सुसाट मन को कपोरता है. लग जाता है एक उदेख जिसके अंदर कुहरा जाती है बाली कुसुमा की ओसिल कहानी. सरयू आज भी सिसकती है.
इतना तो समय बीत गया. विदित नहीं अब देवराम और सरूली दीदी जीवित होंगे भी कि नहीं. किंतु मेरी स्मृति में अभी भी सजीव है कपकोट गांव की वह रात जब मैं सरयू के किनारे से कुछ दूर पर बने देवराम के घर आंगन में बैठा वाली कुसुमा की कहानी सुन रहा था. देवराम गा रहा था और सरूली दीदी उसके बालों को दोहरा रही थी. नीचे सुसाट रही थी सरयू और मैं अभी बहा जा रहा था बाली कुसुमा की कहानी में. रात उदास थी गाथा और भी उदास. गाथा के मुख्य बोल थे – “बाली कुसुमा फूल ढवो.” यानी बाली कुसुमा फूल की तरह झर गई, बिखर गई. गाथा गायकों ने कथा के बोल कहने शुरू किए-
बाली कुसुमा फूल ढवो
पैदा है गेछ फूल ढवो
गोदी को भौ फूल ढवो
स्वर्गों की कन्या फूल ढवो
धुरी के शिकार को निकला था राजा वैशाली शाल. कपकोट से 2 या 3 मील दूर चिरपतकोट की पहाड़ी में गढ़ था उसका. 62 साल का बूढ़ा राजा था वह. धुरी के शिकार अर्थात चट्टानी काँटों और शिखरों पर डोलता रहा दिन भर. रात हो गई. कपकोट गांव के सिरहाने पर था वाली कुसुमा के पिता का मकान. कुसुमा की मां भीतर रोटी बना रही थी. बाहर आंगन में कुसुमा को गोद में लिए उसका बाप लोरी के लहजे में जाने अनजाने कुछ गुनगुना रहा था. उसने जो कुछ गाया होगा उसे मैंने भी देव राम और सरुली दीदी के कंठों से सुना. वह मिलकर गा रहे थे-
बाली कुसुमा फूल ढवो
लाडली चेली फूल ढवो
ठुल होली कुसुमा फूल ढवो
बैशठी शाला का फूल ढवो
त्वेकैं बेवूंलो फूल ढवो
तैई बखता फूल ढवो
बैशठी शाला का फूल ढवो
कुड़े की कर्याणी फूल ढवो
सुणि भली है छ फूल ढवो
आयो पटांगण फूल ढवो
ढोक दी है छ फूल ढवो
सौरा कै हा छ फूल ढवो
लोरी के बोलों में कह बैठा बाली कुसुमा का बाप. यही कि वह अपनी कुसुमा को रानी बनाएगा. उसे राजा बैशठी शाल को ब्याहेगा. उसी समय मकान के पीछे से आंगन की ओर बढ़ रहा था राजा बैशठी शाल. उसने हंसी मजाक में कुसुम के पिता को झुककर ढोक दे दी. हाँ प्रमाण कह दिया. ससुर जी कह दिया. कुसुम के सनकी पिता ने राजा को दामाद कहा और आशीर्वाद दिया. बाली कुसुमा वाग्दत्ता हो गई. लौट गया राजा अपने चिरपत कोट के गढ़ को.
कुसुमा इकलौती थी इसीलिए अपने माता पिता को प्यारी थी. वह बढ़ती गई. सयानी और सुंदर होती गई. सरयू के किनारे से कुछ दूर देवराम के आंगन में कुसुमा की कथा भी आगे बढ़ती गई. रात भी आगे बढ़ती गई. सूरज का सुसाट भी बढ़ता रहा रात के सन्नाटे में.
दिन दूनी है छै फूल ढवो
रात चौगुनी फूल ढवो
दुतिया की जूना फूल ढवो
पून्यू है गेछ फूल ढवो
गैला पातलों में, मखमली चरागाहों में घुरड़ की मस्त पठ्ठी की तरह कुलांचे भर्ती सुंदरी कुसुमा अब बालिका न रही. वह समझने लगी थी की रसीला लछमुआ गोचर में अलगोजा बजाता हुआ स्वरों की भाषा में उससे क्या कुछ नहीं कह जाता था. कुसुमा की सुंदरता के गीत फरसाली और सनेती के मेलों में गाए और सराहे जाते थे. छैला लोग उसे देखने को ललचाया करते थे. सारे दानपुर में महकती थी कुसुमा की गंध! लेकिन वह फिर भी बाली कुसुमा ही रही, अपने मां बाप और पड़ोस के लिए. हां वह वाली कुसुम आ ही रही है गाथा गायक देवराम के लिए –
बाली कुसुमा फूल ढवो
आंग की झंगुली फूल ढवो
छै रे म्हैणा फूल ढवो
नानी है जैंछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
गीत की आंगी फूल ढवो
छै रे म्हैणा में फूल ढवो
छोटि पड़ी जैंछ फूल ढवो
कुसुमा बढ़ती गई. उधर बैशठी शाल बूढ़ा होता गया. उसे कुछ भी तो नहीं पता था. वह तो नहीं जानती थी वह राजा को वाग्दत्ता है. जानता था तो केवल उसका सनकी पिता.
