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उसके इशारे मुझको यहां ले आये

पिछली कड़ी : मैं जहां-जहां चलूंगा तेरा साया साथ होगा

पहले दिन उनका पहला पीरियड खत्म हुआ तभी से ये कुछ अजीब सी उथल पुथल हुई थी कि द्वन्द नाम का शब्द अर्थ देने लगा. कुछ उथल पुथल कर गया.

त्रिपाठी जी की क्लास में,मैं बड़े आनंद से भर गया जो उन्होंने पूछा, बता दिया जो उन्होंने कहा उससे अपनी कॉपी के चार पांच पेज भी भर लिए. हर नई बात नया पन्ना.पीरियड खतम हुआ. पीछे बैठा गिरीश आया.

अबे साले तू तो उनके मुखतिर चाणक्य कह गया था पहले दिन? बस चनकट नहीं पड़ा. नाम ही नहीं सच्ची में चाणक्य हैं, रंगोल देते हैं जरा भी मनकस न हुई तो. कहते हैं सुनी सुनाई परम्परा से उबर जाओ. अपना संसार बनाओ अपनी कल्पना अपनी सोच.

मेरे मन में यह चाणक्य डोलता रहता.

अगला पीरियड पेंडुलम का है. फिजिक्स वाले. गिरीश बोला.

पेंडुलम यानी जीवन दा. हाथ में चौक पकड़े बोर्ड के इर्द गिर्द डोलते रहते. वह तो मेरी पदी बुबू के लड़के हूए. मेरे ददा. यहीं ऐ एन सिंह हॉल में उनका नाटक मिर्जा ग़ालिब मैंने दिनेश दा के साथ देखा था, वह उसके हीरो थे. वह कहानियाँ भी लिखते थे और पी सी एस की तैयारी भी करते थे. नए बाजार से ऊपर जो सड़क पुलिस थाने को जाती है उसके ठीक बीच ऊपर को चढ़ उनका घर था. वहां मैं अक्सर जाता. मेरी बुआ, पदी बुबू खूब खिलाती उनके हाथ के बने बेसन के लड्डू तो गजब ही स्वाद. जगरिया हलवाई क्या बनाए ऐसे लड्डू. भूगोल से एम ए कर चुकी जया दिदी और हमेशा कुछ न कुछ लिखते कोई चित्र बनाते गोविन्द बल्लभ पंत जी जो बड़े नाटककार थे उनका कोहिनूर का लुटेरा नाटक मैंने पढ़ा था. गोरखा लाइन स्कूल में पढ़ते वहीं सबसे पहले मुझे मिले थे हरीश चंद्र सती मास्साब जो अंग्रेजी पढ़ाते और नाटक कराते. मुझे देख उपेंद्र नाथ अश्क के नाटक रीढ़ की हड्डी में मुझे नौकर का रोल मिला.फिर गोविंद बल्लभ पंत जी के लिखे खूनी लोटा में मैं ओझा बना. तारा चंद्र त्रिपाठी जी को मैंने अक्सर इनसे बतियाते भी देखा था. वो बातचीत मेरी समझ में आने भी लगी थी उसमें किस्से होते, इतिहास होता और उसका झूठा सच भी.

दुर्गा लाल साह म्युनिस्पिल लाइब्रेरी करीब रोज ही जाते. अब इंटर में आते दो जगह जाने का क्रम बना. लाइब्रेरी से ठीक ऊपर करीब आठ दस मिनट चढ़ जो रास्ता पड़ा उसके नीचे मोहन निवास जिसमें रहते थे हमारे हाई स्कूल के प्राचार्य गिरीश चंद्र पांडे. उनके घर का आकर्षण दो छोटे लम्बे कान वाले क्रोकर स्पेनियल कुत्ते थे. आते ही उनकी लसपस शुरू होती. उनका छोटा बेटा सुशील हमें उनके खूब खेल दिखाता. प्रिंसिपल साब के बगल में गुरुवर का वास था. उनके घर जाने को अच्छी तरह से रखी और खूब मेहनत से लिखी कॉपी होती. अक्सर अलग अलग विषयों में लिख फिर देखने की बात वह कहते और मैं जुट जाता उनकी किताब जुटाने में. डी एस बी की विशाल लाइब्रेरी थी जिससे मेरा बड़ा गहरा जुड़ाव था. घर पर गुरुदेव की काया बिल्कुल अलग. कुरता पैजामा स्वेटर कभी चक्क कभी नुचा मुसा. सब ओर किताबें.

“हम आजाद हो गए पर शिक्षा तो वही दोयम दर्जे की है. यहीं देख लो एक से बढ़ एक कॉलेज हैं सेंट जोसफ सेंट मेरी बिरला. ये जहां आज डी एस बी है वहां पहले वेलेजली था.गर्ल्स स्कूल. बहुत बड़े कांट्रेक्टर हूए मालदार साहिब उनने दान दिया इस कॉलेज के बनने में. पिथौरागढ़ भी खोला इंटर कॉलेज. उनका व्यापार देश विदेश चलता था. सरकार की सही मति थी जो इसे विशिष्ट महाविद्यालय बनाया. जानते हो इस के पहले प्रिंसिपल कौन थे?”

