समाज

क्या तराई में कभी जैविक हथियारों के लिए कच्चा माल तैयार किया गया था

कोरोना या कोविड-19 वायरस के प्राकृतिक रूप से पैदा होने या उसके किसी प्रयोगशालामें विकसित हैने के विवाद के बीच यह याद रहना जरूरी है कि प्रयोगशालाओं में होने वाली संदिंग्ध खोजें ही जैविक हथियार का कच्चा माल रही हैं . जिनके बारे में पिछले कई दशकों में छुटपुट खबरे आती रही थीं ऐसे ही एक संदिग्ध अनुसंधान और प्रयोग की चर्चा तीन दशक पहले उत्तराखण्ड में शिवालिक पर्वत माला की तराई में भी हुई थी. हल्द्वानी में केन्द्रित उस विवादित अनुसंधान की पडताल करने वाले पत्रकारों में इन पंक्तियों का लेखक भी रहा था. (Biological Weapons Research in Tarai)

कोरोना वायरस के फैलाव के समय बीते हुए समय में जैविक हथियारों के प्रयोग और सत्ता/पावर के लालच में जैविक हथियारों पर किए गए अनुसंधानों को आज समझने की आवश्यकता है ताकि नई पीढी इस मूर्खता और मानव द्रोही खेल को समझ सके. आज कोरोना वायरस को लेकर विश्व संकट मे है, लोग भयभीत है. न्यूक्लीयर व परमाणु बमों के दम पर राज करने वाले देश आज सूक्ष्मतम कोरोना विषाणु से सहमें हुए हैं.

 यह विषाणु कैसे आया, कैसे इसने मनुष्यजाति पर आक्रमण किया इस पर भिन्न भिन्न मत हैं. बडे बडे वैज्ञानिक विशेषज्ञ इस पर अपने मत प्रकट कर रहे हैं, जहां  एक पक्ष इस वायरस को प्राकृतिक रूप से बदले हुए इंफ्लुएंजा वायरस का नया संस्करण कह रहा है तो वहीं दूसरे पक्ष के सोशल एक्टीविस्टों, युद्ध विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का दावा है कि यह वायरस किसी न किसी देश की प्रयोगशाला से निकला है,  यह चीन से निकला और फैलाया है या चीन में फैला/ फैलाया गया है, लोग इसी में उलझे रहे उधर कोरोना ने पूरी दुनिया को अपने पंजे में ले लिया.

 प्राकृतिक रूप से फैले इंफ्लुएंजा से 100 साल पहले करोडों लोग मरे थे, इससे पहले और इसके बाद दुनिया भर में ऐसी सैकडों घटनाएं हो चुकी हैं. जिसमें अचानक आई बीमारी से सैकडों हजारों लोग मर जाते थे यहां तक कि बचाने वाले भी नहीं रहते थे. इंफ्लुएंजा से बीमारी और मौतों से योरोप इतना भयभीत था कि हमेशा अपने साथ दवाई रखने की सलाह दी जाती थी, विश्व प्रसिद्ध बालगीत रिंगा रिंगा रोजेज को भी 17वीं शताब्दी में फैले प्लेग और बाद में ब्लैक डेथ या इंफ्लुएंजा से जोडा जाता है.

अभी तक के मानव सभ्यता के इतिहास के क्रम में मनुष्य जाति के सामने कोरोना बीमारी जैसे खतरे आते रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि पहले मनुष्य संसाधनों और चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव में असहाय था अब अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के बल पर हर तरह की सुविधा जुटाने का दावा करने वाला अपेक्षित रूप से और अधिक असहाय दिखाई दे रहा है. इस असहायता में ज्यादा गहराई और खाई है.

