हिमालय केवल भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह जैव-विविधता और पारंपरिक ज्ञान की एक समृद्ध प्रणाली का प्रतिनिधित्व करता है. इस क्षेत्र में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पतियाँ सदियों से स्थानीय समुदायों के जीवन, स्वास्थ्य और आजीविका का आधार रही हैं. हाल के वर्षों में यारसागुंबा (Ophiocordyceps sinensis) के अत्यधिक प्रचार और व्यावसायीकरण के कारण अन्य महत्त्वपूर्ण हिमालयी औषधीय पौधे शोध और जनचर्चा से लगभग बाहर हो गए हैं. इन्हीं उपेक्षित किंतु अत्यंत मूल्यवान वनस्पतियों में से एक है सालम पंजा.
सालम पंजा, जिसे वैज्ञानिक रूप से Dactylorhiza hatagirea कहा जाता है, हिमालयी क्षेत्र की एक दुर्लभ और संरक्षित औषधीय प्रजाति है. यह लेख सालम पंजा के वनस्पति-विज्ञान, पारंपरिक उपयोग, लोकज्ञान, आर्थिक महत्व तथा संरक्षण की आवश्यकता का विश्लेषण प्रस्तुत करता है.
यह पौधा ऑर्किड कुल से संबंधित है, जो स्वयं में जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण कुल माना जाता है.
सालम पंजा मुख्यतः पश्चिमी और मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है. इसका प्राकृतिक वितरण निम्न क्षेत्रों में दर्ज किया गया है:
यह पौधा सामान्यतः 2,800 से 4,500 मीटर की ऊँचाई पर, ठंडी जलवायु, नम मिट्टी और आंशिक छायादार परिस्थितियों में विकसित होता है. अल्पाइन घास के मैदान (बुग्याल) इसका प्रमुख प्राकृतिक आवास हैं.
सालम पंजा की पहचान मुख्यतः इसकी भूमिगत जड़ (tuber) के आधार पर की जाती है.
इसी विशिष्ट संरचना के कारण इसका स्थानीय नाम “पंजा” प्रचलित हुआ. पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में किसी पौंधे या फल की, शरीर के किसी अंग से संरचनात्मक समानता को औषधीय प्रभाव से जोड़कर देखा जाता रहा है.
हिमालयी लोकज्ञान में सालम पंजा को कभी विलासिता या चमत्कारी औषधि नहीं माना गया. इसका प्रयोग मुख्यतः उन व्यक्तियों के लिए किया जाता था जो:
लोकमान्यता के अनुसार, सालम पंजा का कार्य शरीर को “जवान बनाना” नहीं, बल्कि क्षीण होती शारीरिक ऊर्जा को संतुलित करना है.
पारंपरिक हिमालयी चिकित्सा में सालम पंजा का उपयोग अत्यंत नियंत्रित मात्रा में किया जाता था.
सूखी जड़ को कूटकर दूध में उबालकर सेवन किया जाता था. यह विधि सामान्य कमजोरी और थकान के लिए प्रयुक्त होती थी.
अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में सीमित मात्रा में घी के साथ इसका उपयोग किया जाता था, जिससे शरीर में ऊष्मा बनी रहे.
अश्वगंधा, शतावरी आदि के साथ इसका उपयोग शक्ति-वर्धक योगों में किया जाता था.
वर्तमान समय में सालम पंजा एक दुर्लभ एवं संरक्षित प्रजाति बन चुकी है.
यारसागुंबा की तुलना में इसका बाज़ार कम संगठित है, किंतु मांग लगातार बनी हुई है.
अत्यधिक दोहन, आवासीय क्षरण और जलवायु परिवर्तन के कारण सालम पंजा अब संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल है. कई राज्यों में इसके संग्रह पर कानूनी नियंत्रण लागू है.
इसके संरक्षण के लिए आवश्यक है कि निम्नलिखित तरीके अपनाए जाएं:
आधुनिक शोधों में सालम पंजा को संभावित: टॉनिक, एडेप्टोजेन, शक्ति-वर्धक गुणों से जोड़ा गया है, किंतु अभी व्यापक नैदानिक अध्ययन सीमित हैं. अतः: स्व-उपयोग से बचना चाहिए, मात्रा और स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है.
सालम पंजा (Dactylorhiza hatagirea) हिमालयी औषधीय परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण धरोहर है. यह पौधा यह स्पष्ट करता है कि पारंपरिक चिकित्सा का उद्देश्य चमत्कार नहीं, बल्कि शरीर और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना है. यारसागुंबा के वैश्विक बाज़ार के बीच सालम पंजा जैसी जड़ी-बूटियाँ यह याद दिलाती हैं कि हिमालयी लोकज्ञान आज भी वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण का पात्र है.
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