प्रतीकात्मक तस्वीर. सोशियल मीडिया से साभार.
ले गुड़ खा, साल भर सांप-कीड़े नहीं दिखेंगे कहकर सुबह ही ईजा देशान* में गुड़ दे दिया करती थी और मैं बड़ी उत्सुक्तावस गुड़ खाते हुए उठता था कि आज कहाँ धमाका होने वाला है. धमाका दरअसल हर बैशाखी को हमारे क्षेत्र में होता था, हम तो छोटे थे पर दीदी, ददा, और भाभियाँ आज के दिन बहुत सतर्क रहती थी क्योंकि आज का दिन सच में हंगामे और धमाके का होता था. (Vishuvat Sankranti Tradition in Uttarakhand)
हमारे सीमांत में होली तो नहीं मनाई जाती पर ये त्यौहार किसी होली से कम नहीं होता हालांकि सब अपनी दिनचर्या में व्यस्त पर सजग होते थे. आज के दिन न जाने कब कहाँ से भाभी, देवर, ननद, साली, जीजा कोई भी आ जाये और सिन्ने से हमला कर दे. जी हाँ सिन्ने से वही सिन्ना जिसे आप बिच्छू घास या कंडाली के नाम से जानते हैं.
तब जब हम बच्चे थे एक खुशी ये भी होती थी कि आज के दिन हमारे मासाब घर से बाहर नहीं निकलेंगे क्योंकि हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़ी दीदी लोगों ने मासाब को सिन्ना लगाके बेहाल करना है. गाँव में चूंकि एक ही बिरादरी के अधिकतर लोग थे और जिनके मज़ाक के रिश्ते नहीं होते थे उनके लिए मासाब आसान शिकार थे क्योंकि वो बाहर के थे. उनसे कोई रिश्ता गाँव वालों का नहीं था, गुरु-शिष्य के अतिरिक्त तो वो सिन्ने की चपेट में जरूर आते थे हर वर्ष या फिर वो कमरे के बाहर नहीं निकलते थे. (Vishuvat Sankranti Tradition in Uttarakhand)
ये एक अनूठी परम्परा है सीमांत की, हालांकि अब यह परम्परा मृत प्रायः है पर अब भी रिवाज के नाम पर सिन्ने का डंक जरूर लगाया जाता है. माना जाता है कि आज के दिन सिन्ने का डंक मारने और गुड़ खाने से साल पर विष और विषैले कीड़ों, सांप या विषैले पौधों से दूरी बनी रहती है. बैशाखी को सीमांत क्षेत्र में विषपति के रूप में मनाते है. होता ये है कि लंबे-लम्बे सिन्ने के ढांक को काटा जाता है, पीछे से छीलकर या कपड़े से लपेटकर लोग दूसरों पर जमकर सिन्ना लगाते है. ये भी होली की भांति केवल मज़ाक के रिश्तों में ही खेला जाता है. मुँह और शरीर का सुजना औए उसमें शाम को मक्खन लगाकर राहत देना तो उन दिनों हर घर में रहता था. कई बार ददा, भाभी या दीदी लोगों को इतना सिन्ना लगता था कि उन्हें बुखार तक हो जाता था. (Vishuvat Sankranti Tradition in Uttarakhand)
जैसे-जैसे हम बड़े हुए वैसे-वैसे ये परम्परा समाप्ति की और ढल जरूर गई पर आज भी इस परंपरा का निर्वहन हर सीमान्तवासी करता है. इतने वर्षों के अध्ययन और विविध शौधों के बावजूद इस परंपरा का जिक्र न होना मुझे आश्चर्यचकित करता है. कारण जो भी हो मैं इसे सिन्ने की होली के रूप में देखता हूँ जो अब केवल परम्परा के रूप में एक डंक सिन्ना और गुड़ खाने तक ही सीमित रह गई है.
*बिस्तर
– भगवान सिंह धामी
मूल रूप से धारचूला तहसील के सीमान्त गांव स्यांकुरी के भगवान सिंह धामी की 12वीं से लेकर स्नातक, मास्टरी बीएड सब पिथौरागढ़ में रहकर सम्पन्न हुई. वर्तमान में सचिवालय में कार्यरत भगवान सिंह इससे पहले पिथौरागढ में सामान्य अध्ययन की कोचिंग कराते थे. भगवान सिंह उत्तराखण्ड ज्ञानकोष नाम से ब्लाग लिखते हैं.
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