आरम्भ से ही मनुष्य संसाधनों को हथियाने में बहुत निर्दयी रहा है, इतिहास में तमाम तरह के युद्ध कहीं न कहीं संसाधनों के कब्जे को लेकर ही हुए हैं, और अभी भी हो यहे हैं, इन्ही संसाधनों की लूट में शत्रुपक्ष या विपक्ष पर जीत हासिल करने या अधिक से अधिक नुक्सान पहुंचाने और बर्बाद करने के लिए जहां सीधे अधिकाधिक घातक हथियारों का विकास उत्पादन और प्रयोग होता रहा वहीं गैर परम्परागत रूप से अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए कई तरीके अपनाए जाते थे. विषकन्याओं द्वारा विपक्षी नेतृत्व पर प्राणघातक वार और संसाधनों को बर्बाद करने के लिए पानी के स्रोतो, पहाडों जंगलों आदि को विषाक्त करने के कुचक्र आम थे. विगत के अति प्रचीन काल के उदाहरणों पर न भी जाया जाए तो पिछले सौ सालों में ऐसी अनेक घृणास्पद घटनाऐं हो चुकी हैं.

वर्तमान महामारी के अचानक फैलाव के परिप्रेक्ष आज चीन और अमरिका दोनों पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है, इतिहास में जाकर देखे तो पता चलेगा कि पिछली सदी में ऐसी अनेक घटनाए हो चुकी थीं. लेकिन जिस जापान को आज राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में उद्धृत किया जाता वो ही जैविक हथियारों के आदिम रूप रासायनिक हथियारों के प्रयोग करने में बदनाम रहा है.

द्वितीय विश्व युद्ध के पहले 1937 में चीन जापान युद्ध हुआ था जो 1945 में विश्वयुद्ध में जापानी हार के साथ समाप्त हुआ था. जिसमें जापान ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं. 1937 में दिसम्बर से मार्च 1938 तक चीन के नानजिंग में 3 लाख चीनी मारे गए थे व 80 हजार महिलाओं के साथ ब्लात्कार हुआ था क्रूर जापानी सैनिकों पर चीनी लोगों को मारकर उनका मांस खाने के आरोप भी लगे थे.

लेकिन इससे भी खतरनाक बात यह हुई कि जापानी सेना ने युद्ध के दौरान और वापस लौटते हुए चीनी क्षेत्र के पानी के स्रोतों को प्रदूषित और जहरीला बनाने का घृणित कार्य किया, जिससे चीन में हैजे और टायफाईड जैसी बीमारी का संक्रमण फैला. जापान के आत्मसमर्पण के बाद चीनी शत्रुओं को बीमारी और संक्रमण से नुकसान पंहुचाने वाले कथित जापानी वैज्ञानिकों को युद्ध अपराधी माना गया था. जिन्हे बाद में अमेरिका ने माफी दे दी. इस टीम के वैज्ञानिक बाद में अमेरिका और योरोप में सैटिल हो गए. ऐसा समझा जाता है कि जापानियों की वही टीम विषाणु या जैविक हथियार बनाने वाली पहली टीम थी. जिसने इसका विस्तार पूरे विश्व में कर दिया.

शीत युद्ध के दौरान विषाणु या जैविक हथियारों के अनुसंधान विकास व उसके परीक्षण करने के आरोप अमेरिका और उसके मित्र नाटों देशों पर लगे, जो सहायता और कथित दोस्ती की आड़ में ऐसे आपरेशन और अनुसंधान करते रहे, मित्र राष्ट्रों के सहयोगी देशों के अलावा तटस्थ/ गुटनिरपेक्ष देश व विकासशील ऐसे संदिग्ध आपरेशनों की आदर्श स्थली रहे, गरीब व गुट निरपेक्ष देशों में येनकेन ऐसे काम चलते रहे. दक्षिण वियतनाम, सहित सुदूर पूर्वी देश दक्षिणी एशिया अफ्रीका व लैटिन अमेरिकी देशों में जीवाणु हथियारों के लिए किए जाने वाले अनुसंधान, कृषि बागबानी मत्स्य पालन आदि की आड में खूब चले.

ऐसा ही संदेह 90 के दशक में उत्तराखण्ड के हल्द्वानी शहर में हुआ था जब भारत सरकार के एक संस्थान की आड़ लेकर ही नहीं स्वयं को भारत सरकार की संस्था बताने वाले एक संस्थान/ग्रुप ने यहां मच्छरों और अन्य सूक्ष्म परजीवियों पर प्रयोग किए थे. यह वह दौर था जब अन्तर्राष्टीय आतंकवाद की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी. तराई मे आतंकवाद था और यहां राजनैतिक हत्याओं के संदेह व्यक्त किए जा रहे थे.

