अपने शानदार और मौलिक अभिनय से हिंदी सिनेमा में अपना लोहा मनवाने वाले मनोज बाजपेयी इन दिनों कुमाऊं के मुक्तेश्वर में ठहरे हैं. लॉकडाउन के कारण शूटिंग रद्द होने के कारण मनोज बाजपेयी अपने परिवार समेत मुक्तेश्वर में पिछले दो महीने से रह रहे हैं. मनोज बाजपेयी के साथ वरिष्ठ पत्रकार ध्रुव रौतेला की एक ख़ास बातचीत पढ़िये :
(Manoj Bajpai in Mukteshwar Uttarakhand)
द फ़ैमिली मैन के श्रीकांत त्रिपाठी और वास्तविक जीवन के मनोज बाजपेयी जो पत्नी और एक छोटी बेटी के साथ रहते हैं क्या समानता है?
जब आपकी यात्रा नीचे से ऊपर की ओर होती है तो आपके पास अनुभव का भंडार होता है. कलाकार को पिता के रूप में अनुभव करना और बेटी की चिंता करना आज के आम इंसान की तरह श्रीकांत तिवारी भी वही सब करता है. उसमें एक मानव स्वभाव जैसी अच्छाई हैं तो बुराई भी. मसलन वह पत्नी और उसके सहकर्मी के संबंधों पर शक करता है, पीछा करता है. इसी तरह दक्षिण भारतीय परिवार से आने वाली पत्नी के माता-पिता के साथ उसका एक प्रकार का द्वंद्व संस्कृतिक और भाषाई भी है. इसलिए मेरा प्रयास चरित्र में डूबकर उसको बाहर लाने का रहता है.
सत्या के भिकू म्हात्रे के सिनेमा दौर से अब समानांतर वेब सीरीज के जमाने के इस बदलाव के समय में, जब “मस्तराम” तक आसानी से हमारे घरों में फोन, टीवी के माध्यमों से जगह बना रहा है तो क्या कला के ऊपर अश्लीलता हावी नहीं हो रही? आप इसे कैसे देखते हैं?
देखिए यह जो ओटीटी और वेब सीरीज की दुनिया आई है इसने गजब की जगह बनाई है. यह बेहद स्वतंत्र और लोकतांत्रिक है. गालियां हमने गणित की तरह किसी क्लास में नहीं सीखी होती हैं. स्वयं माहौल से हम उसको आत्मसाथ करते हैं. इसी तरह इसमें सेंसर की कैंची का खतरा नहीं है, यह ज्यादा स्वतंत्र है. आजादी की बात हम कलाकार शुरू से करते आए हैं और सेंसर भी किसी माता-पिता से बढ़ा नहीं. उसको एक उम्र तक क्या करना है यह हम पर निर्भर है. उसके बाद तो हमारा बच्चा भी स्वयं ही तय करता है न कि क्या बोले या फिर देखे. ओटीपी प्लेटफॉर्म पर मेरी बेटी अभी से सीरीज देखती है लेकिन जिसमें लिखा होता है यह सात साल तक के बच्चे के लिए मंजूर है वो उसी को देखेगी, जिसको हम माता पिता बोलेंगे. द फैमिली मैन आई तो हमने तय किया उसको दिखाएंगे और जो सवाल वह मुझसे पूछती रही, मैं मौलिकता के साथ उसकी जिज्ञासा को शांत करता गया. हर जागरूक माता-पिता को यही करना चाहिए. जिसकी आप बात करे रहे हैं, मस्तराम एक ऐसा काल्पनिक चरित्र हमारे समाज का हिस्सा रहा है. जिसको हम नकार नहीं सकते हमारी बढ़ती हुई उम्र के साथ वह नाम काफी लोकप्रिय रहा है और इस बात का द्योतक रहा है कि हमारे समाज में वासना को लेकर कुंठाए कितनी हैं. हमने उसको प्राकृतिक न मान दबाया छुपाया है जिसके कारण से यह हुआ ओटीटी प्लेटफॉर्म ने जन्मजातीय व्यवस्था धारणा और परपंरा को भी तोड़ा है. इसमें बीच में बॉक्स ऑफिस भी नहीं जो आपका मूल्यांकन करेगा. आपकी प्रतिभा सीधे दर्शक तय करेगा कोई आलोचक या अख़बार भी नहीं.
