ग से गरुड़ गंगा के गंग लौड़ों की रेडियोधर्मिता से अभिसिक्त व गो से गोमूत्र की सरल आणविक शक्तियों द्वारा सिंचित रहस्यमयी टुटकों के  चुटकों को उधेड़, लोक कल्याण की पावन कामना से खुड़पेंची दिमाग में व्याप्त जंत्री का   यह परंपरागत दन बुना गया है. जिसमें उत्तराखंड में व्याप्त पूर्व पश्छिम व  दक्षिण पंछियों के श्रीमुखों से निसृत वचनों के भेद सूत्र रूप में छुपे हैं. सरलता के लिए इन्हें विस्तृत टीका सहित लिखा गया है. ऐसे टोंड टुटके जिनका अपर्ण  ग्रीन बोनस से तृप्त पहाड़ द्वारा मैदान की ओर निःशुल्क किया जा रहा है. मंत्री मुखों से निसृत  ऐसे सत्य वचनों के वायरल होते व भारी लाइक व शेयर अर्जन की सफलता से प्रेरित गूगल ने अपनी विज्ञापन सेवाएं अर्पित करने हेतु अलीबाबा व टिक टॉक तक को अनुबंधित कर लिया है.

झस्स होती ही ऐसी है,  कि आंख जरा वक्र हुई कि सब किया धरा चौपट. इसी झसक से सहमे डरे चंद्रयान भेजने वाले टेक्नोक्रेट भी माथे पर कोई भी आड़ी, कोई लाल खड़ी व कोई सिंदूरी गोल टिकुली धारण कर चंद्र देव का नमन पारायण करते हैं. ई बराबर एमसी स्क्वायर वाला आइंस्टीन भी अपनी लेबोरेटरी में जाने से पहले मम्मी के दिए लॉकेट को तीन बार चूमता था. तो अमेरिका का वह झनकिया ट्रंप तो सुना बल, भोट प्रदेश की कीड़ाजड़ी को स्काच से भरे गिलास में डुबा तब तक प्रतीक्षा करता है,  जब तक स्कौच का रंग मुतैन न हो जाए. फिर इसका पान कर आई उर्जा से ईरान व चीन के अगेनस्ट डिसीजन लेता है. अपने देश के 70 पार कर चुके महानायक को ही देख लीजिये, हर नई फिल्म साइन करने से पहले वह बटवे में पड़ी रेखा को निहार, तरंगित हो जाते हैं. और फिर अपने से तिहाई तापसी से बदला लेने को बेताब दिखते हैं.

 प्राचीन काल में एक श्वेत टोपीधारी बड़े कान वाले वित्त मंत्री ने स्वमूत्र की रसतरंगिणी से पीएम की चेयर का सुख भोगा और अपनी मंत्री परिषद में कई धात रोगियों की ग्रंथियों से पुनः आसवन भी आरंभ करवा दिया. वही कपाल पर हल की फाल छुआ हुक्का गुड़गुड़ा और पान चबा के टोटके से कई खेतिहर पशुचारक  भी श्री समृद्धि का प्रसाद पा गए साथ साथ अपने सूबे का नाम भी रोशन कर गये.

अब यहां वहां का माल अपने नाम से बेच फिर  मंदी के उल्टासन से ग्रस्त बाबा रामदेव एलोवेला के जूस गटक विदेश जा घुटनों की कटोरी बदलवा लाए. सब प्राचीन गुप्त ज्ञान का प्रताप है. अब अति कर दो, नियंत्रणहीन कर दिया अपना, तो गच्चा खा गया चीताराम गप्पू. अस्सी की उमर में बानरी बूटी की ओवरडोज, वह भी पंचकों में जापानी कैप्सूल के साथ गटक खुद के साथ लौंडे को भी सब हुनर सिखा  गया. अब काल कोठरी में साथ में पांच और बाबा भी नपा गया. भूल गया कि गए लोक विधाओं में भी शेड्यूल एच और एल की सीमा रेखा है. इसलिए ध्यान रहे कि आगे वर्णित संहिता में आहार- विहार, यम- नियम उप नियम का अनुपालन तो  करना ही होगा. अन्यथा हिटलर जैसा हाल होगा जो हैप्पी मैरिज के बाद गेस्टापो में हनीमून मनाने की सोच रहा था. पर आपाधापी में अपना फेवरेट उल्टा स्वास्तिक चूमना भूल गया. पिस्तौल की गोली खोपड़ी में ठनका गया. 

