सामाजिक उत्पीड़न को सम्पूर्णता में व्यक्त करते हैं ‘जागर गीत’

सामाजिक उत्पीड़न कुमाऊँ के लोकगीतों में अनेक प्रकार से उभरा है. इन गीतों का कोई अंग यदि इस उत्पीड़न को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है तो वह है कुमाऊँ के ‘जागर गीत’. आंचलिक देवी-देवताओं से सम्बन्धित इन गाथाओं और गीतों का एटकिन्सन आदि अंग्रेज विद्वानों ने और कई भारतीय पंडितों और वैज्ञानिकों ने एकांगी विश्लेपण किया है. उन्होंने इन्हें कुमाऊँ के लोगों के अंधविश्वासी होने का एक सुबूत बताया है.

इसका कारण यह है कि गांव में जब भी कोई आफत आती है तो लोग यह स्वीकार कर लेते हैं कि यह कोई दैवी प्रकोप है, और यह प्रकोप किसी भूत, प्रेत, पिशाच या चुड़ैल को माध्यम बनाकर उन पर आरोपित किया जा रहा है. जानकार को बुलाकर, जिसे ‘गणतुवा’ कहते हैं, सही भूत, प्रेत या चुड़ैल का पता लगा लिया जाता है और फिर दिन निश्चित कर उसे नचाया जाता है. उसका ‘जागर’ लगाया जाता है. 

जागर लगाते समय उस देवता, भूत, प्रेत, चुड़ैल के विषय में जगरिया गाता है और डंगरिया (नृत्य करने वाला) नृत्य करता है. विधि-विधान के अनुसार पूजा होती है. जागर की समाप्ति पर अक्सर देखा गया है कि बीमार ठीक होने लग गया है और प्रकोप घटने लगा है. यह तो निर्विवाद है कि यह सब अंधविश्वास है. पर कुछ ‘विश्वास’ तो है. और विश्वास के पीछे जो कहानी छिपी हुई है, वह कारुणिक है. आखिर इसकी उत्पत्ति क्यों हुई? 

इस प्रश्न का सही उत्तर ‘जागरों’ के असली रूप को स्पष्ट कर देता है. ये जागर गीत वास्तव में सामाजिक उत्पीड़न के विरुद्ध उत्पन्न हुई जन-साधारण की सामूहिक प्रतिक्रिया की कलात्मक अभिव्यक्ति हैं, उनका रूप भले ही अन्धविश्वासी क्यों न हो! जिस उत्पीड़न का तत्काल विरोध नहीं किया जा सका, जिसे रोका नहीं जा सका, उसका विरोध इन गीतों के सृजन द्वारा किया गया. 

कुमाऊँ के जागर गीत (जिन्हें कई लोग केवल अंधविश्वास के प्रतीक मानते हैं) मैक्सिम गोर्की के इस कथन की पुष्टि करते हैं- “The religious thought of the toiling masses should be placed in quotation marks since it represented a purely artistic creativeness.”

मोहन उप्रेती की किताब कुमाऊनी लोकगीत से साभार

इसे भी पढ़ें : उत्तराखंड की जागर गाथाएं

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