प्रो. मृगेश पाण्डे

छिपलाकोट अन्तर्यात्रा: मुड़ मुड़ के न देख

पिछली कड़ी यहां पढ़ें: छिपलाकोट अंतरकथा : जिंदगानी के सफर में, हम भी तेरे हमसफ़र हैं

“दस ग्यारह साल की उम्र रही होगी तब से उस पहाड़ पर जाने की जिद करते थे. आपुँ.. हो, कुन्ना बाबू. खूब चंट हुए. डिमाग चलता आपुँ का, फटीग पड़ती हमारी. कैसा फंसाया था उस दलीप बिचारे को. दूध में मुख लगाने में झस्स हो जाती है रेss धनिया, कहता था मुझसे. अब सारी बात तो भौत बाद में पता चली मुझको. के कुनि पें, पहाड़ तो खूब चढ़ते ही रहे फिर आssपूँ, तभी आज चुस्त फुर्त हो. अब ये शौक आssपूँ के बाल गोपालों में लगा ही होगा.पर आपूँ जैसे किकड़ तो नी लागनई भाऊ लोग.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

मेऱ ले भाग भै, आssपूँ लोग जै खुकुरिटुक गिरस्त और भल सैब मिलीं. ग्वाव गुसें हुए. जुगुत हुई सैब की. जां गए मीके साथ लेते गए, सार सारिणी में कट गई हमारी. डी. अफ. ओ. बने तो लखीमपुर खीरी जाना हुआ. आप भी तो आए थे वहाँ. फिर हमीरपुर जां मेरी तबियत बड़ी बिगड़ गई. दमा हो गया सैबो. देखते देखते पिंसन लग गई.”

धन सिंह अचानक ही शाम को पिथौरागढ़ घर पर आया दिखा. मैं कॉलेज से पहुंचा तो देखा बाहर तखत पर धन सिंह. वैसी ही मक्खी कट मूछें. मुझे खूब याद है दिनेश दा ने कैसा मतकाया था उसे कि दलीप का तो बैंड बज गया अब तू ही रै गया छड़ा. अगर तेरे मुच्छी होती तो तेरा भी बाजा बज जाता. ब्या की हौस से धन सिंह की ठकुराई जाग गई. उसने दाढ़ी भी उगाने का मन बना लिया. अजीब सी छितरी-मितरी दाढ़ी आई. कई दिन के दौरे के बाद जब कक्का जी घर लौटे तो धन सिंह की सूरत देख बड़ा बिगड़े, ” साला हुड़ भ्यास. अबे बाल भी तो होने चहिये तब दिखेगी कुछ दाढ़ी मूछ. आ गया मुंह में चीड़ के जैसे छितिर-मितर लगा. कल ही दरियाब सिंह की दुकान में जा. कायदे का बन नौकरी कर. वरना जाओ गांव वापस. नौकरी करो तो स्मार्ट रह कर”. “जी शाब” कह धन सिंह ने अपनी जान बचाई. दूसरे ही दिन दिनेश दा के कॉलेज जाते उनके साथ इंदिरा फार्मेसी के नीचे दरियाब की दुकान पे जा उसका काया कल्प कराया गया. खोपड़ी में गोल काट के बाल और मक्खी कट मूछ रखा दी दिनेश दा ने. फिर घर आ खूब खिसाई लगाई. पर ऐसी फल गईं ये मक्खी मूँछ कि कुछेक दिन में ही जब उसके बौजू उसको भेटने रांची आए तो बताया कि उसका लगन तय हो गया है इसी जाड़े में. पिथौरागढ़ भुरमुणी जाएगी बारात. खड़ायतों में हुआ है रिश्ता. खूब जमींन जायदाद वाले हैं.

दिनेश दा तो बारात में गए भी. मैंने कित्ती जिद कर दी. पर तू बस में उखाले करेगा. इतनी दूर का सफर कैसे करेगा. कह सबने टरका दिया. आमा ने एक काथ सुनाई थी कि मनकस न होने पर ऋषि मुनि श्राप भी दे देते हैं. सो मैंने भी सब ना कहने वालों को श्राप दिया कि तुम सब को छेरुआ लग जाये. सच्ची में जब दिनेश दा और दलीप के साथ ही पतरोल लोहन जू बरात से लौटे तो सबके पेट चलते हुए थे. डॉ गंगोला की दवा लाये इंद्रा फार्मेसी से तब जा कर रुका बरात के सिंगल लगड़ का ठेला.

जब धन सिंह आया ब्वारी ले के तो खूब दैल-फैल हुई. मुझे तो बड़ी अच्छी लगी ब्वारी. नाम हुआ चंदा, खूब गोरफरांग और गोल मटोल. पर आवाज एकदम पतली. दिनमान भर नाचती दिखती. ईजा, चाची, माया दी कोई काम के लिए कह दें, चट्ट से कर देती. आमा कहती कुनुआ! तेरे लिए भी ऐसी ही ब्वारी ढूंढूंगी मैं. पक्की खशिणी. फिर खित्त से हंसती और मुझे पकड़ अपनी गोदी में लिटा देती. मुझको शरम लग जाती. एक बात तो तय थी कि अगर धनसिंह की लुगाई जिसे हमने धनुली नाम दिया था, से अगर मैं उस लड़ियाकांटा वाले पहाड़ में चलने को कहूं तो वो खट्ट से बटी जाएगी. थक गया तो गोद में भी उठा लेगी. ऐसे ही सोच-विचार के बीच संध्या में जब ठ्या में घर की औरतें कोई भजन भट भट करते ढोलक के साथ गा रहीं थीं तो मेरे दिमाग में एक गीत भी बजने लगा, “ओ! मैं तो ठकुराइन ही ब्याहुँगो, कोई मेरो क्या कर लेगो?.. ढमक-ढमक-ढम-ढम”. मुझे लगा कि मैं उस पहाड़ की चोटी पर पहुँच गया हूं और मेरे आगे-आगे चंदा है.

मैंने देखा, धन सिंह के साथ बगल में मेरा बी ए का छात्र चतुर बैठा था. दोनों बच्चों से खूब ढिमी गए दिख रहे थे. सामने पकोड़ी की प्लेट भी थी और चाय के गिलास भी. साफ लग रहा था कि श्रीमती जी को धन सिंह खूब पसंद आ गया था. काफी देर से बैठे होंगे मेरे इंतज़ार में. पता नहीं ये धन सिंह मेरे बारे में क्या-क्या बता गया.. कम बकतरुआ थोड़ी है ये.

