“हिमालय के दक्षिण में, समुद्र के उत्तर में भारत वर्ष है जहां भारत के वंशज रहते हैं.” संभवतः मैं उसी जगह पर खड़ी हूं जहां हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत तथा शकुंतला के गंधर्व विवाह के पश्चात भरत का जन्म हुआ. कालांतर में शकुंतला के इसी पुत्र भरत अर्थात चक्रवर्ती राजा भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा. (Kanvashram Vishwamitra Menaka Shakuntala)
मैं कण्वाश्रम में विचरते हुए सुखद कल्पना कर रही हूं कि कितना रमणीय व मंत्रमुग्धकारी होता होगा वह पुरातन समय? है न! जहां वेद ऋचाओं की स्वर लहरियों से गुंजायमान विशुद्ध वातावरण, पवित्र होम की धूम का सघन वन में विचरण एवं विद्यार्थियों द्वारा अनेक क्रियाकलापों से गुम्फित गुरुकुल जहां भविष्य के लिए संस्कृतियों एवं सभ्यताओं के उपार्जन हेतु ज्ञान-विज्ञान, खोज, अविष्कार, उपचार, सिद्धांतों की बुनियाद खोदी जाती रही होगी.
मेरे मन की ज़मीन पर वह परिदृश्य भी उछाल मार रहा है कि प्राचीन काल में, गंगा में स्नान करने के बाद चार धामों की यात्रा के लिए जाते हुए धर्म और आस्था के रंग में लिप्त, कण्वाश्रम में रुके हुए तीर्थ यात्रियों का जमघट कैसा दिखता होगा ? जिनके लिए चार धाम की यात्रा पर जाने से पूर्व कण्वाश्रम में रुकना अपरिहार्य था. उनका आपस में क्या वार्तालाप और क्रियाकलाप होता होगा? किस प्रकार की दुष्वारियां उन्हें सहनी पड़ती होंगी? कम से कम वर्तमान में हम सभी की तरह तो नहीं. यात्रा के दौरान पिकनिक मनाने के बहाने ढ़ूढते, जहां-तहां रुकते, फोटो खिंचवाते और खाते-पीते हम भौतिकता में रत यात्री.
आप सभी के मन में जिज्ञासा उठ रही होगी कि आखिर मैं किस प्राचीन परिवेश का इतना धनाढ्य वर्णन कर रही हूं? अभी हाल ही में कण्वाश्रम जाने का संयोग मिला. उपरोक्त जो भी कहा मैंने इसी कण्वाश्रम के बारे में कहा है.
हममें से अधिकांश लोगों को ज्ञात नहीं होगा कि भरत की जन्मस्थली कहां है और उसका नाम क्या है? कण्वाश्रम उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार शहर से 14 कि.मी. की दूरी पर स्थित हमारी प्रसिद्ध प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है जिसे ऋषि कण्व का आश्रम (गुरुकुल) या भरत की जन्मस्थली भी कहा जाता है.
ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में केदारखंड की यात्रायें श्रद्धालुओं द्वारा गंगाद्वार (हरिद्वार )से कण्वाश्रम, मालिनी नदी के किनारे-किनारे महाबगढ, ब्यास घाट, देवप्रयाग होते हुए अनेक कष्ट सहकर पूर्ण की जाती थी. केदारखंड में भी कहा गया है कि कण्वाश्रम से आरंभ करके जहां तक नंदगिरी आता है उतना क्षेत्र पुण्य और मोक्ष देने वाला है.
कण्वाश्रम समारम्य याव नंदा गिरी भवेत
यावत क्षेत्रम परम पुण्य मुक्ति प्रदायक
कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है इसी की बानगी व पुनरावृत्ति हम कण्वाश्रम में देख सकते हैं. जहां जाकर हम वैदिक काल के उस स्वर्णिम व पवित्र युग में पहुंच जाते हैंजहां धर्म, संस्कृति, वेद, वेदांत, पुराण, योग, अध्यात्म, कला साहित्य, शास्त्र, ज्योतिष, दर्शन व आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करने हेतु विद्यार्थी देश ही नहीं अपितु विदेश से भी आया करते थे. हालांकि यह उस कालखंड की बात है जब नालंदा और तक्षशिला विश्व विद्यालय नहीं थे.
