प्रबल प्रयास की चाह में सिडकुल और उपजी विषमता

पिछली कड़ी  : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन

राज्य अंर्तसंरचना एवम औद्योगिक विकास कारपोरेशन अर्थात “सिडकुल” जिसकी स्थापना के जनक रहे मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी. सन 2002 में उनके नेतृत्व में स्थापित सिडकुल एक लिमिटेड कंपनी के रूप में राज्य के औद्योगिक विकास व अवसंरचना विस्तार की सोच से स्थापित किया गया. उमंग और तरंग फैलाने में माहिर तिवारी आर्थिक जगत की हलचलों को सूंघने में माहिर थे.लोक वित्त की गहरी समझ और प्रबंध व्यवस्था के जुगाड़ से भारत सरकार में वह कई आर्थिक करिश्मे कर चुके थे. गड़बड़ी बस यह थी कि प्रथक पर्वतीय राज की संकल्पना के जिस अधिमान की चाह लोगों की प्राथमिकता में थी उसका खाका उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से देहरादून तक आते आते तमाम अटक- बटक और मौकापरस्ती में धुंधलाता गया. चाहे राजधानी का मामला हो या फिर पहाड़ी राज्य की विशिष्ट प्रकृति-उसके भूगोल का, जहाँ से बहती नदियों के जल की तरह युवा भी बाहर बह रहे थे. पहले नाम पड़ा उत्तराँचल जिस पर बहस छिड़ी कि इस नाम के लिए तो हम प्रथक राज्य न मांगे थे, तो फिर उत्तराखंड नाम ही भावुकता की लड़ाई जीत गया. पहाड़ में राजधानी बनाने के पक्के वादे के साथ विधानसभा देहरादून में थापी गयी. उसी देहरादून में जो अपने बेहतरीन संस्थानों, परिवहन की सेवाओं, बढ़िया मौसम और माजरा की बासमती के साथ दर्शनीय जगह थी. बाकी पहाड़ के लिए “सूरज अस्त-पहाड़ मस्त” का कोरस उस दौर में खूब बजा.

तिवारी जी के मुख्यमंत्री बनते ही आर्थिक तंत्र की हलचलों का सुरूर चला. नेहरू की तरह वह औद्योगिकीकरण के रसिया थे पर उनके साथ कोई प्रशांत चंद्र महलनोबीस न था जो किसी बहु क्षेत्रीय प्रारूप की रचना करता. हाँ दो क्षेत्र अलग थलग पड़े ही रह गए. उत्तर प्रदेश राज्य में वैसे ही जैसे पर्वतीय विकास परिषद थी जो लखनऊ की गिनी-चुनी रेवड़ी से पहाड़ को ललचाती थी. अब लखनऊ से आये घाघ हुकमरानों और सचिवालय की जमात ने विकास का बंदर नचाया. तिवारी जी को भाया, सब उनकी सोच का नतीजा जो था. रस्सियों को ढील देना फिर खींच लेना.

देखते ही देखते उत्तराखंड में कई इंटिग्रेटेड इंडस्ट्रियल इस्टेट्स की आधार शिला यहाँ की उपजाऊ खेतिहर मैदानी धरती पर नमूदार हुईं. पंतनगर, सितारगंज, हरिद्वार, सेलाकुई, देहरादून आई टी पार्क. छोटे पैमाने से शुरू हुई. आरम्भ में उद्योग बहुत कम स्तर पर विकसित हुए, मात्र ~14163 एमएसएमई थे जिनमें 38,500 लोगों को काम मिला. तब से अब तक 79,000 से अधिक इकाईयां राज्य में विकसित हो गईं हैं.

