फोटो: सुधीर कुमार
4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 56 (Column by Gayatree Arya 56)
पिछली किस्त का लिंक: तुम ‘हमेशा सफल होने’ के दबाव वाले समय में पैदा हुए हो
यहां नानी के घर पर तुम्हारे बहुत सारे फैन बन गए हैं. पड़ोस के दो घरों की लड़कियों के लिए तो तुम सबसे बड़ा खिलौना हो, सबसे अच्छा टाइमपास हो. यदि तुम किसी कारण से न रोओ और उसी वक्त मैं तुम्हें न बुलाऊं, तो शायद वे पूरे दिन ही तुम्हें अपने पास रखें. कितना प्यार करती हैं वे लड़कियां तुम्हें. उन्होंने तुम्हारे कुछ नए नाम रखे हैं ‘मोहित‘ और ‘उत्सव‘. ‘उत्सव‘ तो मुझ भी बहुत अच्छा लगा और तुम्हारी नानी को भी. सच में तुम्हारे वहां जाते ही उन लोगों का उत्सव शुरू हो जाता है. उत्सव मेरे बच्चे! सच में अब मेरे जीवन में तुम्हारी उपस्थिति एक विराट उत्सव ही तो है. एक ऐसा उत्सव जो कई साल चलेगा, जो दिन-रात चलेगा. जो सारे मौसमों में अपने रंग बिखेरता जाएगा.
यहां गांव में जैसे घरों की छतें जुड़ी हैं, वैसे ही लोगों के दिल भी जुडे हैं. कम से कम शहर वालों की तुलना में तो ज्यादा ही. दो कारण और भी हैं जो कि तुम्हें पड़ोस के घर में उत्सव मनाने भेज दिया जाता है, बिना किसी डर के. पहला अहम कारण है कि तुम लड़की नहीं हो और दूसरा उससे भी अहम कारण है, कि तुम्हें अपने घर ले जाने वाली लड़़कियां हैं लड़के नहीं. कैसी विचित्र स्थिति है मेरे बच्चे कि लड़का होने के बावजूद बतौर बच्चे तुम भी स्त्रियों/लड़कियों में ही सबसे ज्यादा सुरक्षित हो. इस मामले में तो तुम्हारा दुर्भाग्य ही है कि तुम उस वर्ग (पुरुष) से हो जिस पर मेरा, मेरा क्या ज्यादातर मांओं को विश्वास नहीं. तुम विश्वासी लड़के/पुरुष बनना. ये बहुत बड़ी चुनौती है तुम्हारे सामने.
जे.एन.यू में मेरा एक मित्र है, जिसकी बहुत सारी मित्र लड़कियां ही हैं. बहुत सारे लड़के उस मित्र को इस बात के लिए अक्सर टोकते थे, क्योंकि उनके मन में ये जलन थी, कि ‘ये साला हमेशा लड़कियों से घिरा रहता है.’ इस बारे में मैं हमेशा उस मित्र से यही कहती थी, ‘ये सारे लड़़के, लड़कियों से घिरे तो रहना चाहते हैं; पर लड़कियों को इंसान समझकर व्यवहार करने को तैयार नहीं. फिर क्यूं जाएंगी लड़कियां भला उनके पास?’ अधिकांशत की इच्छा ‘झूठा प्रेम’ जताकर सिर्फ सेक्स करने की होती है. यदि लड़कियों से दोस्ती की परिणति सेक्स न हो, तो ऐसी दोस्ती में ज्यादातर लड़कों की दिलचस्पी नहीं होती. जे.एन.यू के लड़के भी मुझे इसका कोई अपवाद नहीं लगे. यही कारण है कि जे.एन.यू. के बहुत से लड़के अक्सर यह प्रचारित करते पाए जाते हैं, ‘कि जे.एन.यू. की लड़कियों से शादी मत करना.’ क्योंकि उनकी सोच भी यहीं तक सीमित है, कि गर्लफ्रेंड तो ऐसी हो जो संबंध बनाने को तैयार हो, लेकिन पत्नी यौनशुचिता वाली चाहिए.