“ये चतुर है रिश्ते में मेरा साला ही लगा. यहां भुरमुणी मेरी ससुराल हुई. आपको बहुत मानता है. इसी से पता चला आप यहां हो. दिनेश दाज्यू भी यहीं बड़े शाब हो आ गए हैं बल. तभी आ गया तुरंत आपको भेटने कुन्ना बाबू”.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

कुन्ना बाबू सुन छोटा बेटा खित्त हंसा. ये धन सिंह तो बड़ा गपोड़ी है, पता नहीं मेरे बारे में क्या-क्या बक गया होगा. मेरी सारी हरकतें जानता है ये बचपन की. अब वह उठ मेरी ओर आने को था तो मैंने उसका कन्धा पकड़ बैठा दिया और बोला अरे बैठो, मैं बस दो मिनट में आया. श्रीमती जी प्लेट को फिर पकोड़ी से भर चुकी थीं. इसका मतलब धनसिंह से खूब गपियाया जा चुका है और वह उससे खुश हैं. बड़ा बेटा प्लेट में टोमेटो सौस उड़ेलने के लिए उसकी बॉटल ऊपर-नीचे कर रहा था.

“बोतल गिर न जाये भाऊ” कह धन सिंह ने झटके में थोड़ा सौस प्लेट में डाला. “इत्मीनान से पकोड़ी मुख में डाल कुछ जाँच परख के बाद बोला.” ये छोटा वाला भाऊ, क्या नाम कहते हैं इसे बदलू , इसकी की तो अनवार बिल्कुल आप पे गई है कुन्ना बाबू. आदत भी आप जैसी ही होंगी. नाम भी आपने नानतीनों के क्या क्या रख दिए, तूफान-बादल.”

मैं तेजी से भीतर गुसल खाने की तरफ चल दिया. बाहर आया मुँह हाथ आया तो वहाँ धन सिंह की फिर कोई लम्बी कथा चल रही थी. मेरे दोनों सपूत आधा मुंह खोले और श्रीमती जी अपनी आँखों को और बड़ा फैलाये अच्छा! अरे! का विस्मय प्रकट कर रहीं थी. मैं आ कर कुर्सी पर बैठा ही था कि वह बोलीं, “सुनो वो क्या गांव है ना! हाँ, बीसा बजेड़. वहाँ हुआ पुछयार, वोई रमेश धामी. उसी धामी के पास गए थे ये. पूछ में. हाथ में चावल पकड़ते ही सब बता दिया उसने. क्योंss, तुम्हारे यहाँ का कुण्डल सिंह भी तो भगत है उसका. वो चंद्र शेखर पांडे भी जिसको लड़का होने का वरदान दिया है उसने.”

पत्नी की बात खतम भी न हुई कि धन सिंह बोला,”वो रमेश गणतू. उसको तो द्योताल आता है. मशाण हुआ, चमकताल हुई. उस पर गणमेश्वर की क्रिपा हुई, एक दम सच्ची बात बता देता है ,चड़म्म. पुश्तों के भेद खोल देता है. दिमाग को मुन देता है कुन्ना बाबू. मेरे चावल पकड़ बोला तेरे घर तो पकड़ है घर की उसी सैणी की जो भरी जवानी मरी, वो भी निपूती . अब क्या बताऊँ कुन्ना बाबू, वो मेरी भाबी हुई. घा काटने गई जंगल तो भ्योल में चित्त पड़ी मिली. रड़ी गई होगी. द्यो-चौमास के दिन हुए. अकाल मौत हुई. निरपूती मरी. बन गई होगी भूतणी. वही सीने में चढ़ी बता दिया. हफ्ते भर की रोक करी फिर धामी ने. अब पोर वार से तो मेरी सांस ठीक ही पड़ रही, नहीं तो होss, बिडॉव पड़ गया था मैं . लड़का कुमाऊं रेजिमेंट में हुआ उसे तार भी कर दिया.बबाss! ध्वाँ- फंव्वाँ! हर घड़ी खांसी –ँखार. प्राण अब छूटें तब छूटें. कितनी गोली खा दी बोतल गटक दी. कुच्छ नहीं हुआ. ऐसा बिडोव पड़ा कि गांव में सबूँ लोगों ने कहा कि एक बेर रमेश धामी के ठोर चामल ले जाओ”.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

“यहां अस्पताल में डॉ महावीर हैं अच्छे फिजिशियन. उनको दिखाओ. यहीं मेरे जीजा हैं रेडियोलॉजिस्ट वह तुम्हें दिखवा देंगे. बाकी पूछ-वूछ तुम्हारी मर्जी.”

“वो भी करा दूंगा पर मेरे प्राण तो धामी ने ही फरकाये”.

अपने महाविद्यालय के चपरासी कुण्डल सिंह के साथ मैं बीसाबजेड़ गांव के इस रमेश धामी से मिल चुका था. गहरा सांवला रंग, घने बाल जिनपर वह खूब तेल लगाए रखता. छोटा सा पर चौड़ा माथा जिस पर काला टीका होता. हाथों में चांदी के कई कड़े, गले में रुद्राक्ष- भद्राक्ष की कई मालाऐं और उनके साथ काले डोरे में बँधी किसी जानवर की हड्डी व साथ में लाला बनियों जैसी सोने की मोटी चेन भी हुई और कानों में नेपाली डिज़ाइन के कुण्डल,सब माल ताल सोने का. सफ़ेद कुरता और मटमैली सी धोती जिसके भीतर उसकी हृष्ट-पुष्ट देह झांकती. कुण्डल ने बताया पूछ सपड़ जाने पर जजमान खुश हो उससे बड़ी पूजा करवाते और दान दक्षिणा में नोट की गड्डी के साथ सोने के जेवर भी चढ़ते. लगातार चाय पीता और खूब सिग्रेट धोंकता. पहली भेंट से ही धामी मुझ पर बड़ा मेहरबान हो गया. खाली बखत में उससे खूब बातें होतीं. कई जगह दूर दराज भी वह जाता और मुझसे भी चलने को कहता. खास कर नेपाल के मंदिरों में. नागार्जुना तो में गया भी. पर आखिरकार में सरकारी नौकरी वाला हुआ. इतनी छुट्टी कहाँ कि बेरोकटोक घूम सकूँ.घूमने में भी बड़े जोड़ -जंतर लगाने पड़ते.