सिडकुल से राज्य में बड़ा पूंजीगत विनियोग अंतरप्रवाह संभव हुआ. इससे निर्माण क्षेत्र राज्य के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का करीब एक तिहाई हिस्सा बन गया. सिडकुल जोन में एकीकृत इकाईयां बनी, सड़कों, विद्युत, गैस, सीवेज प्रणाली का विकास हुआ, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बेहतर हुआ. मुख्यतः हरिद्वार और उधमसिंह नगर में उद्योग गतिविधियां बढ़ी. रोजगार और विनियोग बढ़ाने का यह मॉडल धीरे धीरे पंतनगर, सितारगंज, देहरादून फार्मा सिटी, सेलाकुई में बड़ी कंपनियों को आकृष्ट करता रहा जिनमें ~₹30,000करोड़ के विनियोग प्रस्ताव मिले. उम्मीद बनी कि इनमें ~25,000 युवाओं को रोजगार का अवसर मिलेगा. प्रत्यक्ष काम मिलने के साथ विकास के लहर प्रभाव-दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे जो रिप्पल इफ़ेक्ट के नाम से जाने जाते हैं. इनके साथ सामाजिक गतिविधियों के साथ काम की संस्कृति उपजती है. रोजगार मिलने से आय बढ़ती है तो उपभोग व बचत की सीमांत प्रवृति विकसित होती है. औद्योगिक इलाकों के समीप हाउसिंग कॉलोनी, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, रोजमर्रा जरुरत के स्टोर व चाही जाने वाली सेवा केंद्र बढ़ते जाते हैं. यह विस्तार प्रभाव सुविधाऐं व सेवा प्रदाता बनता है. सिडकुल के पांचो सिरों से जुड़ने वाली सड़कों व ऊर्जा नेटवर्क ने ग्रामीण से शहरी औद्योगिक केंद्र तक बेहतर पहुँच बनानी संभव होगी.

पर अर्न्तक्षेत्रीय असंतुलन व विषमताएं अभी व्यापक हैं. मैदानी इलाके तराई भाबर खेती से समृद्ध रहे थे तो सिडकुल से द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्र का विस्तार हुआ. रहा कोरोना काल तो कई इकाईयों के उत्पादन व निर्यात में सुस्ती आई.स्थानीय युवकों की कम भर्ती व आरक्षण पालन की चुनौतियां बनी रहीं. रोजगार की आस में पहाड़ से पलायन होता रहा.पर्वतीय क्षेत्रों में सिडकुल के सीधे प्रभाव व प्रत्यक्ष प्रतिफल की न्यूनता बनी रही.उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते नारायण दत्त तिवारी ने उद्योग व रोजगार की दिशा बदलनी चाही. पहाड़ की औद्योगिक घाटियों में गतिविधियों को बढ़ावा देने का श्रेय उन्हें ही जाता है जिससे कई औद्योगिक इकाईयां व रोजगार उन्मुख परियोजनाएं यहाँ लग सकीं.

तिवारी जी ने उत्तर प्रदेश व केंद्र में आर्थिक विकास संबंधी बड़े फैसले लिए थे. वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. सड़क, उद्योग, शिक्षा व रोजगार की विकास योजनाओं को आरम्भ करवाया. वह उत्तरप्रदेश सरकार के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे. भारत के वित्त, उद्योग व पेट्रोलियम मंत्रालय में उनकी प्रभाव शाली भूमिका बनी . तदन्तर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने उद्योग व रोजगार पर महत्वपूर्ण फैसले लिए. कांग्रेस दल की कई नीतियों में मतभेद व गड़बड़झाले का सामना करते उनके कई फैसले विवाद से भरे भी रहे पर विकास की सोच और दूरदर्शिता से वह आर्थिक नीतियों में अपनी प्राथमिकता पर अडिग रहे.

