दिशा बताई, इसलिए मुझे बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए.”

दूसरे ने कहा, “मैंने कठिन चढ़ाइयों में तुम्हारा सामान उठाने में मदद की, इसलिए मेरा हक़ ज़्यादा है.”

अब तीसरे की बारी आई. वह बोला, “तुम दोनों सही कह रहे हो, लेकिन रोटी मेरी है. अगर मैं इसे न निकालता, तो आज हम तीनों भूखे ही सोते.”

यह कहकर उसने रोटी तोड़ी—एक बड़ा टुकड़ा अपने लिए रख लिया और दो छोटे-छोटे टुकड़े बाकी दोनों को दे दिए. पहले और दूसरे मुसाफ़िर समझ गए कि वे चाल में फँस चुके हैं. लेकिन भूख इतनी थी कि कुछ कह नहीं पाए.

रात बीती. अगली सुबह जब वे आगे बढ़े, रास्ते में एक पहाड़ी नदी आई. पानी तेज़ था. पुल नहीं था. तभी तीसरे मुसाफ़िर का पाँव फिसला और वह गिरते-गिरते बचा. दूसरे मुसाफ़िर ने हाथ बढ़ाया और उसे खींच लिया. पहला मुसाफ़िर बोला, “सफ़र में साथ चलने का मतलब सिर्फ़ साथ खाना नहीं, बल्कि ज़रूरत में साथ निभाना भी होता है.”

तीसरे मुसाफ़िर का सिर झुक गया. उसे अपनी गलती समझ आ गई. कुछ दूर जाकर उसने अपना झोला खोला, जिसमें सूखे फल और भोजन था. उसने सब सामने रख दिया और बोला, “कल मैंने जो किया, वह गलत था. आज यह सब हम तीनों बराबर बाँटेंगे.”

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