बीसा बजेड़ मोटर सड़क से नीचे उतर करीब एक किलोमीटर नीचे रमेश धामी का बड़ा सा घर था. घर के आस-पास ही उसके भाइयों रिश्तेदारों ने चाय खाने-पीने के साथ रात भर पैर फ़ैलाने के इंतज़ाम कर दिए थे. अच्छी कमाई के बनधारे बह रहे थे. बाहर से,तराई भाबर से, बड़े शहर महानगर से लोग उसके यहाँ जुटते,आसपास वाले मैंने कम ही देखे. बीसा बजेड़ की सड़क पर बिल्कुल नयी चम्म कारें कतार में खड़ी हो जातीं. महिंद्रा और टाटा की टैक्सी सेवा भी इधर खूब भरी पूरी दिखती. कई बुकिंग पर आतीं. बहुतों का आना जाना हुआ. अपनी-अपनी रोग शोक की कथा सबकी हुई. धामी का एक भाई अपने यारों के साथ बैठ वहां भविष्य में बनने वाली धर्मशाला के चंदे की रसीदें भी काटता फिरता. शाम होते होते भीड़ पे भीड़ जुटने लगती. हर कोई अपने अनिष्ट से मुक्ति की कामना का भाव लिए उस बड़े से आँगन में अपनी जगह बना लेता जिस पर कुछ ऊंचाई पर धामी विराजमान होता. जब अँधेरा हो जाता तब नहा-धो, फूक लगा, आँखों में लाल डोरे खींचे, धुले सफ़ेद कपड़े पहने रमेश धामी आता और अपनी गद्दी पर जम जाता. बड़े से दिए में तेल डालता. मोटी सी धूप बटी जाती. कई त्रिशूल टंगे होते, काली सफेद चीर लटकी रहतीं. कुछ चेले धूनी की आग बढ़ाते. गुग्गुल की खुसबू फैलती. उसके सामने फल-मिठाई, मेवे, धूप-अगरबत्ती के पैकेट के ढेर जमा होते जाते. एक परात में नोट चढ़ते. ढोली बैठे रहते. उसके धूप बत्ती करते ही ढोल एक विशेष लय में बजता. सामने बड़ी पीतल की परात में चावल ही चावल. कई पुड़ियाएँ नीले-काले-सफ़ेद पॉलिथीन से बंधी होतीं. माहौल एकबारगी ही सुन्न और डरावना सा हो जाता. आगे सुलग रही लकड़ियों की लपट और धुंवे के पीछे धामी के मुंह से जोरदार चीत्कार निकलती और फिर वह कोई लम्बा सा मंत्र बोलने लगता. बोलता क्या चीखता. कुछ पल एकदम चुप हो जाता तो इधर ढोल तेज हो जाते और थाली टुंण-टुंणाती. फिर धामी के शरीर का ऊपरी हिस्सा अचानक तेज गति से हिलने लगता और वैसी ही लय के बोल से वह अपने द्योताल को बुलाता. बोल क्या हैं, मन्त्र क्या है कुछ समझ में न आता.

 कुण्डल ने बताया सब नेपाली में है. अभी जब द्योताल चढ़ेगा तो वो भी नेपाली ही बोलेगा. नेपाली में ही सवाल जवाब होंगे. गणमेश्वर का औतार होगा. पाँव जहां आसन पर टिके हैं वहीँ रहेंगे. कूल्हे से ऊपर का बदन नाचेगा. नेपाली में बोले वचन से वह अपने ईष्ट को पुकार लगाएगा. और फिर सामने की परात पर धरे चावल की कोई पुड़िया खोल चावल वारेगा वह. जिसके कपाल सर पर पड़े उसकी पूछ.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

“वो धामी से मिलने को कह रहीं थीं तुम्हारी भाभी. कुण्डल जाता है जहाँ बीसा बजेड़. अब तुम्हारा कुण्डल से उसके साथ अच्छा उठना-बैठना है”. ये कह दिनेशदा ने मेरी और गहरी नजर से देखा जैसे उन्हें सब भेद लग गए हैं मेरे. “जरा कहना उससे. अब सोनू ने रिसर्च भी कर ली है. अच्छी नौकरी भी है पर लड़के तो सही मिल ही नहीं रहे भाई. कुछ पूछो उससे. कई लोगों ने बताया वो चावल देखते ही सब बता देता है. अब वो चाय का गहरा घूंट लेने लगे थे”.

“अच्छा. कह दूंगा कुण्डल से, आपको तो ले ही जायेगा वो”, कह मैंने बात ख़तम की. चाय पी वह उठ खड़े हुए. खाना खा के जाइये,श्रीमती जी बोलीं. “नहीं, कभी फिर, दिन में आ रसभात खाऊंगा. आज तो दन्या के परांठों से ही पेट भरा है”. उन्हें छोड़ने जी आई सी प्राचार्य निवास तक गया. बच्चे भी साथ हो लिए.

“जहाँ आपकी समझ में नहिं आएगा तो में बता दूंगा साब”. कुण्डल सिंह ने हमारे प्राचार्य डॉ पांडे से कहा और बीसाबजेड अमूस की रात को वहाँ पहुँच उनकी पूछ हो गई. वो भी पहले नंबर पर. जैसे धामी का देवता भी वीआईपी की पहचान रखता हो. धामी ने ये भी बता दिया कि होने वाला जवांई सात समुन्दर पार नौकरी करता है और बहुत ही बड़ा ठुलधोतिया है. दिनेश दा तुरंत अगले दिन मीटिंग में नैनीताल चले गए.