 सार संक्षेप यह कि जितने भी ब्रह्म सूत्र गरुड़ गंगा गोमूत्र रत्नावली में वर्णित है उनका पूर्ण विधि-विधान से अनुपालन हो. अघोरियों की सी साधना के बाद ही इनका रहस्य  भेदन होता है. फेसबुक ट्विटर सा डालते ही लाइक नहीं मिलता. सचिवालय की टीपों से सजी इनकी फाइल धीमी गति  से अखिल चेतन अवचेतन में घूमकर ही सिद्धिदायिनी बनती है. अतः इन सूत्रों के प्रयोग की पूरी जिम्मेदारी प्रयोग कर्ता की ही होती है. इनका कॉपीराइट फ्री है.बस प्रयोग में स्मार्टफोन में टकटकी लगा खुट्ट-पुट्ट करने जैसी निष्ठा अपेक्षित है. पहले ही बता दें कि यदि आप जनेऊधारी हैं पर लाल सलाम कहते हैं, कितनी डिग्री बटोर  ज्ञान की मां बहन करने वाले बकाडुभाड़ हैं.मीन मेख करने वाले काक दृष्टि युक्त या लोमड़ बुद्धि वाले हैं. या फिर अपनी घरवाली की आतंक से त्रस्त कल्लूमल कोयले वाले की श्रेणी में आते हैं, तो इन सूत्र समीकरण प्रवाहिका के विपरीत प्रभावों से बचने के लिए पहाड़ी सिंसूण को नौ  बार अपने पार्श्व पर झपकवा लें. इससे आप लोकथात की विशिष्टताओं के अवमूल्यन जैसे अपयश के भागी न बनेंगे.

 अब आपकी शंका यह है कि, यदि गरुड़ गंगा का पत्थर ना मिले या  जाड़ गंगा का अतल गहराई में भी आपको कोई ढुंग ही ना मिले तो? चिंतित होने, धुनन मुनई टेकने की जरूरत नहीं. तू नहीं और सही जैसे कई विकल्प हैं. जो मनीषियों की  कंदराओं, ऋषियों की खोह और सनकियों-झटकियों  के आश्रम में सुरक्षित है. पहले भी बताया जा चुका है कि इनका कॉपीराइट यूनिवर्सल  फ्री है. फॉर्मूला हम देंगे,  सिद्ध आपको करना है-की तर्ज पर. तभी इस गुह्य गणित का इति शुभम होगा. इसी प्रयोजन से  ऑल्ट -बालाजी  सीरीज जैसे नवरंगों को सोलह संस्कारों से युक्त कर शरीर और आत्मा की उन्नति के सूत्र दिए जा रहे हैं.आप इतना तो जानते ही होंगे कि शरीर का प्रारंभ गर्भाधान संस्कार से होता है जिसके अभिनव प्रयोगों में सारी क़ायनात मुरब्बे सा मीठा बस चाटे  जाती है. Tanav-दबाव के बाद कसाव के अगले क्रम में पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जात कर्म आते हैं. सुरक्षित प्रसव के प्रकरण के अगले  क्रम में जच्चा बच्चा कष्ट, परिवार परिसीमन, प्रसूता की बल वृद्धि के  शास्त्रीय योग होंगे. जिनके आधार पर नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ से पुनः विवाह संस्कार के गुणसूत्र खुल सकें. अंततः वानप्रस्थ व सन्यास की अवस्था में लुस्त पुस्त पड़ गई इंद्रियों को अंत्येष्टि से बचाने के फार्मूले दिए जा रहे हैं. इनसे हट लुकाछिपी के प्रकरण भी संपुटित होंगे. समस्त उपायों में आसपास प्राप्त वनस्पतियों कीट पतंगे चिड़िया जानवर ( सामिष व निरामिष ) के साथ जड़-कंजड़, सबका अनुपान भेद से सम्मिश्रण होता है. इन अनुभूत प्रयोग व रहस्यों से परिचित मानव, डॉक्टरों के शोषण,  इंश्योरेंस के जंजाल व अस्पतालों के नागपाश से मुक्त रहता है.

