फोटो: सुधीर कुमार
मेरा बचपन-1 (डीडी पन्त की अप्रकाशित जीवनी के अंश)
-देवी दत्त पंत
सुबह उठते ही कोलाहल, चिन्ता, अव्यवस्था, 70 वर्श के जीवन का यह आखिरी पड़ाव कैसा बीभत्स है! विज्ञान, तकनीक, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र सब धरे रह गये हैं. धर्म, मानवता, करूणा, प्रगति, शांतिव्यवस्था सब आधारहीन, अर्थहीन जान पड़ते हैं. आरक्षण, राम, रोटी, सरकारों का गिरना-बनना, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, मूल्यों की राजनीति आदि बातें सब चमत्कार के लिए ही जाती हैं. इनसे बचने के लिए अपने अतीत में भागना सुखद लगता है.
हिमालय के एक गांव में जन्म लेकर मैंने नैसर्गिक आनन्द लिया. ब्राह्मण कुल ने संस्कार दिये. रामायण और गांधी ने धर्म का रूप सिखाया. यही ‘सामल’ ले कर यात्रा पर चल पड़ा. जीवन के इस पड़ाव तक ही पहुंच पाया हूं. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ऐसी पूंजी लेकर यात्रा करनी थी. यात्रा घुमावदार किन्तु दिलचस्प रही. मुझे तो ऐसा ही लगता है.
मेरा घर पिथौरागढ़ जिले के देवराड़ी गांव में है. जब मैं पैदा हुआ था तो गांव में कुल पांच घर थे और आज भी वहां पांच-छः घर ही हैं. एक घर बरसों पहले भू-स्खलन में बह गया और दो-एक नये घर बन गये हैं. लेकिन हमारे गांव के आस-पास दूसरे बड़े गांव हैं.
गांव की कोई आधुनिक पहचान नहीं है. आज भी न वहां बिजली है, न मोटर सड़क, न हाईस्कूल और न अस्पताल. कुछ समय के लिए जब मैं उत्तर प्रदेश का शिक्षा निदेशक बना था तो एक जूनियर हाईस्कूल का प्रबंध कर पाया था. अब गाड़ी आगे नहीं बढ़ती है. फिर भी मेरा गांव सुन्दर है. वृक्षों के कट जाने पर भी हरा-भरा दिखाई पड़ता है. वैष्णवी देवी के प्राचीन मंदिर से पानी निकलता है— स्वच्छ निर्झर जो वर्षा ऋतु में अद्भुत सौन्दर्य देता है. गांव 5700 फीट की ऊंचाई पर बसा है. जलवायु शीतोष्ण है. पानी स्वच्छ, हवा स्वच्छ, कोलाहल रहित वातावरण, फिर अस्पताल की जरूरत कहां? फिर भी कुछ नवयुवक सट्रेप्टामाइसीन, मेटासिन, एस्प्रो जैसी दवाइयों के नाम सीख गये हैं. सेना से छुट्टी पर घर लौटते जवान टू इन वन लटकाए फिरते हैं. बीड़ी-सिगरेट का चलन हो गया है. चिलम, जिसे पहाड़ में हुक्का कहते हैं, समाप्तप्राय है. कच्ची शराब भी आसपास बनने लगी है.
मेरा भाई अपने परिवार के साथ वहीं रहता है. उसके घर में आज भी मिट्टीतेल से लालटेन जलती है. घर में एक ट्रांजिस्टर भी है, जो सैल से चलता है. गांव में पहले से थोड़ी ज्यादा खुशहाली है. एक श्वेत-श्याम टीवी भी है, जो वैकल्पिक ऊर्जा विभाग की सौर बैटरियों से चलता है. कपड़े पहले से अधिक है. जिस घर से सदस्य सेना में या दिल्ली-लखनऊ के होटलों में नौकर हैं, उनमें पैसा दिखने को मिलता है. पहले लोग अपने खाने लायक पैदा कर लेते थे. अब अनाज मैदान से आता है. घी, दूध, दही और नौजवान गायब हो गये हैं. गांव में बूढ़े ज्यादा दिखाई देते हैं. काम करने को हाथ कम हैं. होली, नवरात्री, मेले उस उत्साह से नहीं मनाए जाते जैसे पहले मनाये जाते थे.
