कनार गांव के ऊपर बर्फीला पहाड़ छिपला केदार.
मलैनाथ की कथा में छिपलाकोट से भागश्री को भगा लाने का बड़ा ही रोमांचक प्रसंग आता है. मलैनाथ सीराकोट के थे और छिपला कोट यहाँ से सामने उत्तर दिशा में दिखता. दोनों के बीच में घणधूरा का विशाल और घना जंगल. शरद में सीरा और अस्कोट के इलाके से देखें तो छिपला कोट बर्फ से भरा हुआ अपनी पूरी आभा में चमकता है. इस पहाड़ी के बीच में घने जंगलों के बीच नजर आता है कनार का मायाला सा गाँव जहाँ का अलौकिक घी दुनिया में सबसे बढ़िया घी है. इस छिपला की पहाड़ी को अलग अलग रंगों में देखते देखते हमारा बचपन बीता. इसी बीच कभी हमने छिपला की जात के बारे में सुना. और फिर किसी पत्रिका में एक लेख भी इस बारे में पढ़ा. सालों तक सोचते रहे कि कभी यहाँ जायेंगे. लेकिन कभी संजोग बना नहीं. Chhipla Jaat Kanaar Village
समय बढ़ता गया और इत्तेफाक से हमारे पड़ोस में बरम के कुछ विद्यार्थी आकर रहने लगे जो थे, परिहार मासाप के बच्चे. उनके साथ दोस्ती हुई तो हमारे मन में फिर से छिपला जात की हिलौरे फिर से उछाल मारने लगे. बरम में उनके घर का पता ले कर हम दोनों भाई निकल पड़े छिपला की जात में. हमें न रास्ता पता था न कैसे जायेंगे इसका अनुमान. हम दोनों भाइयों ने एक-एक बैग बनाया. उसमें एक जोड़ी गरम कपडे, शौल और पानी की बोतलें, कुछ बिस्किट, सूखे मेवे, ग्लूकोज आदि रखे और निकल लिए जौलजीवी की गाड़ी पकड़ कर.
जौलजीवी तो पंहुच गए थे लेकिन आगे का कोई पता न था कि जाना कहाँ है. बरम की गाड़ी में बैठे. एक लम्बी जीप के पीछे की सीट मिली. सवारी भरने में अच्छा ख़ासा टाइम लग रहा था. एक-एक कर बरम के पेसेंजर आकर गाड़ी में बैठते जाते. सबसे आगे की सीट में एक दुबला सा किशोर बैठा था, लाल टी शर्ट पहने. उसके बगल में एक गोरा सा लड़का जो उससे कुछ बड़ा लग रहा था. बीच की सीट में कुछ और लोग थे जो कनार, बरम, गोगई गाँव के रहे होंगे. गाड़ी चलने से ठीक पहले एक दुबला पतला आदमी पीछे की सीट में सवार हुआ. हलके नशे में था. पहली नजर में बड़ा झगडालू सा लगा. पूरे रास्ते वह कुछ न कुछ बोलता ही रहा. हम बरम में बाकी लोगों के साथ-साथ उतर गए.