दिनेश दा लोहाघाट से ट्रांसफर हो हमारे कॉलेज आ गए. जब दिनेशदा के पिथौरागढ़ महाविद्यालय में प्राचार्य बन आने की खबर मिली तो उस समय महाविद्यालय के राजनीति शास्त्र के हेड डॉ एच एस फर्तयाल ने जोरदार आवाज लगा मुझे अपने विभाग में बुलाया. मैं चाय पीने उप्रेती कैंटीन जा रहा था. डॉ फर्तयाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पढ़े बड़े विद्वान आदमी थे. बड़े खरे, मुहंफट और गुस्सैल भी थे. मुझे बड़ा अच्छा मानते थे. उसी दौर में, मैं फ्रैंकिल की इंडियन पोलिटिकल इकॉनमी किताब पढ़ रहा था. कई जगह उलझ भी रहा था. डिपार्टमेंट में अकेला बैठा था कि फर्तयाल साब आये और सामने की कुर्सी मैं बैठ गए. चारों ओर देख फ्रैंकिल की किताब पर नज़र पड़ी. जेब से चश्मा निकाल चढ़ाया और किताब की उलट पलट की फिर बोले बहुत बढ़िया काम किया है इसने. इंडियन पॉलिटी के सारे दुर्गुण और कांग्रेस के नेताओं का अहंकार सारे सिस्टम को कैसे बर्बाद कर रहा उसकी ऑथेंटिक समरी है ये किताब.

पर कई जगह मेरी समझ में नहीं आ रही. अचानक मैंने पाया कि उनके चश्मे में चौक का पाउडर लगा पड़ा है और वो वैसे ही किताब पर नजर गढ़ाए हैं. सर जरा चश्मा दीजिये कह मैंने उसे रुमाल से साफ किया. उन्होंने अब खुश हो वह चश्मा लगाया और बोले, “अरे अब समझा कि मुझे दिख क्यों नहीं रहा सही सही. अब तबियत खराब रहती है यार!अल्सर हो गया होगा. उस पर वो डॉ भूपेंद्र बिष्ट इतनी दवा लिख देता है कि भूख ही मर जाती है. अब ये इंडियन पोलिटिकल इकॉनमी मैं तुझे समझाऊंगा”. यह कह वह खांसे और खाँसते ही चले गए.. मैंने गिलास में उन्हें पानी दिया. तब तक वह रुमाल से अपनी नाक और आंख पोछ चुके थे.”चल चाय पी आते हैं”.

हम दोनों नीचे चले. वह बिष्ट कैंटीन में बैठते थे. रास्ते में उन्होंने पूछा,”क्यों आज लम्बोदर और धोतीधारी नहीं दिख रहे. प्रिंसिपल की लगा रहे होंगे”. वह हमारे हेड डॉ जे सी पंत को लम्बोदर और डॉ राम सिंह को धोतीधारी कहते और इनसे हमेशा तने रहते. चाय की एक लम्बी सुड़ूप्प कर उन्होंने मुझसे कहा, “देss खो. अब इनके यार आ रहे हैं प्रिंसिपल की कुर्सी पे. अब तक चला सिस्टम भी बदलेगा. तुss म इस के सी शर्मा के जाते ही वो सब एनएसएस और बाकी अगड़म-बगड़म छोड़ देना. तुम बस पढ़ो-पढ़ाओ, नाटक करवाओ, घूमो फिरो, कॉलेज के पैसे वाले जालों में मत फंसना.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

दिनेश दा यानी नये प्राचार्य के आते ही मैंने राष्ट्रीय सेवा योजना के सहायक समन्वयक से हटने की अर्जी लगा दी थी. लाइब्रेरी कमिटी से भी और यूजीसी से भी. वैसे दिनेश दा बढ़िया अकादमिक आदमी थे. उनके समय में खूब सेमिनार हुईं. कई रेफ़्रेन्स किताबें लिखीं थीं उनने. लगातार रिसर्च करते थे पर हुए तो अपने भाई.भाई भतीजे की किसी भी फुस्स-फुस्स से मैं छिटका ही रहना चाहता था. लोहाघाट से यहाँ ज्वाइन करने के बाद वह नैनीताल चले गए थे. पहले भी पिथौरागढ़ रह चुके थे. उनके संपर्क सूत्र गजब के थे. पिथौरागढ़ में तब पढ़ाई लिखाई, खेलकूद, सेमिनार गोष्ठी के साथ नाटक रंगकर्म का भला सा माहौल था. यूजीसी भी मेहरबान थी. पहली बार पर्यटन पर रोजगार परक कार्यक्रम चल रहा था. नेपाल के बहुत स्टूडेंट उसमें प्रवेश लिए थे.

उधर नेपाल में विद्रोह की स्थिति भी थी प्रचंड नेपाली छात्रों पर गहरा असर रखता था. महाविद्यालय में भी डीएम की तरफ से एक आदेश आया था जिसमें नेपाली छात्रों का विवरण माँगा गया था. उन दिनों नये लिखे नाटक बलि का बकरा की रिहर्सल भी चल रही थी जो गांव में फैली खुचुड़-पुचुड़ राजनीति पर आधारित था. इसका नायक कभी निर्मल पंडित जैसा ही जुझारू बन जाता था कभी शराब माफिया का विरोध करने वाला उमेश डोभाल. वन खनन और खड़िया भी उसकी फेहरिस्त में ठहरे. बस वह तेजी से बदलाव लाने का इच्छुक था. इसकी खबर भी नये प्राचार्य को लग चुकी थी. पता नहीं किसने ये बात कान मैं डाल दी थी कि ये नाटक तो नेपाली बगावत के धागे वागे के जोड़ जंतर से बुना गया है. उनके विश्वस्त उन्हें बता चुके थे कि रोज शाम पांच बजे से ऑडिटोरियम में रिहर्सल होती है जो आठ नौ बजे रात तक चलती है.

