समाज

काली कुमाऊं के जिमदार देवता अर्थात भूमिया की कथा

भूमि के देवता के रूप में जिमदार, भूमियाँ व क्षेत्रपाल, इन तीन नामों से पूजा जाता है. भूमिया जो भूमि का स्वामी, गाँव का रक्षक, पशुओं तथा खेती की देखभाल करने वाला ग्राम देवता है, इसी को कुछ लोग जिमदार के रूप में मानते हैं. प्रत्येक लोकदेवता को संतुष्ट करने के लिए विशेष अवसरों, पर्वों, समारोहों के आयोजन में इनकी गाथाएं सुनाई जाती हैं. उदाहरण के लिए जिमदार की ‘भाग’ इस प्रकार है:
(Jimdar or Bhumiya Devta)

कहते हैं एक बार एक हुड़क्या (हुड़का बजाने वाला) भीख मांगते हुए एक जिमदार (खेतिहर या किसान) के घर पहुंचा. उस समय जिमदार घर पर नहीं था, उसकी बूढ़ी माता जो आँख नहीं देखती थी, घर पर थी. उसने भूलवश हुड़क्या को अन्न के धोखे में एक सूप कालीमिर्च दे दी. यही हुड़क्या जब भीख माँगता हुआ राजा के महल में पहुंचा तो राजा की दी हुई भीख से संतुष्ट नहीं हुआ. इस पर उसने राजा को ताना मारा. राजा अपनी खीझ मिटाने के लिए अपनी सेना लेकर जिमदार पर चढ़ बैठा. इस पर जिमदार घबड़ा गया. उसने अपने कुत्ते, बिल्ली समेत चौबीस प्राणियों के अपने कुनबे को घर में दरवाजा बंद कर के लखौर (आग लगाकर जल मरना) कर लिया. वही जिमदार बाद में ग्राम देवता बन कर पूजा जाने लगा.

जिमदार या भूमिया किसी व्यक्ति पर चिपट कर अन्य देवी देवताओं की भाँती अपना रोष प्रकट नहीं करता, बल्कि उसके कुपित होने का लक्षण खेती-पाती को जंगली पशु-पक्षियों या चूहों के उत्पात में देखा जाता है.

कभी-कभी पशुओं में दूध कम होने, दूध के साथ रक्त चूने, दुधारू अप्शु द्वारा दूध देने में परेशान करने आदि में भी जिमदार देवता की मान-बिन्ती (मान-मनौवल) करने से लाभ होता है. उसे वर्ष में एक बार बकरा चढ़ाया जाता है. उसके मंदिर में स्थानीय गोल-मटोल पत्थरों को लिंग के रूप में स्थापित करके पूजते हैं. मंदिर को थान कहते हैं. घरों में धार्मिक कर्मकांडों में ग्राम देवता का भाग अवश्य रखा जाता है.
(Jimdar or Bhumiya Devta)

सभी देवी-देवताओं के साथ ‘ग्रामदेवताभ्यो नमः’ कह कर पुरोहित उसके नाम का भी स्मरण करता है. इन ग्राम देवताओं की वर्ष में दो बार होने वाली पूजा को जातो या नौं नेगी (नया अन्न चढ़ाना या नवां का नेग या उपहार भेंट करना) कहलाता है. प्रत्येक गाँव में भूमिया या जिमदार का एक डंगरिया (जिस पर आवेश या अवतार होता है) अवश्य होता है. प्रत्येक घर से आई पूजा की सामग्री व भेंट-उपहार उसको और पूजा कराने वाले ब्राह्मण को बंटता है. अपने डंगरिया में अवतार लेकर वह ग्रामवासियों के सामने अपनी मांग रखता है और उनका भला करने का वचन देता है.

गाँव वाले मिलकर वर्ष भर में एक बार देवता के नाम से जागौ, जागर या ढवला आदि जहाँ जैसा प्रचलन हो, लगाते हैं. जागौ या जैगौ में उसी देवता की गाथा गई जाती है. जागर में उस देवता की संतुष्टि के लिए पांडवों की लोक-प्रचलित गाथा सुनाई जाती है और ढवला (कई देवी-देवताओं की सामूहिक स्तुति तथा गुणगान) का आयोजन किया जाता है. इन अवसरों पर ढोल या नगाड़ों से देवता के नाम पर नौबत अवश्य बजती है.
(Jimdar or Bhumiya Devta)

–डॉ. राम सिंह

(प्रस्तुत आलेख ‘पहाड़’ द्वारा प्रकाशित डॉ. राम सिंह की पुस्तक ‘राग-भाग काली कुमाऊं’ से साभार लिया गया है.)

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

दुनिया में सबसे पहले चावल की खेती चूहे और चुहिया ने की: कुमाऊनी लोककथा

-काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कुमाऊं में रामलीला की परम्परा

सांस्कृतिक परम्परा की दृष्टि से उत्तराखण्ड एक समृद्ध राज्य है. समय-समय पर यहां के कई…

3 days ago

‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…

जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी से कल शाम मुलाकात हुई. दरअसल,उनके निर्देशन में…

3 days ago

हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा के मुख्य आकर्षण में से एक रामलीला का मंचन इन…

3 days ago

‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है

लोग इसे पहाड़ और पलायन की कहानी की तरह देखेंगे. लोग इसे खंडहर होते जा…

5 days ago

धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’

पिछली कड़ी : सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन संघर्षनामा का ये किस्सा आजादी…

6 days ago

गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी

गाँव में सब उसे जानते थे. कोई उस के पास सब्जी लेने आता तो वह…

1 week ago