1970 से 1980 के दौर में उत्तरप्रदेश के पहाड़ में फल प्रसंस्करण, दुग्ध उत्पादन, हस्तशिल्प, छोटी मशीन व टूल्स के साथ इलेक्ट्रानिक्स इकाई की स्थापना भीमताल, काठगोदाम-हल्द्वानी में स्थापित करना उनका पर्वतीय औद्योगिक प्रारूप था. वह चाहते थे कि पहाड़ में बड़े उद्योग लगाने की सीमाऐं साफ दिखाई देती हैं पर मूल्य संर्वधित इकाईयां लगनी ही चाहिये. इनकी ढुलाई और बाजार की कमियां दूर करने के लिए जरुरी कोशिश लगातार करनी होगी. 1988-89 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने नोएडा का विस्तार कर औद्योगिक शहरी हब के रूप में विकसित करने की नीति को अंतिम रूप दिया था. वहां भूमि के अधिग्रहण, अंर्तसंरचना के फैलाव व उद्योगों के आवंटन की प्रक्रिया को गतिशील करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी. उनका कहना था कि दिल्ली की भीड़ को अगर रोकना है तो दिल्ली के बाहर रोजगार देना होगा. तब कांग्रेस के उनके साथियों ने इस बात पर उनका विरोध किया कि उद्योग के नाम पर किसानों से उनकी उपजाऊ भूमि क्यों छीनी जा रही है. तिवारीजी ने साफ जवाब दिया कि खेती पेट चरती है तो उद्योग पीढ़ियाँ पालता है. आज का एनसीआर मॉडल तिवारीजी की सोच की उपज है. पेट्रोलियम मंत्री रहते उन्होंने ओएनजीसी का विस्तार किया. गैस आधारित ऊर्जा नीति को बढ़त देनी चाही जिसके लिए इसके घरेलू उत्पादन पर जोर दिया. जब तेल कीमतों पर राजनीतिक दबाव था तब उनका मत था कि ऊर्जा को अनुदान से नहीं उत्पादन बढ़ा कर सस्ता किया जा सकता है. तब आर्थिक मामलों में राजनीति से प्रभावित छूट व अनुदान की नीति हावी थी ऐसे में तिवारी की सोच कमजोर पड़ गई.

केंद्र व राज्य के बीच वित्तीय संतुलन में उनकी सोच मजबूत केंद्रीय सरकार के साथ संघीय प्रणाली का समर्थन करती थी. वित्त व उद्योग मंत्रालय में रहते उन्होंने राज्यों को अधिक लचीलापन देने का समर्थन किया. अक्सर वह कहा करते थे कि दिल्ली सब जानती है यह सोचना सबसे बड़ा भ्रम है. यही कारण रहा कि वह योजना आयोग की शक्ति सीमित करने के पक्ष में थे. इन्हीं सिद्धांतों पर टिके रहने के कारण उन्हें सहकारी संघवाद का वैचारिक पूर्वज कहा जाता है.

1975 से 1977 के इमरजेंसी के दौर में केंद्र ने राज्य सरकारों पर कठोर नियंत्रण किया. अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर उन्हें बर्खास्त करने का निर्णय भी लिया गया जो सहकारी संघवाद के विघटन का कारण बना. 1990 के दशक के पूर्वाद्ध से राज्य सरकारों के साथ परामर्श व सहयोग का दौर चला. निर्णय लेने में राज्यों की भागीदारी व टकराव के बदले सहयोग -समन्वय व सहमति से साझा लक्ष्य प्राप्ति को तिवारी जी प्राथमिकता देते रहे.  वित्त पर उनकी गहरी पकड़ थी वह अर्थशास्त्र के इस बुनियादी सिद्धांत को स्वीकार करते थे कि संसाधनों और राजस्व का असमान वितरण राजकोषीय असंतुलन का कारण बनता है. 1991 के दौर में राजीव गाँधी की हत्या के बाद उनकी महत्वकांक्षाओं पर विराम लगा. कहा गया की नैनीताल का चुनाव यदि वह न हारते तो प्रधानमंत्री भी बन सकते थे.

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद सुविधा युक्त देहरादून का चयन राजधानी के लिए किया गया. गैरसैण बनाम देहरादून बहस में उन्होने व्यावहारिक राजधानी स्थापित करने के तर्क से इसका समर्थन किया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजधानी भावनाओं से नहीं प्रशासनिक नियंत्रण से चलती है. वह पहाड़ की संवेदनशीलता से परिचित थे लेकिन आर्थिक प्रशासन-प्रबंध लिए मैदानी आधार को जरुरी समझते थे. यह निर्णय आज भी विवादित है, लीपापोती से ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण में थोपी जरूर गई. आर्थिक गति व प्रभाव उपजने के उनके तर्क जारी रहे.

