कला साहित्य

युगमंच नैनीताल : रंगमंच और सिनेमा जगत को नामचीन कलाकार देने वाला थिएटर ग्रुप

उत्तराखण्ड में रंगमंच के विकास की गरज से साल 1976 में ‘युगमंच’ की स्थापना की गयी. चार दशक के अपने सफर में युगमंच हिन्दी रंग जगत की उन चुनिंदा संस्थाओं में गिना जाता है जो पूरी प्रतिबद्धता, समर्पण और शिद्दत के साथ संस्कृति और रंगकर्म को लगातार विकसित करता रहा है. रंगमंच के लिए यह दौर इतना आसान भी नहीं रहा और उत्तराखण्ड राज्य के नैनीताल जैसे छोटे पहाड़ी कस्बे में तो यह और ज्यादा मुश्किल है. इसके बावजूद युगमंच ने चालीस साल का सफर न सिर्फ सफलतापूर्वक पूरा किया बल्कि इस दौरान रंगमंच और सिनेमा जगत को अतुलनीय योगदान भी दिया. (Yugmanch Theatre Group Nainital)

युगमंच नाट्य शिविर में, बाएं से : ज़हूर आलम, हरीश पंत, अनुपम खेर, उमेश त्रिपाठी

युगमंच जैसी संस्था के गठन का विचार चालीस वर्ष पूर्व तब आया जब कुमाऊँ के चन्द बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों व रंगकर्म से जुड़ी मशहूर हस्तियों ने पहाड़ के लोक साहित्य, कला व लोक रंगकर्म को सहेजने व आगे बढ़ाने के विचार से एक संस्था के निर्माण की परिकल्पना की. इन महानुभावों में मोहन उप्रेती, लेनिन पंत, तारादत्त सती, , ब्रजेन्द्रलाल साह, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा, शरत चन्द्र अवस्थी, के.पी.साह, शेखर पाठक जैसी हस्तियों का योगदान रहा. प्रो. डी.डी. पंत, ब्रजमोहन शाह व चन्द्रलाल साह जैसे मनीषियों का इसको पूर्ण संरक्षण प्राप्त था.

आल इण्डिया ड्रामा कम्पटीशन – जहूर आलम और ललित तिवाड़ी

अपने विकास क्रम में युगमंच एक सांस्कृतिक संस्था की सीमा लांघकर एक अनौपचारिक नाट्य विद्यालय के रूप में विकसित हुआ और युगमंच से प्रशिक्षित होकर अब तक 17 कलाकार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के लिए चुने गए हैं— ललित तिवाड़ी 1977-80, नीरज शाह 1982-85, सुदर्शन जुयाल 1983-86, ईशान त्रिवेदी, विकास महाराज 1983-86, सुनीता अवस्थी 1984-87, इद्रीस मलिक 1984-87, निर्मल पाण्डे 1986-89, सुवर्ण रावत 1986-89, योगेश पंत 1987-90, ज्ञान प्रकाश 1991-94, सुमन वैद्य 1993-96, सुनीता चन्द 1994-97, ममता भट्ट 1994-97, गोपाल तिवारी 1996-99, हेमा बिष्ट, दाऊद हुसैन 2002-05.

नाटककार श्री गोविन्द बल्लभ पंत से बेस्ट एक्टर प्राइज़ ग्रहण करते हुए.

7 फिल्म व टी.वी. संस्थान पुणे (FTII) के लिए चुने जा चुके हैं — सुदर्शन जुयाल, बेला नेगी, राजीव कुमार, निर्मला चन्द्रा, राजेश शाह, राजेश तिवारी, बतुल मलिक.

युगमंच- नाट्य शिविर 79 – बाएं से : अनुपम खेर, ज़हूर आलम, उमेश त्रिपाठी

इसके अलावा युगमंच के दर्जनों अन्य रंगकर्मी भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ, इण्डियन थियेटर, चण्डीगढ़, हिमाचल नाट्य व शोध संस्थान, मण्डी आदि अन्य राष्ट्रीय संस्थानों के लिए भी चुने गये हैं.

