एक ही समय में धराली और स्विट्ज़रलैंड में हिमस्खलन या भूस्खलन की घटनाएं हुईं, लेकिन परिणाम बिल्कुल अलग रहे. उत्तराखंड के धराली क्षेत्र में आई आपदा ने भारी नुकसान पहुंचाया, लोगों को जान और संपत्ति दोनों का नुकसान झेलना पड़ा. वहीं स्विट्ज़रलैंड के आल्प्स क्षेत्र में हुई घटना में किसी की जान नहीं गई. वहां समय रहते चेतावनी जारी कर दी गई थी और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था. यही फर्क है एक मजबूत और व्यवस्थित अर्ली वार्निंग सिस्टम का.
पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और हिमस्खलन अचानक नहीं होते. इनके पीछे मौसम, तापमान, बर्फ की परतों की स्थिति, वर्षा की मात्रा और जमीन की नमी जैसे कई संकेत होते हैं. स्विट्ज़रलैंड ने इन संकेतों को समझने और समय रहते खतरे की पहचान करने के लिए दशकों से एक वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की है. वहां हिमस्खलन चेतावनी सेवा का संचालन WSL Institute for Snow and Avalanche Research नाम की संस्था करती है, जिसे संक्षेप में SLF कहा जाता है. यह संस्था पूरे आल्प्स क्षेत्र में बर्फ और ढलानों की स्थिति पर लगातार नजर रखती है.
स्विस अर्ली वार्निंग सिस्टम का पहला आधार है व्यापक सेंसर नेटवर्क. आल्प्स की ऊंची चोटियों और ढलानों पर ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए गए हैं. ये स्टेशन तापमान, हवा की गति, हवा की दिशा, वर्षा, बर्फबारी और बर्फ की मोटाई जैसे आंकड़े हर कुछ मिनट में रिकॉर्ड करते हैं. कई स्थानों पर बर्फ की परतों की संरचना को मापने वाले विशेष उपकरण लगाए गए हैं जो यह बताते हैं कि बर्फ की कौन सी परत कमजोर है और किस ऊंचाई पर दरार बनने की संभावना है. इन आंकड़ों को सैटेलाइट या रेडियो सिग्नल के जरिए केंद्रीय डाटा सर्वर तक भेजा जाता है.
इसके अलावा जमीन की हलचल मापने के लिए जियोफोन और ग्राउंड वाइब्रेशन सेंसर लगाए जाते हैं. ये सेंसर बहुत हल्की कंपन को भी पकड़ लेते हैं. यदि किसी ढलान पर बर्फ खिसकने की शुरुआती हरकत होती है तो यह कंपन सिस्टम को संकेत दे देता है. कुछ स्थानों पर रडार आधारित निगरानी प्रणाली भी लगी होती है जो ढलान की सतह की गति को दूर से माप सकती है. इसी तरह भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में मिट्टी की नमी मापने वाले सेंसर लगाए जाते हैं. जब मिट्टी में पानी की मात्रा एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाती है तो जमीन के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है. सिस्टम इस बदलाव को रिकॉर्ड करता है.
स्विट्ज़रलैंड में केवल मशीनों पर निर्भरता नहीं है. वहां प्रशिक्षित मानव पर्यवेक्षक भी होते हैं जो नियमित रूप से बर्फ की परतों की जांच करते हैं. वे छोटे परीक्षण करके देखते हैं कि बर्फ कितनी आसानी से टूट रही है. उनकी रिपोर्ट डिजिटल प्रणाली में जोड़ी जाती है. इस तरह मशीन डाटा और मानव अनुभव दोनों को मिलाकर खतरे का स्तर तय किया जाता है.
इन सभी आंकड़ों को एक केंद्रीय कंप्यूटर मॉडल में डाला जाता है. वैज्ञानिक मौसम पूर्वानुमान, पिछले वर्षों के रिकॉर्ड और वर्तमान डाटा को मिलाकर गणितीय मॉडल तैयार करते हैं. इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि अगले चौबीस से अड़तालीस घंटे में किस क्षेत्र में हिमस्खलन या भूस्खलन का खतरा कितना है. स्विट्ज़रलैंड में खतरे को पांच स्तरों में बांटा जाता है, बहुत कम से लेकर अत्यधिक तक. हर दिन बुलेटिन जारी किया जाता है जिसमें मानचित्र के साथ बताया जाता है कि कौन सी ढलान कितनी खतरनाक है.