एक दौर था जब शरद जोशी के एक था गधा, अंधों का हाथी के साथ ही शाह जी का त्रिशँकु, एक और द्रोणाचार्य जैसे नाटक कॉलेज में खेले जाने लगे थे और चालू नाटकों का बादशाह कैलाश पंत बस हमारे ही नाटकों में अभिनय करने लगा था. भारत दुर्दशा बनाम अंधेर नगरी के कोकटेल में उसने जमादार और जल्लाद की ऐसी भूमिका निबाहीं कि उसके एन एस डी जाने व वहाँ सफल होने के हम मनसूबे भी बाँधने लगे. गिरदा, बादल सरकार, गुरशरण सिंह के साथ हमारी टीम के कई नाटक जब शरदोत्सव में हज़ारों की भीड़ देखती तो सच में इससे बढ़ कर कोई और चरम सुख हो सकता है इसकी कल्पना न होती. नैनीताल का शरदोत्सव याद आता जहां हमने कभी नेफा की एक शाम, कोहिनूर का लुटेर, युद्धमन, कर्ण भारम जैसे नाटक देखे थे. शैले हॉल आबाद रहता था. रसायन विज्ञान वाला अपना अनिल पंत नये निर्देशकों में उभर रहा था. सुरेश गुर्रानी, विनोद स्विफ्ट, सब्जी वाले अपने शौजू की अभिनय में धाक थी तो विनय कक्कड़ जैसे लाइटिंग डायरेक्टर मौजूद थे जिसने नदी, नाव और मुसाफिर में कमाल कर दिया था.वह कॉलेज का रेगुलर स्टूडेंट भी था और रोजी रोटी के लिए बाटा की शॉप में सेल्स मैन भी.

कोई बड़ा आयोजन था. प्रशासन उसे तीन चार महिने बाद महाविद्यालय में करने के लिए प्राचार्य से करार कर चुका था. उसमें वंदना -लोकगीत -नृत्य भी शामिल थे, जिसके उस्ताद बी एड वाले के. सी.जोशी थे. तब प्राचार्य डॉ.के. एन.जोशी थे. डी एस बी में अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके थे. मुझे बुलाया. इस कार्यक्रम की बात हुई जिसमें सीमांत जिले में महामहिम के साथ बड़े नेताओं के आने की बात रखी गई. मुझे सुनाया गया कि, ” ये वंदना-गीत-नृत्य तो ठीक हो गये. अब तुम कब तक पागल खाना, एक और द्रोणाचार्य, युगान्तर करते रहोगे? कुछ नया कर दिखाओ.”
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

स्पार्टाकस पढ़ा है अभी, आदिविद्रोही उपन्यास भी. पूरे उपन्यास का भारतीयकरण हो सकता है.

“तो करो”.

पर व्यवस्था के विरुद्ध है. आप अनुमति देंगे?

“अरे!अभिव्यक्ति की आजादी भी तो है “. प्राचार्य के.एन. जोशी की बड़ी प्रभावी आँखे चश्मे के भीतर से मुझे भेद रही थी.

तो ठीक है, आपको स्क्रिप्ट दिखाता हूं आदिविद्रोही की.

दूसरे ही दिन कैफ़ी आज़मी, रघुवीर सहाय और गिरदा की नज़्म और गीतों से भरी पचास पेज की स्क्रिप्ट उनके सामने थी. उन्होंने उसे अपने बैग में डाला. दूसरे दिन उसमें कई सुधार हुए लाल स्याही से और तीखा बना मुझसे कहा गया. “करो”.

तीन महिने की रिहर्सल. फिजिक्स के दीप पंत की प्रकाश व्यवस्था. अंग्रेजी वाले एन.के. अग्रवाल का संगीत और डी एन पंत, के के भट्ट और रमदा की एडिटिंग. सेना से आये थे एक्सपर्ट, द्वन्द दृश्यों के एक्सपर्ट, तो उस्ताद शहर का बॉडी बिल्डर सलीम खान जो अपना चेला भी था. गुलाम औरत और राजकुमारी के रोलके लिए पुनेठा बहनों के पेरेंट्स के पास जा ली गई अनुमति, जो सहर्ष मिली. कॉलेज के जितने दबंग थे उनमें से चुने गये सामंत और सिपाही. घायल सैनिक थे फिजिक्स के आर. सी. पांडे और फिलोसोफर दिलीप कपूर स्पोर्ट्स प्रवक्ता. अपनी हरकतों से जूलॉजी डिपार्टमेंट के प्रवक्ताओं का सरदर्द बना अनिल पंत था आदिविद्रोही.

 रोल से खुश अनिल तीसरे ही दिन अचानक बहुत अवसाद से भरा मेरे घर शाम को आया और बोला कि वह यह भूमिका नहीं का सकता. पर क्यों?

“वो आदिविद्रोही है और मेरे पाँव में पेरालीसिस! अपाहिज हूं मैं, लंगड़ा कर चलता हूं”. वह थके स्वर में बोला.

यह बात मेरे मित्रों ने भी मुझसे कही थी.

बगावत हो या वैचारिक परिवर्तन.. सब सोच से होता है. यह कह, मैं भीतर रसोई में चाय बनाने चला गया और मुझे अपने डायलॉग पर हंसी भी आने लगी. ऐसे हर फलसफे पर मैं जी भर मुस्का लेता था क्योंकि इनको कर गुजरने की कुब्बत मुझमें थी कहाँ. बस कह दिया.

चाय ले बाहर आया तो बड़ी तीखी नज़रों से अनिल ने मुझे देखा

“मैं करूँगा सर. जरूर करूँगा”.

रिहर्सल के दौरान हमारे गुलाम नायक अनिल और गुलाम औरत हेमा पुनेठा के बीच ऐसी दाँतकाटी दुश्मनी हुई कि रिहर्सल से परे कुकुर बिलाव का योग बन जाता . पर नाटक होने पर दोनों की ट्यूनिंग काबिले तारीफ थी विशेष कर पूरे सात मिनट के प्रेम दृश्य में.

अब आज ये हालत कि बलि का बकरा होने पर ही सत्ता परिवर्तन और नये प्राचार्य के आते ही अंतरमहाविद्यालय खेल प्रतियोगिता की तैयारी के बाबत क्रीड़ा अधिकारी लल्लन सिंह से सवाल-जवाब किया गया और महाविद्यालय के हॉल में शाम चार से आठ बेडमिंटन और टेबल-टेनिस की रिहर्सल के मौखिक आदेश दे दिये गये. इससे पहले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की थीम पर पहाड़ की पोल पट्टी सामने रखने वाला नाटक लड़ाई काफी पसंद किया गया था. बलि का बकरा इसी की कड़ी थी. निर्मल भी रिहर्सल में खूब आता. चाय पानी का फण्ड जुटाता. मुझसे कहा था उसने कि गांव के युवा इसी नाटक के नायक की तरह तेवर दिखाएँ तो कुछ बदलाव हो. वो नशा नहीं रोजगार दो का दौर था. निर्मल की भागीदारी बढ़ चढ़ कर थी. निर्मल को मैंने चढ़ाया भी था कि बलि के बकरे का नायक तो तू ही है. पर उस समय मुझे कहाँ मालूम था कि बलि उसी की होनी है. सफ़दरजंग अस्पताल में अस्सी परसेंट बर्न के साथ.