पहले कितने ही जंगली फल-काफल, हिसालू, बमौर, बेडू, मखौल, कीमू, किरमड़-होते थे. आज नहीं हैं. अभागे बच्चे! हमें बचपन में इन फलदार पेड़ों से कितना आनन्द और मनोरंजन मिला था. पेड़ की चोटी पर चढ़ कर दाने तोड़ना साहस का काम था. बांज के एक विशाल वृक्ष पर पुरैड़ (जंगली अंगूर) की एक भारी बेल फैल गयी थी. बेल का तना छः इंच व्यास का था. उस पर चढ़ कर पुरैड़ के दाने खाना और बांज की फैली टहनी से जमीन पर कूदना सबके बस की बात नहीं थी. मैं कर लेता था. प्रतियोगिता में सफल होने का आनन्द ही निराला होता था.
अतीत में और स्रोत भी थे. बड़े वृक्षों के अलावा कई प्रकार की छोटी झाड़ियां-हिसालू, किरमड़ आदि फल देती हैं. बच्चे महीने भर इन फलों का स्वाद लेते थे. विकास के नाम पर किरमड़ उजाड़ दिया गया. विकास और उसकी सामाजिक कीमत का सम्बन्ध न नियोजकों को मालूम था और न जन नेताओं को. आषाण में काला बेडू पकता था. उनके वृक्ष गांव के खेत में ही थे. वृक्ष पर चढ़ने में खेत की फसल को नुकसान पहुंचता था. दूर से डराने की आवाज आती, ‘पेड़ पर मत चढ़ो’. पर कौन पूछता? पेड़ों के झुरमुट के अंदर भैरव का सुंदर लिंग था, जो आज भी है. पेड़ तो नहीं है. लिंग का सिर फटा है. बताया कि एक गाय आकर उसे दूध पिलाती थी. हरिजन मालिक ने कुल्हाड़ी से भैरव का लिंग विक्षत कर दिया. वह संतानहीन रहा.
आज जंगल रौखड़ हो गये हैं. बांज, काफल, बुरुंश, चौड़ी पत्ती के पेड़ समाप्त है. झगड़े-फसाद आज भी कम होते हैं, पर वैसा सद्भाव नहीं रहा. हम हरिजन समाज से कट गये हैं. उनका गांव पिताजी को बहुत चाहता था. वह मैत्री भी अब नहीं रही.
मेरा गांव और दर्जनों ऐसे गांव बासुकी नाग पर्वत के चारों ओर बसे हैं. गोवर्धन पर्वत तो छोटा सा है, इसलिए उसकी महिमा स्वयं भगवान को ब्रज वासियों का बतानी पड़ी. वृहद् बासुकीनाग की महिमा सभी गांववासी जानते हैं. उनकी रोजी-रोटी आदिम काल से बासुकी ही देते आए हैं. 8500 फीट ऊंचा पर्वत शिखर चौड़े आधार पर पिरामिड के रूप में खड़ा है. गांव वासियों को ईंधन, घास, पानी देता है. गाय, बैल, बकरियां जंगल में हांक दी जाती हैं. शाम को पेट भरने पर वे घर लौट आते हैं. वन्य पशु खत्म हो गये है. छोटा बाघ पहले आसपास से गुजर जाता था. आज कुछ भी नहीं है. शरद काल में ठीक शिखर पर बमौर के वृक्ष मीठा-कडुवा स्वाद लिये गुठली विहीन लीची की तरह का फल देते थे. जब भी छुट्टियों में घर आता तो इन फलों को खाने 2500 फीट की ऊंचाई चढ़ना खलता न था. क्या अद्भुत स्वाद होता और क्या अविस्मरणीय यात्रा. ये पेड़ नष्ट हो गये. कितना क्षोभ हुआ था एक दिन यह देखकर. कुछ वर्षों में उपरांत देखा पेड़ फिर उग आये हैं. हरे भरे हो गये हैं. आज पता नहीं उनमें फल आते हैं या नहीं . सुना था नौजवानों की कमी होने से गाय-बैल भी कम हो गये हैं और शिखर तक चरने नहीं जाते.
(…जारी)
(डीडी पन्त की अप्रकाशित जीवनी के अंश आशुतोष उपाध्याय के सौजन्य से ‘पहाड़’ में प्रकाशित हो चके हैं. वहां से साभार)
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