आस पास कोई परिचित न था. केवल परिहार मासाप के बच्चों, नरु- संजू का रिफरेन्स था जिसके सहारे कुछ लोगों से पहचान सी होने लगी. यहाँ पर छिपला से आने वाली साफ और सुन्दर सी नदी गोसी आकर गोरी में मिलती है. गोसी में एक पुल पार कर इसके एक किनारे किनारे कनार गाँव तक आज का सफ़र था जहाँ से कल जात आगे बढ़नी थी. हमने स्थिति का जायजा लिया. जहाँ जाना है उसकी दूरी का अनुमान लेने के लिए पूछताछ शुरू की. लोगों ने छिपला की जात के नियम कायदे बताने शुरू किये. रात को कहाँ रहेंगे इस बारे में पूछा क्योंकि कनार में कोई भी हमारा परिचित न था और न कभी हम पहले यहाँ आये थे. इतने में वह दुबला आदमी कहीं से प्रकट हुआ जो गाड़ी की पीछे की सीट में बैठा था. बहुत ही हिकारत भरे भाव में उसमें लगभग आसमान की और ऊँगली करते हुए सबसे ऊंचे पहाड़ को दिखाते हुए बताया कि वहां है छिपला… तुम्हारे बस का नही है यार. खाली आ जाते हैं… Chhipla Jaat Kanaar Village
बड़ा गुस्सा आया और थोड़ा डर भी लगा लेकिन उसकी बातों से और ज्यादा ललक हो गयी वहां जाने की. ईगो का सवाल आ गया था. यहाँ पर हमने परिहार मासाप का घर पूछा, वहां जाकर उनके छोटे भाई साहब से मिले और कुछ सहयात्री यहाँ हमें मिले जिनमें कुछ शिक्षक भी थे. अधिकाँश लोग भक्ति भाव से देव दर्शन वाले भाव से जा रहे थे लेकिन हममें इस भाव का अभाव था. हम तो रोमांच और एडवेंचर के भाव से ज्यादा प्रेरित थे.
बरम से हमने धीरे-धीरे ऊपर चढ़ना चुरू किया. अपने याशिका कैमरे के लिए हम पर्याप्त फिल्म रोल लेते आये थे इसलिए तस्वीरें लेते चल रहे थे. रास्ता लगभग सोलह किलोमीटर लंबा था. इस बीच उन शिक्षक से हमारी अच्छी दोस्ती हो चुकी थी जो हमें बरम में मिले. लगभग आधे रास्ते में एक जगह पर पानी का धारा है जहाँ पर सभी मुसाफिर रुकते हैं. हम भी यहाँ पानी के लिए रुके. थोडा सुस्ता ही रहे थे कि वह दो लड़के आते दिखे जो जौलजीवी में गाडी की आगे की सीट पर बैठे थे. उनमें से बड़े वाला ख़ासा परेशान दिख रहा था. असल में उसके बड़े से बैग का चैन उखड़ गया और सामान गिरने लगा था. सामान भारी भी था. ऐसे में हमारे बैग में रखा सूई तागा बड़ा काम आया और बदले में उन दोनों लड़कों की बहुत मित्रवत मुस्कान हमें मिली. यहाँ से चले तो दोनों ही लड़के थोड़ी ही देर में बहुत आगे निकल गए और फिर रास्ते भर कहीं नहीं दिखे.
कनार पंहुचते-पंहुचते शाम हो चुकी थी. अक्टूबर की ठंड शाम थी और हमने कनार में कोकिला भगवती के मंदिर में मसाप लोगों के साथ शरण ली. तय हुआ कि हम पैसे मिलकर खाने का सामान ले लेते हैं और किसी से बनवा लेते हैं. लोगों ने कहाँ कि जित्तू खाना बना देगा. खैर हमने सामान के लिए पैसे दिए और एक किनारे बैठ सुस्ताने लग गए. कुछ देर में खाने के लिए बुलावा आया. जित्तू खाना बनाकर तैयार था. लेकिन उसे देख हमारी स्थिति अजीब हो गयी. ये वही आदमी था जो गाड़ी की पछली सीट में था और जिसने बरम में हमने अच्छा ख़ासा डराया था. लेकिन खाना खाते हुए यह कोई और ही आदमी लगा. इतना दोस्ताना, इतना खुशमिजाज, इतना केयरिंग. खाना खाते-खाते जीतू से हमारी जो दोस्ती हुई वह आज भी बरकरार है और जीतू का घर कनार में हमारा अपना ही घर बन गया. यहाँ मुझे इस बात पर और पक्का यकीन हुआ कि फर्स्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इम्प्रेशन की बात गलत है. जीतू इसके बाद हमारे छिपला और कनार प्रवास का पक्का साथी बना और इसके साथ ही हमने समधी के उड्यार में तीन रातें काटी. कनार के घी के साथ मजेदार खाना खाकर हम पराल और दरी बिछाकर सो गए. Chhipla Jaat Kanaar Village
सुबह अँधेरे में उठकर ताजा हुए तो मसाप लोग आगे की व्यवस्थाओं के लिए किसी न किसी घर में जा चुके थे. उन्होंने हमें कुछ बताया भी नहीं. अब हम मंदिर में खड़े थे कि आगे क्या करें? दो दिन की यात्रा में हम रास्ते में क्या खायेंगे? अधिकांश लोग वहां पूरी, आलू और सत्तू बनाकर ले जाते हैं और कुछ सयानों और पुजारियों के लिए अन्वाल खाना बनाते हैं. हमारे पास न आलू था न पूरी और सत्तू.
