फोटो: डॉ. सबीने लीडर
(पिछली क़िस्त का लिंक – जोहार घाटी का सफ़र – 2)
काफी देर बाद यह सहमति बनी कि कैमरे दे दिए जाएं और कल शंकर भाई की हालत देखकर आगे जाने या न जाने का विचार किया जाएगा. कैमरों को फौजी साथियों को थमाते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे कलेजा निकाल के दे रहे हों. सामान लेकर दोनों जन घुप्प अंधेरे में गायब जैसे हो गए. कुछ देर तक हम उन्हें देखने की कोशिश में लगे रहे लेकिन कुछ नहीं दिखा तो अंदर सैल्टर में आ गए. फौंजी इन जगहों से रचे—बसे जो ठैरे!
नींद आने लगी थी. गोविंद और नर बहादुर सो चुके थे. शंकर भाई दर्द से कराह रहा था तो राजदा शंकर की तिमारदारी में लग गए. उसे गर्म पानी पिलाया और उसके पेट और पैरों की तेल से मालिश करने में लग गए. मैं थकान महसूस कर रहा था तो चुपचाप स्लीपिंग बैग में घुसा ये सब देख रहा था. काफी देर बाद शंकर भाई के चुप होने पर राजदा को लगा कि उसे नींद आ गई है तो वो भी सोने की कोशिश करने लगे. आज राजदा काफी परेशान थे लेकिन वो जाहिर नहीं कर रहे थे. रात में तकरीबन तीनेक बजे मेरी नींद खुली तो देखा शंकर भाई दर्द से तड़फ रहे हैं और राजदा उसे ढाढस बंधाने में लगे हैं. मैं भी उठा गया. शंकर भाई को कहा कि सुबह होने पर हम वापस लौट पड़ेंगे तब तक वो थोड़ा धैर्य रख ले. शंकर भाई अपने आप में ही बड़बड़ा रहा था.’मुझे डाकधर सैप ने मना किया था हिमालय में जाने को. पिशाब में परेशानी है करके. मैं गरीब आदमी ठैरा हो सैप क्या करता. सोचा कुछ कमाई हो जाएगी और बच्चों के लिए कुछ लता कपड़ा मिल जाएगा. मेरा भाग्य ही खराब ठैरा हो सैप. आप लोगों को भी परिशान कर दिया हो. सैपो डाकधर ने बताया भी था कि मुझे पेट की बीमारी है उप्पर मत जाना नहीं तो पेट फट जाएगा. वैसा ही हो रहा है सैपो. क्या करूं. मुझे माफ कर देना हो सैपो.’
शंकर को हम चुप रहने को कहते रहे लेकिन दर्द में वो सुबह तक बकबक करते रहा. पौ फटी तो राजदा बाहर को निकले. बाहर बाल्टियों का पानी ठंड में बर्फ हो जम गया था. स्टोव में बर्फ गलाते हुए राय बनी की सभी जन वापस जाएंगे. शंकरदा को इस हालत में नहीं छोड़ सकते. शंकरदा को हमने धीरे—धीरे नीचे को उतरने को कहा. वो एक लाठी लेकर शराबी चाल में कुछ कदम चलता और बैठ जाता. उसका सामान हमने आपस में बांट लिया. एक घंटे में हम आधा किलोमीटर भी नहीं चल सके तो मैंने अपना रूकसैक किनारे रखा और शंकरदा को पीठ में ले लिया. बमुश्किल वो तैयार हुवा. अब मेरी हालत खराब होनी थी. शंकर भाई को नीचे की ओर सौ-एक कदम तक ले जाकर फिर वापस अपना रूकसैक लेने वापस जाना हुवा. विक्रम—बेताल की इस प्रक्रिया में बेताल बना शंकर दर्द में रोते हुए कह भी रहा था, ‘मालिक साहब ये काम तो हम करने वाले ठैरे और मुझे आज ये दिन देखना पड़ रहा है. सैप मैं बच जाउंगा तो आपका एहसान कभी नी भूलूंगा हो सैप. सैप मुझे आंत की बीमारी थी हो. डाकधर ने मना किया था हो. क्या करूं सैप. अब ये दिन भी देखना होगा फिर मुझे भी.’शंकरदा की बातों सें मैं चौंका. उसे नीचे बिठाकर मैं उप्पर अपना रूकसैक लेने गया तो नर बहादुर ने गुस्से में शंकरदा को गाली दी और मेरा रूकसैक अपने सामान के उप्पर रख लिया.