नये प्राचार्य के आते ही यह बात भी पहले ही दिन साफ हो गई कि यूजीसी और आईसीएसएसआर के प्रोजेक्ट के अलावा और कोई फंडिंग अगर कोई विभाग ले रहा है तो वह सीधे प्राचार्य के थ्रू ही आएगी क्योंकि कई एन.जी.ओ भी पैसे का चारा दे अपनी योजनाएं चला रहे और बदनाम कॉलेज हो रहे. यह बात पर्यावरण सुरक्षा परिषद के बारे में कही गई जिसे अर्थशास्त्र विभाग चला रहा था. साथ ही यह भी सुनाया गया कि रिसर्च पेपर मानक पत्रिकाओं में भेजे जाएं आज की तरह पहाड़-परवत जैसी पत्रिकाओं में नहीं जिन्हें रेडिकल लोग चला रहे. सारी मीटिंग के बीच डॉ. फर्तयाल मेरी ओर देख हल्के -हल्के मुस्का रहे थे.

पर्यावरण जागरूकता पर उत्तराखंड सेवा निधि के ललित पांडे हर तरह की मदद देते थे. गांव-गांव जा फल की पौध लगाने का हमारा कार्यक्रम उनकी प्राथमिकता में था. जिसमें पौंध की व्यवस्था उद्यान विभाग के डॉ हीरालाल और तिवारी जी के प्रयास से हो जाता था. मामूली खर्चे सेवानिधि उठा लेती थी.नये आए प्राचार्य ग्रांट अनुदान के सरकारी तौर तरीके से योजनाएं चलाने में कुशल थे. एक ही काम के लिए कई स्त्रोत कैसे लाइनअप किये जाते हैं और उनमें ऑफिस की क्या हिस्सेदारी हो,का गणित वह बखूबी जानते थे. हमारी टीम कुछ भिन्न थी. निर्मल पंडित जैसे छात्र नेता थे तो उससे पहले नब्बू मनराल. बड़े साफ आज़ाद ख्याल. जहां कहीं कुछ झोल दिखे तो आसमां सर पे उठा लेना.

निर्मल तो ऐसी मौलिक हरकतें कर देता कि हर बार एक नई क्रांति की कथा का बीज पड़ता. उस दिन जाड़ों के ठंडे मौसम में शाम की पाली में महाविद्यालय के हॉल में कोई परीक्षा चल रही थी. हॉल के बगल में इग्नू भवन के दुमंजिले परीक्षा कार्यालय था. पेपर बंट गये थे. एब्सेंटी आ गये थे. प्राचार्य सहित सभी दिग्गज इग्नू कक्ष के बाहर आ गये थे जहां बलभद्र बड़ा सा सग्गड़ जला चुका था. उसके अगल-बगल कुर्सियां लगा दीं थी और चाय बना कर कुण्डल लाने ही वाला था. परीक्षा इंचार्ज के.के. भट्ट अगले दिन की तैयारी में व्यस्त थे. हम सब सहायक भी नीचे धूप में आ गये. मैं डी एन पंत के साथ बॉटनी गार्डन जा वहाँ आराम से बैठ फूक लगाने की फिराक में था कि अचानक सामने से निर्मल आता दिखाई दिया. ढीली कमीज और लटकता स्वेटर. आते ही उसने प्राचार्य के पास की खाली कुर्सी पटक दी और चीख कर बोला, “वो लाइब्रेरी की किताब के सारे आर्डर आगरा कैसे गये. कुंजी टाइप किताब मंगाने की जाँच क्यों नहीं हुई? हर स्टूडेंट को चार किताब क्यों नहीं इश्यू हुईं. वो काला भूत स्टूडेंट से बदतमीजी करता है. मिल-बाँट कमीशन खाता है? क्या एक्शन हुआ”. काला भूत वह लाइब्रेरियन को कहता था. आगे फिर अपने सीने में जैसे हवा भर वह जोर से चीखा, “और स्पोर्ट का सामान नैनीताल दुआ स्पोर्ट्स से क्यों आता है”?
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

सब सुन्न. प्राचार्य कुर्सी से खड़े हो गये. उन्होंने जे सी पंत जी की ओर देखा. जे सी पंत जी निर्मल को बोत्याने आगे बढ़े. “आप रहने दीजिये. मैं प्रिंसिपल से बात कर रहा हूं. सारे आर्डर अभी कैंसिल करो. मुझे सब लिखित चहिये. वरना…

सब अवाक हो निर्मल की ओर देखते रह गये. अरे अरे! ना! अरे आग लग जाएगी! ये क्या कर रहा…”

निर्मल जलता सग्गड़ अपने हाथ में उठा अपने सर की ओर ले जा रहा था. बलभद्र एक कदम आगे बढ़ा. प्रिंसिपल साहब ने कहा मैं अभी कमेटी…

“कोई कमेटी नहीं लिखित दो अभी वरना…”

“अरे निर्मल, रुक जा सब ठीक हो जायेगा तू रुक..” जे सी पंत जी आगे बढ़े. निर्मल के दोनों हाथों में पकड़ा सुलगा हुआ सग्गड़ और खूब लम्बा बलभद्र. पलक झपकते उसने सग्गड़ अपने हाथ में लपक लिया. पर तब तक सग्गड़ क्रांति का सूत्रपात हो चुका था. फौरन डॉ प्राचार्य कक्ष की ओर दिग्गजों की रवानगी हुई. थोड़ी देर बाद सब नीचे सड़क की ओर जाते दिखे. सबकी बॉडी लैंग्वेज सही लग रही थी. निर्मल जरा तेज चलने का आदी था सो कुछ कदम आगे जा वह प्राचार्य के, उस तक पहुँचने की अवधि में रुका दिखता.