अपने जन्म से अब तक युगमंच ने लोक परम्परागत व आधुनिक शैलियों में लगभग सवा सौ स्तरीय नाटकों का मंचन किया है —  अंधा युग, अंधेर नगरी, नगाड़े खामोश हैं, दाज्यू शेखर, नाटक जारी है, कबिरा खड़ा बजार में, समरथ को नहीं दोष, मेन विदाउट शैडोज, इडिपस, खड़िया का घेरा, हेमलेट, अनारो, सराय की मालकिन, एल्डरसन, पोस्टर, गिरगिट, अजुवा बफौल, जार्ज पंचम की नाक, खूबसूरत बला, दुलारी बाई, चन्द्रहास, जिन लाहौर नई देख्या, दूसरी दुनिया, तीन कैदी, लड़के लेंगे उत्तराखण्ड, ईदगाह, सरकार का जादू, अस्तित्व, धूप का टुकड़ा, महर ठाकुरों का गाँव, बेगार,नारदमोह, महानिर्वाण, स्वांग-99, फट जा पंचधार, अक्ल बड़ी या शेर, पोस्टमैन, एग्रीमेंट, कगार की आग, सोने की मछली, टोबा टेक सिंह, कोर्टमार्शल, हानूश, हंसी मार्किट, जयनन्दा, गोपुली बुबू आदि प्रमुख हैं.

युगमंच नाट्य शिविर- बांए से : उमेश त्रिपाठी, थ्रीश कपूर, जहूर आलम, अनुपम खेर

अपनी चार दशक की यात्रा में युगमंच ने न केवल सौ से अधिक अविस्मरणीय नाटक किये वरन नाट्य समारोह, कार्यशालाएँ, नुक्कड़ नाटक समारोह, संगीत समारोह, लोक उत्सव, फिल्म समारोह तथा सेमिनार आयोजित किये हैं.

रंगमंच के साथ ही संस्था दम तोड़ती स्थानीय लोक विधाओं को पुनर्जीवित करने का काम भी कर रही है. 1997 से होली महोत्सव जैसी महत्वपूर्ण पहल के जरिये पहाड़ के परम्परागत होली गायन व नर्तन की लुप्तप्राय विधा को संजीवनी प्रदान की है. परिणामस्वरूप पहाड़ी होली की यह विशिष्ट विधा अपने पूर्व स्वरूप में लौटकर नई पीढ़ी तक पहुँच रही है. कुमाउँनी होली की इस गौरवशाली परम्परा से नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए युगमंच प्रतिवर्ष होली की कार्यशालाएँ भी आयोजित कर रहा है. महोत्सव में प्रतिवर्ष बुजुर्ग होल्यारों को सम्मानित भी किया जाता है. साथ ही होली गायकों के डाक्यूमेंटेशन का कार्य भी प्रगति पर है. होली महोत्सव के अतिरिक्त संस्था ने नुक्कड़ नाटक समारोह और नैनीताल फिल्म फेस्टिवल की परिकल्पना को भी साकार किया और कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों का भी निर्माण किया.

जिन लाहौर नई देख्या, बायं से : ध्रुव काण्डपाल, मुकेश धस्माना, जावेद हुसैन, जितेन्द्र  बिष्ट मदन मेहरा

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौर में भी युगमंच की भूमिका और सांस्कृतिक सक्रियता देखते ही बनती थी. प्रभातफेरी से लेकर नुक्कड़ नाटक, आन्दोलन के गीतों का गायन और नये गीतों की रचना, पुस्तिकाओं का प्रकाशन, कैसेट निर्माण, पोस्टर प्रदर्शनी और जलसे-जुलूसों के जरिये आन्दोलन को ऊर्जा देने में संस्था ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अनौपचारिक नाट्य विद्यालय का काम करते हुए युगमंच समय-समय पर नाट्य प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करता रहा है. इनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, संगीत नाटक अकादमी व संस्कृति विभाग के सहयोग से बहुत से सफल नाट्य शिविर आयोजित किये हैं जिनमें देश के जाने-माने प्रख्यात रंगकर्मियों ने प्रशिक्षण देते है.

