Uncategorized

झड़पातली : पहाड़ियों का टाइमपास

वैसे तो पहाड़ के लोगों के पास इतना टाइम ही नहीं होता की उसे पास किये जाने के लिए कुछ किया जा सके. सुबह चार बजे से लेकर रात तक हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले पहाड़ियों की डिक्शनरी में शायद ही टाइमपास जैसा कुछ हो. Rare Traditional Food Of Uttarakhand

चौमास के दिनों दिनभर की घनघोर बारिश भी पहाड़ियों को उनके काम करने से नहीं रोक नहीं पाती. भरी बरसात में भीगते-भागते पहाड़ियों को अपने जंगलों से लकड़ी लाते, खेतों से घास लाते आज भी देखा जा सकता है.

पहाड़ में सर्दियां कड़ाके की पड़ती हैं फिर उसमें बरसात हो जाये तो उनका सारा काम ही रुक जाता है और कहीं चुपके से टाइमपास जैसा शब्द उनकी जिंदगी में घुस जाता है.

अब तो बाज़ार के नजदीक होने के कारण मूंगफली नाम का शहरी टाइमपास, गांव वालों की जिंदगी आ चुका है लेकिन एक समय था जब पहाड़ में लोगों के पास अपना एक टाइमपास हुआ करता था. इस टाइमपास का नाम है झड़पातली.

अब केवल ठेठ पहाड़ी गावों में ही झड़पातली बनाने का रिवाज है. झड़पातली का अर्थ बारिश के दिन कुछ भुना हुआ बनाने से है. लम्बे समय तक जब बारिश हो या सर्दियों में जब बारिश हो तो गांव में लोग आस पड़ोस वालों के साथ मिलकर बनाते हैं झड़पातली.

अगर घर में भट्ट हों तो भट्ट भूनते हैं, गेहूं हों तो गेहूं भूनते हैं या मक्का हो तो मक्का भूनते हैं. जिसे ज्यादा होने पर कड़ाही में और कम होने पर तवे में बिलकुल हल्की आंच में भुना जाता है. फिर इसे गुड़ की कटकी के साथ खाया जाता है.

फोटो : सोशियल मिडिया से साभार

अपने पड़ोसियों के साथ पहाड़ी गपशप करते हुए, गुड़ की कटकी के साथ इस साथ झड़पातली के दिव्य स्वाद का आनन्द लेते हैं और अपने संघर्ष भरे जीवन में सुकून के कुछ लम्हे बिताते हैं. Rare Traditional Food Of Uttarakhand

-काफल ट्री डेस्क

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

View Comments

  • बरसात के दिनों में भुने हुए अन्न का रिवाज लगभग हर राज्य में किसी न किसी रूप में मिल ही जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के आस-पास भी घरों में सुबह से ही दिन में भूनने के लिए मक्का ,चना ,मटर ,जोड़री आदि को हल्का सा नाम करके रख दिया जाता और दोपहर के खाने के बाद शाम ढले उन्हें चूल्हे पर बालू पड़ी पतीली में सींकों वाली झाङू से पकड़ने वाली साइड से चला कर भूना जाता था। एक ओर से बरसात से भीगी मिट्टी की सौंधी -सुगंध दूसरी ओर से भुने हुए दानों की सम्मोहित करती गंध सबका जी ललचाती थी।

Recent Posts

पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता

इस बार करीब 9 साल बाद पिथौरागढ़ जाकर एक बात साफ दिखी कि यहां कुछ…

3 days ago

अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें

आस्था और विश्वास की प्रतीक श्री नंदा देवी की भक्ति में इन दिनों पूरा उत्तराखंड…

6 days ago

अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक

उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं रहे हैं. वे लोकजीवन की…

6 days ago

सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन

पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की…

1 week ago

उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज

1970 के दशक का उत्तराखण्ड का ‘चिपको आंदोलन’ विश्वविख्यात है. यह तथ्य भी कमोबेश ज्ञात है कि…

1 week ago

कामिनी तुम कौन?

पानी बरस रहा है. जब भी पानी बरसता है, देखता हूं पेड़-पौधे बहुत खुश हो जाते…

1 week ago