समाज

पहाड़ में काम करने न करने पर लोक विश्वास

पहाड़ में कुछ काम करने न करने पर कुछ लोक विश्वास भी बने रहे जैसे यात्रा करने में वारदोख का विचार. व्यक्ति की पूरब दिशा की ओर सोम बार और छनचर को पश्चिम की तरफ, इतवार और शुक्र को उत्तर की ओर, मंगल और बुद्ध को दखिन की ओर, बीपे या बृहस्पत को जाना ठीक नहीं, इसका बारदोख लगता है. (Traditional Belief In Kumaon)

ऐसे ही छनचर छाड़ मंगल मिलाप नहीं होता जिसका मतलब है कि शनिवार को घर छोड़ कर नहीं जाते और मंगल को रिश्तेदारी में नहीं जाते. बिरादरी में किसी के गुजर जाने पर मंगल, बीपे व शनि का दिन तय होता है.

सरकारी काम या नौकरी में जाने के लिए शनिवार व मंगल अच्छा माना  गया है. घर से बाहर जाते किसी का छींकना या रस्ते  में या दाएं छींक का स्वर या अपनी ही  छींक भी अपशकुन मानी जाती है.

बिराऊ या बिल्ली का रास्ता काटना, सुबह सबेरे किसी को नंगभूतंग या हगते देखना भी भंचक लगना माना जाता है. मंसाती या मासांत, संक्रान्ति, पुन्यु, अमूस व पर्व के दिन अजोत होता है, इन दिनों खेत  नहीं जोतते.

ऐसे ही सोते समय पश्चिम तथा दक्षिण की ओर सिरहाना नहीं रखते स्त्रियों के अलग होने के दिनों में उनके द्वारा भोजन पकाने, पूजा पाठ करने, साथ रहने सोने की  मनाही होती है. इसे क्वीड में रहना कहा जाता है. (Traditional Belief In Kumaon)

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago