क्या चंद शासकों से पहले अल्मोड़ा में नंदादेवी का कोई मंदिर था?

परंपरा और इतिहास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण यह लेख पल्टन बाज़ार, अल्मोड़ा प्रभात कुमार साह गंगोला जी द्वारा 2011 में लिखा गया है. श्री नंदा स्मारिका 2011 में ‘नंदा प्रवाह’ नाम से प्रकाशित यह लेख स्मारिका से साभार लिया गया है : सम्पादक

य इदं परम् पुण्यं नन्दा महात्म्यमुत्तमम्, शृणुयाद वा पठैद्वापि भुक्तिं  मुक्तिं च विन्दति।। 
इत्येतत्कथितम् विप्रा नन्दाख्यानं सुविस्तरम्, आयुरारोग्यमैश्वर्यं सुख सम्पद्विऽवर्धनम्।।

नन्दा-एक शक्ति, एक संस्कार, एक परंपरा, एक आराध्य, एक विचार, एक संस्कृति अर्थात उत्तराखण्ड के प्रत्येक कण और विचार में किसी न किसी रूप में विद्यमान है. नन्दा को एक पूज्यनीय शक्ति स्वरूपा देवी भगवती का रूप मात्र मान लेना नितान्त अनुचित होगा. आवश्यक है कि इसके पौराणिक, एतिहासिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि सभी पक्षों का सामयिक दर्पण में समग्र रूप से अवलोकन किया जाय तो नन्दा के उस विराट स्वरूप का आभास होता है जिसका वर्णन वैदिक ऋषि ने स्वयं माँ के श्रीमुख से करवाया है –

अहं ब्रह्मस्वरूपिणी. मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकम् जगत्. शून्यंचाशून्यं च. अहमानन्दानानन्दौ. अहं विज्ञानाविज्ञाने. अहं बह्याब्रह्माणी वेदितव्यै. अहं पंचमूतान्य पंचभूतानि. अहंमखिलं जगत्. वेदोहमवेदोहम. विद्याहमविद्याहम. अजाहमनजाहम. अध्श्वोध्यं च तिर्यकचाहम

यही वो विराट स्वरूप है जिसने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में निर्गुण ब्रह्म के उपासक महात्मा तोतापुरी को दर्शन दिए थे और जिसे महर्षि अरविंद ने समस्त ब्रह्मांड की देवी कहा था. कुर्मांचल में, इसकी पूजा माँ काली, नंदा,चंद्रिका और दुर्गा के नाम से की जाती है. नंदा की उत्पत्ति के बारे में कई किंवदंतियाँ और मिथक प्रचलित हैं, लेकिन पौराणिक आधार पर, प्रत्येक धारा का स्रोत एक ही स्थान पर है. नंदा पर्वत पर स्थित नंदा से उत्पन्न, देवी की छह शक्तियों में से पहली शक्ति योगमाया है. मार्कंडेय पुराण के मूर्ति रहस्य प्रकरण में इसका उल्लेख है :

“नन्दा भगवती नाम या भविष्यति नंदजां सा स्तुता पूजिता भक्त्या वशीकुर्य्याज्ज्ञयक।।

यह भी उल्लेख है कि नंदा से उत्पन्न देवी नंदा की भक्तिपूर्वक पूजा करने से तीनों लोक उपासक के अधीन हो जाते हैं. नवर्ण मंत्र जप विधि और सप्तशती न्यास में, सर्वोच्च शक्ति माता के अंश छह देवियाँ नंदा, रक्तदेविका, शाकंभरी, दुर्गा, भीम और भ्रमरी हैं. दुर्गा सप्तशती में, माता के तीन स्वरूपों, अर्थात् महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती में से प्रथम को नंदा, दूसरे को शाकंभरी और तीसरे को भीम कहा जाता है.

नंदा शाकंभरी भीमाः शक्तयः. रक्तदतिकादुर्गाभ्रामयर्योबीजानि..

