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थियेटर इन नैनीताल – उमेश तिवारी ‘विश्वास’ की एक ज़रूरी किताब

नैनीताल में थियेटर का इतिहास करीब एक शताब्दी पुराना है और नैनीताल नगर ने लम्बे समय से रंगमंच के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई हुई है. ललित तिवारी, निर्मल पांडे, सुदर्शन जुयाल, सुनीता रजवार, ज्ञान प्रकाश, सुमन वैद्य सरीखे कितने ही नाम हैं जिनकी शुरुआती रंगमंचीय दीक्षा नैनीताल में हुई. राष्ट्रीय स्तर की इस पहचान के बनने के पीछे न जाने कितने ही अनकहे किस्से-कहानियां छिपे हुए हैं. नैनीताल की रंगमंच परम्परा के अभिन्न हिस्से रहे उमेश तिवारी ‘विश्वास’ ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘थियेटर इन नैनीताल’ में ऐसी अनेक कहानियों को दर्ज किया है.

नैनीताल के डी.एस.बी. कैम्पस के ऐतिहासिक ए. एन. सिंह हॉल में में आयोजित हुए कार्यक्रम में इस पुस्तक का विमोचन किया गया. विमोचन मशहूर उपन्यासकार-कहानीकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ के अलावा पूर्व सांसद महेंद्र पाल सिंह, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डी.के. नौडियाल, डी.एस.बी. परिसर के निदेशक एलएम जोशी, डीएसडब्लू प्रो. पी.एस बिष्ट, विश्वम्भर नाथ साह ‘सखा’ के हाथों हुआ.

रुपया ( 1956 )

रंगकर्म से गहरे जुड़े अनेक लोगों के अलावा नैनीताल के थियेटर के अभिन्न हिस्से रहे अनेक अभिनेता-निर्देशकों की उपस्थिति ने इस समारोह को यादगार बना दिया. यह एक ऐसा जमावड़ा था जिसकी लम्बे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी.

अपनी पुस्तक के विषय में उमेश तिवारी ‘विश्वास’ ने बताया कि ‘थियेटर इन नैनाताल’ में 1910 से लेकर 2010 तक नैनीताल में रंगकर्म की यादों को संजोया गया है. पुस्तक में प्रथम महिला रंगकर्मी से लेकर विश्व स्तर पर नैनीताल के ख्याति प्राप्त रंकर्मियों तक की जानकारी दी गयी है. पुस्तक में अनेक रंगकर्मियों की बहुत सी पुरानी तस्वीरें भी हैं. पुस्तक में 1956 में नैनीताल में स्वांग करते रंगकर्मी, 1954 में अभिमन्यु नाटक के कलाकार, 1954 का ही नैनीताल में प्रदर्शित रुपया के मंचन आदि की पुरानी तस्वीरें किताब में मौजूद हैं.

एचएमवी के मालिक का स्वांग करते हरिकिशन लाल साह ( बीच में ) 1956

पुरानी तस्वीरें और अनेक दुर्लभ दस्तावेज़ इस पुस्तक को और अधिक मूल्यवान बनाते हैं. नैनीताल के रंगकर्मियों के अलावा पुस्तक में पुराने समय नैनीताल में होने वाली नाटक प्रतियोगिताओं का भी जिक्र है. देश के अनेक हिस्सों से इन प्रतिभागी इनमें हिस्सा लिया करते थे. ‘थियेटर इन नैनीताल’ में केवल नैनीताल के रंगकर्मियों के विषय में ही नहीं बताया गया है बल्कि आस पास के इलाकों के अनेक रंगकर्मियों के कार्य की झलक भी किताब में मिलती है. इसके अतिरिक्त रंगमंच के इतिहास में स्थानीय रामलीला आदि के महत्व को भी रेखांकित किया गया है.

