फोटो https://www.artmajeur.com से साभार
कार्तिग के महीने गांव के ऊपर नीचे की सारियां फसल काटने के बाद खाली हो जाती. आसमान बरसात के बाद गहरा नीला ये स्यो (सेब) जैसे बड़े बड़े तारों से अछप रहता. हम सब बच्चे चौड़ी फटालों वाले आँगन में अपने दोनों हाथों को फैला कर गोल गोल घूम के रिंग्गा पत्ती खेलते. खूब घूमने के बाद जब आँखे घूमने लगती सीधे आँगन की पाले से गीली फटालियों में लेट जाते और घूमती आँखों से पूरे आसमान के तारों को घूमते देखते. वो देखो खाट खटुली (सप्तऋषि मंडल). वो देखो ध्रुव तारा. तभी घर के भीतर से एक आवाज आती खूब करके खेलो रे छोरों झगड़ा मत करना.
वो किनारे पर वाला चम्म चमकता बड़ा वाला तारा मेरा. तारों को खोज कर उन पर अपना कब्ज़ा करने का ये खेल झगडे की शुरुवात कर देता. वो मेरा, वो मेरा और फिर लड़ाई झगड़ा, मार कुटाई शुरू. कोई बड़ी दिदी अपने भुला की पीठ में कस के मारती साले रोज मेरा वाला तारा हथिया देता है अपना तारा खुद खोज. मैंने नहीं खोजा अपने लिए और दिदी ने भी खोजा, न बड़ी दिदी. मारने से पहले वो सबसे बड़ी दिदी को भी अपने साथ मिला देती. भुला जोर से ह्वा ह्वा करके हल्ला मचा देता और तब दादी जी को हमारे बीच पड़ना पड़ता .
दादी वहीं किनारे पडी लकड़ी की ढेरी से एक मोटी लकड़ी उठाती हमको गाय बाछी जैसे हकात्ती चलो सब भीतर. हे ब्वै गोर बछरु भी सो गए अर इनको दिन भर उंदराते थौ नहीं पड़ती. पाला पड़ने लगा ये देखो ह्या सारा गुठ्यार गीला हो गया .
रात जब सारे गदेरों में भर जाती और ज्यूनी का उजास सारे पहाड़ों की चोटियों को थपकी दे रहा होता हम सब सुबह होने तक अपने घरों के भीतर घूस जाते. खाना खाते एक दुसरे की चुगली खाता, दादी इसने गोर बाछी को खेतों में हंकाते सुबेर न, गाय को ये मोटी लाठी चूटा था. हे न बाबा न गाय को कभी मत मारना. असगार देगी बाबा. जैसे उस औरत को दिया था न दादी. सबसे बड़ी दिदी ने अपना ज्ञान बघारा.
बस फिर हम सब शुरू हो जाते, कु औरत दादी. क्यूं दिया था उसे गाय ने असगार. तू तो कह रही थी गौड़ी बहुत भोली होती है. दादी कहती तुम सब अंगीठी के गोल घेरे में बैठो झगड़ा नि करना ह्वा. बांज के कोयलों से चिडकती अंगीठी के ऊपर अपनी हथेलियों को सकते हम गाय के असगार वाली कहानी का इंतजार करने लगते.
त सुनो भौत पुरानी बात है गरुड़ के अंडे से जगत नमान बन गया था. चारों तरफ जल थल. सब जीव जंतु, पौन, पंछी, पेड़ पौधे, कीड़े मकोड़े आपस में बोलते चालते, एक दूसरे की मदद करते प्यार से रहते. तभी कोई बीच में दादी को टोकता दादी बाघ भी, स्याल भी. अंगीठी के चटकते कोयलों की उजास से दमकते चेहरों में से दूसरा बोलता चुप बे, बाघ तो जीवों को खाता है वो कैसे दोस्त बन जायेगा.
कथा लगानी है कि नहीं दादी डपटती. चुप हो के सुनो, बस हुंगरे देते जाओ. त बाबा दूर एक जंगल में छोटे से गदेरे के किनारे एक गाय और एक औरत रहते थे. औरत गाय को धौली कहती अर गाय औरत को नंदी कहती. नंदी और धौली एक दुसरे के बिना कभी नहीं रहते. दोनों ने खूब मेहनत करके अपने लिए एक छोटा सा घर बना लिया और साथ रहने लगी. दोनों को एक दूसरे का सहारा रहता.
