फोटो : Avo Gharibian की पेंटिंग
बहस बहुत देर से चल रही थी. कोई किसी निर्णय तक नहीं पहुँच पा रहा था. प्रश्न ऐसा था जिससे पूरे मोहल्ले का भविष्य तय होना था. चर्चा वहाँ पहुँच चुकी थी जहाँ से आगे एक बंद गली थी. मोहल्ले के आधे परिवार एक तरफ थे,आधे दूसरी तरफ़. तय किया गया कि प्रश्न पर मतविभाजन करवा लिया जाय, जिससे वास्तविक निर्णय तक पहुँचा जा सके.
तभी भोगीलाल जी चीखे-‘ठहरो! मुझे कुछ समय दिया जाय.’
‘क्या मोहल्ला कमेटी के सदस्यों की ख़रीद-फ़रोख़्त करनी है?’ शर्मा जी विरोध में चीखे.
‘नहीं, मैं कोई ग़ैरक़ानूनी काम नहीं करूँगा! मोहल्ला कमेटी के मेम्बरान से मिलूँगा भी नहीं. और वैसे भी वो सब यहीँ मौजूद हैं. मुझे बस आधा घण्टा दीजिये.’
मोहल्ला समिति के सदस्यों ने यह विचार कर के कि शायद कोई मध्य मार्ग निकल आये ,भोगीलाल को आधा घण्टा दे दिया.
आधे घण्टे बाद भोगीलाल जी लौटे तो उनकी मोटरसाइकिल के पीछे दो ऑटोरिक्शा में दस किन्नर बैठे थे,जो अपने साथ ढोलक-मजीरे लाये थे.
ऑटोरिक्शा से उतरते ही उन्होंने तालीयाँ बजा-बजा कर ज़ोर से गाना शुरू कर दिया- ‘आय-हाय नल्ला यहीँ खुदेगा, आय-हाय नल्ला यहीँ खुदेगा.’ भोगीलाल के इशारे पर नाला खुदवाने का समर्थक समूह भी अपनी सामूहिक तोंद हिला-हिला कर किन्नरों के साथ चिल्लाने लगा- :आय-हाय नल्ला यहीं खुदेगा,आय-हाय नल्ला यहीं खुदेगा.
मैं भी वहीं था. मैंने भोगी से पूछा ,’ये क्या नौटंकी है, ये क्या हो रहा है?’
वे बोले ,’प्रिय कृपया आप शांत रहें! प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो रहा है.’ फिर भोगीलाल ने घोषणा की, ‘साथियों ,अंकिल-आंटियों ,अब आप लोग घर जाएं! नाला खुदवाने का प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित किया जाता है. अब नाला यहीं खुदेगा.’
कुछ लोगों ने आपत्ति की कि ये तरीका गलत है. ये गुंडागर्दी है. लोकतंत्र में इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती. क़ायदे से मत डलवाये जाएं. इस बात पर किन्नर और ज़ोर से चिल्लाने लगे और उनके साथ नाला समर्थक भी. तालियों का शोर बढ़ने लगा. नाला समर्थक हावी थे. धीरे-धीरे शरीफ़ लोग वहाँ से खिसकने लगे. प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो गया.
शाम को मैं भोगी के घर पर बैठा था तभी मोहल्ले के पार्षद जी आ पहुँचे और बोले ,’ भोगीभाई कल्ल हमाई नगर निगम की मीटिंग है. आप अपनी टीम के संग आय सकत हो का? नैक से ध्वनि मत की जरुअत हती. जो लगैगो ,देख लैंगे. बस ध्वनि मत कर्रो होये. कोई ससुर चूँ नाय कर पाय.’
‘आप चिंता मत करिये पार्षद जी,’ भोगिभाई चालू हुए,’ एकदम बेहतरीन ध्वनि मत लाऊँगा आपकी मीटिंग में. अगर आप थोड़ा और व्यवस्था कर दें तो हमारे पास एक से एक रॉक बैंड, ढोल-ताशे वाले, तुरही वाले हैं. ध्वनि मत अपना ही भारी पड़ेगा.’
‘व्यवस्था की चिंता मती करौ, बस काम पक्कौ होय!’ पार्षद जी ने कुछ चिंतित होकर कहा. फिर वे भोगी भाई के निकट आकर धीरे से बोले, ‘दरअसल रट्टा जे है कि सड़क कौ ठेका है गयो, अपऐं आदमी को मिलहू गयो. बर्कोडर निकाद्दये. पर कौंसिल से पास नाहीं भओ, सो मामला अटकौ है. कहूँ प्रस्ताव गिर गओ, तो अपईं भौत भद्द पिट जाएगी.’ फिर वे भोगीलाल के थोड़ा और निकट आये- ‘का है कि हमने ठेकेदार कौं एडवांस पेमेंट करवाय दओ और अपनो एडवांस पेमेंट ठेकेदार सैं लैउ लओ.’
‘आप निश्चिंत रहें पार्षद जी!’ भोगी भाई ने सोफ़े पर पसरते हुए कहा,’लोकतंत्र में सबसे बड़ा मत ध्वनि मत है. ध्वनि ही तो साक्षात ब्रह्म है. ध्वनि का अपने देश में बहुत सम्मान है. इसके आगे सब नतमस्तक हैं. क्या बुद्धि, क्या संख्या?’
