प्रेम में ‘अपर्णा’ होना

हिमालय की गोद में राजा हिमवान और रानी मेना के यहाँ जन्मी पार्वती बचपन से ही शिव को अपने आराध्य के रूप में देखती थीं. शिव कैलाश के योगी थे, भस्म से विभूषित, जटाओं में गंगा धारण किए और संसारिक वैभव से दूर. राजमहल में पली पार्वती के लिए यह मार्ग सहज नहीं था, फिर भी उनके मन में एक ही संकल्प था कि वे शिव को ही पति रूप में स्वीकार करेंगी. जब उन्हें ज्ञात हुआ कि शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करना होगा, तब उन्होंने सुख सुविधा छोड़कर हिमालय की निर्जन स्थली में साधना आरंभ की. पहले उन्होंने अन्न त्यागा, फिर केवल फल पर रहीं और धीरे धीरे पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया. इसी कारण उन्हें “अपर्णा” भी कहा गया, जो पत्ता पर्ण भी न ग्रहण करे. यह नाम उनकी तपस्या और अडिग निश्चय का प्रतीक बन गया.

समय बीतता गया, ऋतुएँ बदलीं, पर पार्वती का संकल्प नहीं डिगा. शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और उनके सामने उपस्थित हुए. उन्होंने शिव के विरक्त जीवन का वर्णन करते हुए पूछा कि एक राजकुमारी ऐसे योगी को पति क्यों बनाना चाहती है जो श्मशान में रहता है और भौतिक सुखों से दूर है.

पार्वती ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि उनके लिए शिव का बाहरी रूप नहीं, उनका सत्य और उनका स्वभाव महत्वपूर्ण है. वे उन्हें उसी रूप में स्वीकार करती हैं जैसे वे हैं. यह उत्तर उनके विश्वास और प्रेम की दृढ़ता को प्रकट करता है. तब शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और पार्वती को वरण किया. देवताओं और ऋषियों की उपस्थिति में हिमालय क्षेत्र में उनका विवाह संपन्न हुआ, जिसे लोकमान्यता उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण और गौरीकुंड से जोड़ती है.

यह कथा बताती है कि प्रेम धैर्य, विश्वास और आत्मबल से जुड़ा होता है. पार्वती ने अपने लक्ष्य को पाने के लिए स्वयं को अनुशासन और तप में ढाला. उनका संकल्प समय की कठिनाइयों से गुजरा, पर कम नहीं हुआ. शिव और पार्वती का यह प्रसंग आज भी लोककथाओं, विवाह गीतों और धार्मिक स्मरणों में जीवित है, जहाँ पार्वती की अटूट निष्ठा और दृढ़ विश्वास उस प्रेम की याद दिलाते हैं जिसने अंततः शिव को भी उनके सामने प्रकट होने के लिए प्रेरित किया.

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