प्रकरण की शुरुआत जचगी  से हुई  थी. जहां गरुड़ गंगा के गंगलोड़े को घिसकर लेपित करने से सुरक्षित प्रसव की गारंटी थी. यदि यह चमत्कारी पत्थर न मिले तो?  अब यह तो वह विलक्षण व क्रिटिकल समय है जब प्रकृति स्वरूपी जननी अपनी कोख से  सृजन के पल्लवित बीज को पूर्ण आकार देने कि प्रक्रिया में उसे  शिशु के रूप में प्रस्तुत कर, आह्लाद का अनुभव करती है. पर क्या करें? न तो पति ने पहले गर्भपाल रस खिलाया, न सोमधृत. शिवलिंगी के बीज उसे मिले नहीं. पुत्रमातृका बटी पर  एक्टिविस्टों ने बैन लगा दिया. ऊपर से खानपान ऐसा कि अमिया- इमली व विकृत मैगी  की चटर -पटर सुसाट भुभाट से पीड़ित  रहती है अबला. दूसरी ओर एफ्लुएंट  सोसाइटी की संपन्न जच्चाओं में जोमेटो की  अनवरत होम डिलीवरी से छटपटाट- फड़फड़ाट कोमल कोमलांगियों को बेचैन किये देता है. अतः इन कष्टकारी दशाओं के निवारण के लिए :

 घोड़े के खुर, सग्गड़ की आग में बांज व फल्यांट की लकड़ी के साथ जलाएं. बीच-बीच में चीड़ के छिलुके डालते रहें. गोठ में जब धुरमान पट्ट हो जाए तो प्रसूता को लाकर लेटा दे. प्रसव पीड़ा दूर हो जाएगी.पंखा, कूलर, ऐ -सी का प्रयोग वर्जित  है.

 अगर घोड़े का खुर न मिले और धुएं से एलर्जी हो. पत्नी के आंसू आपसे देखे न जाएं और खांसना-खंखारना सहन न हो. तो सर्प की केंचुली को प्रसूता के नितम्ब प्रदेश से बांध दें. 

यदि सैणी बहुत थुलथुला गई हो, मेद अभिवृद्धि हो व प्रसव में देर लगे. पीड़ा से टिटाट पड़ रहे हों तो  गधे -खच्चर व घोड़े के अगले खुरों को सम मात्रा में लेकर,  जतकाली की एक सौ ग्यारह बार प्रदक्षिणा करें. सुरक्षित प्रसव होगा  तथा एक साथ त्रिगुणी प्रतिभा वाली  संतान प्राप्त होगी. 

जतकाली के वक्ष पर बारहसिंगे का सींग बाँधने से न तो प्रसव काल में दर्द होता है न पीड़. बस शिशु लात मारने में पारंगत होता है और कूदता-फिरता अवतरित होता है. 

अत्यंत दुर्बल, क्षीण व कृषकाय स्त्री को यदि  प्रसव में यदि अतिकष्ट हो तो उसकी काया  व नाम का संपुट स्मरण करते हुए ताड़ वृक्ष  के उत्तर वाला सिरा उखाड़ कर घर ले आएं और रक्षा धागे से लपेट कमनीय काया को कमर में बांध दें. कोई चिंता हड़बड़ाट न करें. बालक के जन्म के बाद उस धागे को कहीं गाड़-गधेरे तालाब में डाल दें. चलते समय दाएं हाथ में धागा पकड़ उस हाथ को आगे रखें और प्रवाहित करते समय  पीछे मुड़कर न देखें. पर सावधान भूलकर भी धागा पड़ोसी की नाली या लेट्रिन पिट में न डालें. 