दुर्गा सप्तशती के उत्तर चरित्र विनियोग में भी नंदा को आदि शक्ति कहा गया है. सुमेधा ऋषि मूर्ति रहस्य में कहते हैं – नन्द के वंश में पैदा होने वाली नन्दा कहलाएगी. ब्रह्मपुराण में नंदा का वर्णन दक्ष प्रजापति की पुत्री सती और हिमवान की पुत्री उमा के रूप में आया हैं मत्स्यपुराण में नन्दा का उल्लेख पार्वती के रूप में हुआ है. उसमें पार्वती के तीन रूप दृष्टिगत होते हैं- उमा, अपर्णा तथा एकपर्णा. केनोपनिषद में इन्द्र के सम्मुख प्रकट हुई देवी हेमवती को हिमालय की पुत्री नंदा कहा गया है. स्कंदपुराण के मानस खंड में उल्लेख है :-

पश्चिमाभिमुख साक्षात् हिमाद्रिः कथ्यते बुधेः, तस्य दक्षिणमागे वै नाम्नां नंदगिरी स्मृतः। 
तत्र नंदा महादेवी पूज्यते त्रिदशै ऋषि, तां दृष्ट्वै मानवो लभ्यते ऐश्वर्यमिह सम्यक् 
नास्ति नंदा समादेवी भूतले वरदा शुभा।।

(पश्चिमी हिमालय के दक्षिणी भाग में नंद गिरि पर्वत है जहाँ महादेवी नन्दा की देवताओं और ऋषि मुनियों द्वारा पूजा की जाती है जिनके दर्शन से मानव ऐश्वर्य प्राप्त करता है. भूतल में ऐसी वरदायी व कल्याणकारी देवी नंदा के अतिरिक्त और कोई नहीं है.)

भविष्य पुराण, देवीपुराण, श्रीमद्देवी भागवत, हरिवंशपुराण, शिवपुराण तथा अन्य कई ग्रंथों में नन्दा के विराट आदि शक्ति रूप का उल्लेख मिलता है. यह भी माना जाता है कि हिमवान की पुत्री अपने ही मायके में रहने के कारण नन्दा कहलाई.

जागर में भाद्रपद शुक्लाष्टमी को नन्दा का जन्म बतलाया गया है जो इस बात का वाचिक पारंपरिक प्रमाण है कि योगमाया भगवती ही माँ नन्दा है. कुछ जगरिये स्पष्टतः सृष्टि की उत्पत्ति की गाथा के गायन में कंस के हाथों से छूट कर नन्दापर्वत श्रृंखला में महामाया का अवस्थित होना बतलाते हैं. मालूशाही में भी मालू के पिता दुलाशाही अपनी रानी धर्मदेवी के साथ मनोकामना पूर्ण करने के उद्देश्य से अल्मोड़ा हाट आकर नन्दादेवी के द्वार पर माथा टेकता है – 

रौबास तौबास कने एगो अल्मोड़ि हाट हो महाराज दुलासाही पुजी हल गय रे. 
तै बखत बिधातौ नंददेबि दाजैज. 
सिरा दीनी ढोक पायां ल्हिनी ओट. 
देबी सुफल है जाया हमन हुणि. 
हमर पराण देबी पुर कर दिये हो. 

गंगनाथ की गाथा में भी डोटी के राजकुमार गंगनाथ का नंदादेवी मंदिर आने का उल्लेख मिलता है :-

तला खेत बोई खेति पाति मला खेत रायो, भाना का खतिर जोगी अल्मोड़ि आयो. 
नन्दादेबी थाना में दरखणों तेरा देखणै, तेरि गंगा दरखाणि तेरी.

यह प्रश्न अनुत्तरित है कि क्या नंदादेवी का कोई मंदिर अल्मोड़ा में इससे पूर्व भी रहा क्योंकि ये दोनों गाथाएँ बाज बहादुर चंद से पूर्व की हैं. लोक गाथा आँटू में भी नन्दा की अभिव्यक्ति हुई है. यह उल्लेखनीय है कि किसी भी जागर अथवा गाथा में चंद राजाओं द्वारा या अन्यथा नन्दा के कन्यादान करने विषयक कोई उल्लेख नहीं मिलता है. कूर्मांचल में नन्दा का महत्व इस बात से सुस्पष्ट हो जाता है कि यहाँ जन्मे व्यक्ति के प्रथम संस्कार अर्थात षष्ठी पूजन के द्वार मातृका पूजन में नन्दा का ध्यान किया जाता है :- 

“कुमारी धनदा नन्दा विपुला मंगलाचला पद्मा शैला तु नामोक्ता क्षरमातरः .” 