यह चेतावनी केवल वेबसाइट तक सीमित नहीं रहती. मोबाइल ऐप के माध्यम से लोगों को सीधे सूचना मिलती है. पर्वतारोहियों, स्की करने वालों और स्थानीय निवासियों को एसएमएस और नोटिफिकेशन भेजे जाते हैं. कुछ संवेदनशील घाटियों में सायरन आधारित अलार्म सिस्टम भी लगा है. यदि सेंसर अचानक तेज गति से बर्फ या मलबे के बहाव का संकेत देते हैं तो सायरन बज उठता है और लोग पहले से तय सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाते हैं. कई जगहों पर सड़कों और रेल मार्गों को स्वचालित रूप से बंद करने की व्यवस्था भी है.
स्विस प्रणाली में ड्रोन और सैटेलाइट का भी उपयोग होता है. सैटेलाइट तस्वीरों से बर्फ के फैलाव और भूमि की स्थिति पर नजर रखी जाती है. ड्रोन कठिन इलाकों की ताजा तस्वीरें लेकर आते हैं. कुछ आधुनिक उपकरण जैसे स्नो प्रोफाइल इमेजिंग डिवाइस बर्फ की परतों का आंतरिक ढांचा दिखा सकते हैं. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कौन सी परत फिसलने के लिए तैयार है.
अब यदि हम धराली जैसी घटना को देखें तो समस्या का एक बड़ा कारण समय पर चेतावनी का अभाव था. उत्तराखंड के कई पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम स्टेशन सीमित हैं और जो हैं भी वे आपस में पूरी तरह एकीकृत नहीं हैं. मिट्टी की नमी, ढलान की गति या बर्फ की परतों की निगरानी के लिए व्यापक सेंसर नेटवर्क मौजूद नहीं है. चेतावनी जारी करने की प्रक्रिया भी अक्सर बिखरी हुई रहती है. स्थानीय लोगों तक सटीक और समय पर सूचना नहीं पहुंच पाती.
हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक रूप से आल्प्स से अलग है, लेकिन जोखिम दोनों जगह मौजूद है. फर्क केवल तैयारी और तकनीकी व्यवस्था का है. यदि उत्तराखंड में भी व्यापक स्तर पर ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए जाएं, ढलानों पर ग्राउंड सेंसर स्थापित किए जाएं, मिट्टी की नमी और वर्षा की मात्रा का लगातार विश्लेषण हो, और इन सबको जोड़ने वाला एक केंद्रीय डाटा प्लेटफॉर्म बने, तो आपदा के पहले संकेत पकड़े जा सकते हैं. इसके साथ मोबाइल आधारित चेतावनी प्रणाली और गांव स्तर पर सायरन अलार्म लगाए जाएं तो नुकसान कम किया जा सकता है.
स्विट्ज़रलैंड का अनुभव बताता है कि अर्ली वार्निंग सिस्टम केवल तकनीक का मामला नहीं है बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, निरंतर निवेश और स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है. वहां स्कूलों में लोगों को सिखाया जाता है कि चेतावनी मिलने पर क्या करना है. अभ्यास किए जाते हैं. खतरे के मानचित्र सार्वजनिक होते हैं.
धराली और स्विट्ज़रलैंड की घटनाओं का अंतर हमें यह सिखाता है कि प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है. मजबूत सेंसर नेटवर्क, वैज्ञानिक विश्लेषण, स्पष्ट चेतावनी प्रणाली और प्रशिक्षित समुदाय मिलकर जान बचा सकते हैं. हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अब समय आ गया है कि हम भी एकीकृत और आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम की दिशा में गंभीर कदम उठाएं, ताकि भविष्य में पहाड़ की कोई चेतावनी अनसुनी न रह जाए.
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