(Manoj Bajpai in Mukteshwar Uttarakhand)
क्या मनोज बाजपेयी जैसा मझा अभिनेता मानता है कि हमको अब गालियां सुनने की आदत डालनी पड़ेगी और कितना यह प्लेटफॉर्म भाषा को खराब करेगा?
देखिए चरित्र को मैं जज नहीं करता हूं. भाषा चरित्र के साथ कैरी करती है और यह तय भी करती है कि उसका बैकग्राउंड क्या है, आप बताओ कहानी लिखने वाला लेखक उस चरित्र का क्या मूल्यांकन कर सकता है जिसको स्वयं वह गढ़ रहा हो? आप मैं और यहां बैठे सब समाज के भिन्न परिवेश से आते हैं, शिक्षा अलग है, संस्कार अलग हैं लेकिन हम सब अपने आप में सत्य तो है न.
फिल्म राजनीति में वीरू भइया वाला किरदार माना जाता है दुर्योधन से प्रेरित था आपने इसको कैसे लिया?
दरअसल जितना हमने पढ़ा जाना है कौरवों के बारे में वह अधूरा है. हमने समय के अनुसार और अपनी कमफर्ट के हिसाब से सच्चाई बुराई के मानक तय कर लिए हैं. हम खुद की अच्छाई पसंद करते हैं और बुराई को पचा नहीं पाते हम अपने प्रतिनिधि भी प्रसंशा करने वाले चुनते हैं. यह जानकर की हममें गुण और अवगुण दोनों हैं, वह चरित्र जिसकी आप बात कर रहे है वह बुरा होकर भी वहां पर दर्शकों को अच्छा लगता है. श्री राम भी अवगुणों पर विजय प्राप्तकर आदर्श बने और हम उनको भगवान मानते हैं. आज हम अपने भगवान के बारे में कुछ नहीं जानते इसका मतलब है स्वयं के बारे में कुछ नहीं जानते इसलिए आलोचना पर तकलीफ महसूस करते हैं.
आप बेलवा जैसे छोटे गाँव से चलकर दिल्ली आए लगातार तीन बार एनएसडी में दाखिले से वंचित रहे उस समय कैसा लगा, ऊर्जा कहां से आई?
20-21 की आयु में रिजेक्शन बर्दाश्त के बाहर होता है लेकिन लगातार रिजेक्शन आदत बना देता है. वो आदत जीवन में कहीं न कहीं काम आती है. मसलन जब आप पहली बार रिजेक्ट होते हैं तो आपको लगता है सामने वाला गलत है. आपके अंदर की अतभूत क्षमता को वह देख नहीं पाया दूसरी बार आपको लगता है, आपमें कमी है और इस बार आप उससे सीख जाएंगे अंततः तीसरी बार के रिजेक्शन में आप समझ जाते हैं, यह चीज मेरे लिए नहीं बनी या मेरी किस्मत में नहीं थी. रिजेक्शन आपके भीतर के आध्यात्मिक विकास का मौका देता है और वह आपके जीवन की जद्दोजहद से विजय प्राप्त करने में मददगार साबित होता है इसलिए अपना काम कीजिए और ऊपर वाले पर छोड़ दीजिए.
(Manoj Bajpai in Mukteshwar Uttarakhand)
इरफ़ान के जाने का सभी को दुख है. आपके दौर के बेहद संजीदा अदाकार थे, कैसे रहे आपके उनसे संबंध?