श्रीमद्भागवत के दसवे स्कन्ध के दूसरे अध्याय में वर्णन है कि योगमाया ने नन्द के घर जन्म लिया. इसी योगमाया ने देवकी के गर्भस्थ बालक को खींच कर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में डाला. यही बालक संकर्षण या बलराम के नाम से विख्यात हुआ. भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी को भगवान ने देवकी के गर्भ में जन्म लिया तथा इसके एक पक्ष पूर्व योगमाया प्रकट हुई मानी जाती है. योगमाया के ही प्रभाव से वसुदेव कंस के हाथों नवजात शिशुओं की रक्षा करने में समर्थ हुए तथा दोनों शिशुओं की रक्षा इसी योगमाया द्वारा भगवान के आदेशानुसार की गई. यह भी एक कारण है कि बालक के षष्ठी संस्कार में योगमाया अर्थात भगवती नन्दा का ध्यान किया जाता है. देवी भागवत में नन्दा को शैलपुत्री के रूप में नव दुर्गाओं में बताया गया है. भविष्य पुराण में जो नव दुर्गाऐं उल्लिखित हैं उनमें नन्दा भी सम्मिलित हैं. देवी पुराण में स्वयं शिव कहते हैं कि हिमालय में चार तीर्थ हैं जिनमें से नन्दा तीर्थ भी एक है.

माँ नन्दा का हिमालय में सर्वमान्य स्वरूप नन्दादेवी पर्वत शिखर है जो देवी का जाग्रत मंदिर माना जाता है. शिव की अर्धांगिनी माँ पार्वती का निवास स्थान भी यही माना गया है. नन्दाकोट माँ भगवती का दुर्ग माना गया है. पिण्डरक पर्वत जो अब त्रिशूल पर्वत के नाम से जाना जाता है वह इस दुर्ग की रक्षा करता है. नन्दा पर्वत श्रेणी में ये तीन प्रमुख शिखर हैं. पिण्डरक से निकलने वाली नदी का नाम इसीलिए नन्दाकिनी हुआ.

उत्तराखण्ड में नन्दा का प्रभाव संस्कार, वास्तु, क्षेत्र, नदी, सरोवर, व्यवहार, विचार सभी में विद्यमान है. नगर, सरोवर, नदी, व्यक्तिगत नाम इत्यादि में नन्दा समाहित है. यह नन्दा के प्रति समर्पण व आदर का परिचायक है. प्रकृति की गोद में जीवन यापन करने वाले लोगों ने इसे ही परम् शक्ति माना है. इसी का ध्यान कर “नन्दा मैया की जै” के गगनभेदी नाद से शत्रुओं के पाँव डिग जाते हैं. इसी जयकार ने उत्तराखण्ड के रणबाँकुरों को बल शौर्य व पराक्रम प्रदान किया. शत्रुविध्वंसिनी श्री महाकाली शक्ति स्वरूपा माँ नन्दा के प्रति विश्वास, भक्ति तथा श्रद्धा ने उन्हें कभी ईष्ट देवी, कभी माता, कभी पुत्री, कभी भगिनी, कभी सखी अर्थात सभी मानवीय रूपों में स्थापित कर दिया.

चंद शासन काल के पूर्व भी नन्दा की आराधना अर्चना के प्रमाण प्राप्य हैं. कार्तिकेयपुर के महाराज परमेश्वर,ललितशूर देव, पद्मभट देव, सुभिक्षराज देव आदि के भगवती नन्दा की आराधना विषयक प्राप्त ताम्रपत्र कत्यूरियों के शासनकाल में माँ नन्दा की कूर्माचल में पूजा-अर्चना का प्रामाणिक साक्ष्य है. इस विषय में कोई संदेह नहीं है कि चंद शासकों ने माँ नन्दा को अपनी ईष्ट देवी के समकक्ष माना और अपनी कुलदेवी के साथ ही उनका भी पूर्ण आस्था, विश्वास व सम्मान के साथ विधिवत् पूजन किया. संभवतः इसी कारण अल्मोड़ा में नन्दा के साथ दूसरी प्रतिमा (डिकारा) निर्मित किये जाने की प्रथा प्रचलन में आई, जिनमें एक नन्दा और दूसरी चंद राजवंश की कुल देवी हैं.