विमोचन के दौरान भी वक्ताओं ने नैनीताल के रंगमंच के इतिहास के विषय में चर्चा की. रंगकर्मियों ने 1910 से लेकर अब तक नैनीताल में रंगमंच के इतिहास पर बताया कि एक समय ऐसा था जब डीएसबी कालेज में एक ही प्रतियोगिता में बारह डिपार्टमेंट की बारह टीमें भाग लेती थी. इस तरह हर साल डीसबी कैम्पस में बारह नाटकों का मंचन होता था. इनको देखने हजारों की भीड़ आती थी. सिनेमा के आविष्कार के बावजूद रंगमंच ने अपना रंग नहीं खोया था.

नैनीताल में रंगमंच को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा देने वाली संस्था युगमंच के संस्थापक जहूर आलम ने अपने अनुभव को साझा करते हुये बताया कि एक समय नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में नैनीताल का सिक्का चलता था. नैनीताल में होने वाली नाट्य चैम्पियनशिप में भाग लेने देश के अलग अलग हिस्सों से कई नाट्य ग्रुप आते थे. दीगर है कि एक समय दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अर्थात नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में नैनीताल के छात्रों का ऐसा दबदबा था कि लोगों ने उसे नैनीताल स्कूल ऑफ़ ड्रामा कहना शुरू कर दिया था.

कालेज कॉम्पीटिशन के दौरान वर्ष 1976-77 और 1980-81 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री रश्मि पन्त और राजेन्द्र जुयाल ( दुलारी बाई का दृश्य )

नगर के वरिष्ठतम रंकर्मियों में से एक विशम्भर नाथ साह ‘सखा’ और प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने पुराने दिनों को याद करते हुये बताया कि कैसे उनके कालेज के दिनों में भी नाटक हुआ करते थे. कला, विज्ञान और कामर्स सभी संकायों के छात्र इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे. उन्होंने रंगमंच के गिरते स्तर पर भी चिन्ता व्यक्त की.

पूर्व सांसद महेन्द्र पाल ने इस बात पर जोर दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों की लोककला को पर्यटन से भी जोड़ा जाना चाहिये. लोक कलाओं के महत्व पर बात करते हुये उन्होंने बताया कि यह हमारे युवाओं को रोजगार दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

विमोचन कार्यक्रम के दौरान विभिन्न रंगकर्मियों ने चर्चा में इस बात पर चिंता भी व्यक्त कि वर्तमान में नैनीताल के रंगमंच का वह स्वरूप नहीं रहा जैसा पुराने समय में रहता था. इस पर सभी इस बात पर सहमत भी हुए कि युवाओं को रंगमंच से जोड़ना चाहिये और नये युवा रंगकर्मियों के साथ पुराने रंगकर्मियों को मिलकर एक परिपक्व चर्चा का भी आयोजन किया जाना चाहिये.

एक था गधा (1980)

अपने अनुभवों को नये युवा रंगकर्मियों के साथ साझा कर फिर से नैनीताल में रंगमंच का एक माहौल तैयार किया जाने पर भी चर्चा में सभी लोगों ने सहमति व्यक्त की थी. इस चर्चा में कई पुराने नाटकों के मंचन और उस दौरान हुई घटनाओं और उस दौर की चुनौती पर भी चर्चा की गयी.

चर्चा में अपने अनुभवों के आधार पर इसे पर्यटन आदि से जोड़े जाने के सुझाव भी दिये गये. इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार-सम्पादक दिनेश जुयाल, फिल्मकार-रंगकर्मी सुदर्शन जुयाल, के.के. पाण्डे, अजायब सिंह, हरीश पंत, अनिरुध्द कटौच, प्रो. एच. एस. बिष्ट, प्रो. संजय पंत, ओ. पी. पांडे, प्रो. संजय पंत, प्रो. नीता बोरा, डॉ सुरेश डालाकोटी, एलएम शाह, महेंद्र तड़ागी, प्रो. एबी मेलकानी,भुवन जोशी,कुलवंत सिंह,इंद्रीस मालिक ने अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन भास्कर उप्रेती ने किया.

– काफल ट्री डेस्क

पुस्तक ‘थियेटर इन नैनीताल’ को ज़ोर्बा प्रकाशन ने छापा है. इसे मंगाने का पता है – 

पुस्तक ‘थियेटर इन नैनीताल  का  मूल्य  200 रुपये. 

 

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