संस्कृति

उत्तराखण्ड में लोकविश्वास

“मामा आ गए-मामा आ गए,” चहकती हुई शारदा माँ के पास आई. माँ बोली, “मैं ना कहती थी, कोई मेहमान आने वाला है. आज सुबह से मुंडेर पर बैठ कौआ काँव-काँव किए जा रहा है.” (Folk Beliefs in Uttarakhand)

अतिथि की खूब आवभगत हुई. लेकिन दिन भर शारदा के मन में एक ही सवाल घूमता रहा, ’माँ को कैसे पता चला कि कोई आने वाला है? क्या कौआ कोई ज्योतिष है? जो माँ को आकर बता गया कि कोई आने वाला है!’

शाम को मामाजी के जाने के बाद शारदा तपाक से बोली, “माँ क्या कौआ कोई ज्योतिष है?” माँ हँसते हुए बोली, “तेरे इस छोटे से दिमाग में क्या-क्या आता रहता है रे? ऐसा क्यों पूछ रही है?” “तुमने ही तो कहा ना, मुझे पता था कोई आने वाला है क्योंकि सुबह से कौआ काँव-काँव कर रहा है.” शारदा बोली. “हाँ बिटिया मुंडेर पर कौवे का बोलना मेहमान के आने का सूचक है. हाँ, लेकिन इसका कर्कश आवाज में चिल्लाना अशुभ भी माना जाता है.

“ऐसे ही अनेक भविष्यवक्ता हैं हमारे पहाड़ों में. सुनोगी सबके बारे में?” माँ ने कहा. शारदा ने उत्सुकता से हामी भरी. माँ ने अपनी बात कहनी शुरू की.

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हिमालय की कन्दराओं में बसा हमारा कुमाऊँ प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य से सजा होने के साथ ही प्राकृतिक घटनापरक लोकविश्वासों से भी समृद्ध है. चाहे वे वृक्षों से संबन्धित हो या जीवजन्तुओं से, अन्तरिक्ष से हो या वायुमंडलीय घटनाओं से, प्रकृति के सभी पक्ष साधारण जनता के विश्वास का आधार हुआ करते हैं. माना जाता है कि सुहावने मौसम में अचानक आंधी-तूफान का आना अनिष्ट का सूचक है. मकान के आस-पास या घर के मुख्य द्वार की सीध में पीपल, तूणीं, रीठा आदि विशाल वृक्षों का होना भी अशुभ माना जाता है, इनसे घर का भेदन होता है और वज्रपात का भय बना रहता है. इसलिए नागफनी का एक कांटेदार पौंधा (स्योन/स्योनाक) और ड्यांसी (सफेद पत्थर) को अनिष्ट से बचने के लिए मकान की छतों पर रखा जाता है, मान्यता है कि यह बज्रपात से मकान की सुरक्षा करता है.

इसी तरह प्रवेशद्वार के सामने केले का पौधा होना अशुभ तथा अनार परिवार की वनस्पति का होना शुभ माना जाता है. घर के पूर्व में पीपल, पश्चिम में सेमल, उत्तर में केला व दक्षिण में नींबू के वृक्ष का होना अमंगलकारी होता है.

गेंहूँ के पौधे में एक साथ दो बालियां आना, पेड़ों पर बेमौसमी फूल-फलों का आना, पेड़ों का अत्यधिक फलों से लदकर टहनियों का झुक जाना जैसी अप्राकृतिक घटनाओं को अशुभ संकेत मानते हैं. वहीं तुलसी, पीपल, आँवला, केला और वटवृक्ष की पूजा से कामनापूर्ति होती है.

वृक्षों में भी जीवन होता है, इसलिए फलदार वृक्षों को सींचना पुण्य का काम है. रात में पेड़-पौधों के फूल या पत्ते तोड़ना पाप है.

“अच्छा तभी अम्मा हमें रात में फूल नहीं तोड़ने देती.” शारदा सहमति में बोली.

“हाँ, बिल्कुल सही. और तुम जानती हो भूकम्प क्यों आता है?” माँ ने पूछा.