मैंने हाथ खड़ा किया, बोला, सर प्रोफेसर ए एन सिंह.मेरे बप्पा जी तो हर बखत उनके ही गुण गाते. “हां, बड़े गणितज्ञ. और क्या मालूम है इसके बारे में? फिर कॉलेज के सारे विद्वान प्राचार्य के बारे में वह बताते. कौन किस विषय का विद्वान है. डॉ के एन श्रीवास्तव की बड़ी तारीफ करते जिन्हें दोस्त लोग काला भूत कहते. परती साब थे, बॉम्बवाल साब थे, डॉ छैल बिहारी गुप्त थे.मैंने तो अपना बचपन इसी कॉलेज में बिताया था.

बप्पाजी यहां के पहले हेड क्लर्क थे और तो और मेरा जनम भी यही इसी कॉलेज में हुआ ऊपर जहां आज संस्कृत विभाग है. बड़ा होने तक यही रहे.हमारे घर के नीचे जो मैदान था उसमें एन सी सी होती थी. शाम को वहाँ कुर्सी डाल सब धूप तापते थे. लाइब्रेरी थी उससे लगी जिसमें में ऐसे ही खूब जाता. उसमें मेरे ताऊ जी थे ख्याली राम बिष्ट जी. वो मुझे खूब चित्रों वाली किताब दिखाते थे.वो लाइब्रेरियन थे. किताबों की दुनिया में मगन. उनकी सार संभार में व्यस्त. कितनी रंग बिरंगी किताबें उन्होंने मुझे दी थी.

“देखो”. त्रिपाठी जी बताते थे,” एक माहौल होता है जिससे बहुत कुछ अपने आप सीखा जाता है. यह एक तस्वीर है बड़ी मोहक. पर हर जगह नैनीताल नहीं.अंग्रेजों की बसाई ये बस्ती नहीं. मेट्रोपोल होटल नहीं, रिंक थिएटर नहीं, बोट हाउस क्लब नहीं, अपना डी एस बी नहीं. इससे हट के वह जगहें, दूर गांव,सुदूर सीमांत के गाँव जहाँ सड़क नहीं स्कूल नहीं.स्कूल जहां है भी तो बस एक कमरा एक कुर्सी एक ही श्याम पट एक ही चटाई और एक ही अध्यापक. अब जो वह गांव है उसके उच्च कुलीन यह भी सोचते हैं कि कहीं यहां से पढ़े लिखे बच्चे शहरों के बड़े स्कूल में पढ़ रहे उनके बच्चों से प्रतियोगिता न करने लगें.

यही हाल इस डी एस बी कॉलेज का भी किया गया. जब ये खोला गया तो यू पी के और कॉलेजों कि तुलना में यहां प्रोफेसरों की तन्खा ज्यादा थी. जब चंद्र भानु गुप्ता की सरकार बनी तो उसने सारी खास सुविधा दी थी वह खतम कर दीं. धीरे धीरे पतन होता गया. हमारी राजनीति का स्वभाव ही ऐसा दोगला है. वह सुविधा वाले -सुविधा हीन, अमीर गरीब, बड़ी जात छोटी जात को ध्यान में रख नीति बनाती है.यहां भी मैदान -पहाड़ को ले नीति बनी. इन नीतियों को भरमाने में बड़े चालाक दिमाग काम करते हैं. ये ही हैं इस युग के सामंत. चालाक ठेकेदार”.

मुझे तब अपने घर के आगे से घोड़े पर सवार बड़ा पैसे वाला ठेकेदार याद आने लगता था. जुबली बिला से ऊपर उसकी कोठी थी. कितने नौकर कितने माली. एक माली तो बिचारा कुबड़ा हो गया था. जब भी में उससे फूल मांगता तो वह मुझे उसके पौधे देता. कितने कंटर काट उनमें मैं उन्हें लगाता.ठेकेदार की कोठी तो कितने फूल लता बेल से सजी थी. उसके पास घोड़े भी थे उसके एक नौकर ने बताया था कि एक काला घोड़ा बीमार हो गया था तो साब ने उसको गोली मार दी. फिर हमने दिन भर जंगल में खड्डा खोद उसे खड्या दिया. ठेकेदार के पास कई कारें भी थीं.इन्हीं में बैठ वह बोट हाउस क्लब जाता और रात अधरात उसका ड्राइवर उसे कोठी तक लाद लाता. राजभवन वाली सड़क पर भी उसकी लम्बी वाली कार जाती दिखती. उसकी दो बीबियां थी एक बहुत मोटी, थुल थुली और दूसरी फ़िल्मी हीरोइन जैसी. बड़ी बीबी हमेशा उदास जैसी दिखती तो छोटी खूब मस्त. वह तो कितनी बार सड़क से गुजरते हमें देख पास बुलाती और टॉफी देती. एक दो नहीं खूब सारी. बातें भी करती. हमसे पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछती. मुझसे हमेशा कहती गणित कैसा चल रहा? बीच बीच में अंग्रेजी में बोलती.

मुझे तब क्लास में सुनी त्रिपाठी जी की बातें याद आती और खूब गुस्सा भी आता. उन्होंने साफ कहा था, “जो भी बड़े देश हैं वहाँ उनकी अपनी भाषा बोली जाती है जैसे चीन और जापान और फ्रांस. हम ही हैं जिन्होंने अपनी भाषा में पढ़ाई लिखाई को दोयम दर्जे का बनाया. देश आजाद हुआ तो नेहरू ने देश को सम्बोधित किया अंग्रेजी में. क्या सिर्फ अंग्रेजी जानने वालों को ही आजादी मिली? बाकी गुलाम ही रहे”.