उल्लेखनीय है कि जागर अथवा किसी गाथा में सुनन्दा नाम की चर्चा या उल्लेख नहीं मिलता. अल्मोड़ा क्षेत्र के अतिरिक्त नन्दा देवी की अन्य प्रतिष्ठित पीठों में दो डिकारे बनाने का प्रचलन नहीं है. पारंपरिक रूप से अन्य सभी पीठों में कोट भ्रामरी की तरह या तो एक डिकारा या प्रतिमा व धातु के एक मुखौटे की डोली बनाने का प्रचलन है. कोट भ्रामरी में एक अन्य परंपरा भी है कि प्रतिवर्ष मेले के पूर्व देवी की प्रतिष्ठित कटार को बेदिनी कुंड में स्नान करा कर लाया जाता है तथा उस अभिसिंचित कटार से ही बलि देकर और फिर कदली स्तम्भ काट कर मूर्ति निर्माण किया जाता है.

चंद वंशज राजा बाज बहादुर चंद (1638-1678) ने गढ़वाल व भोट के राजाओं पर विजय प्राप्त कर जूनियागढ़ के दुर्ग को जीता. विजय के उल्हास में प्रतीक स्वरूप नन्दा के विग्रह को अल्मोड़ा लाया गया. मार्ग के अंतिम पड़ाव में डंगोली गरूड़ के पास रात्रि विश्राम के बाद प्रातः विग्रह के टूट कर दो भागों में विभक्त होने की सूचना ने राजा को शंकित कर दिया. यह किंवदन्ति है कि तब राजगुरु के आदेशानुसार विग्रह के एक टुकड़े को उसी स्थान पर स्थापित कर मर्मी भगवती की कटार के साथ प्रतिष्ठित किया गया. कालान्तर में यही स्थान कोट भ्रामरी के नाम से विख्यात हुआ. विग्रह के दूसरे भाग को अल्मोड़ा में राजा के तत्कालीन निवास भल्ला महल (वर्तमान में कचहरी परिसर) में स्थापित किया गया. इस प्रतिष्ठित विग्रह की नित्य पूजा आदि के लिये विशेष फुल्यारों, दास-दासियों एवं पुरोहित की व्यवस्था की गई. प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की नन्दाष्टमी को महाराज द्वारा कुल देवी की षोडषोपचार विधि से तांत्रिक महापूजा का आयोजन किया जाने लगा जिसमें महिष बलि के उपरान्त तांत्रिक विधि विधान से कुल देवी के यंत्र को खोल कर उसका पूजन किया जाता था. माँ नन्दा के आगमन के पश्चात इसी क्रम में उनका भी पूजन इसी विधि से किया गया. तात्रिक पद्धति में माँ नन्दा को भगवती तारा के नील सरस्वती स्वरूप में माना गया है अतः इस षोडषोपचार विधान से उनका भी पूजन किया जाने लगा.

गढ़वाल के राजवंशजों द्वारा भी माँ नन्दा का पूजन तांत्रिक अनुष्ठान स्वरूप किया जाता था अतः चंद शासकों ने भी इसी रूप में भी नन्दा का पूजन करना उचित माना. इस वार्षिक महापूजन में महाराज की कुलदेवी, माँ नन्दा, गढ़देवी (लालमंडी किले में प्रतिष्ठित) सहित नगर में अवस्थित व प्रतिष्ठित नवदुर्गाओं का विधिवत् पूजन किया जाता रहा. आज जो तीन प्रतिमाएँ अल्मोड़ा मंदिर में स्थापित है उन्हें माँ तारा के तीन स्वरूप एकजटा, अनिरूद्ध, सरस्वती व नील सरस्वती माना जाता है. कालान्तर में राजा बाजबहादुर चंद के बाद भी चंद शासक नन्दा की मूर्तियों को गढ़वाल से लाते रहे और विजय की यह एक परम्परा सी बन गई. 