तिवारी जी की आर्थिक सोच के कुछ दृढ़ सिद्धांत रहे जैसे पहले विकास हो, राजनीति बाद में होती रहेगी. केंद्र कमजोर नहीं पड़ा है लेकिन राज्यों को उनका वाजिब हक जरूर मिले क्योंकि नीति की निरंतरता राजकाज से बढ़ कर है. उद्योग पलायन की रोकथाम करेंगे, स्थानीय रोजगार बाद में देखा जाएगा. पहाड़ में भारी उद्योग संभव नहीं पर बाद में इनसे मूल्य संवर्धन प्राप्ति होगी.

उत्तराखंड का औद्योगिक पैकेज 2003-2007 असली गेम चेंजर साबित हुआ जब यहाँ का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक्साइज पर 21% की छूट दे डाली. दस साल तक आय कर रियायत व सस्ती बिजली, जमीन, बिजली, सिंगल विंडो क्लियरेंस मिली जिससे सिडकुल हरिद्वार व पंतनगर के मैदानी क्षेत्र औद्योगिक स्वरूप ले पाए. दिल्ली की एक सभा में जब अफसरों ने पहाड़ में उद्योग नहीं चलने की बात की तो उन्होंने पूछा तो क्यों मैदानी उद्योग पहाड़ की युवा श्रम शक्ति खींच लेते हैं?

नारायण दत्त तिवारी का समय देश के औद्योगिक आधार के स्थापित होने का सबल दौर था जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का विस्तार हुआ. वह केंद्र-राज्य संतुलन की सोच रखते थे पर पहाड़ केंद्रित सेवा अर्थव्यवस्था अर्थात खेती और पर्यटन को संस्थागत आधार नहीं दे पाए. उन्होंने स्थानीय उद्यमिता की बात तो की पर इसके पनप पाने की दशाओं में सुधार न कर पाए. उनके समग्र विचारों को आगे ले जाने वाले उत्तराधिकारी भी कम व कमजोर रहे हालांकि उनके बाद उत्तराखंड में भले ही सरकारें बदलती रहीं पर आर्थिक दर्शन की मूल प्रकृति वही रही.

तिवारी के समय राज्य के पास ऐसी आर्थिक लहर थी जिसने उद्योग को रोजगार व रोजगार को पलायन से जोड़ना चाहा. वह कहते थे कि पलायन रुकेगा तो गाँव बचेगा. उनकी नीति श्रृंखला उद्योग में पूंजी लगा लोगों को काम धंधा मिलने व स्थानीय आर्थिक क्रियाओं के विस्तार से सामाजिक स्थायित्व की समरसता पर केंद्रित थी. उनके बाद यह डोर कमजोर पड़ गई.उनके बाद की नीति के स्वरुप में घोषणाऐं-उदघाटन-विज्ञापन और बयानबाजी बढ़ी पर दीर्घ अवधि के आर्थिक लक्ष्य गायब हो गए.पहले उद्योग, पार्क, फैक्ट्री, आपूर्ति श्रृंखला व कौशल निर्माण की प्राथमिक बातें थीं बाद में अनुदान-स्वरोजगार व स्टार्टअप आऐ पर इनमें से कोई गुणक प्रभाव उपजा न पाया. लोग प्रशिक्षित हुए पर नौकरी न बनी. तिवारी के समय आर्थिकी उद्योग केंद्रित ढांचा लेने लगी तो उनके बाद स्कीम केंद्रित हो गई. सीमा क्षेत्र के गांव जो पलायन के चलते भुतहा बन गए उन्हें अब सरकार वाइब्रेंट विलेज बनाना चाह रही.