‘अगर कहूँ बोटिंग है गई तौ मज्जाऐंगे?’ पार्षद जी ने शंका जाहिर की.
‘पार्षद जी अपने लिये सबसे पवित्र पुस्तकें कौन सी हैं?’ भोगी ने अचानक ही पूछ लिया.
‘कछु समझे नाहीं हम?’ पार्षद जी के लिये सवाल ‘आउट ऑफ सिलेबस’ था.
‘मतलब किस पुस्तक को आप सबसे ऊँचा दर्जा देते हैं?’
‘अपयें बेदन कौं,’ पार्षद जी ने गर्व से कहा.
‘आप जानते हैं दर्शनशास्त्र के हिसाब से वेद कौन से प्रमाण हैं? नहीं जानते होंगे. मैं बताता हूँ- वेद शब्द प्रमाण हैं.’
‘तुम फिर मेरे पढ़ाये दर्शन शास्त्र का मज़ाक बनाने लगे?’ मैंने टोका.
‘मज़ाक? प्रिय आपको तो मेरी पीठ ठोंकनी चाहिये. मैं ऐसा पहला व्यक्ति हूँ जो दर्शन शास्त्र का कुछ व्यवहारिक प्रयोग कर रहा है.’
‘व्यवहारिक नहीं,अव्यवहारिक.’
‘ठीक है, अब आपकी पढ़ाई हिंदी का प्रयोग करूँगा.’
भोगी की इस बात से मुझे भी कौतुहल हो उठा. पार्षद जी की बेचैनी पहले से ही बढ़ी हुई थी.
‘तो पार्षद जी सबसे बड़ा प्रमाण है शब्द. अब पूछो शब्द की इकाई क्या है? शब्द की इकाई है वर्ण. अब पूछो वर्ण किससे बना है? वर्ण बना है ध्वनि से. तो सब किस पर निर्भर है?’
‘ध्वनि पर’ पार्षद जी तपाक से बोले.
‘तो सबसे बड़ा मत कौन सा है?’
‘ध्वनि मत,’ पार्षद जी उछल गये,’ बा भोगी भैया बा! का बात कही, का बात कही.
‘शब्द को शब्द प्रमाण से मत जोड़ो! आप्त व्यक्ति का वचन ही शब्द प्रमाण है, अन्य का नहीं.’ मैंने आपत्ति ली.
‘तो आप्त व्यक्ति कौन है प्रिय?’
‘आ ss..’ मैं सोचने लगा.
‘प्रियोस्की ऋषि ने बहुमत मीमांसा में इसका विस्तार से वर्णन किया है. उनका कहना है कि राजतंत्र में आप्त व्यक्ति राजा है. और लोकतंत्र में आप्त व्यक्ति वह है जिसके हाथ में लट्ठ है ,जिसकी ध्वनि सबसे ऊँची है. उसका वचन ही प्रमाण है ,वही बहुमत धारण करता है.’
‘वाह! दर्शनशास्त्र की आँखे फोड़ना कोई तुमसे सीखे.’ मैने तंज किया. ‘तुम्हारी व्याख्या से अरविंद का अति मानस वो होगा जो सबसे ज़्यादा चिल्ला-चोट कर सकता हो. और राजनीति के क्षेत्र में वही देश का नेतृत्व करेगा. हैं ना?
‘करेगा? आप देखियेगा प्रिय वह समय आयेगा जब राजनीतिक दल, टिकट वितरण करते समय मुकदमों की संख्या के साथ-साथ प्रत्याशी की ध्वनि मचाने की क्षमता पर भी विचार किया करेंगे.’
‘ध्वनि ‘मचाना’?’
‘जी प्रिय, ध्वनि मचाना!’
‘अरे पक्की समझें कि नाहिं?’ पार्षद जी ने हमारी चर्चा में हस्तक्षेप किया.
‘पक्की,पक्की पार्षद जी. शाम को घरै आत आपके.’ भोगी भाई ने वचन दे दिया.
पार्षद जी के जाते ही मैं भोगी पर बरस पड़ा ,’ तुम्हारा दिमाग़ ख़राब है? अगर तुम भूल गए हो तो मैं तुम्हें याद करा दूँ कि तुम एक प्राइवेट नौकरी कर रहे एमआर हो ,जो लोकसेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है. ये किस चक्कर में फँस रहे हो?’
‘आप चिंता मत करिये प्रिय! आउटसोर्सिंग का ज़माना है.’
भोगीलाल से मिलकर मैं घर आ गया. अगले दिन अख़बार की हैडिंग थी – नगर निगम की मीटिंग में अभूतपूर्व हंगामा. जम कर मार-पीट. कट्टे और हथगोले चले. प्रस्ताव ध्वनि मत से पास.
प्रिय अभिषेक
मूलतः ग्वालियर से वास्ता रखने वाले प्रिय अभिषेक सोशल मीडिया पर अपने चुटीले लेखों और सुन्दर भाषा के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में भोपाल में कार्यरत हैं.
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