1766 में राजा जगतचंद ने जब गढ़ प्रदेश में आक्रमण किया तो उन्हें नन्दा की मूर्ति नहीं मिल पाई तब उन्होंने 200 स्वर्ण अशर्फियों से मूर्ति बनवाकर राज मंदिर में स्थापित करवाई. इससे पूर्व 1699 में भी नन्दा की मूर्ति लाने का उल्लेख मिलता है. चंद शासकों ने अपने शासन काल में कई मंदिरों-भवनों का निर्माण किया. खगमरकोट, लालमंडी किला, विष्णुदेबाल, मल्ला महल, तल्ला महल, पार्वतीश्वर, उ‌द्योत्चंदेश्वर, दीपचंदेश्वर, ड्योड़ीपोखर जैसे कई अनुपम कलात्मक सुंदर दुर्ग व मंदिर उनके वास्तु प्रेम को दर्शाता है. 1680 में उद्‌योत चंद ने महल बनवाना आरम्भ किया पर खुदाई में वहाँ अत्यधिक ततैये निकलने लगे अतः राजा ने वहाँ दो शिव मंदिर बनवाए – उद्योतचंदेश्वर व पार्वतीश्वर. यह मंदिर समूह गोरखा काल से ही नन्दा देवी मंदिर कहलाया जाने लगा था. 1777 में राजा दीपचंद की सता कर हुई, हत्या के फलस्वरूप कीलन हेतु उ‌द्योतचंदेश्वर में एक मंडपाकृति बनाकर उसमें राजा दीपचंद की प्रतिमा स्थापित कर कीलन किया गया जो आज भी वहीं विद्यमान है. इसे दीपचंदेश्वर कहा जाता है.

कहा जाता है कि अंग्रेजों ने सिटोली हीराडुंगरी और अंत में उद्योतचंदेश्वर में तोप लगाकर लालमंडी किले पर गोरखा शासकों पर अतिम प्रहार कर नगर में प्रवेश किया. मल्ला महल को कमिश्नरी बना दिया गया. वहीं स्थापित काल भैरव व नन्दादेवी के मंदिर में पूजा अर्चना व निरंतर बलि होने से कमिश्नर जार्ज विलियम ट्रेल त्रस्त तो था ही अतः 1816 में उसने कालभैरव को किले की खाई में व नन्दादेवी को दीपचंदेश्वर में स्थानान्तरित करने का आदेश पारित कर दिया. तब से नन्दा माँ की प्रतिष्ठित पीठ के रूप में वर्तमान नन्दादेवी मंदिर में ही समस्त पूजाएँ सम्पन्न होने लगीं जो आज भी सुचारू हैं.

समय चक्र चलता रहा राजा द्वारा सम्पन्न किया जाने वाला राज उत्सव शनैः शनैः लोक उत्सव में बदल गया. देश में राजशाही समाप्त होते-होते नन्दा के वार्षिक पूजन ने एक पारंपरिक लोक उत्सव का रूप ले लिया. अल्मोड़ा नगर की एक विशेषता यह भी रही कि राजशाही समाप्त हो जाने के बाद भी नगरवासियों ने परंपरा के निर्वहन हेतु चंद वंशजों को हमेशा अपना राजा ही माना व उसी सम्मान, आदर व मर्यादा का निर्वाह किया जो पूर्व में होता रहा था. आज भी वर्तमान चंदवंशज महाराज के.सी. सिंह बाबा जी को महाराज के रूप में पूजा जाता है. उन्हीं के द्वारा देवी का षोडषोपचार विधान से पूजन किया जाता है.

वर्तमान में नन्दादेवी की पूजन प्रक्रिया प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि से प्रारम्भ होती है. पंचमी को पुजारी गोधूलि की बेला में जगरियों व गणमान्य व्यक्तियों के साथ शुभ लग्न में ढोल नगाड़ों के साथ कदली वृक्ष पूजन हेतु प्रस्थान करते हैं. कुछ दशक पूर्व तक कदली स्तम्भ के लाने का स्थान भी पारंपरिक रूप से नयाल खोला में काली मंदिर के समीप हुआ करता था जहाँ पंचमी को गोधूलि बेला से देर रात्रि तक नन्दा जागर और राज वंशावली जगरियों द्वारा गायी जाती थी. कहा जाता है कि जागर जब अपने चरम पर पहुँचता था तो झुरमुट के कुछ कदली वृक्षों में कम्पन होता था और तुरंत उन वृक्षों पर प्रहार कर चिन्हित कर लिया जाता था.

