समाज

‘गरमपानी का रायता’ भुलाये नहीं भूलता जिसका स्वाद

कुमाऊं के गांव से जुड़े पहाड़ी को भले अपनी उमर ठीक से याद हो या न हो पर उनको गरमपानी का रायता जरुर याद रहता है. पहाड़ों से दशकों पहले बाहर चली गयी बहु बेटियों के मुंह में आज भी गरमपानी के रायते का नाम सुनकर पानी आ जाती है उनके लिये तो आज भी गरमपानी मतलब ठेकी में जमे दही लजीज रायता ही है. लाल मिर्च के साथ सिलबट्टे में पीसे राई, धनिया और हल्दी का मिश्रण जब कोरी हुई ककड़ी के साथ ताजे दही में मिलता है तो फिर रायता फैलता नहीं डब्ब से थाली में आ जाता है.
(Garampani ka Raita)

अल्मोड़ा और नैनीताल से बराबर 30 किमी की दूरी में पड़ने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव गरमपानी हुआ करता था. करता था इसलिए क्योंकि आज के समय में 30 किमी की दूरी एक सामान्य दूरी मानी जाती थी पर पहले के समय बसें इतनी दूरी तय करने के बाद पानी मांगने लगती. अल्मोड़ा-हल्द्वानी मार्ग पर गरमपानी एक ऐसा अड्डा था जहां बस के चालक, सवारी और ख़ुद बस अपना दम भरते.

एक थका देने वाले सफ़र के बाद अगर रायते जैसी चीज मिले तो कौन ही जो मना करे. गरमपानी के रायते का स्वाद ही था जो अधिकतर पहाड़ी यहां पर पहाड़ की बनाई लोक-लज्जा एकबार के लिये किनारे रखकर बस स्वाद लेते. गांव लौटने पर इस बात कोई हो हल्ला भी न था क्योंकि गरमपानी के रायते का स्वाद सबको एक जो कर देता. गरमपानी के रायते पर वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रशेखर बेंजवाल लिखते हैं-   

पुरातन समय से यह मल्ला, तल्ला दानपुर, कत्यूर घाटी, गगास घाटी, बारामंडल क्षेत्र, रानीखेत छावनी के फौजी अफसरों व सिपाहियों और गढ़वाल के लोहबा, खनसर, बधाण से हल्द्वानी आने वाले पदयात्रियों के लिए सफर की थकान के दौरान सुस्ताने और जलपान लेने का ठिकाना रहा गरमपानी.
(Garampani ka Raita)

बाद में ब्रिटिश काल में हल्द्वानी से अल्मोड़ा के बीच गरमपानी होते हुए लोअर अल्मोड़ा रोड बनी तो इस रोड पर गाड़ियों की आवाजाही शुरू हो गई. तब सड़क एकमार्गीय थी और गरमपानी में बैरियर लगाकर एक तरफ की गाड़ियों को ही निकलने दिया जाता था. बैरियर के कारण यहां वाहन रुकने शुरू हुए तो यात्रियों की भीड़ लगनी शुरू हो गई. चाय आदि तो बिकनी ही थी.

थके-मांदे, पहाड़ की सर्पीली सड़कों के सफऱ में हिचकोले खाते और मिनट-मिनट पर उल्टियां करके आते यात्रियों के लिए ये रायता भी बनना शुरू हो गया. क्वारब व आसपास के गांवों में उन दिनों दूध की प्रचुर उपलब्धता थी. जो बाल मिठाई बनने के लिए अल्मोड़ा जाता था और दही जमाने के लिए गरमपानी आता था. इसी दही से बनता था गरमपानी का यह गजब रायता. इस रायते की एक कटोरी पीते ही उल्टी के कारण कसैली हो चली जीभ भी दुरुस्त हो जाती और बदन भी नए सिरे से तरोताजा हो जाता और यात्री ताजादम हो आगे के सफर पर चल पड़ते.
(Garampani ka Raita)

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

दुनिया में सबसे पहले चावल की खेती चूहे और चुहिया ने की: कुमाऊनी लोककथा

-काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

3 days ago

कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा

बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ…

2 weeks ago

दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है

हमारे इलाक़े में लंगड़ा आम अमूमन इन्हीं दिनों यानी जून के तीसरे-चौथे हफ़्ते में सलीके…

2 weeks ago

उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

पिछली कड़ी : एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता हिमालय को जानने समझने व…

1 month ago

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस…

1 month ago

रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का…

1 month ago