लोकगाथा कहती है अंतिम दिनों में कामुक राजा की वासनाएं और अधिक उमड़ गईं. कुसुमा के सौंदर्य की महक उसे उकसा गई.
उसने कुसुमा के पिता के पास जोलिया भेजा –
मेरा हो सौरा फूल ढवो
कौला करारा फूल ढवो
के भूली गोछा फूल ढवो
दीयां बचन फूल ढवो
पूरी करी देला फूल ढवो
मंगसीरा मांसा फूल ढवो
आपुणी चेली को फूल ढवो
आंचव करी दिया फूल ढवो
गीत को आगे बढ़ाते बढ़ाते देवराम और देबुली की आंखें भर भर आई थी. रात ओसिल होती गई कहानी बोझिल होती गई. मेरा मन भी रुँधने सा लगा.
कामुक राजा बूढ़ा और जर्जर हो गया था. बीमार पड़ा और दम तोड़ गया. विवाह लग्न के पूर्व ही वह अपने कुसुमा को विधवा बना गया. चिरपतकोट के गढ़ से उसकी डोली नहीं अपितु अर्थी भ्यू बगड़ की और सरयू और खीर गंगा के संगम की दिशा में चल पड़ी. कुसुमा के सनकी पिता को खबर पहुंचाई गई. दस दुश्मनों ने उसकी खिल्ली उड़ाई कि उसकी बेटी की रानी बनने की बेला आ गई. सनकी बूढ़ा बौखला गया. उसने वाग्दत्ता बेटी का कन्यादान करने का संकल्प कर लिया. उसी समय कालू दर्जी से कुसुमा के लिए इकहार लहंगा और इकहार पिछौड़ा सिलवाया गया. शुभ और मंगल के सूचक हैं यह इकहरे वस्त्र. कुसुमा को सजाया-संवारा गया. ढोली बुलाए गए. लेकिन ढोल भी इकहारे ताल में बजाए गए. डोली उठाई गई कुसुमा की. आगे-आगे राजा की अर्थी चली और पीछे से कुसुमा की डोली.
सरयू और खीर गंगा के संगम में चिता के रूप में बनी विवाह की वेदी लगन का मंडप. डोली में बैठी कुसुमा फूट-फूट कर रो रही थी और सिसकते हुए पूछ रही थी अपने पागल पिता से –
ओ मेरा बौज्यू फूल ढवो
आज की लुकुड़ी फूल ढवो
इकारी किलै छ फूल ढवो
ओ मेरा बौज्यू फूल ढवो
आज की ढोलकी फूल ढवो
आज को बाजो फूल ढवो
इकारी किलै छ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
रवेधाणा लगैछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
झांकरी लुचैंछ फूल ढवो
देवराम और देबुली रो रहे थे. सरयू सिसक रही थी. रात पिघली जा रही थी. दोनों गाथा गायकों के गले रुंधे हुए थे. घड़ी मौन रहे. गा नहीं सके. मैं भी सुन न सका. सब कुछ चुप था. थम सा गया था. केवल व्याप्त था अर्धरात्रि का सन्नाटा और उसको चीरता उस सरयू का सुसाट जिस सरयू के तट पर चिता के रूप में विवाह का मंडप सजा था. बहुत पहले सुदूर अतीत में. कुछ देर को मौन रहने के बाद गाथा गायकों ने हिचकोले खाते हुए स्वरों में कथा का समापन आरंभ किया –
बैशठी शाला का फूल ढवो
चित्ता पड़यूँ छ फूल ढवो
काठी कफना फूल ढवो
आंचव बांधो फूल ढवो
भ्यूं का बगड़ फूल ढवो
फेरा है गया फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
फिटकार दींछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
फेरा रिटेंछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
चित्ता चढ़ेंछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
सत्ती बनेंछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
कथां ल्हैगेछ फूल ढवो
बाली कुसुमा फूल ढवो
काथ रै गे छ फूल ढवो
सरयू आज भी सिसकती है. सुसाट मन को कपोरता है. लग जाता है एक उदेख जिसके अंदर कुहरा जाती है बाली कुसुमा की ओसिल कहानी.
(विख्यात नाट्यकर्मी, रंगकर्मी बृजेन्द्र लाल साह का यह दुर्लभ लेख पुरवासी के लोक कथा विशेषांक 1988 से साभार)
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