वर्तमान में नगर के अन्य क्षेत्रों से भी कदली स्तंभ लाये जाने लगे हैं. षष्ठी को सायं व रात्रि जागर होता है. सप्तमी की प्रातः चयनित कदलीस्तम्भों को लाने हेतु ढोल-नगाड़ों व राजकीय निषाण के साथ जाकर विधि-विधान के साथ स्तम्भों को काट कर नन्दादेवी मंदिर परिसर में लाया जाता है जहाँ इनका पुनः पूजन होता है. पूजा के उपरान्त मंदिर प्रांगण में प्रतिमा (डिकारे) बनाने की प्रक्रिया आरम्भ होती है. इन डिकारों का स्वरूप हू-ब-हू वही होता है जो नन्दा देवी पर्वत शिखर पर दृष्टिगोचर होता है. मंगोल, तिब्बती व पहाड़ी महिला के मिले-जुले जो नैन-नक्श इस पर्वत में दिखने वाली छवि के हैं उसी का प्रतिरूप इन डिकारों में बनाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि नन्दा पर्वत पर दिखने वाली यही छवि इन डिकारों के प्रारंभिक निर्माताओं की प्रेरणा है. सप्तमी रात्रि को प्रतिमा निर्माण के पूर्ण हो जाने के उपरान्त राजा द्वारा देवी की चल-प्रतिमा (हिटौ-डिकारों) की प्राण प्रतिष्ठा कर पूजन किया जाता है. अष्टमी को प्रातःकाल से ही पूजन आरम्भ हो जाता है.

दिनभर अन्यान्य लोगों द्वारा पूजा व बलिदान आदि किया जाता है. रात्रि में परंपरानुसार तांत्रिक षोडषोपचार विधि-विधान से देवी तारा के तीनों स्वरूपों – एकजटा, नील सरस्वती व अनिरूद्ध सरस्वती का पूजन किया जाता है. शस्त्र पूजनोपरान्त उससे बलि दी जाती है. इस अनुष्ठान में अष्ट बलि का विधान है जिसमें एक बिना सींग का बकरा भी है जिसे नन्दा के परम सेवक लाटू को समर्पित किया जाता है. इसके अतिरिक्त भैरव व क्षेत्रपाल को भी भोग दिया जाता है. देवी पूजन के बाद मंदिर के गर्भगृह को बन्द कर अन्दर गुप्त पूजन किया जाता है और यंत्र को खोल कर उसका पूजन कर अभिसिंचित किया जाता है. यह नितान्त गूढ़ एवं गुप्त पूजन होता है तथा अन्त में महिषबलि के उपरान्त राजा अपनी प्रजा की सुख शांति व समृद्धि का आशीष माँ से मांगते हैं. इस पूरी समयावधि में नन्दा जागर व राजवंशावली का गायन चलता रहता है.

नवमी तिथि को प्रातः पूजन के बाद बकरों व महिष की बलि दी जाती है व डोला आरम्भ किया जाता हैं. यह डोला (शोभा यात्रा) प्रमुख बाज़ार से होकर राजा आनन्द सिंह के निवास ड्योढ़ी पोखर होता हुआ नगर क्षेत्र से गुज़रता हुआ अंततः छावनी में स्थित राजनौली पहुँचता है जहाँ राजपरिवार व अन्य उपस्थित लोगों द्वारा विदाई हेतु पूजन व आरती करके डिकारों का विसर्जन कर दिया जाता है. कुमाऊँ में यह परंपरा है कि मंगलवार, गुरूवार तथा शनिवार को डोला नहीं उठाया जाता है. 

राजा की इस नितान्त वैयक्तिक शाही पूजा में प्रजाजन की भागीदारी स्वभाविक थी. राजा प्रसन्न तो प्रजा खुशहाल. दोनों पक्ष अपने आनन्द को उजागर करते हैं राजा उत्सव की घोषणा करते हैं तो प्रजा नाच गाकर अपने आनन्द को दर्शाते हैं. पूजा के उपरान्त इस राजकीय पर्व के आल्हाद ने संभवतः इस पूजा को एक महोत्सव में परिवर्तित कर दिया. किंचिंद् यहीं से इस पर्व में हमारी समृद्ध लोक सांस्कृतिक विधाओं का समावेश हुआ होगा जिसका वर्तमान में तीव्रगामी क्षण हो रहा है. आज यह महोत्सव एक विराट मेले के रूप में विख्यात है. जब इस राज उत्सव ने मेले का रूप ले लिया तो इससे व्यापारिक गतिविधियाँ भी जुड़ने लगी निःसन्देह यह एक नितान्त धार्मिक मेला था परन्तु जहाँ जन सैलाब उमड़ा वहाँ विकासशील समाज के नाम पर व्यापार के आयाम खुले.