तिवारी काल में स्थानीय उद्योग क्लस्टर, कुटीर उद्योग व निगम सक्रिय रहे. बाद में निगम कमजोर पड़ गए व लघु व कुटीर उद्योग कागज पर रह गए बैंक ऋण लेने कठिन हो गए. नतीजा यह हुआ कि पहाड़ में उद्यम वृत्ति हमेशा दुविधा में रही. अफसर शाही और लाल फीता के घेरों ने आम साहसी को जोखिम लेने से हमेशा की तरह रोका. यह लघु व कुटीर उद्योग के अध: पतन का दौर था. उत्तराखंड में वर्ष 2000से 2024 की अवधि में 10 + मुख्यमंत्री व 15+ उद्योग नीतियाँ बनी. हर मुख्यमंत्री ने कहा कि नई नीति लाऊंगा. कोई यह नहीं स्वीकार कर पाया कि पुरानी नीति की अच्छाई को स्वीकार करूँगा. ऐसी राजनीतिक अस्थिरता से आर्थिक असंतुलन बिगड़ता रहा.

तिवारी जी विशिष्ट उद्योग, कार्य क्षेत्र व व्यवसाय से संबंधित तकनीकी-व्यवहारिक जानकारी व समझ रखते थे. विषय विशेषज्ञ होने के साथ वह दिल्ली में गहरी पैठ रखते थे और अफसरशाही से डरते भी न थे. उनके बाद तो अफसर शाही आधारित शासन चला.

तिवारी जी चाहते थे कि मैदान में भारी उद्योग लगें और पहाड़ में वैल्यू एडेड लाइट उपक्रम पर बाद की सरकारों ने मुखिया तेजी से बदलते रहे, नीति भ्रम से पीड़ित रहे और केंद्र की तर्ज पर ऊँचे पहाड़ों तक पर्यटन पहुंचा देना इष्ट हो गया. अब पर्यटन कुछ हिस्से के लिए आस्था आयोजन था जो चार धाम और ब्रिटिश कालीन विरासत केंद्रों तक सिमट गया. पर्यटन का राजनीतिकरण हो गया. पर्यटन का अर्थ होना चाहिये था होम स्टे, ट्रेकिंग, स्थानीय गाइड, आंचलिक भोजन, कुटीर व परिवार उद्योग, पर्व त्यौहार व मेले पर वह बड़े होटल काम्प्लेक्स के साथ जमीनी सौदे और संसाधनों की ठेकेदारी में बदला. 2013 में उत्तरकाशी के महाप्रलय में असि गंगा -भागीरथी के किनारे बने कई होटल व आवास अपना नाम-निशान मिटा गये फिर भी नदी किनारे बसाव सम्भला नहीं. अगस्त 2025 में फिर धराली की आपदा के पीछे भी मानव निर्मित बसाव उजड़ गया. अब तो आपदा जनित पुर्ननिर्माण राज्य की स्थाई प्रकृति बनता जा रहा है.

तिवारीजी के बाद उत्तराखंड में नेतृत्व नहीं दृष्टि का संकट हुआ. योजनाएं बहुत आ गयीं पर दर्शन नहीं उपजा. उन्होंने आर्थिकी बनाई, बाद वालों ने अर्थव्यवस्था पर योजनाएँ चलाईं. यही कारण है कि 2007 में पलायन दर मध्यम थी तो 2024 में बहुत ज्यादा. पहले पहाड़ में उद्योग सीमित थे जो बाद में पनपने के लिए चाहे जाने वाले सहारों के ढुल मुल रहने से डूबते चले गये. 2007 में खेती की दर स्थिर थी जो 2024 में ह्रासमान होती दिखी. तेजी से खेती की जमीन बिकी जो थी. सरकारी नौकरी पर निर्भरता पहले भी थी फिर तरह- तरह की संविदा, अंशकालिक व उपनल की डोर खिंची. निगमों की दशा बिगड़ती गई. रोडवेज भी अनुबंध की सेवाओं की आड़ में चालक परिचालकों का वेतन रोकता रहा. उनका घर खर्च, मकान किराया बच्चों की फीस भरना मुश्किल हो गया. उत्तराखंड में जिस रफ़्तार से महाविद्यालय व विश्वविद्यालय खुले, उपाधियां बटीं उस के सापेक्ष रोजी रोटी के सबल इंतजाम न हुए. चिकित्सा, इंजीनियरिंग, वाणिज्य की डिग्री प्राप्त युवा नॉएडा, दिल्ली गुड़गांव, बंगलौर, हैदराबाद का रास्ता पकड़ गए.