मेरा वो दोस्त सच में एक बेहद अच्छा लड़का था. मैं उसके लिए दुआ करती हूं. तुम भी ऐसे ही बनना मेरे बेटे, कि लड़कियां तुमसे दोस्ती करना पसंद करें. तुम्हारे साथ खुद को सहज और सुरक्षित महसूस करें. फिर खुद ही आएंगी वे तुम्हारे पास और एक राज की बात बताऊं, एक अच्छे, विश्वासी, स्नेही और ईमानदार लड़के/पुरुष की कमी, लगभग सारी लड़कियों की जिंदगी में है. बल्कि कहूं कि अकाल है. तुम इस कमी को पूरा करने में अपनी भूमिका निभा सकते हो मेरे बेटे.
6.45 पी.एम. – 31/03/2010
आज से तीन दिन पहले तुम आठ महीने के हो चुके हो. आठ महीने. ओह! कितने बड़े हो गए तुम, लंबे और वजनी. तुम बैठने लगे हो मेरी जान. घुटने और दोनों हथेलियों को जमीन पर टिकाकर तुम आगे-पीछे झूला सा झूलते हो तो कितने खुश होते हो. आहह कितना आनंद आता है तुम्हें ऐसा करते देखकर. तुम्हारी किन चीजों को देखकर नहीं मिलता आनंद भला? जैसे कहते हैं न कि पुरानी शराब का सुरूर बढ़ता जाता है. वैसे ही जैसे-जैसे तुम्हारे साथ वक्त बिताती जा रही हूं मैं तुम्हारे प्यार के सुरूर में डूबती जा रही हूं. जब तुम बिल्कुल छोटे थे तब मुझे ऐसा नहीं लगता था, कि तुम्हारे बिना नहीं जिया जा सकता. लेकिन अब कह सकती हूं कि तुम्हारे बिना जीना मुश्किल है मेरे बच्चे! सम्मोहन किया है तुमने, बताओ तो भला कहां से तुम बच्चे लोग सम्मोहनी विद्या सीख कर आते हो? मैं तुम्हारे सम्मोहन में घिर चुकी हूं.
नुसरत फतेह अली खान की आवाज शुरू में मुझे फटे बांस सी लगती थी, (जो कि है भी, पर आवाज को ऐसा साध लिया उन्होंने की कि बससस.) लेकिन जब उन्हें सुनना शुरू किया तो उनके सुर की दीवानी हो गई. ऐसी कि उनके कई पंजाबी और उर्दू के गीत जो कि मुझे समझ भी नहीं आते वे गाने भी मैं डूबकर सुनती हूं. आज हालत ये है कि नुसरत के बहुत सारे गाने सुनकर मैं मेडीटेशन की सी स्थिति में पहुँच जाती हूं. घंटों एक ही गाना सुन सकती हूं. सुनती हूं. तुम्हारा सुरूर मुझे नुसरत के गानों की तरह चढ़ा है, जो देर से चढ़ा, बहुत धीरे-धीरे, लेकिन अब सिर चढ़कर बोल रहा है.
तुम अभी-अभी कच्ची नींद से जगे थे और जगते ही सबसे पहला काम तुमने उल्टे होकर घुटने और हथेलियों के बल आकर, आगे-पीछे झूलने का किया. उफ्फऽऽ… कितने प्यारे, कितने कातिल लग रहे थे तुम ऐसा करते हुए. कैसा लगता है तुम्हें ऐसे अपनी ही मस्ती में झूमते हुए देखकर, मैं तुम्हें क्या ही बताऊं मेरी जान. मेरे पास शब्द ही नहीं हैं तुम्हारी उस मस्ती से मिलने वाली खुशी और आनंद को बयान करने के लिए.
11 ए.एम – 07/05/2010
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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