पता नहीं धर्मबीर की कोठी की ओर टहलते जब उसने मुझसे कहा कि कैपिटल में लगी बेनहर पिक्चर देखना, समझ में तो तेरे क्या आएगी, अंग्रेजी में है बस रथोँ कि दौड़ देख लेना तो मुझे झंग चढ़ गई. अंग्रेजों का गू चाटने वाले जैसी बात मैंने बड़े तीखे स्वर में उस इतरुआ छबीली,धर्मबीर ठेकेदार की दूसरी वाईफ से कह दी.ऐसे जैसे डिबेट में हाथ नचा स्वरों को आरोह -अवरोह दे हाथ पटक बोला जाता है. वह तो अचानक रुवांसी हो गई.हमारी पड़ोसन शीला जिसके डैडी डॉ शर्मा थे अंग्रेजी दवा वाले और मम्मी फ्रांस के एक बड़े अस्पताल में बड़ी नर्स,उसे तिमंजिले अपने घर ले गई. गीता और राकेश भी पीछे पीछे गए जो शीला से छोटे थे और हमारी धमचौकड़ी में हर समय शामिल.बाद में गीता ने बताया कि वह तो रोई खूब रोई. असल में उसके मम्मी पापा पार्टीशन में कतल कर दिए गए. वो बच गई. उसके ताया ने उसे उसे दूर हॉस्टल में रख दिया. फिर वह मुंबई आ गई.वह कोई अंग्रेज थोड़ी है. फ्रंटियर की है.

शीला, गीता, राकेश और उनके सबसे बड़े भाई विजय, हमारे पडोसी, उनके पापा बहुत बड़े डॉक्टर रहे फॉरेन में और मम्मी हेड मिस्ट्रेस. देश आजाद हुआ अपने वतन आ गए. दोनों कभी आपस में खूब गिट -पिट करते दिखते तो कभी खूब लड़ाई होती. शर्माजी पहाड़ी में गाली देने लगते हैं और मम्मी फ्रेंच में. अब मैं समझा कि गीता और राकेश को इत्ती गालियां कैसे आती हैं. पहाड़ी गालियों में तो मेरी आमा भी जबरजंड हुई. अपने गांव गरम पानी में खेतों में खड़ी हो चिल्ला चिल्ला के उनके पुरखे तक तार देती देती जिनके बल्द और बकरी खेतों में घुस उजाड़ कर देते थे.

मोहन निवास में ही पता चला कि मेरे गुरु का गांव भी गरम पानी से आगे खैरना और फिर ऊपर मझेड़ा है. तब उनसे मैंने पूछा था ये माफ़ीदार क्या होते हैं?मेरे मामा भी माफीदार मेरी चाची के पिता जी भी बहुत पढ़े लिखे हो के भी माफीदार थे जिनके पास मामा से सौगुना ज्यादा जमीन थी.और अपने अपने गाँव की उस मिल्कियत में लोग बाग इन्हें राजसेब कहते, खास कर इनके साजी. मेरे नाना यानी छोटी चाची के बाबू बप्पा जी के लिए, जब भी वो आते किताबें लाते और खूब चर्चा होती. एक किताब सोशियल इकॉनमी ऑफ़ हिमालय उन्होने मुझे दिखाई जो इंग्लैंड में छपी थी और जिसके लेखक एस डी पंत थे, अपने नाम के नीचे ही पहले पेज में पंडित कृष्णा नन्द शास्त्री का आभार था. बहुत बाद में अपने सर चंद्रेश शास्त्री के जिक्र करने पर इसे मैंने पढ़ा भी था. उसके भी नाना हुए वह.. चंद्रेश चाची की तरफ से मेरा बड़ा भाई लगता था. बप्पा जी और नाना जी की खूब जमती थी. इन बड़े लोगों के साथ बप्पाजी खूब बोलते. नाना जी के साथ तो हारमोनियम ले बैठ जाते और मस्त बहार उभर जाती. अगल बगल से गंजू साब, डॉ खन्ना, भोज मास्साब, डॉ शर्मा, ऊपर थोड़ा दूर से अरगल साहिब. हरकिशन उर्फ़ गुरूजी के साथ दिलीप और धन सिंह सबको चाय पानी पेश करते. सग्गड सुलगाते. बप्पा की तो आवाज के एल सहगल से मेल खाती और नाना ऐसे आलाप लेते कि कई बार उनकी नाक से पानी चू जाता.

माफ़ी दार और ब्रिटिश शासन, ब्रिटिश राज और ठेकेदारी, जंगलात के नियम और लकड़ी के स्लीपर पर जो त्रिपाठी जी ने मुझे बताया तो कई बार मेरे आगे अंग्रेजों के आगे हाथ बांधे लोगों का चित्र बनने लगता जिनमें नानाजी और मम्मा जी सबसे आगे होते.एक बार तो छुट्टियों में गरम पानी जा वहां जड़बिला वाले दुमंजिले घर में मैंने उनसे कह भी दिया कि माफिदार तो अंग्रेजों के पिछलग्गू ही रहे. खुशामद करी और जमीन पाई. अभी भी हल तो कुंवरराम लगाता है. आपको राजसेब कहता है.