बरसात के समय यहां-वहां मडराते सांप दिख ही जाने वाले ठहरे. थोड़ा पुरुषार्थ कर अच्छे से सांप का दांत उखाड़ लें. सर्पिणी का दांत मिल जाये तो डबल असर होगा. अब इस सर्पदंत को ताबीज में डाल फिर प्रसूता के गले में चरयो की माला के साथ ही पहना दें.  सर्प जैसी गति व चपलता लिए बालक जग में प्रवेश करेगा. यह तो आप जानते ही हैं कि सर्प का शत्रु है गिद्ध. अगर सर्प दंत की प्राप्ति में बाधा हो तो गिद्ध का पंख स्त्री के तलवों में बांध दें. प्रयोजन सिद्ध होगा.

परम ग्यानी परमेश्वरी लाला बताते हैं कि ज्यादा कुछ नहीं करना. अमावस की रात काले कागज में सफ़ेद रंग से चक्रव्यूह लिख दें. सफ़ेद चाक को पानी से गीला कर भी लिख सकते हैं. चावल के बिश्वार को रिंगाल की कलम में रुई से बांध के भी लिख सकते हैं. लिखी हुई ब्लैक एंड व्हाईट टोन जब पूरी तरह सूख जाए तो जतकाल में तड़प रही पत्नी की आंखों के सामने ‘चक्रव्यूह’ लिखे इस कागज को किसी दीवार में गूंद, फेविकोल या आटे से चिपका दें. बस समझो काम हो गया. 

 कई निकम्मे पतियों का पुरुषार्थ बस एक ही जगह सिमटा होता है. सामग्री, उपाय व अभीष्ट प्राप्ति के प्रयासों के प्रति वह संवेदनहीन सुप्त ही बने रहते हैं. ऐेसों के लिए भुजान वाले लोकमणि पंडितजू ने अचूक शब्द गर्जन का विकल्प दिया है. कराह रही पत्नी के आगे पूरी ध्वनि से तीन शब्दों को चिल्लाकर कहें. पहले नाभी से जोर लगा कर  कहें ‘इंदूsss.’ फिर फेफड़ों के जोर पर बोलौ ‘माया sss’और फिर गले व ओठों से उच्चारित करें ‘ममता sss ‘.बस शिशु अवतरण संपन्न. शहर की टीमटाम वाली प्रसूताओं के लिए सोनाक्षीs,  कैटरीssना व कंsssगना का उच्चारण करें.

कभी-कभी गर्भ थैली प्रसव से पूर्व ही रिसने -चूने लगती है. इस लीकेज को रोकने का उपाय जीवंती ताई लमगड़ा वाली (सेवानिवृत्त एएनएम )बताती है. ताजा शरपानी की जड़ को जत्काली के केशों की जटा बना उसके भीतर रख दें. इसकी तरंगों से कष्ट रहित प्रसव होगा. विकल्प रूप में पाषाण भेद या सिलफोड़े के बैगनी फूल और जड़ भी प्रयोग किया जा सकती हैं.

ये थीं प्रसूतावस्था  की सिद्ध लोकचिकित्सा. अब चिंता-कष्ट-बैचेनी के निवारण हेतु समर्पित उन लोक रहस्यों का बिंदुवार पारायण करें, जो अगली अवस्था में अभीष्ट है. जैसे शिशु जन्म तो सुखपूर्वक हो गया. पर वो है बड़ा कुकाटी-टिटाटी . तमाम हगभरीने, पोतड़े बदलने, आटे की लोई लाल तेल की मालिश, आमा दादी की थपकी लोरी के बाद भी टिराट पाड़ना बंद न हो, तो बकरी की मुठ्ठी भर मैंगनी उसके झूले के सिरहाने या बिछौने में राई के तकिये के नीचे दबा दें. वायुशुद्धि की प्रतीक्षा करें. खित्त से मुस्काएगा शिशु ! 

( जारी )

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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Girish Lohani

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  • वाह बहुत खूब। मंत्री वैद्य की औषध का यह मृगेषी अचूक टोटका है। काश, मंत्री जी इसे पढ़ पाते!

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