फोटो : जयमित्र सिंह बिष्ट
इन दिनों पहाड़ को जाने वाली सड़कों के किनारे काफल की टोकरी लिये पहाड़ी खूब दिख रहे हैं. लोक में माना जाता है कि काफल देवताओं द्वारा खाया जाने वाला फल है. देवताओं द्वारा खाए जाने वाले ख़ालिस पहाड़ी फल इन दिनों बहुत से पहाड़ियों के मौसमी रोजगार का हिस्सा है.
(Myrica Esculata kafal)
यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि पहाड़ का लोकगीत और लोक साहित्य काफल के बिना अधूरा है. पहाड़ के लोक में काफल हर तरफ दिखने वाले इस फल का वानस्पतिक नाम मिरिका ऐस्कुलेटा (Myrica Esculata kafal) है. मिरिकेसियाई परिवार से ताल्लुक रखने वाला यह एक सदाबहार पेड़ है जो 2800 फीट से 6000 फीट तक की ऊँचाई में आसानी से मिल जाता है.
भारत के हिमालयी क्षेत्र में काफल खूब पाया जाता है. रावी के पूर्व से असम तक हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाला यह फल अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, उत्तराखंड, हिमांचल और मेघालय जैसे कुछ अन्य भारतीय राज्यों में भी मिलता है. इन राज्यों में इनके नाम अलग-अलग हैं. कम लोग ही जानते हैं कि भारत के बाहर भी काफल का फल मिलता है.
भारत के अलावा यह नेपाल में भी पाया जाता है. पश्चिमी नेपाल में यह काफल नाम से ही जानता है. नेपाल के अलावा काफल चीन, भूटान, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और जापान जैसे देशों में भी काफल का फल होता है.
पहाड़ियों द्वारा सिल-बट्टे में पीसे नमक के साथ खाये जाने वाला काफल पौष्टिकता से भरा फल है जिसमें कैल्शियम, कार्बोहाईड्रेट, मैग्नीशियम, प्रोटीन, फाइबर, वसा, पोटेशियम की भरपूर मात्रा पायी जाती है. काफल के फल के अलावा इसका पेड़ भी काफ़ी लाभकर होता है.
(Myrica Esculata kafal)
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नैनीताल में इस दफ़ा बुराँश के पेड़ बहुत कम दिखे। काफल का फल अप्रैल के अंत तक बाज़ार में नहीं आया था। सो हम चखे बिना ही लौट आये। आपका प्रयास प्रशंसनीय है। परंतु आमजन को लगता है की पर्यावरण को बड़े बड़े वैज्ञानिक और पर्यावरणविद ही बचा सकते है। अतः वे ऐसे मंच से जुड़ना ही नहीं चाहते।