अपने औजारों को मिट्टीतेल से साफ करते उनपर ग्रीस लगाते बड़े शांत भाव से उनने मुझसे कहा जब फौज में गया था तो सब खेति पाती ईजा ने संभाली. गाय बल्द भी. ये कुंवरिया का कुटुंब हमारे बाबू के जमाने का है. इसके लिए अलग मकान अलग गोठ बनाया वहां जो खेत हैं उनकी साग सब्जी मसाले मिर्च अलग से गरम पानी बाजार में बेचता है वह. और कृष्णा नन्द शास्त्री जी वो फ्रीडम फाइटर रहे हैं. जेल भी गये लम्बे समय. अब तुम्हें मालूम है जमींदारी कानून आ गया है जिनकी पूरे गांव गांव जमीन फैली है वो सब सरकार काश्तकारों को बाँटेगी.

माल रोड पर साथ चलते ही त्रिपाठी जी ने मुझसे पूछा था कि अपने गांव जाता है कभी? मैंने बताया अपने गांव पल्यूं तो बप्पाजी कम ही ले गये हैं पर जब भी छुट्टी हों या जाड़े पड़ें तो गरमपानी जरूर भेज देते हैं जहाँ नानी है जिन्हें हम आमा कहते हैं. मामा भी आ गये हैं फौज से वापस. गरम पानी में जड़बिल और सिलटूना के राजसेब हुए वह. आमा ने तो मुझे बहुत घुमाया है. आगे मजेड़ा धनिया कोट तक और अपने सारे बिरादरों के यहां गर्मपानी बाजार के तिवार्री भोजनालय तक. नीचे गाड़ के बगल में खूब फैले सेरे तक जहां खूब सब्जी उगाती रहीं बस्सू ईजा.

त्रिपाठी जी ने बताया उनका गांव भी मझेड़ा. फिर बात आई पहाड़ी कुमाऊंनी बोली बोलने की.

ओंss कहा मैंने. ईजा चाची माया दी बोलते हैं घर में. गंगासिंग, हर किशन गुरू , नितुआ जो बप्पाजी के ऑफिस में काम करते हैं सभी कुमाऊंनी बोलते हैं.

कॉलेज के बड़े काबिल मालिज्यू दीनामणि सगटा जी तो बहुत ही मीठी पहाड़ी बोलते हैं. डंगवाल बाबू भी. और हमारे हाई स्कूल में गणित पढ़ाने वाले गुरूजी भोज मास्साब और उनके घर में सब, ठुल ईजा, अनिल दा भूपाल दा, इन्दर भैया सबसे पहाड़ी में बात होती है उनके वहां किरन तो खूब बढ़िया कुमाऊंनी बोलती है तो छोटी मंजू नाक से कें कें कर जब बोलती है तो हम उसको खूब चिढ़ाते है. तो जितने भी लोगों के मुख से जो कुमाऊंनी बोली सुनी वो भी अलग अलग तरह से बोली जाती है.

त्रिपाठी जी ने बताया था एक दिन क्लास में कि ये जो बचपन से अपने घर परिवार पड़ोसी मुहल्ले वालों के मुख से वह बोली बस जाती है दिमाग में. अब अगर परिवेश देश काल अलग हो तो अलग अलग समूह व या जातियों में इसमें बदलाव दिखेगा ही.यही कईं कुमाऊँ -गढ़वाल के गावों में अलग. जौनसार -हिमाचल में भी कुछ अलग.

ये जो गरमपानी की परिधि में धनिया कोट है वहाँ कुमाऊंनी में बोले जाने वाले ‘मैं’ के लिए बामण तो ‘मैं” शब्द का ही उच्चारण करता है पर हरिजन शिल्पकार ‘मि’ बोलते हैं. त्रिपाठी जी की बात बिल्कुल सही थी. मामा का साजी कुंवरिया यानी कुंवर राम ‘मि’ ही बोलता था. फिर उन्होंने बतलाया था कि स्यूँनरा कोट पट्टी में ब्राह्मण ‘मि’और गंगोलीहाट में ‘मु’ बोलते हैं. धनियाकोट में ‘मुझको’ के लिए ‘मुँक ‘ बोला जाता है तो साह यानी सौज्यू लोग इसे ‘मिकी’और बाकी लोग इसे ‘मेकिं’और

 ‘मेकें’ बोलते हैं.

बाद में उनके कई लेख पढ़े जिससे यह समझ में आया कि एक तरफ तो अलग अलग राठों में परिवार या समूहों में पहाड़ की बोलियों में उच्चारण अलग अलग तरीके से होता है तो कई वस्तुओं के नाम भी भिन्न – भिन्न जगहों में अलग कहे जाते हैं जैसे प्याज़ सब जगह प्याज ही कहा जाता है तो कोटाबाग में इसे ‘गंठि’ कहते हैं. मूली को कई जगह ‘मुल’ कहते हैं तो काली कुमाऊँ में ‘चोत’ बोलते हैं. मक्के को कहीं ‘जुनोल’ कहते हैं तो कहीं ‘घ्वग’, कहीं काकुनी तो कहीं भुट्टा. जामुन को कहीं ‘ जमण’ तो कहीं ‘फल्न’. कुल्हाड़ी को कहीं ‘रम्ट’ तो कहीं ‘बणकाट’. कैंची को ‘ कैचि’तो कहीं ‘लखमार’, खेत को ‘गड़’ तो कहीं ‘हाङ’, आग को कहीं ‘ऑग’ तो कहीं ‘आगु’ कहीं ‘भिनेर’ बोला जाता है.