सिडकुल ने उत्तराखंड की आर्थिकी को बदला पर पहाड़ में स्थानीय रोजगार व जीवन यापन की बेहतर दशा उपेक्षित ही रही जिनके लिए अतिरिक्त नीतिगत हस्तक्षेप यहाँ प्रत्यक्ष व प्रेरित विनियोग से स्थानीय आजीविका उपजाने का संक्रमण लक्ष्य रखता है. ऐसी घोषणाओं व प्रचार सामग्री से अखबार रंगे हैं. उत्तराखंड की आर्थिकी को सबल आधार देने के प्रबल प्रयास में तिवारी मॉडल की नीतिगत संरचना के कई पक्ष ऐसे हैं जो मात्र उनके स्मृति -श्रवण से अधिक उद्योग की संवृद्धि को पुष्ट करते हैं. उनके प्रारूप में उत्तराखंड के तीन भौगोलिक क्षेत्र या पट्टियां थीं. उद्योग वृद्धि की संभावनाओं में रोजगार घनत्व वाले व स्वचालित भारी उद्योगों में विनिर्माण, निर्यात इकाईयां व लॉजिस्टिक्स शामिल रहे जो सिडकुल का परिक्षेत्र रहा. मध्य हिमालय के पर्वतीय इलाके नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी व टिहरी मूल्य संवर्धित इकाइयों के रूप में देखे गए जिनमें खाद्यन्न प्रोसेसिंग, औषधि, जड़ी बूटी, हाथकरघा व जैविकीय पदार्थ शामिल थे. फिर आता है उच्च हिमालय का इलाका जिसमें पारम्परिक उद्योगधंधों के साथ जैविक खेती व रोमांचकारी व साहसिक पर्यटन मुख्य हैं. माना गया कि यहाँ अंतरसंरचना हल्की रहे व मानव सेवा का योग अधिक जिससे इकोतंत्र पर अनावश्यक भार न पड़े.

तिवारी जी के बाद पर्यटन जोर पकड़ा. केंद्र की परियोजनाओं से चार धाम यात्रा में भीड़ बढ़ी. मसूरी नैनीताल जैसे गंतव्य धारक क्षमता से अधिक का बोझ उठा गये. नये स्थलों तक भी पर्यटकों के आगमन से प्रशासन की मुश्किलें बढ़ी. कैंची धाम के लिए नये यात्रा पथ खोजने की कवायद बढ़ी.छोटा कैलास तक वाहन सुविधा बढ़ गईं. ऐसे में जरुरी हो जाता है कि पर्यटन के नये अर्थ में “स्टेयर”या सहनशील पर्यटक के आगमन को वरीयता दी जाए जो कार-टैक्सी से उतर होटल तक जा अपने मनोरंजन की इति श्री कर ले बल्कि उस स्थान पर रुक वहां के सौंदर्य के साथ संस्कृति व एकांत का भी आनंद ले. विदेशी पर्यटक भी अब नैनीताल से हट आगे के शांत इलाकों में टिकना पसंद करते हैं. कसारदेवी तो ऐसा उदाहरण बना ही. ऐसे सुरम्य स्थानों उत्तराखंड में बहुल हैं. यहाँ स्थानीय भोजन व गृह आवास की व्यवस्था रहे.