जिस संस्था ने यहां कथित वैज्ञानिक अनुसंधान किया उस संस्था के सम्पर्क अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के थे यहां तक की उनकी पहुंच उच्च राजनैतिक स्तर और सरकार तक थी. उस अवधि में संस्था ने यह सब मलेरिया अनुसंधान के नाम पर किया था जिसकी कार्य प्रणाली की जानकारी प्रशासन को भी नहीं थी. उन दिनों शीत युद्ध के अन्त के दिनों में अनेक रहस्योद्घाटन हो रहे थे. इसमें  मनुष्यों और जानवरों पर जैविक हथियार के लिए किए जाने वाले प्रयोग और अनुसंधान की खबरें भी होती थीं.

उसी दौर में स्थानीय पत्रकारों को मलेरिया अनुसंधान के लिए काम करने वाली संस्था के काम करने की जानकारी मिली. उसके बोर्ड में भारत सरकार का नाम की संस्था के नाम के नीचे कोष्ठक में था लेकिन वह राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान से सम्बद्ध नहीं थी ना ही अन्य भारत सरकार के स्वामित्व में थी. बाद में पता चला कि वह संस्था विदेशी संस्था द्वारा सरकारी संस्था को दिए गए एक प्रोजेक्ट में काम कर यही थी तथा वह विशुद्ध निजी संस्था थी. और यह काम देश के अन्य स्थानों पर भी किया जा रहा था.

उस समय उत्तर प्रदेश के पर्वतीय कमिश्नरी कुमाऊं डिवीजन की तराई में मच्छर/विषाणु जनित बीमारी फैलने की घटनाएं हो चुकी थी, मलेरिया के नए वर्जन मलेरिया फैल्सीफेरियम से अनेक मौत हो चुकी थीं यहां तक कि हल्द्वानी का चिकित्सा स्टाफ भी चपेट में आ चुका था. इंसीफिलाईटिस/जापानी ज्वर मष्तिष्क ज्वर और डेंगू जैसी बीमारियां तराई में कहर बरपा रही थी, उन महामारियों से लडने व बचाव के लिए जनता को जागरूक किया जाता था और आवश्यकता पडने पर घर-घर दवाई बंटवाई जाती थी. (Biological Weapons Research in Tarai)

मलेरिया पर कथित अनुसंधान करने वाली संस्था से जब उनके कार्य के बारे में जानना चाहा तो संस्था के प्रमुख ने एकदम इंकार कर दिया. आरम्भ में तो उस संस्था ने पत्रकारों को अपने कार्यालय में घुसने भी नहीं दिया, और उसके कर्मचारी  हाथापाई पर आमादा हो गए थे. बाद में जब दबाव पडा तो उन्होने बस इतना ही कबूला कि वह ऐसी मछलियों का अध्यन कर रहे हैं जो मच्छरों का लारवा खाती है. ऐसी मछलियों का विकास से मलेरिया रोका जा सकता है.

इस सब के लिऐ वह संस्था तराई के गांव-गांव में ग्रामीणों मछलियों के अंडे देकर मछलियां पलवाती थी. ऐसी भी रिपोर्टें थीं की वह संस्था चिकित्सा आदि के नामपर  गांव में चिकित्सा कैम्प लगाती है और ग्रामीणों का स्वास्थय परीक्षण कर और खून के नमूने इकट्ठा करती थी.

यह भी पता चला था कि उस परियोजना के लिए धन की व्यवस्था एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ने की थी जो कि एक सुपर पावर* के लिए दुनिया भर में ऐसे प्रयोग और अनुसंधान करवाती रहती थी. उस अन्तर्राष्ट्रीय संस्था* द्वारा दिया गया धन भारत सरकार की संस्था के माध्यम से मलेरिया पर कथित अनुसंधान करने वाली संस्था को मिला था. इसी लिए वह संस्था अपने बोर्ड व लैटर पैड पर भारत सरकार का प्रयोग करती थी. जिसके कारण वह संस्था अपने कार्य को पर्दे के पीछे करती रही.

