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सर्वेक्षण विभाग के 250 वर्षों के बदलावों को दर्शाती पुस्तक ‘ग्लिम्पसेज़ ऑफ सर्वे ऑफ इण्डिया’

शनिवार 2 नवम्बर, 2019 को दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र देहरादून के तत्वाधान में होटल इन्द्रलोक के सभागार में ब्रिगेडियर के.जी.बहल, भूतपूर्व उप-महासर्वेक्षक, सर्वे ऑफ इण्डिया की पुस्तक ‘ग्लिम्पसैस ऑफ सर्वे ऑफ इण्डिया-कवरिंग 250 इयर्स’ पर चर्चा का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया.  (Glimpses of Survey of India Book)

कार्यक्रम में इस पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया. सर्वे ऑफ इण्डिया की पूर्व पुस्तकालयध्यक्ष सी.के. मामिक ने इस पुस्तक पर लेखक ब्रिगेडियर के.जी.बहल से बातचीत की. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता सुपरिचित समाजसेवी डॉ. एस.फारूख ने की.  (Glimpses of Survey of India Book)

कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवम् शोध केन्द्र के निदेशक प्रो. बी.के.जोशी ने कार्यक्रम में आये सभी लोगों का स्वागत किया और दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रमों की जानकारी दी. इस कार्यक्रम में पुस्तक के लेखक ब्रिगेडियर के.जी.बहल ने सर्वेक्षण विभाग द्वारा सर्वक्षण में प्रयुक्त यन्त्रों और सर्वेक्षण के कार्यो पर तथायात्मक प्रकाश डाला.  

इस कार्यक्रम में देहरादून नगर के प्रतिष्ठित साहित्यकार, समाज विज्ञानी, साहित्य प्रेमी, संस्कृति और कला से जुडे लोग, समाजसेवी पुस्तकालय सदस्य और दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सदस्य समेत शहर के तमाम लोग मौजूद रहे.

इस पुस्तक में सर्वेक्षण विभाग के 250 वर्षों के बदलावों को दर्शाया गया है तथा विभिन्न परिस्थितियों में किए गए नक्षों के सर्वेक्षण में किस किस तरह के यन्त्रों तथा उपकरणों में बदलाव तथा उनके उपयोग को चित्रित किया गया है. ( Glimpses of Survey of India Book ) 

इस पुस्तक में यह बताया गया है कि पहले कितने बड़े यन्त्र थे और उन्हें उंची-उंची पहाड़ी पर ले जाना कितना कठिन होता था.  सर्वे के दौरान उन र्दुगम क्षेत्रों में जहां पर आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं वहां कार्य करना कितना जोखिम भरा होता था वह भी इस पुस्तक में बताया गया है.  

इसके साथ ही बिना मानचित्र व आवागमन की सुविधाओं के न होने व रास्तों में घने जंगल, जंगली जानवर तथा आक्रामक जन जातियां का भी सामना भी करना होता था.  उस समय न तो कोई कम्प्यूटर थे और न ही कोई अन्य आधुनिक सुविधाएं.  सभी कार्य खुद ही करने पड़ते थे.

सर्वे आफॅ इण्डिया की स्थापना 1776 में मेजर रेनल द्वारा कोलकाता में हुई थी और इसका ज्यामीतीय सर्वेक्षण मेजर विलियम लैम्ब्टन द्वारा 1802 में चेन्नई (तब मद्रास), मैरिडोनयल आर्क द्वारा प्रारम्भ किया गया था.  

इस दीर्घ सफर में पुस्तक में विभिन्न झांकियां दर्शायी गई हैं, जो देखने वालों का मन मोह लेंगी.  पुस्तक आर्ट पेपर पर प्रकाशित की गई है जिसमें सर्वे से सम्बन्धित सभी यन्त्रों व उपकरणों को देखा जा सकता है.  यह पुस्तक कॉफी टेबल बुक के रूप में है.  मुखपृष्ठ में माउण्ट एवरेस्ट का चित्र सहज आकर्षित करता है.

देहरादून से चंद्रशेखर तिवारी की रिपोर्ट.

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चंद्रशेखर तिवारी. पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड ,देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.

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