दोनों एक साथ बोलते हंसते कूदते बण जाते. धौली घास चरती और नंदी अपने खाने के लिए कंद मूल, फल फूल, जलाने के लिए लकडिया जमा करती. जहाँ नंदी जाती धौली भी खुड़बूड़ खुड़बूड़ उसके पीछे पीछे जाती. जहाँ धौली जाती नंदी भी जाती. रुमुक पड़ने पर दोनों अपने घर आ जाती. नंदी कहती हम दोनों हर समय दुःख सुख में एक दुसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे और धौली उसे अपनी जीभ से चाट चाट कर दिलासा देती हाँ हम ही तो एक दुसरे का सहारा हैं. नंदी आग सुलगाती और दोनों उसके पास बैठ के हंसते खेलते एक दूसरे के गले में हाथ डाल के सो जाती.
दिन जाते क्या लगता है बाबा दोनों जवान हो गए. जनानी जात बिचारी. एक दिन जंगल की तरफ जाते धौली नंदी का हाथ चाटते बोली तुझे एक खुशखबरी देनी है मै दुबस्ता(गर्भवती) हूँ. नंदी ने जोर से धौली की कौंली भरी और उसके सर को मलासते हुए बोली धौली मै बहुत खुश हूँ, ऐसी ही एक खुशखबरी तेरे लिये भी है मै भी दुबस्ता हूँ.
द बाबा दोनों खूब हंसी खूब रोई. उनकी बात सुन कर घुघूती घूर घूर करने लगी. सारे बन के पशु पक्षी जीवा जंतु कीट पतंगे अपनी बोली में खुशी मनाने लगे. बुराँस खिल कर दोनों के ऊपर अपनी पंखुड़ी गिराने लगा. दोनों के मुँह से बात क्या निकली कि हवा ने सरर से सारे बण में फ़ैला दी.
नंदी और धौली हर समय एक दुसरे का ध्यान रखते. जब धौली थक जाती नंदी उसे ऐसे सहलाती कि उसकी थक उतर जाती. जब नंदी थकती धौली उसे कुछ काम नहीं करने देती. दोनों अपने पेटों में उछलते लात मारते बच्चों को प्यार करती. एक दुसरे को दिखाती. नंदी बोली ,धौली कौन जाने हम दोनों में किसका बच्चा पहले होगा. जिसका भी होगा उसकी देखभाल मिल के करेंगी और हम दोनों के साथ पूरा बन तो है ही.
द बाबा यही बगत होता है जब जनानी जात के लिए ये सबसे कठिन दिन होते हैं, उसे सहारे की बहुत जरुरत होती है. होते करते दोनों के बच्चे पेट में कुबलाने लगे. उनके पैदा होने के दिन आने लगे. दोनों ने मिल कर अपने खाने पीने के लिए घास,लकड़ी,कंद मूल,फलफूल सब जमा कर दिए.
एक दिन क्या हुआ कि रात को अचाणचक नंदी धौली का नाम लेकर जोर जोर से रोने लगी. धौली ने ननंदी की कमर मलासी ,पैर दबाये,पेट मलासा.उसे समझ नहीं आ रहा था कि दर्द से लोट पोट लगाती, तड़फती नंदी के लिए क्या करे. नंदी बोली कमर दबा धौली मरती हूँ मै. नंदी की कराह ने आस पास के सारे जीव जन्तुओ में जाग लगा दी. धौली ने गरम पानी करके नंदी को पिलाने की कोशिश की पर नंदी की हाय हाय ने उसे बैचेन कर दिया.
तभी नंदी जोर से चिल्लाई और वहीं कहीं से उस घर के नए पराणी की हुंआ हुंआ रोने की आवाज आई. दोनों नंदी जैसे दो हाथ दो पैर के नन्हे से पराणी को देख के हैरान थी. नंदी की पीड़ा थम गयी. चारों तरफ खून और काला सा पानी फ़ैल गया. धौली ने सबसे पहले चाट चाट के बच्चे को साफ किया और एक किनारे सूखे में लिटा दिया. नंदी को गर्म पानी से धोया और बच्चे के पास लिटा दिया. बाबा तब तक बच्चा अपने छोटे छोटे पैरों से डगमगा कर खड़ा हो गया.