यहां एक दिलचस्प तथ्य को बताना जरूरी हो जाता है कि शिवालिक पर्वतमाला के मध्यपूर्व में मलेरिया का जबरदस्त आतंक था. इस तराई में आजादी के बाद तक मलेरिया महामारी के कारण आबादी नहीं थी. यहां तक की पर्वतीय मूल के लोग भी अपने तराई के निवासों में स्थाई रूप से नहीं रहते थे वे जाडा समाप्त होते ही मच्छरों के सीजन आरम्भ होने से पहले तराई छोड कर पर्वतीय प्रवासों को चले जाते थे. लेकिन तराई के आदिवासी थारू और बुक्साओं के रक्त में मलेरिया प्रतिरोधक शक्ति विकसित होने के कारण वह कहीं नहीं जाते थे. बाद में तराई में मलेरिया से लडने के लिए मलेरिया उन्मूलन विभाग बना. विभाजन के बाद तराई में बडी संख्या में पंजाब से आए किसानों को बसाया गया. मलेरिया विभाग के काम और सिखों की बसाहट से तराई से मलेरिया खत्म होता गया. (Biological Weapons Research in Tarai)

ऐसे में यहां संदिग्ध रूप से काम करने के क्या उद्देश्य थे इसका रहस्योद्घाटन तो नहीं हो पाया. वह अपने आप में कोई पूरा अनुसंधान था या अनुसंधान चेन की कोई एक कडी था. और जब वह अनुसंधान या उसकी कडी पूरी हो गई तो वह कथित अनुसंधान भी बंद हो गया. यह भी जानकारी में आया था कि ऐसे कथित अनुसंधान देश के अनेक संवेदनशील स्थानों पर अलग अलग तरीकों से हुए थे.

लेकिन उसके बाद और अभी तक दुनिया भर से ऐसी खबरें आती रहती थीं जिसमें विशेष ग्रामीण क्षेत्रों आदिवासी क्षेत्रों में मानव पशु पक्षियों आदि पर जैविक हथियारों के लिए कच्चा माल जुटाया जाता है. यह ठीक ऐसा होता है जैसे किसी बडी फैक्ट्री में मशीनों/कारों का एसेम्बली लाइन के माध्यम से उत्पादन होता है. अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग संस्थानों द्वारा किए गए कार्यों को मिलाकर कोई निष्कर्ष या उत्पाद निकालने जैसा. जिसमें अलग अलग स्तर पर कोई एक विशेष कार्य अथवा उत्पाद/ अनुसंधान करने वाले एक दूसरे को नहीं जानते और कोई तीसरा पक्ष अलग अलग उत्पाद को जोडकर कोई एक उत्पाद का विकास करता है. (Biological Weapons Research in Tarai)

इसलिए यह समझना जरा मुश्किल है कि कोई एक जीवाणु/विषाणु केवल प्राकृतिक रूप से ही पूर्ण विकसित होता है. क्योंकि गाय को तेल पिलाकर अथवा वसायुक्त चारा खिलाकर उसके दूध में बढे हुए फैट के बल पर विशुद्ध घी का उत्पादन बढाने वाले भी इसी दुनिया में रहते हैं.

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रानीखेत में जन्मे इस्लाम हुसैन फिलहाल काठगोदाम में रहते हैं. 1977 से ही लेखन और पत्रकारिता से जुड़े इस्लाम की कहानियां, कविताएँ, लेख और रपट विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. कुछ वर्षों तक एक सार्वजनिक उपक्रम में प्रशासनिक/परियोजना अधिकारी के रूप में काम कर चुके इस्लाम हुसैन ने एक साप्ताहिक पत्र तथा पत्रिका का संपादन भी किया है. कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं. अपने ब्लॉग ‘नारीमैन चौराहा” में संस्मरण लेखन व ट्यूटर में “इस्लाम शेरी” नाम से कविता शायरी भी करते हैं.

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