त्रिपाठी जी लिखते हैं कि बोलियों के बदलाव पर कई झकझोर देने वाले प्रभाव पड़ते हैं. जैसे जब पहाड़ के इलाके में खस आए तो यहां की कोल, मुंड, किरात जातियों के पराभव के साथ उनकी बोलियां भी मृतप्राय होने लगीं. उनकी बोलियों के अवशेष अब बोली जा रही कुमाऊंनी बोली के कुछ शब्दों तक ही सिमट कर रह गई. ऐसा भी हुआ कि जैसे जैसे हिंदी का प्रयोग ज्यादा हुआ पहाड़ में बोली जाने वाली बोली का प्रयोग भी कमतर होते गया.

मुझे याद है कि हमारे पड़ोस में जब भी एक से बढ़ कर एक पडोसी घर की खूब बड़ी छत पर इकट्ठा हो बतियाते तो अधिकांश बातें गिटिर पिटिर अंग्रेजी में होतीं. इनमें जम्मू कश्मीर वाले इतिहास के धुरंधर प्रोफेसर इन्द्र किशन गंजू साब, कानपुर के जन्तु विज्ञान के प्रोफेसर साहिब शरण खन्ना, अंग्रेजी के परती साहब, पोलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अर्गल, एम बी बी एस डॉक्टर शर्मा जिनकी श्रीमती यानी हमारी ऑन्टी फ्रांसिसी थीं और हाईस्कूल में गणित पढ़ाने वाले भोज मास्साब थे जो कभी बस अल्मोड़ा छाप वाली कुमाऊंनी बोलते. पर जब इन घरों की महिलाएं जुट तीं तो पहाड़ी, देसी व हिंदी अंग्रेजी की खिचड़ी का महासंगम होता. होली के स्वांग में तो एक बार फ्रेंच ताई ने जागर वाली टोन में अपनी जाबिर काया से ऐसा कंप जगाया कि भोज मास्साब वाली काकी ने विभूति ही च्याँप दी. ऊपर बड़े ठेकेदार धर्मबीर की दोनों पत्नियां पंजाबी वाली हिंदी बोलती. उनमें छोटी वाली फैशनबल तो कुमाऊंनी में छूट गालियां दे खूब हंसती जो उसे दूध वाली मोतिमां ने सिखाई थीं.

अब महसूस करता हूं कि त्रिपाठी जी सही लिख गये थे कि ऐसे कई आर्थिक सामाजिक घटक भी हैं जिनका प्रभाव बोली जाने वाली भाषा पर पड़ता है. देश के अलग -अलग भू भागों में चली सम्पर्क भाषा में स्थानीय बोली के उच्चारण की छाप भी दिखाई देती है.

खूब फ़िल्में देखने के शौक से बम्बइया हिंदी, मद्रासी हिंदी, पुरबिया हिंदी, उत्तर पूर्व की हिंदी की झलक साफ होती गई. नैनीताल के श्रमजीवी डोटियालों की हिंदी जहां नेपाली के कई शब्द सिखा जाती तो कारीगरी वाले मुसलमानो से उर्दू के नुकते बिंदी के साथ ठेठ पहाड़ी टोन भी सुनने को मिलती. बप्पाजी कॉलेज में अब बरसर थे तो चलने वाले निर्माण और रखरखाव के कामों के लिए रामपुर, चंदौसी, मेरठ मुरादाबाद के ठेकेदार आते उनमें से कई चेहरे मैं कई साल से देख रहा था और उनमें से कई फर्राटे से पहाड़ी बोलते. नैनीताल होटल नगरी हुआ जहाँ कारीगरी की हमेशा मांग रहती.तल्ली ताल की पुरानी बाजार के हकीम साब हों या मेरे हाई स्कूल के कादरी मास्साब अजब उर्दू वाली पहाड़ी बोलते तो मल्ली ताल चौकोट रेस्टोरेंट के ठीक सामने वाला अपना मित्र यासीन जिसकी प्रसाधन की दुकान थीं वहाँ इत्र फुलेल भी मिलता और मुगली घुट्टी, औरतों के कमर दर्द मिटाने वाला कमर कस भी. सारी खरीद फरोख्त की बात पहाड़ी टोन में होती उर्दू के जुमलों के साथ. लाला श्याम सुन्दर पंसारी और किराना सेठ राम सिंह सरदार की सूरत न दिखे तो साफ लगता कि कोई ठेठ पहाड़ से आया बुबू बतिया रहा है. सस्ती किताब वाले बंगाली बाबू और ज्योतिष व काले जादू का माहिर कामरूप बंगाली जो बप्पाजी से दुर्गा सप्तशती पर बड़े शास्त्रार्थ करता व हर आधे घंटे बाद बड़े गिलास में चाय पीता की पहाड़ी टोन अलग ही होती.