मैंने जब राजदा को शंकर भाई की बात बताई तो वो चौंकते हुए बोले, ‘अरे! इसका मतलब उसे पैप्टिक अलसर है. अब क्या होगा. चलो जल्दी. इसे हाईट से जल्दी नीचे पहुंचाना होगा. नहीं तो परेशानी होगी.’ मैं भागता हुवा शंकर भाई के पास पहुंचा और उसे पीठ में लाद दो—तीन बार रास्ते में सुस्ताने के बाद उसे दुंग में पहुंचा दिया. हमें वापस देख यहां सब चौंके. हमने उन्हें बताया कि शंदरदा का स्वास्थ्य खराब हो गया है. पेट में बहुत दर्द है तो एक फार्मेसिस्ट जवान अपना दवाईयों का पिटारा ले आए. उन्हें शंकर भाई की बीमारी बताई तो उन्होंने कुछ दवाईयां देकर उसे जल्द मिलम ले जाने को कहा. हम सब बुरी तरह से थक गए थे तो उनसे मदद मांगी. राजदा का मित्र जवान और दो अन्य जवान तैंयार हो गए. दो लकड़ियों में रस्सी से स्ट्रेचर बनाकर शंकरदा को उसमें लिटाया. लेकिन शंकरदा तुरंत ही पेट पकड़ कर बैठ गए.
उसके पेट का दर्द बढ़ गया था. राजदा ने स्ट्रेचर को कुर्सी वाला बनाया तो शंकरदा को उसमें बैठने में थोड़ा आराम मिला. बटालियन पंडित और दूसरे साथी ने कुर्सीनुमा स्ट्रेचर को कंधों में डाल दुंग से नीचे उतरना शुरू कर दिया. मुझे कैमरे चुपचाप वापस कर दिए थे. हम सभी तेजी से नीचे ढलान की ओर उतरते चले जा रहे थे. नीचे ग्वांख नदी का पुल पार करने के बाद अब खड़ी चढ़ाई में पतली सी पगडंडी दिख रही थी. हम पहले मिलम से जब यहां को आए थे तब अंधेरे की वजह से कुछ नहीं दिखा था. आज ये रास्ता देख सिहरन हो रही थी. इस पतले रास्ते में शंकरदा को ले जाना मुश्किल हो रहा था तो एक जवान ने शंकरदा को पीठ में लादा और नदी के किनारे कम बहाव में से पहाड़ी के किनारे—किनारे जाना शुरू कर दिया. बर्फीले पानी वो सधे कदमों से चल रहा था. पचासेक मीटर बाद फिर उप्पर रास्ते में आ गया. यहां से फिर स्ट्रेचर में शंकरदा को लाद दिया गया. शंकरदा का चेहरा मुर्झा गया था. आंखों के कोर से आंशू की बूंदे उनके सूखे गालों में चमक रही थी.
कुछ घंटे चलने के बाद रास्ते में सब सुस्ताने को रूके तो रास्ते के उप्पर पहाड़ी में झाड़ियों में से दोएक जवान जिन्न की तरह प्रकट हुए. एक बार के लिए मैं घबरा सा गया. उन्हें जब हालात के बारे में पता चला तो वो हमें अपने ठिकाने में ले गए और जिद्व करके चाय पिलाई. यहां से एक और जवान भी हमारे साथ हो लिया. हम सभी तेज कदमों से मिलम की ओर चल रहे थे. मिलम में आईटीबीपी के कैम्प में ईलाज की काफी कुछ इंतजाम थे. अंधेरा घिरने को आया तो दो जवानों ने कहा कि वो मिलम जाकर डाक्टर और अन्य साथिंयों को ले आते हैं. मिलम यहां से अभी दो किलोमीटर दूर था. रास्ते में हम सभी शंकरदा को किनारे बिठाकर सहायता के इंतजार में ठहर गए. हम सभी थककर चूर हो गए थे. रास्ते से जो जवान हमारे साथ आया था वो भी हमारे साथ रूक गया था. उसने रास्ते के किनारे से कुछ हरी टहनियां तोड़कर उनमें आग लगाई तो वो पेट्रोल की तरह जल उठी. आग से शंकरदा को गर्मी देने की कोशिश की जा रही थी. शंकरदा का शरीर धीरे—धीरे शांत जैसा होता जा रहा था. मैं किनारे से सूर्यास्त के नजारे को कैमरे में कैद कर रहा था कि राजदा कि आवाज आई. ‘भट्टजी!’