उपरोक्त गौरवशाली संस्कृति के स्मृति-खंड वर्तमान में कोटद्वार से 14 किमी दूर भाबर क्षेत्र में मालिनी नदी के दोनों तटों पर छोटे-छोटे आश्रम के रूप में दृष्टिगत हैं. जहां हमारे ऋषि-मुनियों की पारंपरिक शैली में शिक्षा देने की पद्धति आज भी कण्वाश्रम गुरुकुल के रूप में देखी जा सकती है.
लगभग 5500 वर्ष पूर्व महर्षि कण्व ने मालिनी नदी के तट पर कण्वाश्रम गुरुकुल स्थापित किया था. समय के साथ-साथ गुरुकुल की ख्याति फैली और गुरुकुल कण्वाश्रम में परिवर्तित हो गया. कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या दस से पच्चीस हजार बढ़ गयी थी.
कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण व प्राकृतिक आपदाओं से प्राचीन कण्वाश्रम का विध्वंश हुआ. आज भी प्राचीन युग की इस धरोहर के भग्नावशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं और कभी-कभी मालिनी नदी के बहाव में ऊपर आ जाते हैं.
कण्वाश्रम उत्तराखंड के गढ़वाल जनपद कोटद्वार की शिवालिक श्रेणी की तलहटी में हेमकूट और मणिकूट पर्वतों की गोद में अवस्थित है जो कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है. नीरवता के सघन जंगलों से घिरे हुए इस कण्वाश्रम को एक प्राचीन पवित्रभूमि माना गया है. जहां ऋषि कण्व व विश्वामित्र जैसे महान ऋषि ध्यान किया करते थे. कण्वाश्रम में चारों वेद, व्याकरण, छन्द, निरूक्त, ज्योतिष, आयुर्वेद, कर्मकांड आदि के अध्यापन की व्यवस्था थी.
भारत को वैदिक काल से ही ऋषि-मुनियों की धरती कहा जाता है. हिंदू धर्मग्रंथों को टटोला जाये तो लगभग सभी ग्रंथों में ऋषि, मुनियों द्वारा किये गये जप-तप और अपनी शक्तियों से अर्जित किये गये ज्ञान और विज्ञान का वर्णन मिलता है. इन्हीं प्रसिद्ध ऋषियों में एक ऋषि कण्व हुए है. ऋषि कण्व महर्षि कश्यप के पुत्र थे.
कहा जाता है कि 103 सूक्त वाले ऋग्वेद की आठवें मण्डल के अधिकांश मंत्र महर्षि कण्व तथा उनके वंशजों व गोत्रजों द्वारा उच्चारित हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्व ऋषि ने ही व्यवस्थित किया है. धार्मिक किंवदंतियों के अनुसार महर्षि कण्व ने एक स्मृति की भी रचना की है जिसे कण्वस्मृति के नाम से जाना जाता है.
कण्वाश्रम में मालिनी नाम की जो नदी बह रही है कहा जाता है कि यह वही मालिनी नदी है जिसका कि पुराणों में भी ज़िक्र है. मालिनी नदी आज भी अपने उसी प्राचीन स्वरुप में बह रही है और भाबर क्षेत्र को अभिसिंचित कर सुख-समृद्धि प्रदान कर रही है.
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कण्वाश्रम के बारे में लिखा जाये और कालिदास द्वारा लिखे गए अभिज्ञान शाकुंतलम का ज़िक्र न हो ऐसा नामुमकिन है. दरअसल कण्वाश्रम को जानना शकुंतला के बारे में जाने बिना अधूरा है. शकुंतला शब्द का अर्थ है चिड़ियों द्वारा लायी गयी. शकुंत शब्द संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है चिड़िया संभवतः इसी अर्थ वश ऋषि कण्व ने शकुंतला को यह नाम दिया.