“क्यों?” उत्सुक शारदा बोली.

भूकम्प के विषय में मान्यता है कि पृथ्वी को अपने फनों पर धारण करने वाला शेषनाग जब विश्राम करने के लिए इसे एक फन से दूसरे पर लेता है, तब भूकम्प आता है. इसी तरह सूर्य और चन्द्रग्रहण के बारे में लोकविश्वास है कि— राहु-केतु नामक राक्षस अपना ऋण लेने के लिए जब इन पर हड्डियों से प्रहार करते हैं और मांस के टुकड़े फेंकते हैं, तब ग्रहण लगता है. उस समय उन पर आने वाले काले धब्बे वही मांस के लोथड़े होते हैं. इस विपदा से उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए लोग ढ़ोल, नगाड़े, शंख, घंटियों के साथ जप-तप करते हैं और जोर-जोर से चिल्लाते हुए कहते हैं— “छाड़-छाड़ केरुआ चांडाल का पोथा छाड़-छाड़.”

श्राद्ध या देवपूजा पर कौवे का हिस्सा जरूर निकाला जाता है क्योंकि इसे देवों और पितरों तक भोजन पहुँचाने वाला माना जाता है.

शारदा हर मान्यता के बारे में जानने के बाद माँ को आश्चर्य से देख रही थी और ध्यान से सब कुछ सुन रही थी.

माँ ने बोलना जारी रखा. और भी कई सारी मान्यताएं हैं, जैसे— छोटे शिशुओं का होठों को बुरबुराना, मेंढ़कों का बिना वर्षा के टर्राना, चींटियों के पंखों का उग आना, जंगल में द्योचड़ी (पपीहा) के द्वारा पानी की रट लगाना आदि वर्षा होने का संकेत हैं. धान के खेत में चूहे का बच्चा देना, घर के अन्दर छुछुन्दर का अण्डा देना, गोताई/गौरया का घोंसला बनाना, भौंरे या मधुमक्खी का सिर के आस-पास मंडराना और दाहिने कान की तरफ गुनगुनाना, घर में ग्वाई/टिड्डे का आना (इसे पितरों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसके सिर पर तेल लगाया जाता है). इत्यादि को शुभ संकेतों के साथ जोड़ा जाता है.

ऐसे ही प्रकृति हमें अनेक अशुभ संकेत भी देती है जैसे— प्रातःकाल ब्रह्ममूहूर्त में फ्योन (सियार) का तीन से पांच बार रोने की आवाज निकालना उस क्षेत्र में किसी सम्भावित मृत्यु का सूचक माना जाता है. सांपों को लड़ते देखना तथा हल जोतते बैलों के गर्दन में रखा हुआ जूआ टूटना अशुभ माना जाता है, जिसके दोष निवारण के लिए पूए पकाए जाते हैं. किसी देवालय के सामने या घर के प्रवेशद्वार पर कुत्ते का रोना गृहस्वामी-स्वामिनी की मृत्यु का सूचक माना जाता है. पालतू पशुओं का ना-ना की मुद्रा में सिर हिलाना, शरीर पर छिपकली गिरना, कौवे का बीठना, बिल्ली द्वारा रास्ता काटना अशुभ माना जाता है, लेकिन बिल्ली का घर में आना शुभ मानते हैं. कहते हैं कि बिल्ली को मारने वाले के हाथ कांपने लगते हैं.

शारदा अपने पहाड़ के भविष्यवक्ताओं की जानकारी पाकर खुश भी थी और आश्चर्यचकित भी. (Folk Beliefs in Uttarakhand

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मूल रूप से मासी, चौखुटिया की रहने वाली भावना जुयाल हाल-फिलहाल राजकीय इंटर कॉलेज, पटलगाँव में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता हैं और कुमाऊँ विश्वविद्यालय से इतिहास की शोध छात्रा भी.

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Sudhir Kumar

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  • पौधों को घर के किन दिशाओं मैं लगाना शुभ मंगल होता है यह बताने की कृपा करें ।

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