हम एक साथ आश्चर्य से बोले हैं बच्चा एकदम खड़ा कैसे हो गया. हमारे भुला भुली तो बड़े हो कर चलते हैं. दादी लाड से बोली, वही तो बाबा उस बगत तक इंसानो के बच्चे पैदा होते ही चलने लगते थे. बीच में मत बोलो चुप सुनो कथा.
धौली ने पूरे घर को साफ़ किया. नंदी के लिए कन्दमूल गरम किये पिलाया. सब काम निबटाने के बाद दोनों बच्चे के पास बैठ गयी और उसे लाड़ करने लगी. बण के सारे दगड्या भानु उन तीनों के लिए जो जिसके पास था ले कर आये. सबने बच्चे को प्यार किया. सारा बण एक नया पराणी के आने से झूमने लगा. घाम ने बादलों से कहा चलो हटो मुझे बच्चे को घाम देना है.
बादल बोले चल दूर हट , तेरे घाम से वो कुम्हला जायेगा मुझे छैल करना है. हवा बोली हटो तुम दोनों जादा मत बोलो मै धीरे धीरे झूम कर बच्चे को घाम छाया से बचाउंगी. फूल बोले हटो सब मैंने अपनी पाँखुरियों से बच्चे का बिस्तर बना दिया है. पेड़ों ने अपनी टहनियों से घर गर्म कर दिया. पंछी मीठे सर में गीत गाने लगे.
धौली तो उन दोनों की सेवा करके थकती नहीं थी. नंदी अपने बच्चे में इतनी मस्त हुई कि धौली से बात नहीं कर पाती थी. धौली ने इस बात का क्या बुरा मानना था. उसने नंदी और बच्चे की साज सम्हाल में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी. एक दिन रात को नंदी अपने बच्चे के साथ घनघोर सो रही थी कि धौली दर्द से अलटने पलटने लगी.
धौली ने नंदी को बहुत पुकारा, रोई गिड़गिड़ाई कि मेरी मदद कर दे पर नंदी ने अपने बच्चे के साथ करवट ली और कानो में तेल डाल कर सोने का बहाना करने लगी. धौली के बहुत बुलाने के बाद भी नंदी ने धौली की तरफ ध्यान नहीं दिया. होते करते धौली ने बच्चे को जन्म दिया. जीभ से चाट कर बच्चा साफ कर एक किनारे लिटा दिया और अपनी सफाई करने लगी.
तभी बच्चा डगमगाते हुए धौली के पांसों (थन) से चस चस दूध पीने लगा. नंदी तब तक भी सोती रही. नंदी के इस स्वार्थी व्यवहार को देख कर धौली को बहुत गुस्सा आया. आना ही था बाबा औरतों के लिए बच्चे होने का बगत ही सबसे कठिन होता है जब उनका शरीर बहुत कमजोर हो जाता है. ऐसे कठिन बगत जब नंदी काम नहीं आई तो धौली ने उसे असगार दिया हम जानवरों के बच्चे पैदा होते ही चलने लगेंगे और तुम आदमियों के बच्चे कई बरस तक तुम्हारे सहारे रहेंगे.
द बाबा क्या जमाने थे जो बोला सो हुआ. तब से जावरों के बच्चे पैदा होते ही चलने लगते हैं और इंसानों के बच्चे कई बरसों तक अपने बड़ों के मोहताज रहते हैं. धौली और नंदी के बच्चे एक साथ खेल कूद कर बड़े होने लगे. गाय रहती इंसानो के साथ है पर तब से उसने इंसानो से बोलना बंद कर दिया.
-गीता गैरोला
देहरादून में रहनेवाली गीता गैरोला नामचीन्ह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं. उनकी पुस्तक ‘मल्यों की डार’ बहुत चर्चित रही है. महिलाओं के अधिकारों और उनसे सम्बंधित अन्य मुद्दों पर उनकी कलम बेबाकी से चलती रही है. काफल ट्री की नियमित लेखिका.
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