एक बार ऋषि विश्वामित्र की कठोर तपस्या से स्वर्ग के राजा इन्द्र अत्यंत विचलित हो गये थे. उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने अद्भुत सुंदरी अप्सरा मेनका को धरती पर भेजा. मेनका ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने में सफल हो गयी. विश्वामित्र और मेनका के परिणय से एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम शकुंतला रखा गया. शकुंतला जब छोटी सी थी, मेनका उसको ऋषि कण्व के आश्रम में छोड़कर स्वर्ग वापिस चली गयी. हालांकि यह प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठ रहा है कि मेनका ने नन्हीं बालिका शकुंतला को ऋषि कण्व के पास क्यों छोड़ा? ख़ैर यह प्रश्न यहीं पर छोड़ते हैं.
मेनका के द्वारा शकुंतला को छोड़कर जाने के पश्चात शकुंतला का लालन-पालन ऋषि कण्व ने ही किया इसलिए वे शकुंतला के धर्म-पिता कहलाये.
एक जनश्रुति यह भी है कि मेनका द्वारा शकुंतला को छोड़ने के पश्चात ऋषि विश्वामित्र ने शकुंतला को मालिनी नदी में एक बांस की टोकरी में बहा दिया जिसे महर्षि कण्व ने प्राप्त किया. शकुंतला पक्षियों से घिरी हुई थी इसलिए कण्व ऋषि ने नन्ही बालिका को शकुंतला नाम दिया.
कण्वाश्रम ऋषि कण्व का वही आश्रम है जहां हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत ने आखेट खेलते हुए विश्वामित्र व मेनका की कन्या शकुंतला को पशु-पक्षियों के साथ खेलते हुए देखा और जिस शकुंतला ने राजा दुष्यंत को अहिंसा का पाठ पढ़ाया. इसी कारण दुष्यंत शकुंतला पर आसक्त हो गये. इसी कण्वाश्रम में शकुंतला और दुष्यंत के गंधर्व-विवाह के उपरांत भरत का जन्म हुआ. भरत का बचपन कण्वाश्रम में शेर के बच्चों के बीच खेलते हुए बीता. इसी भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा. भरत को सर्वदमन भी कहा जाता है क्योंकि उसने एक विशाल भूखंड पर राज किया.
कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम में भी कण्वाश्रम का परिचय इस प्रकार से मिलता है — “एस कण्व खलु कुलाधिपति आश्रम”
कण्वाश्रम के आस-पास बिखरे हुए प्राचीन साक्ष्य अर्थात भग्नावशेष यहां किसी गढ़ या आश्रम होने की पुष्टि करते हैं. कण्वाश्रम के ऊपर काण्डई गांव के पास आज भी एक प्राचीन गुफा है जिसमें तीस-चालीस व्यक्ति आराम से निवास कर सकते हैं. कण्वाश्रम में तीन दिन का बसंत पंचमी का मेला ‘कण्वाश्रम विकास समिति (प्रख्यात स्थानीय लोगों की निकाय) द्वारा आयोजित किया जाता है. जहां स्थानीय स्कूली बच्चों और लोक कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुति दी जाती है.
कण्वाश्रम जाकर मुझे किसी दैवीय शक्ति की अनुभूति नहीं हुई, बस हदय ने यह महसूस किया कि क्या यह हमारी वही वैदिक परंपराओं और संस्कृतियों की जन्म-स्थली है? जहां से मंत्र और श्लोक हवाओं में गूंजे ज्ञान-विज्ञान का प्रसार हुआ और विभिन्न विषयों पर आख्यान और अभिलेख लिखे गये. आज उपेक्षित सी पड़ी हुई है, जैसे कि पुरातन को सहेजने की खाना-पूर्ति. जबकि यह हमारे देश भारत की आत्मा और शरीर है जहां चक्रवर्ती राजा भरत का जन्म हुआ जिसने विशाल भूखंड पर राज करके राष्ट्र के रूप में इसका एकीकरण किया. क्या इस राष्ट्रीय उत्सर्जन की ख्याति विश्वभर में नहीं होनी चाहिए? जिसने हम सभी भारतवासियों को धनाढ्य संस्कृति प्रदान की है और भारत नाम से हमें एक पहचान दी है. यह हम सभी के लिए चिंतनीय और सरोकार का विषय होना चाहिए. (Kanvashram Vishwamitra Menaka Shakuntala)
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