सभी ग्रामीण इस मेले के बहाने अल्मोड़ा, हाट आते. पूजा-अर्चना के बाद अपनी ही मौज-मस्ती में झोड़ा, छपेली, चांचरी, भगनौल, भजन इत्यादि नाच-गाकर देवी माँ के मंदिर परिसर को गुंजायमान करते थे फिर अंतिम दिवस बाज़ार से आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी करके शोभायात्रा के मार्ग में आने वाले घरों की छतों में बैठ कर डोले का आनन्द लेते थे. दस-बारह वर्ष पूर्व तक यह सब सहज रूप में होता था. गाँव के गाँव हुड़का, ढोल, दमुआ, नगाड़े के साथ झोड़ा, छपेली, चांचरी, भगनौल, भजन इत्यादि के गायन से नगर को गुंजायमान करते हुए मंदिर परिसर में प्रवेश करते थे फिर नन्दा के सम्मुख रात भर बैर-भगनौल, झोड़े के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित करते थे. सारा क्षेत्र बस नन्दामय हो जाता था. इतने सुसंस्कृत, धार्मिक व सभ्य वातावरण में जुआ, मदिरा, अभद्रता, उदण्डता, उत्श्रृंखलता के लिये कोई स्थान नहीं था.

ना कोई पुलिस ना प्रशासन सब स्वेच्छा से अपने-अपने कार्य सम्पादित करते थे. यश, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा के लिये कोई प्रतिद्वन्दिता नहीं थी. नन्दा मैया के लाडले बस माँ की सेवा के लिये तत्पर रह कर समस्त कार्य सम्पादित करते थे. इस बात की प्रतीक्षा नहीं रहती थी कि शासन, प्रशासन, सरकार कितना अनुदान देगी अथवा नगर के निवासी कितनी आर्थिक सहायता करेंगे. तब सभी क्रिया-कलाप आम ग्रामीण, शहरी जनता की भागीदारी से लगभग निःशुल्क होते थे और ऐसी सेवा में आत्मा का वास होता था इसीलिये मैया उन सभी पर सदैव दैण रहीं परन्तु जब से आम जन को पुलिस बैरिकेट से रोककर रंगीन बैच लगे व्यवस्थापकों के माध्यम से रंगमंच पर कार्यक्रम करवाने की प्रथा का प्रार्दुभाव हुआ तक से इस आयोजन से पारंपरिकता व लोक का पुट दूर होता गया.

आज यह स्थिति आ गई है कि पूरे मेले के दौरान एक भी व्यक्ति हुडका, बिणई और अलगोजा लेकर नगर में स्वेच्छा से गाते हुए नहीं दिखाई देता है. रंगमंच में कुछ चर्चित चेहरे आकर मेले में रंगमंचीय कार्यक्रमों का उद्घाटन करते हैं. सूर्यास्त होते-होते अधिकांश उद्दण्ड, असामाजिक तत्व दर्शक दीर्घा में विराज जाते है. फिर चंद सरकारी पंजीकृत सांस्कृतिक दल पारंपरिकता के नाम पर क्षेत्रीय बोलियों के कुछ फूहड़ नवीन प्रयोग श्रोताओं पर थोप कर भुगतान प्राप्त करके चले जाते हैं. अंतिम दिवस फिर वही कुछ चर्चित चेहरे इस मेले के समापन की घोषणा कर इस मेले से “क्या पाया क्या खोया की गणना करते हुए अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करते हैं. विगतं कुछ वर्षों में यह भी देखने को मिला कि मेले की अवधि को व्यापारिक गतिविधियों के कारण मनचाही समयावधि के लिये बढ़ा दिया गया.

यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या माँ नन्दा अपने लाड़लों से ऐसे ही संस्कार और व्यवहार की अपेक्षा करती है? यह उचित समय है कि माँ के श्री चरणों में हम अपने आठ दोषों व दुर्गुणों की अष्टबलि अर्पित करें तथा माँ से प्रार्थना करें कि वो हम पर सदैव दया दृष्टि बनाए रखें.

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