मसाप के साथ के एक आदमी ने सलाह दी कि कुछ राशन खरीद कर किसी से बनवा लो. हम भी दुकान की और चल दिए आटा-तेल लेने. लेकिन यहाँ हमने वह छोटा लड़का भुप्पी मिल गया जो कल गाड़ी की फ्रंट सीट में बैठा था. उसने कहा मैं खाने की व्यवस्था करवा दूंगा आप चिंता मत करो. वह बहुत कम बोलता था. हमें वह अपने घर ले गया. बाहर के कमरे में हमें बिठा कर वह कहीं चला गया. कुछ देर तक तो वहां कोई आया ही नहीं. हम अजीब सी उलझन में थे कि भुप्पी अपने पूरे परिवार के साथ हमारे सामने आ गया. बूबू, आमा और मां. अगल बगल के परिवारों के लोग भी मुस्कुराते सामने थे और वह गोरा लड़का गोपाल भी जिसका बैग फटा था. थाली में ताजा हरी कड़की और हरा नमक लाते हुए बोला कि ये ककड़ी खाओ पहले. आपने जो जौलजीवी में खरीदी वह तो हाइब्रिड थी ये असली है. हम अब सहज होने लगे.
बूबू गोपाल सिंह पुजारियों में से एक थे और उन्होंने हमारी बेल्ट, पर्स और चमड़े के सामान को यही रखवा लिया. पेट में चूहे कूदने लगे थे और खाने का कोई ठिकाना न था. इतने में भुप्पी की मां थाली में भात, पल्यो और घी लेकर आ गयी. हमें इस प्रेम भरे भोजन को जम कर खाया. और भुप्पी के साथ निकल पड़े छिपला जात के लिए. लेकिन रास्ते में क्या खायेंगे, कैसे दो दिन का भोजन बनेगा इसका अभी भी कोई अता पता न था. अपने गैर जरूरी सामान को हमने यहीं छोड़ा और निकल पड़े उस पर्वत की ओर जो बचपने से हमारे सामने था और जिसमें चढ़ने के सपने हमने वर्षों से देखे थे. लोग यहाँ जाते क्यों हैं? क्या अर्थ है लोगों के लिए छिपला की जात का? ऐसे बहुत से सवाल थे जिनके उत्तर हमें आने वाले दो दिनों में मिलने थे. Chhipla Jaat Kanaar Village
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पिथौरागढ़ में रहने वाले विनोद उप्रेती शिक्षा के पेशे से जुड़े हैं. फोटोग्राफी शौक रखने वाले विनोद ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों की अनेक यात्राएं की हैं और उनका गद्य बहुत सुन्दर है. विनोद को जानने वाले उनके आला दर्जे के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर से वाकिफ हैं.
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बहुत अच्छा वर्णन किया है, धन्यवाद।
बहुत अच्छा बर्णन किया बहुत अच्छी स्टोरी,
लेकिन आगे की स्टोरी जानने कि इच्छा अधूरी रह गई।