मैंने कैमरा बंद किया और दौड़कर भागा. शंकरदा के मुंह में राजदा पानी डाल उसे पिलाने की कोशिश कर रहे थे. कुछ पलों बाद शंकरदा हम सबको हक्काबक्का सा छोड़कर अनंत यात्रा को चल दिए. हम सभी सुन्न से हो गए. आग जलने में थी लेकिन शंकरदा की लौ बुझ चुकी थी.
साथ वाला जवान चुपचाप सा बीढ़ी पीने में लगा था. बीढ़ी से ‘दम’ की गंध आने लगी. वो सुन्न हो बार—बार बीढ़ी भर—भर कर पीने में लगा था. ‘दम’ ने उसे और डराकर रख दिया था. मैं मिलम वाले रास्ते की ओर कुछ दूर इस आश में निकल गया कि क्या पता डाक्टर आए और कुछ चमत्कार सा हो जाए. घुप्प अंधेरे में अकेले चलते—चलते मुझे भी डर लगने लगा तो मैं वापस आ गया. राजदा, गोविंद, नरबहादुर और जवान साथीं चुपचाप बैठे थे. आधे घंटे बाद दूर मशाल की लौ दिखी जो नजदीक आती जा रही थी. मैं उनकी ओर भागते हुए गया. करीब दर्जन भर जवानों का दल पास आया तो एक ने मुझसे पूछा कि, ‘क्या हालात हैं उसके.’ मैंने कहा कि वो चुपचाप है. डाक्टर ने पास आकर शंकरदा के शरीर में आला लगाकर चैक किया और बोला.’ही इज डैड.’
डाक्टर मुझसे जोर में आने लगा कि मैंने उसे क्यों नही बताया कि वो मर चुका है. मेरे मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, ‘सर! आई एम नॉट ए डाक्टर एंड नॉव यू डिक्लेयरड दैट ही इज डैड दैन आई केन से शंकर इज डैड.’
वो अपने साथ आर्मी का हरा वाला स्ट्रेचर लाए थे. शंकरदा को स्ट्रेचर में लादा गया और मिलम तक सभी जवान आपस में कांधा बदलते रहे. मिलम पहुंचने तक नौ बज गए थे. उन्होंने स्ट्रेचर को पीडब्लूडी के रेस्ट हाउस के पीछे रखा और चुपचाप चले गए. राजदा के मित्र जवान ने राजदा को कुछ कहा और राजदा ने हमें कहा कि वो परमिट की फार्मिल्टी करके आते हैं.
मैं और गोविंद चुपचाप बरामदें में बैठ गए. शंकरदा स्ट्रेचर में ही लेटे थे कभी न उठने के लिए. कुछ देर बाद दो जवान आए और टिन के दो डिब्बों में आग जलाकर चले गए. टिन का डिब्बा लेक्टोजन दूध का था जिसमें आधी से ज्यादा रेत भरी थी और उसमें मिट्टीतेल डाल रखा था. मेरे लिए ये डिब्बे कौतूहल से कम नहीं थे. ये डिब्बे आधी रात तक जलते रहे. आधे घंटे बाद राजदा वापस आ गए. उन्होंने बताया कि शंकर राम के घर मुनस्यारी को वायरलैस कर दिया है. कल को वहां से उसके भाई और कुछ गांव वाले मिलम को चलेंगे. अचानक चारेक जवान आए और हमारे सामने कुछ बर्तनों में रोटियों का पहाड़ और दाल—सब्जी रख कर चुपचाप चले गए. भूख तो शंकरदा के साथ ही चली गई थी सो खाना किनारे रख दिया.
बूंदाबांदी होने लगी तो स्ट्रेचर को अंदर बरामदे में रख अपने—अपने रूकसैक का लधार लेकर अधलेटे हो लिए. देर रात में किसी ने पीडब्लूडी का दरवाजा खोल दिया और हमें अंदर चले जाने को कहा. अंदर कमरा पूरा खाली था. मैट्रस और स्लीपिंग बैग निकाल लिए. स्टोव भी जला लिया. शंकरदा को भी मैंने स्ट्रेचर से कमरे में ही एक कोने में रख दिया. रेडियो के कान उमेठे तो उसमें से पुराने गाने बजने लगे. गोविंद और नरबहादुर सो गए थे.
डेढ़ बजे तक रेडियो ने बखूबी साथ दिया और उसके बाद वो भी सो गया तो नींद के झौंके आने लगे. इस पर राजदा ने घर से लाए नमक की पोटली निकाली. दोनों ने हरी मिर्च वाला नमक जीभ में डाला तो नींद ने दौड़ लगा दी. आंखों से आंशूओं की बरसात होने लगी. मिर्च वाला नमक झन्नाटेदार था जिसने चार बजे तक मुझे जगाए रखा.