हमारी शुरुआत लगभग साथ हुई लेकिन हम इतने वर्षों तक अलग-अलग काम करते रहे. हमारे ग्रुप्स भी अलग-अलग ही थे बॉलीवुड बड़ा है. कलाकारों का दोस्तों का ग्रुप भी अलग था लेकिन इरफ़ान के जल्दी जाने का दुख हमेशा रहेगा.
आप अपने जीवन में उत्तराखंड के तिग्मांशु धूलिया का कितना योगदान मानते हैं?
तिग्मांशु ने ही मेरी पहली फिल्म बैंडिट क्वीन के लिए मेरा नाम शेखर कपूर साहब को सुझाया था. उसके बाद गाहे बगाहे भले ही हमारी मुलाकाते हुईं लेकिन फिल्म इंडिस्ट्री में पहला धक्का उन्होंने ही मारा यह सत्य है, जिसको मैं हमेशा बोलता हूं. उससे पहले स्वभिमान में मैं, आशुतोष राणा, रोहित रॉय साथ काम कर रहे थे.
नई पीढ़ी के अभिनेताओं में अपको एक दर्शक के तौर पर कौन पसंद हैं?
मैं राजकुमार राव को पसंद करता हूं, विजय वर्मा पसंद हैं, अभिषेक बनर्जी है और अभी पाताल लोक में जयदीप अहलावत नेचुरल लगे. मुझे वैसे भी बहुत ही ख़ालिस अभिनेता बहुत पसंद हैं. जिनकी परफॉर्मेंस में मुझे एक देशीपना दिखाई देता है, मुझे बहुत ज्यादा अच्छे लगते हैं क्योंकि हमारा हिन्दुस्तान 70% देशी ही तो है.
25 वर्ष आपने हिंदी सिनेमा में काम किया है आपकी अंग्रेजी में भी गजब की कमांड है, क्या जल्दी ही हॉलीवुड की तरफ रुख करेंगे.
देखिए बातचीत चलती रहती है लेकिन मेरे अंदर कोई जल्दबाजी या छटपटाहट नहीं. मैं 15 वर्ष की आयु में जान गया था कि केवल भोजपुरी और हिंदी मुझे बड़े शहर में स्थापित नहीं कर पाएगी और उस दौर में बिहार, यूपी में कुछ नेता थे जो अंग्रेजी के ख़िलाफ़ आंदोलन करते थे लेकिन खुद के बच्चे बड़े कॉवेंट स्कूलों में पढ़ाते थे. मैं उनकी चाल भाप गया था इसलिए दिल्ली आकर मैंने अंग्रेजी सीखी लेकिन मैंने उसको उर्दू की तरह भाषा के रूप में नहीं बल्कि केवल एक स्किल के रूप में आत्मसात किया. अंग्रेजी को मैंने कभी भी भाषा के रूप में नहीं लिया है.
कोरोना के इस संकट को कैसे देखते हैं?
देखिए लाखों मजदूर जब पलायन कर रहे हों, आधे के आधे शहर खाली हो रहे हों तो कष्ट होता है. बेहद अनिश्चितता का दौर है लेकिन हमको वर्तमान के सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा.
दो माह हो गए आपको उत्तराखंड में यहां मुक्तेश्वर में कैसी दिनचर्या है?
पहाड़ों से प्रेम कर रहा हूं कुमाऊं की संस्कृति सीख रहा हूं. आसपास गांव वालों ने नौला दिखाया, बाखली दिखाई. पत्नी बेटी साथ हैं सामने हिमालय है. प्रकृति के बीच इस दौरान क्लाइंबिंग की है आगे नियम स्थिल हों तो जागेश्वर धाम में जल चढ़ाना है और द्वारहाट पांडु खोली भी जाने के मन है, पहाड़ के लोग मौलिक हैं निर्मल हैं अतिथि देवो भव: संस्कार में शामिल हैं.
(Manoj Bajpai in Mukteshwar Uttarakhand)
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वरिष्ठ पत्रकार ध्रुव रौतेला देश के कई नामी मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं.
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