अगले दिन प्राचार्य मीटिंग के वास्ते नैनीताल-हल्द्वानी निकल लिए. हल्द्वानी उनका घर था जिसके नीचे के एक भाग पर एक वकील ने कब्ज़ा कर दिया था और वह किसी भी कोशिश से उसे छोड़ नहीं रहा था. इससे पहले सुना एक पुलिस वाले ने कब्ज़ा कर उनको किराया देना ही बंद कर दिया था. दूसरा हल्द्वानी में निदेशालय था तो नैनीताल में कुमाऊं यूनिवर्सिटी जहां मीटिंग होतीं रहतीं थीं और पिथौरागढ़ जैसे सीमांत के महाविद्यालय की समस्याओं को सुलझाने वहाँ प्राचार्य का होना लाज़िमी था. फिर भाभी भी नैनीताल जीजीआईसी में केमिस्ट्री लेक्चरर. मेरी दोनों होशियार भतीजियों में बड़ी सोनू पीएचडी कर बड़ी नौकरी में लग गई थी और छोटी मोनू आईआईटी.

पिथौरागढ़ प्राचार्य पद सँभालने की शाम ही वह घर आये. सबके हाल चाल पूछे. फिर कुण्डल की सिफारिश से रमेश धामी से मिलने पर बात तय हुई. आपको चाय पिलाता हूं कह मैं किचन में आ गया. चाय के वह बड़े शौकीन थे. श्रीमती जी से पारिवारिक क्वीड़ चलने लगी जिससे मैं बचे रहना चाहता था. इसका तोड़ भी मेरे पास था कि किचन में जा अपनी पाक कला पर ध्यान लगाया जाये और ऐसा कुछ खाने पीने को प्रस्तुत हो कि वहाँ अतिथि श्रीमतीजी के सहज संभाषण में घिरा रहे और मैं इन सबसे मुक्त अपने कुशल रिशयार होने के परंपरागत कौशल को सिद्ध करते रहूं. आखिर पल्यूं के पांडे हुए तो कभी राजा के रसोईये भी. ऐसा मैंने पढ़ रखा था. हालांकि हमारे सयाने पंडित कुलोमणि पांडे जू तो यह सिद्ध कर देते थे कि पूर्वजों की अचूक भविष्यवाणी क्षमता से अति प्रसन्न हो हिमाचल के राजा ने उन्हें अल्मोड़ा के पल्यूं के साथ और भी चार जगह जमीन दान में दी और उन्हें हिमाचली से अल्मोड़िया बना दिया. इस पीढ़ी में हमारे पिता सहित चार भाई गांव से भाग मैदान की ओर खिसक गए. पढ़ने लिखने के शौक से कुछ न कुछ बनते भी रहे.अंग्रेजों को जैसे बाबू लोग चहिये होते वैसे सारे टैलेंट संभवतः उनमें भरे थे.

प्याज़ की पकोड़ी और हरी चटनी की खूब तारीफ हुई. दिनेश दा आशान्वित हो लौटे और मैं उन्हें उनके आवास तक छोड़ भी आया.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

“और क्या कह रहे थे तुम्हारे प्रिंसिपल साब, मतलब दिनेश दा”. लौटकर घर पहुँचने पर श्रीमती जी काफी कुछ जानने की उत्सुक लगीं. पांडे गांव में शेरदा के यहाँ से खाया पान मुंह में था. बस वही, शादी की फिकर. इतना पढ़ लिख भी जब डिसजन धामी के, मसाण के भरोसे हो तो और क्या कहें.

“अरे नहीं, सुनो! ये सब चीजें होतीं हैं. हमारे स्कूल में भी कई टीचर्स जाती रहतीं हैं.ओझा जी की वाइफ भी बड़ी भक्त हैं उनकी”.उनकी बात पूरी भी न हुई थी कि मुझे कुछ गुस्सा सा आने लगा.

हां किसी फ़ौजी की बीबी का भूत झाड़ते अब खुद सवार हो गया है. फ़ौजी को छुट्टी नहीं मिल रही वरना? मालूम है तुम्हें इसे गांव से निकालने पर तुले हैं गांव वाले. कहीं अड़किनी जा कर बैठने लगा है. वहाँ भी वैसी ही माया. तुम्हीं क्या उसके दरबार में ऐसे-ऐसे पढ़े लिखे लोग दिखते हैं कि हैरत होती है. ऐसी ही ताकत है देवता है तो क्यों नहीं गांव का भला करता. बेकार उतने ही हैं. सड़क वैसी ही है. एक वो मुख्यमंत्री घोषणा कर गया हवाई पट्टी की सब..

“हमारे सेंट्रल स्कूल में तो कितने ही जाते हैं वहाँ और सुनो लो डीएम साहिब की बीबी भी…”.

अच्छा भई तुम भी जाओ. पूछ ही कराओ. पूछ ही रह गई है अब, भले के लिए. मैंने टी वी की आवाज बढ़ा दी.

जब कुण्डल के साथ मैं पहली बार बीसा बजेड़ गया तो रमेश धामी बाहर बैठा लोगों से घिरा बीड़ी धोंक रहा था. कुण्डल ने प्रोफेसर साब और खूब घूमने फिरने के शौकीन के कई बोल मेरे बारे में बोले. तुरंत उसने अपने दोनों हाथ से मेरा हाथ पकड़ा और बोला,” जै हो आप को ले जाऊंगा काली पार नेपाल में गणमेश्वर के थान द्योताल की असली जगह. अड़किनी से नीचे उतर थोड़ा जल्दी पहुँचते हैं, पर अभी तो काली प्रचंड है. पार करना मुश्किल होगा. सो दारचुला के रास्ते पुल पार कर जाना होगा. बस प्याज़ लस्सन मीट वीट से दूर रहना होगा. आपको देबता बुला रहा. सो कुण्डल दा बीपै को अमूस पड़ेगी साब को ले आना” .

फोटो खींच सकते हैं क्या? मैं बड़ा उत्साहित हो गया था.
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

कुण्डल ने फ़ौरन कहा, “ना”. चमड़े की पेटी, बटुआ भी नहीं जाता वहाँ”. अब चमड़े से भरी आदमजात की काया कैसे जाती है. मैं भीतरी प्रतिवाद मैं था.

पर धामी बोला,”आप खींच लेना, बस जब आंग में द्योताल हो तो लाइट की झप्प मत करना”.