2026 के बजट में रज्जु मार्ग हेतु विशेष जोर है तो रेल सुविधा का विस्तार भी. एक समय था जब शरदोत्सव के समय नैनीताल में बंगाल का पर्यटक सीमित साधनों के बावजूद आ अपनी संस्कृति व दुर्गा पूजा आयोजन से गहरा प्रभाव छोड़ जाता था. अब तो भीड़ आती है और अपने अपशिष्ट जमा कर जाती है. ग्रामीण पर्यटन के साथ सीढ़ी दार खेतो की खुशहाली अब बहुत जरुरी है.आज की परिस्थितियों में पहाड़ की खेती “श्री -अन्न “की श्रेणी में रख दी गई है इसलिए यह जरुरी हो जाता है कि इस खेती को मात्र कच्चा माल समझ औने पौने दामों में बिचौलियों के हवाले न किया जाए बल्कि उद्योगों के लिए तत्पर आदाओं या इनपुट की सुलभ पूर्ति का साधन बनाया जाए. पहाड़ी अनाज के साथ यहाँ की दालें, मसाले, फल,जड़ी -बूटी,शहद, शिलाजतु आदि के उत्पादन, संग्रहण, पैकिंग की छोटी इकाईयां और अधिक गुणवत्ता के साथ लगें. हर विकास खंड में शीत गृह, उपज साफ करने सुखाने की इकाईयां, ग्रेडिंग व ब्रांडिंग करती इकाई स्थापित हों. इन्हें वाजिब लाभ के साथ बेचने के प्रबंध हों ऐसा न हो कि अधिकांश एनजीओ व महिला सहायता समूह की तरह इनकी ऊँची एमआरपी तय कर दी जाए. हालात यह है कि आगराखाल, लोहाघाट, सोमेश्वर व गरम पानी में मिलने वाली सौ रूपये की चीज के पांच सौ रूपये दाम टांक दिए जाते हैं सरस के मेलों ठेलों पर .

पर्वतीय एमएसएमई मिशन के लिए यह सही समय है जिसमें समूचे राज्य में सूक्ष्म उद्योग चलाए जाएँ इन्हें पहले पांच साल के लिए ब्याज की पूरी छूट मिले, कारगर मशीनरी के लिए पचास प्रतिशत अनुदान व राज्य द्वारा बाजार श्रृंखला उपलब्ध कराई जाए ताकि इनके निर्यात की सम्भावना भी बढ़ती रहे. पढ़ाई -लिखाई को साहस, उपक्रम व जोखिम वृत्ति की कुशलता से जोड़ कल- कारखानों की इकाइयों से जोड़ा जाए. हर संस्थान जहां पर्याप्त आधार सुविधाऐं हों उन्हें स्थानीय व निकट की फैक्ट्रियों से संयोजित किया जाए. अप्रेन्टिशिप अनिवार्य हो जिसके बाद ही डिग्री डिप्लोमा मिले.

ऐसे संस्थागत सुधारों के लिए “उत्तराखंड आर्थिक विकास अधिकार संस्था” बने जो नीतियों की निरंतरता बनाए रखे व राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो. वस्तुतः पहाड़ के विकास का आधार सकल राष्ट्रीय उत्पाद से बढ़ कर “पर्वत आजीविका निर्देशांक” हो. रोजगार की ऐसी व्यवस्था बने कि 40 वर्ष तक की आयु के निवासियों का प्रतिशत गांव में बना रहे जिससे वहां की आबादी स्थिर रहे.ऐसी नीति बनाते पहले दो वर्षों में संरचना का निर्माण हो, अगले पांच वर्षों में उसका तीव्र विस्तार जिससे दस वर्षों के भीतर ग्राम आत्मनिर्भरता की दशा में आ जाएँ. वर्तमान समय की चिंताओं को महसूस कर व समस्याओं को समाधान का रास्ता दिखाते यह नीति पहाड़ के बेहतर व कारगर कल कारखाने फैक्ट्री का भावार्थ बदल देगी.

जारी…

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : उत्तराखंड बजट : स्वयं स्फूर्ति से परिपक्वता की ओर

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