त्रिपाठी जी ने लिखा भी था कि जो समुदाय बाहर से आए हैं उनकी मूल बोली के प्रभाव से बहुसंख्यक समुदाय की बोली का एक अल्पकालिक रूप विकसित होता दिखाई देता है. फिर जो भी बोली रूप हावी होता है वही शेष रहता है अन्य रूप धीरे धीरे विलुप्त प्राय हो जाते हैं.जो समुदाय अपने खास इलाके में आवागमन करते रहते हैं और बाहरी भागों से उनका संपर्क कम रहता है तो दुरूह व दुर्गम इन इलाकों में खेती पाती और पशुपालन,भेड़ बकरी व्यवसाय के साथ व्यापार में संलिप्त रही इन जनजातियों की बोली एक स्वतंत्र बोली के रूप में विकसित होती दिखाई देती है, जैसे कि तिब्बती बर्मी परिवार की दरमियाँ, व्यांसी और चौदांसी बोली. वहीं जोहारी में कुमाऊंनी प्रभाव ज्यादा है बोली का भी व खानपान रीति-रिवाजों का भी. इसी तरह सीमांत इलाके में अपेक्षाकृत सुविधा जनक स्थानों जैसे सोर की सोरयाली या सिराली व काली कुमु की कुमय्यां भी अपना अस्तित्व बचाये रखी है.सीमित बसासत व आबादी के साथ मुंडा परिवार की माने जाने वाली वन रावतों की राजी बोली भी अपनी पहचान बनाए रखी क्योंकि कुछ दशक पहले तक ये अन्य लोगों के सम्पर्क से कटे ही रहते. लकड़ी के जो बर्तन बनाते वह भी समीप के समृद्ध गावों की चौखट में रात को रख देते जिसका मोल वहीं गांव वाले अनाज रख चुकाते. फिर सरकार की सुध से कामधंधे , पढ़ाई, सेहत के लिए जब इनकी आवत जावत समीप के इलाकों से बढ़ी तो इनकी बोली पर भी प्रभाव पड़ा.

कभी कभी बड़े संयोग होते हैं. बड़े दद्दा को चार पांच दिन के लिए दिल्ली जाना था. ऑब्जरवेटिरी की पिकअप के साथ. उसने मुझसे पूछा चलता है. मैं ग्यारहवी में था, छमाही हो चुके थे. दिनेश दा भी मुरादाबाद से आया था तब वो के जी के कॉलेज में पोलिटिकल साइंस पढ़ाता था और नैनीताल वाले प्रताप भईया के साथ बहुत घूमता था. वह भी तैयार हो गया. बप्पाजी ने भी मौन सहमति दे दी और कॉलेज को जाते अपने बटवे से एक एक के पांच करारे नोट निकाल मेरे हाथ में रख दिए.

दिल्ली क्या देखा मेरी तो दुनिया ही बदल गई. उस पर दिनेश दा. बड़े दा तो अपने साथ आए डॉ मेहरा के साथ पिकअप ले अमेरिकन एमबेसी चला जाता और अखबार में कोई सूचना पढ़ दिनेश दा दोपहर बाद मुझे ले गया प्रगति मैदान.

वहाँ बंगाली सिनेमा का मेला लगा था. दिनेश दा ने पास लिया और फिर ऐसी फ़िल्में देख दीं कि उथल पुथल मच गई. कहाँ नैनीताल में लक्ष्मी सिनेमा में गोरखा लाइन स्कूल से भाग देखी दारा सिंह, रंजन और शेख मुख़्तार की फ़िल्में जिनमें खूब मार धाड़ के साथ खूब तेज नाच और गाने होते थे. शम्मी कपूर की जंगली और जॉय मुख़र्जी भी और कहाँ बंगाली भाषा की ये फ़िल्म महानगर, दूसरे दिन कापुरुष- महापुरुष, तीसरे दिन अपराजिता सब सत्यजित राय की फ़िल्में. ऐसा सच ऐसी हकीकत बयान करती कि मन कड़वा हो गया. दिनेश दा से छुप मैंने सिगरेट भी पी दी. चार्मिंनार. वह भी फिल्मों जैसी कड़वी. आखिरी दिन तो महेश दा भी आए. उनकी नासा के वैज्ञानिकों की मीटिंग हो चुकी थी और उन्होंने जो फ़िल्म देखनी तय की वह थी मेघे ढाका तारा थी. ये कहानी पूर्वी पाकिस्तान की एक शरणार्थी लड़की की थी जो अपने परिवार को बचाने कितने दलदलों में धंसती है. इसको लिखा था शक्तिपद राजगुरु ने और डायरेक्ट किया था ऋतविक घटक ने. मेरा तो दिमाग ही फाड़ दिया इसने. इतनी बंगाली कहाँ समझ में आती पर जो देखा. उफ. वापस गेस्ट हाउस लौट खाना खाने से पहले महेश दा, मेहरा साब और दिनेश दा कांच के गिलास में सफेद वोदका बिन पानी डाले पी रहे थे. पिकअप के ड्राइवर मोहन सिंह ने उनका ग्लास बना भीतर दिया तो इस बीच मैंने भी एक कप में डाली और सोंठ हो गया. वहीं गुम्म हो डायरी लिखने लगा. भीतर के दौर जब खतम हो तलत और हेमंत कुमार के गीत गाये जाने शुरू हूए तो मोहन दा ने खाना मंगवा लिया और अपना गिलास अलग बोतल से बना जरा मुझे भी चखा दी. वह हरकुलिस थी मेरे बप्पाजी की फेवरेट.