“आपको अच्छा मानता है धामी. तभी साथ ले जाने के लिए कह दिया. फोटो-होटो भी खींच लो कह दिया. और किसी को इतना मुंह नहीं लगाता. आपकी वो पाउच वाली सिगरेट भी खूब धोंक जाता है”. कुण्डल कालीपार थान में जाने को ले बहुत ही खुश था. उसने पहले कई बार वहाँ जाने की सोची पर जाने में अड़ंगा लगा. अब तो द्योताल की कृपा हो ही जाएगी. लड़का हाईस्कूल मैं ही अटका है. पांच लड़कियों में दो अभी बिवानी हैं. सबसे बड़ी वाली का दामाद आइ.टी. बी.पी में था. पता नहीं क्या रोग लगा कि हड्डियां गलने लगीं. बच भी न पाया. देबता ही सब ठीक करेगा साब.

कुण्डल था तो चपरासी पर खटीमा के पास चकरपुर में कई एकड़ जमीन थी. यहीं पिथौरागढ़ में भी कॉलेज के पास उपरेतियों के गांव में कई खेत हैं,दुमंजिला मकान है. गाय भैंस का गोठ है. रोज सुबे जी.आइ. सी रोड तक आ कॉलेज वालों के यहां दूध पहुंचाता है. दही-मट्ठा तो होने पर ऐसे ही पिला देता है.

जब से मैं पिथौरागढ़ कॉलेज आया, चार-पाँच बजे घर लौटने से पहले नियम सा बन गया था कि उप्रेती कैंटीन में चाय पी जाती. वहाँ कुण्डल भी होता. खबरों का खजाना. सब अपडेट कर देता. और हां, कभी चाय के पैसे न देने देता. खुद देता. साथ में कैप्सटन सिगरेट भी पिलाता.

घर की अपनी समस्याओं के समाधान का सूत्र कई मानों में कुण्डल से मिला था. ये एक आदमी अपनी छोटी सी सरकारी नौकरी के साथ कितने बड़े मकड़जाल में उलझा है पर कहता कुछ नहीं. और दूसरी तरफ मैं हूं जो जरा जरा बात में घबड़ाने की बीमारी पाल रहा हूं. और इन सब से परे यात्राओं का शौक़ीन. सोर घाटी का बड़ा हिस्सा उसी के साथ घूमा था मैं. वह कहीं भी चल दे बस देबता का थान होना चाहिए.

दारचूला से आगे नागार्जुन मंदिर होते फिर काली नदी के किनारे -किनारे चलते पूरा दिन लग गया था गणमेश्वर के थान पहुँचते.रास्ते में हरड के जंगल. पहले ही बता दिया था कि यहां पेड़ों में लगा कुछ तोडना नहीं है. और हरड़ के जंगल में बैठना तो बिल्कुल भी नहीं. ऐसा प्रेशर बनेगा कि संभालना मुश्किल. काली के किनारे उसके भयानक शोर और गर्जना के बीच एक चबूतरा उस पर कुंड सा बना. नेपाल से आए कितने ही, आस पास के गावों से जुटे आदमी औरतें, बड़े -बूढ़े सयाने हर किसी के चेहरे पर किसी न किसी दुख की छाया.चिंता की रेखाएं.

ढ़ोल दमुवे के साथ थाली भी पीटी जाने लगी. रमेश के साथ नेपाल से आए कई कई धामी. कितनों पर अक्षत पड़े कितनों ने दरबार में माथा टेका. न जाने कितनों के दुख गले, विपदा मिटी.

धन सिंह आया था फिर बड़ा खुश. कहने लगा अब तो मिल भेंट होती रहेगी. यहीं भुरमुनी में रहने की मजबूरी हो गई सैबो. बहुत जमीन-जायदाद हुई पर करने वाला कोई नहीं. ऐसे ही पड़ा रहा तो इधर-उधर से घेरबाड़ कर कब्ज़ा लेंगे रिश्तेदार. यहाँ रहते तबियत भी ठीक है अब. खांसी तो थम ही गई. अब एक दिन आपको ले जाऊंगा भुरमुनी. वहाँ से आगे ज्वालाजी का मंदिर भी है. पाण्डेजु हुए करता धर्ता. उनको तो साब कर्ण पिशाचनी सिद्ध हुई,जाने बगुलामुखी. बस कान में जनेऊ डाल पाण्डेजु के खाप में तो जैसे सुरसती मैया बस जाने वाली ठेरी. आप गए हो पहले कभी?

हां अपने जीजा के साथ गया था. वो भक्त हुए उनके.

तो आपको कुछ बताया उन्होंने.

मैंने तो खूब फोटो खींची. प्रसाद खाया. फिर उस दिन भंडारा भी था. खन्ना मेडिकल स्टोर वालों की ओर से वो योगेश खन्ना लगा था. वो भी भक्त हुआ पाण्डेजु का.

“खूब चढ़ाई है मंदिर को जाने में. आप भी पहाड़ चढ़ने के शौकीन हुए बचपन से. कैसा डिमाग खराब कर दिया था दिलीप का. यहां भी जाते होगे पहाड़ों में. कैलास गए कि नहीं”?

नहीं कैलास तो गया नहीं महंगा भी तो बहुत है वहाँ जाना. इधर मिलम हो आया था तो धारचूला से ऊपर कई बार जा चुका. पिथौरागढ़ का ये सीमावर्ती इलाका कॉलेज पढ़ने के दिनों में ही हो आया था, इक्कीस साल की उम्र में. फिर कॉलेज में नौकरी लगी तो श्रीनगर अल्मोड़ा के बाद पिथौरागढ़ आ गया.

अल्मोड़ा में जब था तो तवाघाट दुर्घटना हुई थी तब कॉलेज की ओर से राहत- बचाव दल में ऊपर खेला-पलपला तक गए थे. पिथौरागढ़ आने पर तो धारचूला आना, कभी नारायण आश्रम कभी आदिकैलाश और फिर गोरी गंगा जल विद्युत परियोजना से भी जुड़ा. सो इस बहाने पहाड़ चढ़ना देखना होता रहा. अब नौकरी के साथ जब छुट्टी हो जाड़ों की, तभी लम्बा निकला जा सकता है. अब छिपला रह गया है. देखो कब तक…
(Chhiplakot Article by Mrigesh Pande)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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