उत्तराखण्ड की संस्कृति की समझ बढ़ाने और लोक कलाकारों को रु-ब-रु करने के लिए युगमंच ने समय-समय पर विषयपरक लोक रंग कार्यशालाओं का आयोजन किया है जिसमें बड़ी संख्या में लोक कलाकारों और संस्कृति के ख्यातिलब्ध विद्वानों ने हिस्सेदारी की है. इसी क्रम में “एक विरासत को सुनें’ जैसे कार्यक्रम ‘उत्तरा’ के सहयोग से आयोजित किये.

युगमंच प्रतिवर्ष संगीत समारोह, कवि सम्मेलन व विभिन्न सांस्कृतिक विषयों पर सेमिनार आदि का भी आयोजन करता है. तबला नवाज संगीतकार विनोद कुमार की स्मृति में दो दिवसीय संगीत समारोह आयोजित होता है. संस्कृतिकर्मी, जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ और प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की याद में ‘गिर्दा-वीरेनदा’ कवि सम्मेलन 2016 से प्रारम्भ किया जा रहा है.

युगमंच ने नैनीताल में जन संस्कृति मंच के साथ मिलकर 2009 में उद्देश्यपूर्ण फिल्मों को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए और देश व दुनिया में बन रहे सार्थक सिनेमा जो आमतौर पर दर्शकों की पहुँच से दूर है, ऐसी फिल्मों से आमजन को रु-ब-रु कराने के उद्देश्य से ‘नैनीताल फिल्म फेस्टीवल” का आयोजन किया जा रहा है. युगमंच ने डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण में भी पहल कदमी ली है. केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के लिए ‘उत्तराखण्ड के लोकनृत्य डाक्यूमेंट्री बनाने के साथ ही युगमंच के दिवंगत रंगकर्मियों निर्मल पाण्डे और गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ पर भी लघु फिल्मों  का निर्माण किया है. कुमाउँनी होली गायकों के डाक्यूमेंटेशन का काम भी किया जा रहा है, जिसे जल्दी ही पूरा कर लिया जायेगा.

युगमंच द्वारा कई सांस्कृतिक व साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन तथा गीतों के कैसेट व सीडी, डीवीडी का भी निर्माण किया. एक और महत्वपूर्ण काम जो संस्था ने किया है, गिर्दा के निर्देशन में 1983 में बने तीन जागर कैसेट का डिजिटलाइजेशन कर पुनर्प्रस्तुत किया. युगमंच अपनी रंगयात्रा-चालीस वर्षों का सफर एक नजर एक स्मारिका ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित करने जा रहा है. जिसमें युगमंच के साथ ही उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक इतिहास-भूगोल और नाट्य आन्दोलन को समेटने का पहला प्रयास होगा.

युगमंच के लिए यह बड़े गौरव का विषय है कि उत्तराखण्ड से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कई बार नाट्य प्रस्तुतियों का अवसर मिला है. इसके साथ ही 2002 व 2015 में एनएसडी के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह ‘भारंगम’ में नाट्य प्रस्ततियाँ देकर प्रशंसा प्राप्त की है. इसके अतिरिक्त कई बार संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली, भारत भवन और मध्य प्रदेश कला परिषद भोपाल, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी और संस्कृति विभाग, लखनऊ महोत्सव, उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग के समारोहों, विरासत देहरादून, हिन्दी अकादमी, नई दिल्ली तथा देशभर में विभिन्न स्थानों पर नाट्य व सांस्कृतिक प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया गया है. 

युगमंच प्रतिवर्ष संगीत समारोहों, कवि सम्मेलन और मुशायरों का भी आयोजन करता है जिसमें स्थानीय व आमंत्रित कलाकारों की भागीदारी होती है. इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक मुद्दों पर कई गोष्ठियों का भी आयोजन किया गया है.

संस्था द्वारा प्रतिवर्ष साहित्यकारों, लोक कलाकारों, गायकों तथा वरिष्ठ संस्कृति कर्मियों का सम्मान भी किया जाता है.

पिछले 20 सालों से प्रख्यात रंगकर्मी जहूर आलम द्वारा युगमंच का सफल सञ्चालन किया जा रहा है.

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Sudhir Kumar

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