इंटर में हिंदी के दो प्रश्न पत्र थे दूसरा हमें मुनिन्द्र नाथ पांडे जी पढ़ाते. उनकी क्लास कब शुरू हो कब खतम होती पता ही नहीं चलता. कॉपी में नोट होने लायक भी कुछ नहीं. बस हास्य विनोद से रसखान शुरू होते और अद्भुत पराक्रम से श्याम नारायण पांडे. लगता सुनहरी नागिन देख रहा हूँ जिसमें महिपाल के हाथ आते ही तलवार नागिन में बदल रही है तो कभी अनीता गुहा. कभी गुरूजी की मक्खी कट मूछें रंजन जैसी लगती जो तलवार बाजी में माहिर था. कविता मेरी समझ में घुसी ही नहीं. बस भगवान दादा की तरह गोल नाचती रही गाती रही. उन्हें देख कभी कन्हैया लाल दिखता तो कभी जौनी वॉकर.हिंदी के साथ उर्दू और देहाती ठाठ बोली के संयोग से उनकी साहित्य की बातें सुनने में वैसी ही लगतीं जैसे मेरे द्वारा देखी जा रहीं हिंदी फ़िल्में जिनमें ज्यादातर हॉल से बाहर निकलते ही उड़ँ छू हो जातीं. पर कुछ ऐसी कि घूमती रहतीं परेशान करती रहतीं त्रिपाठी जी की बातों की तरह. कैपिटोल सिनेमा में लम्बे से साह जी के हाथ महिने भर चलने वाली अंग्रेजी फिल्मों का कागज लेते एक फ़िल्म पर उन्होंने पैन से लाल घेरा बना दिया और कहा ये जरूर देखना. उसका नाम था सिद्धार्थ.

बुद्ध जिसके बारे में त्रिपाठी जी से कई बार सुनते मेरी छटपटाहट शांत होती. अपने बप्पा का दिया रूटीन जो मेरा संस्कार बन रहा था कि प्रातः दुर्गा सप्तशती का विधिवत पाठ हो. तब चाय पी जाए. देवी के अभिनव स्वरूप हर कष्ट हर आपदा से मुक्ति दिला देने वाले विश्वास और दूसरी तरफ महेश दा का मनिफेस्टो. मैं तो उलझन में था. मुझसे अच्छी तो माया दी थीं जो मीरा के भजन गातीं रोती जाती और फिर घरेलू काम में लग जातीं. उनकी आवाज लता मंगेशकर से कम न थीं. वह हमको बताती कि उनके बाबू यानी हमारे ताऊ जी असमय ही चले गये.ताऊ जी बहुत बढ़िया गायक, संगीत प्रेमी थे और दिदी को शास्त्रीय गायन का प्रशिक्षण भी देते थे.वहीं महेश दा तो कोई पिठ्या लगा दे तो खट्ट पोछ देता. मैं बड़े अरसे तक ये झूला झूलते रहा.

बहते रहो बहते रहो. सब सांसारिक सुख त्याग सुन्दर पत्नी को सोया छोड़ सिद्धार्थ को राह मिली. दुख में ही जन्म है दुख ही दिनचर्या दुख में ही विलीन हो जाना है यही निर्वाण है. अपने खम्पा दोस्त के साथ कितने दीप जली रोशनी में चक्र घुमाते मुझे भी ऐसा लगा कि में मुक्त हो रहा हूँ और समाधि में बैठी फोटो की सूरत तो त्रिपाठी जी में बदलती जा रही है. पर मेरे दुख थे क्या? यही कि मैं पढ़ाई में फिसड्डी ही था. कोई फर्स्ट क्लास नहीं. त्रिपाठी जी के पेपर में सत्तर अस्सी तो मुनिन्द्र जी में चालीस, जीवन दा वाले फिजिक्स में अप तो बी डी जोशी वाले में डाउन, जे एँ पंत जी की आर्गेनिक व फिजिकल में कमाल तो नरेंद्र लाल साह जी की इंऑर्गनिक में फेल. बस अंग्रेजी थी जिसमें साधु संत से संयत जगदीश चंद्र पंत जी ने पता नहीं क्या जादू किया कि में सम पर रहा. जब वह क्लास में पढ़ाते तो उनका स्वर खींच लेता. इतने संवेदनशील कि चेहरे की एक शिकन या कॉपी पर पैन के रुकते ही पूछते एकदम. समझाते अपनी लहर में बहा देते. और कुछ पूछना है? मुझसे उन्होने कहा.

सर आपके हाथ में क्या लगा है? रोज ही देखता हूँ.

उनके हाथ और अध्यापकों से न थे. उनमें भूरी दरारें भी पड़ चुकी थीं. पीले तो रोज ही रहते थे.

खाना बनाता हूँ बेटा. बर्तन भी घिसता हूँ. ये धनिया हल्दी के दाग हैं बेटा. अब कभी नीम्बू से साफ करूँगा.

उनका लड़का मेरा दोस्त था. लम्बा, मुझसे भी ज्यादा सिंखचा. बोलता भी जल्दी जल्दी था.

उसको बताया.

मम्मी. उसने कहा. फिर वह रोने लगा.

दुख तो यह है. मैं सोचने लगा बप्पा जी को घर में वो सारे काम करने पड़ें जो ईजा माया दी और मेरी बहनें करती हैं तो?

मुक्ति का मार्ग क्या बुद्ध में है?

शिव में है. शिव का शाब्दिक अर्थ तो यह ही है न कि “जो नहीं है ” जो है, वह अस्तित्व और सृजन है. “जो नहीं है”, वह शिव है.