गोविंद और नर बहादुर को ड्यूटी के लिए जगाया और हम दोनों आठ बजे तक सोते रहे. आंख खुली तो बाहर को निकले. शंकरदा अपने स्ट्रेचर में लेटे थे. दिन में किसी ने कहा भी कि मुर्दे को उल्टा खड़ा करके रखो नहीं तो ये जिंदा हो जाएगा. हम तुरंत ही बोले ये जिंदा तो हो हम वही तो चाहते हैं. चाहे भूत बनके ही जिंदा हो. हो तो सही.
दिन में दाल—चावल बनाकर खाया. आईटीबीपी का कोई भी जवान हमारे पास नहीं फटक रहा था. उन्हें उनके साहब ने हमसे दूर रहने को कह दिया था. राजदा एक बार फिर आईटीबीपी कैंप की ओर जानकारी लेने के लिए निकल गए. घंटे भर के बाद वो आए तो उन्होंने बताया कि शंकरदा के ताउ का लड़का और पांचेक गांव वाले चल पड़े हैं, परसों तक यहां पहुंच जाएंगे. वो आईटीबी का सामान भी ला रहे हैं. उनका काम पोर्टर का है और अकसर वो आईटीबीपी का ही सामान ढोते हैं.
डांक बंगले के बाहर हम धूप में बैठे थे लेकिन तीखी हवा काफी परेशान कर रही थी तो दीवार की आड़ में घास में लेट गए. दिन में राजदा का मित्र जवान आया और उसने बताया कि यहां चर्चा चल रही है कि आप लोगों ने शंकरदा को मारा है. उसे जानबूझकर ज्यादा सामान के साथ चलाया जिससे उसकी डैथ हो गई. चर्चा तो यह भी चल रही थी कि हमने शंकरदा को रस्सियों से बांधा भी बल.
उसने हमसे कैमरे कैंप में जमा कराने को कहा. उसने आश्वासन दिया कि वो किसी भी हालत में बाद में कैमरे ले आएगा. अभी साहब लोग कह रहे हैं कि इनके कैमरों की चैकिंग की जाएगी कि इन्होंने क्या कुछ वीडियो और फोटो लिए हैं यहां के. मन मसोम कर कैमरे एक बार उन्हें देने पड़े. वो कैमरों को लेकर चला गया. अब हमें ये चिंता होने लगी कि शंकरदा के परिवार वाले आते हैं तो ये न जाने उन्हें क्या—क्या कहते हैं.
पेट में कल से कुछ गया नहीं था तो बाहर ही खिचड़ी बनाकर सबने पेट पूजा की. दोपहर के समय नर बहादुर भी गांव में किसी से मिलने जाता हूं कहकर चला गया. देर शाम तक भी जब वो नहीं लौटा तो चिंता होने लगी. राजदा ने मुझे और गोविंद को उसे ढूंढने के लिए भेज दिया. मिलम गांव काफी बड़ा और भूलभूलैया वाला है. नदी के किनारे के रास्ते से हम गांव के अंतिम छोर में पहुंचे तो वहां दूकान में उसके बारे में पता किया. उन्होंने बताया कि वो पीछे की गलियों में किसी के घर में होगा वहीं मिलेगा. उन गलियों में अंदर जाते—जाते हम खुद ही चक्कर में पड़ गए कि जाना किधर को है. बार—बार घूमकर हम एक ही जगह में वापस आ जा रहे थे. अंधेरा तेजी से होने लगा था. नर बहादुर का कहीं अता—पता नहीं था. गांव के उप्पर दुंग वाले रास्ते में मंदिर में बल्ब भी जल गया था. उसी बल्ब को लक्ष्य कर हम दोनों खंडहर हो चुके घरों की दीवारों को कूदते—फांदते गांव से बाहर निकल मुख्य रास्ते में आए तो चैन की सांस ली. दोबारा यहां नहीं आने की कसम ली और ठिकाने की ओर तेजी से चलने लगे. अंदर पहुंचे तो देखा राजदा स्टोव में तवे में रोटी बनाने में लगे थे. सब्जी उन्होंने बना ली थी. हम दोनों को शर्मिंदगी जैसी हुवी. राजदा बोले, ‘खाली बैठा था और कई दिनों से ढंग से खाना भी नहीं खाया था तो सोचा आज रोटी—सब्जी ही बना लूं.’
बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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Could you update the link of the second and first parts in the series embedded in the beginning of this post.
Thank you.