“जो नहीं है, उसका अर्थ है, कि यदि अपनी आँखों से हम जो भी दिखता है उसे देखें. इसके आगे देखा जाना तो आँखों की सीमा होगी. ज्ञान आश्वस्त करता है कि सूक्ष्म दृष्टि से बहुत सारी रचना देखी जा सकती है.दृष्टि यदि विशाल वस्तुओं पर जाती है तो विशालतम शून्य ही अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है. आकाशगंगा के बिंदु तो दृश्यमान रहते हैं पर उन्हें बांधे रखने वाली विशाल शून्यता दिखाई नहीं देती. इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहते हैं.

विज्ञान कहता है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है. तो क्या शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव कहा जाता है? हर मनुष्य के भीतर असीम रिक्तता के अनुभव से जुडा जो सारे सृजन का स्त्रोत है.यह त्रिपाठी जी ने बताया था, पर्त दर पर्त.

त्रिपाठी जी तो वही चित्रण करते थे जो दिल्ली यात्रा में मैंने सत्यजित राय की तीन लगा तार देखी फिल्मों में देखा और उस पर ऋतविक घटक. वोदका और रम. मेरा मन कहीं बदल गया.

खूब ठंड के दिन. ठिठुरती ठंड. लेट न हो जाएं कहीं की हांफ. ठीक समय पर क्लास शुरू. अक्सर पीछे तक की सीटों पर निगाह फिरा हाज़िरी पूरी. उस दिन तो मुँह से भाप निकल रही थी. ऊपर से बगल में फिजिक्स के प्रयोगशाला सहायक चार्ली बाबू ने बड़े सग्गड़ में आग जला धम धुकड़ी कर रखी थी. मेरे बगल में सुभाष बैठा था, सुभाष बनर्जी. दुर्गा पूजा और बंगाली फ़िल्में देखने के बाद मुझे ये झोल भात खूब भाने लगा था.

मन हो रहा ना, आग के पास बैठने का. तुममें से कोई ये भी सोच रहा होगा कि बरफ के गोले बनायें और फेंके. कोई इस बरफ में फिसलने घुसघुसाई का भी मन बना रहा होगा क्यों विवेक?

ये जो मन है ना वही इस हाड़ मांस के पुतले के बीच सबसे बड़ी ताकत है. यही मन धागे पिरोता है विचार के. विचार के अलावा मन जैसी वस्तु और कुछ नहीं. विचार ही मन का रूप है. विचार के अलावा इस चराचर जगत का कोई अस्तित्व है क्या?

ये मन तो मकड़ी का जाला है जिसे वह बुनती है और फिर खींच लेती है. यह मन ही है क्या जो जगत का जीवन प्रतिबिम्ब बनाता है.

अब सोचो कि मन के रूप को ढूंढने निकलें और मन गायब हो जाए तो क्या रहा? कोई स्वरूप? क्या मन किसी स्थूल पर हमेशा टिका है? वह कभी अकेला नहीं रह सकता? क्या यह मन हो है जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं? मन को ले खोज बीन करो. शरीर में जो “मैं” के रूप में प्रकट हो रहा है. इस मैं का विचार कहाँ से प्रकट हो रहा. हृदय से? वह तो खून पम्प करने वाली मशीन है. सुख क्या है. क्या ये सुख स्वरूप का सहज स्वभाव है. सुख और स्वरूप अलग अलग नहीं है. संसार की किसी वस्तु में कोई सुख नहीं है.

बुद्ध भी यही कहते हैं कि हम अपने अविवेक के कारण सोच लेते हैं कि तमाम प्रपंच की वस्तुओं से सुख प्राप्त होता है. अब मन तो है बाहर भटकने वाला. ये तुलना करता है. इसके पास ये, उसके पास वो. बस गांठ पड़ जाती है. अब तुम उसे तनाव कहो, दबाव कहो या कसाव. हो गई दुख की शुरुवात.जब इसकी इच्छाऐं पूरी हो जाएं तो यह फिर खुश. यही इसका सुख.

मुझे याद है जब एम ए में मैंने अर्थशास्त्र लिया तो हमारे हेड साहिब डॉ दिवाकर नाथ अग्रवाल ने यहीं से एडवांस्ड इकोनॉमिक थ्योरी की शुरुवात की थी. इच्छाएं, रूचि और पसंद जिनसे मिल कर बनी एक प्रवृति जिसे उपभोग कहते हैं. जितना उपभोग उतना जीवन स्तर ऊँचा उतनी समृद्धि. देश हो या व्यक्ति. पर यहां अकेला व्यक्ति नहीं है वह हाउसहोल्ड है जिसके सदस्यों से बना परिवार, कुटुंब, कुनबा, बिरादरी, समाज, क्षेत्र, इलाका, प्रान्त राज्य और देश. देश क्या है? पोलिटिकल बॉउंड्री. फिर आया विश्व. हर परिवार, समाज, प्रदेश देश के आचरण की नीति. नीतियों का अवगुँठन.ऐच्छिक वस्तुओं की प्राप्ति और उपभोग की लालसा. मन अंतरमुखी नहीं बहिरमुखी. अभी यह मान्यता भी कि अन्य बातें समान रहें. यह भी कि व्यक्ति विवेकशील है.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : मैं जहां-जहां चलूंगा तेरा साया साथ होगा

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